वह छाँव जिसे हम बेड़ियाँ समझ बैठे

“रोज-रोज की ये किचकिच अब और बर्दाश्त नहीं होती!” शिखा ने अपना हैंडबैग सोफे पर जोर से पटकते हुए कहा था।

आज फिर वही बात हुई थी। ऑफिस से आने में थोड़ी देर क्या हो गई, उसकी माँ ने लगातार दस बार फोन कर दिया था। जब शिखा घर पहुंची, तो माँ दरवाजे पर ही खड़ी थीं और उनका पहला सवाल था, “इतनी देर कहाँ लग गई? मैंने कितनी बार कहा है कि शाम ढलने से पहले घर आ जाया कर। ना तू फोन उठाती है, ना कोई मैसेज करती है। तेरा बाप भी परेशान हो रहा था।” शिखा, जो दिन भर के काम से थकी हुई थी और ऑफिस की राजनीति से पहले ही चिढ़ी हुई थी, माँ के इन सवालों पर भड़क उठी। “मैं कोई दस साल की बच्ची नहीं हूँ माँ! मेरी अपनी एक ज़िंदगी है, मेरा अपना एक स्पेस है। हर बात में रोक-टोक, हर बात में सवाल… मुझे सांस तक नहीं लेने देते आप लोग। मुझे नहीं रहना यहाँ, जहाँ मुझे कैदी की तरह महसूस कराया जाए!”

इतना कहकर शिखा ने अपनी स्कूटी की चाबी उठाई और बिना अपने पिता की आवाज़ सुने, जो उसे पीछे से पुकार रहे थे, वह घर से बाहर निकल गई। रात के सर्द मौसम में स्कूटी चलाते हुए ठंडी हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी, लेकिन उसके अंदर गुस्से की आग धधक रही थी। उसने तय कर लिया था कि आज वह घर नहीं जाएगी। आज वह साबित करेगी कि वह अकेले भी रह सकती है। उसने अपना फोन निकाला और स्विच ऑफ कर दिया ताकि ना कोई फोन आए और ना ही उसे सफाई देनी पड़े।

शहर के बीचों-बीच बने एक बड़े और सुरक्षित बस टर्मिनल के 24 घंटे खुले रहने वाले वेटिंग लाउंज में वह जाकर बैठ गई। यहाँ रोशनी थी, थोड़ी भीड़ थी और गर्माहट थी। उसने कॉफी वेंडिंग मशीन से एक महंगी कॉफी निकाली और एक कोने वाली कुर्सी पर बैठ गई। उसका गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था। वह मन ही मन सोच रही थी कि कैसे उसके माता-पिता हमेशा उसे अपनी दुनिया में बांध कर रखना चाहते हैं।

समय बीत रहा था। रात के ग्यारह बज चुके थे। लाउंज में अब भीड़ कम होने लगी थी। तभी शिखा की नज़र अपने से कुछ दूरी पर बैठी एक लड़की पर पड़ी। वह लड़की उम्र में शिखा से कुछ छोटी ही लग रही थी, शायद बाईस या तेईस साल की। उसके पास एक बड़ा, पुराना सा सूटकेस था और एक पिट्ठू बैग जिसे उसने कसकर अपने सीने से लगा रखा था। उसने एक साधारण सा सूती सूट पहना हुआ था और ऊपर से एक पुरानी, पतली सी शॉल ओढ़ रखी थी जो इस कड़कड़ाती ठंड के लिए नाकाफी थी। वह लड़की बार-बार अपनी हथेलियों को रगड़ रही थी ताकि थोड़ी गर्माहट मिल सके।

शिखा उसे ही देख रही थी। वह लड़की कभी अपनी पानी की बोतल से थोड़ा सा पानी पीती, तो कभी अपने बैग से कोई पुराना बिस्किट निकालकर धीरे-धीरे खाती। उसकी आँखों में एक अजीब सी थकान और गहरी उदासी थी। शिखा को लगा कि शायद इसकी भी कोई बस छूट गई है या यह भी मेरी तरह घर वालों से लड़कर आई है।

तभी उस लड़की का मोबाइल बजा। शिखा ने ध्यान से देखा, लड़की ने फोन उठाने से पहले अपने चेहरे पर एक झूठी, लेकिन बहुत ही चमकीली मुस्कान ओढ़ ली। उसने अपनी शॉल को ठीक किया, अपने बालों को संवारा और वीडियो कॉल रिसीव किया।

