फासलों के बीच सिमटती दुनिया

  बरामदे में रखी आराम कुर्सी पर बैठे माधव जी के हाथों में उनका टैबलेट था और उनके चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान तैर रही थी। पास ही बैठी उनकी पत्नी, सुमित्रा, अपने फोन पर किसी को अपनी नई बुनाई का डिजाइन समझा रही थीं। जो भी उन्हें बाहर से देखता, उसे यही लगता कि उम्र … Read more

एक अधूरी विदाई

यह सुनकर काव्या के आंसू छलक पड़े थे। यह खुशी के आंसू थे। बारह सालों की तपस्या पूरी होने वाली थी। कल रात भर वह सोई नहीं। उसने पूरा घर साफ किया, विवान की पसंद का गाजर का हलवा बनाया और अपनी उस लाल साड़ी को निकालकर इस्त्री किया जो विवान को बहुत पसंद थी। … Read more

मायके की दहलीज

“मम्मी, वो जो बनारसी सिल्क की साड़ी आपने दिखाई थी, वही भिजवाना मेरे लिए। और हाँ, काजू-बादाम, पिस्ता के साथ वो इंपोर्टेड चॉकलेट्स का बड़ा वाला पैक भी रख देना। मेरी जेठानी के मायके से बहुत भारी सामान आया है इस बार दिवाली पर। उनके रिश्तेदारों के सामने मेरा इम्प्रेशन डाउन नहीं होना चाहिए। आपको … Read more

वक्त का पहिया

 पार्वती ने यह सुनकर एक पल के लिए आसमान की तरफ देखा और सुकून से मुस्कुराती हुई बोली, “ईश्वर की माया भी कितनी अजीब है न! जो अपनी रफ्तार और मशीन पर इतना इतरा रहा था, वो आज पैदल हो गया। और हम, जो सोच रहे थे कि हमारी जिंदगी अब खत्म हो गई, भगवान … Read more

वह छाँव जिसे हम बेड़ियाँ समझ बैठे

“रोज-रोज की ये किचकिच अब और बर्दाश्त नहीं होती!” शिखा ने अपना हैंडबैग सोफे पर जोर से पटकते हुए कहा था। आज फिर वही बात हुई थी। ऑफिस से आने में थोड़ी देर क्या हो गई, उसकी माँ ने लगातार दस बार फोन कर दिया था। जब शिखा घर पहुंची, तो माँ दरवाजे पर ही … Read more

दरकती दीवारें और मीठा ज़हर

इन तीखे शब्दों में सुभद्रा के चोटिल अहंकार और अपनी बात न रखे जाने का मलाल साफ झलकता था। नीता उनकी आँखों में हमेशा एक खटकने वाले कांटे की तरह रही। भले ही नीता कितनी भी समझदारी और सलीके से घर का काम कर ले, सुभद्रा के मुँह से उसके लिए कभी प्रशंसा का एक … Read more

रिश्तों की बंजर ज़मीन

कुछ दिनों बाद, एक शाम रामदीन को अचानक सीने में बहुत तेज़ दर्द उठा। वे पसीने से तर-बतर होकर ज़मीन पर गिर पड़े। सुमित्रा की चीख निकल गई। पड़ोसियों की मदद से उन्हें तुरंत पास के अस्पताल ले जाया गया। डाक्टरों ने बताया कि उन्हें एक गंभीर हार्ट अटैक आया है और उनकी हालत बहुत … Read more

प्यार की बेड़ियाँ

शाम ढलते ही भैरवगढ़ की संकरी और पुरानी गलियों में एक अजीब सी खामोशी छा जाती थी। यह वह कस्बा था जहाँ समय जैसे दशकों पहले ठहर गया था। इसी कस्बे में एक नया सरकारी बैंक खुला था, जिसके नवनियुक्त मैनेजर अनिरुद्ध ने अभी हफ्ते भर पहले ही यहाँ अपना कार्यभार संभाला था। अनिरुद्ध शहर … Read more

राखी का धागा – डॉ बीना कुण्डलिया

बबीता के परिवार में वो दो बहनें, तीन भाई, एक सबसे बड़ी बहन फिर तीन भाई फिर सबसे छोटी थी बबीता। बड़े ही लाड़ प्यार से माता-पिता ने परवरिश की उन सबकी । एक दूसरे को समझता, एक दूसरे पर निछावर, जान छिड़कता ऐसा था उनका परिवार। पिता मनोज जी सरकारी आफिसर माँ पार्वती घरेलू … Read more

रिश्तों की अटूट डोर

 सुलोचना झेंप गई और मेहमानों के सामने अपनी इज्जत बचाते हुए धीरे से फुसफुसाई, “तू पागल हो गई है शिखा? तमाशा मत बना। तुझे पता है न कि हमारे उनके बीच कोई रिश्ता नहीं है। वे लोग नहीं आएंगे। तू चुपचाप रस्म के लिए बैठ जा।” “रिश्ता कैसे नहीं है माँ?” शिखा की आँखों से … Read more

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