“हेलो पापा! हाँ… हाँ पापा, मैं ठीक हूँ,” लड़की की आवाज़ में एक गज़ब की मिठास और ठहराव था। “अरे नहीं पापा, मैं बाहर नहीं हूँ, वो मेरे नए पीजी (पेइंग गेस्ट) की बालकनी है ना, वहीं बैठी हूँ। यहाँ से शहर बहुत अच्छा दिखता है। हाँ, कमरा बहुत अच्छा है। रूममेट भी बहुत अच्छी है।”

शिखा हैरान रह गई। वह लड़की बस स्टैंड के लाउंज में बैठी थी और अपने पिता से कह रही थी कि वह एक सुरक्षित कमरे में है।

फोन के दूसरी तरफ से एक कमज़ोर सी आवाज़ आई, शायद उसके पिता की तबियत ठीक नहीं थी। “खाना खा लिया बेटा? शहर नया है, किसी पर जल्दी भरोसा मत करना और अपना ख्याल रखना।”

लड़की ने अपनी आँखों में आते आंसुओं को बड़ी चालाकी से रोकते हुए कहा, “हाँ पापा, आज तो मैंने पनीर की सब्जी और रोटी खाई है। बहुत स्वादिष्ट थी। आप चिंता मत करो। आप अपनी दवाइयां समय पर लेना और माँ को बोलना कि मेरी फिक्र ना करे। अच्छा पापा, अब मैं सोती हूँ, कल सुबह जल्दी उठना है।”

जैसे ही उसने कॉल काटी, उसके चेहरे से वह झूठी मुस्कान किसी रेत के महल की तरह ढह गई। वह लड़की अपने दोनों हाथों में अपना चेहरा छुपाकर खामोशी से रोने लगी। उसके कंधे बुरी तरह हिल रहे थे, लेकिन वह कोशिश कर रही थी कि उसकी आवाज़ किसी तक ना पहुंचे।

शिखा से अब रहा नहीं गया। उसका अपना गुस्सा न जाने कहाँ गायब हो गया था। वह अपनी कुर्सी से उठी और उस लड़की के पास जाकर बैठ गई। शिखा ने अपना एक हाथ उसके कंधे पर रखा। लड़की अचानक चौंक गई और डर कर पीछे हटी।

“डरो मत,” शिखा ने बहुत ही कोमलता से कहा। “मैं काफी देर से तुम्हें देख रही थी। तुमने अपने पापा से झूठ क्यों बोला? तुम यहाँ इस ठंड में अकेले क्यों बैठी हो?”

लड़की ने अपने आंसू पोंछते हुए शिखा की तरफ देखा। उसकी आँखें लाल थीं। कुछ देर तक वह खामोश रही, फिर उसकी रुलाई फूट पड़ी। “क्या करती दीदी… सच बता देती तो मेरे पापा का दिल बैठ जाता। उन्हें गाँव में पहले ही दिल की बीमारी है। मैं यहाँ शहर में नौकरी करने आई थी। जिस पीजी में मैं रहती थी, उस मालकिन ने आज शाम को अचानक मेरा सामान बाहर निकाल दिया क्योंकि मैं इस महीने का किराया नहीं दे पाई थी। मेरी कंपनी ने दो महीने से सैलरी नहीं दी है। मेरे पास एक भी पैसा नहीं बचा है कि मैं आज रात किसी सस्ते होटल में भी रुक सकूं। इसलिए यहाँ आ गई कि रात कट जाएगी और सुबह सीधे ऑफिस चली जाऊंगी।”

शिखा अवाक रह गई। “तो तुमने घर वालों को क्यों नहीं बताया? वो तुम्हारी मदद करते।”

लड़की ने एक फीकी सी मुस्कान के साथ कहा, “घर… घर वालों के पास अगर पैसे होते तो वो मुझे इस बड़े शहर की ठोकरें खाने के लिए क्यों भेजते? पापा ने खेत गिरवी रखकर मुझे पढ़ाया है। मैं उन्हें अपनी परेशानी बताकर उनकी रातों की नींद नहीं छीन सकती। वो मीलों दूर बैठकर भी मेरे लिए तड़प उठेंगे, पर कर कुछ नहीं पाएंगे। इसलिए मैं उन्हें यही जताती हूँ कि मैं यहाँ बहुत खुश हूँ।”

लड़की की बातें शिखा के दिल पर किसी भारी हथौड़े की तरह लगीं। एक तरफ यह लड़की थी, जिसके पास आज रात सिर छुपाने के लिए एक छत नहीं थी, खाने के लिए निवाला नहीं था, लेकिन वह अपने माता-पिता की शांति के लिए कितना बड़ा बोझ अकेले उठा रही थी। और एक तरफ वह खुद थी—जिसके पास एक महफूज़ घर था, खाने से भरी मेज़ थी, और ऐसे माता-पिता थे जो उसकी एक खरोंच पर भी बेचैन हो जाते थे। और शिखा? शिखा उसी फिक्र को, उसी प्यार को ‘घुटन’ का नाम देकर घर से भाग आई थी।

उसे अचानक अपनी माँ का वह उतरा हुआ चेहरा याद आया जब वह उन पर चिल्ला रही थी। उसे अपने पिता की वह कांपती हुई आवाज़ याद आई जब वो उसे पीछे से रोक रहे थे। शिखा का गला भर आया। उसे खुद पर इतनी गहरी आत्मग्लानि महसूस हुई कि उसे लगा कि वह दुनिया की सबसे स्वार्थी लड़की है।

उसने बिना एक पल भी गंवाए अपने बैग से अपना स्विच ऑफ पड़ा फोन निकाला और उसे ऑन किया। जैसे ही फोन ऑन हुआ, स्क्रीन पर 27 मिस्ड कॉल और अनगिनत मैसेज फ्लैश होने लगे। सभी कॉल माँ और पापा के थे। आखिरी मैसेज पापा का था—”बेटा, जहाँ भी है बता दे। हम कुछ नहीं कहेंगे। रात बहुत हो गई है, मुझे डर लग रहा है। प्लीज़ घर आ जा।”

शिखा की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने तुरंत अपने पापा का नंबर मिलाया। घंटी पूरी होने से पहले ही फोन उठ गया।

“शिखा! बेटा तू कहाँ है? तू ठीक तो है ना? तेरी माँ का रो-रो कर बुरा हाल है, उसने शाम से पानी का एक घूंट नहीं पिया है। मुझे बता तू कहाँ है, मैं अभी गाड़ी लेकर आता हूँ,” पिता की आवाज़ में एक पिता की बेबसी, डर और अथाह प्यार छलक रहा था। उसमें कोई गुस्सा नहीं था, बस अपनी बेटी को सुरक्षित देखने की तड़प थी।

“पापा…” शिखा फूट-फूट कर रो पड़ी। “मुझे माफ़ कर दीजिए पापा। मैं बहुत बदतमीज़ हूँ। मैं बस स्टैंड के लाउंज में हूँ। मैं अभी घर आ रही हूँ।”

“रो मत मेरी बच्ची, तू बस वहीं रुक, मैं बस पंद्रह मिनट में पहुँच रहा हूँ,” पापा ने जल्दी से कहा।

“पापा, एक बात और…” शिखा ने उस लड़की की तरफ देखते हुए कहा। “मेरे साथ एक लड़की है, मान्या। उसके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं है। क्या वो कुछ दिन हमारे घर रह सकती है?”

“कैसी बात करती है बेटा? तेरा घर है, तेरी दोस्त का भी घर है। उसे साथ लेकर आना। मैं बस निकल ही रहा हूँ,” पापा ने बिना एक पल सोचे कह दिया।

शिखा ने फोन रखा और मान्या (उस लड़की) का हाथ पकड़ लिया। “चलो मान्या, आज की रात तुम अकेले नहीं गुज़ारोगी। तुम्हारे लिए एक घर और गरम खाना इंतज़ार कर रहा है।”

मान्या हैरान थी। “पर दीदी, आपके घर वाले…”

“मेरे घर वाले दुनिया के सबसे अच्छे इंसान हैं, मान्या। बस मैं ही इस बात को समझने में थोड़ी देर कर बैठी,” शिखा ने मुस्कुराते हुए कहा, जबकि उसकी आँखों में अभी भी आंसू थे।

जब शिखा घर पहुँची, तो दरवाज़ा खुला था। माँ दौड़कर आई और शिखा को सीने से लगा लिया। उन्होंने ना कोई सवाल पूछा, ना कोई डांट लगाई, बस उसे चूमती रहीं। पापा ने मान्या के हाथ से उसका भारी बैग ले लिया और उसे अंदर बुलाकर कहा, “आओ बेटा, घर में तुम्हारा स्वागत है।”

उस रात जब शिखा अपने कमरे में अपने नर्म बिस्तर पर लेटी, तो उसे एहसास हुआ कि जिसे वह बेड़ियाँ समझ रही थी, वह असल में वह छाँव थी जो दुनिया की चिलचिलाती धूप से उसे बचा कर रखती थी। आज एक बेघर लड़की ने उसे उसके अपने घर की, और उस घर में बसने वाले बिना शर्त प्यार की असली कीमत समझा दी थी। आज के बाद, शिखा के लिए उसके माता-पिता की फिक्र कभी कोई बंदिश नहीं बनने वाली थी।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।

error: Content is protected !!