इन तीखे शब्दों में सुभद्रा के चोटिल अहंकार और अपनी बात न रखे जाने का मलाल साफ झलकता था। नीता उनकी आँखों में हमेशा एक खटकने वाले कांटे की तरह रही। भले ही नीता कितनी भी समझदारी और सलीके से घर का काम कर ले, सुभद्रा के मुँह से उसके लिए कभी प्रशंसा का एक शब्द नहीं निकलता था। नीता एक सुलझी हुई लड़की थी। वह जानती थी कि अगर उसने इन बातों का जवाब दिया, तो घर की शांति भंग हो जाएगी और उसके पति आकाश को मानसिक क्लेश से गुजरना पड़ेगा। इसलिए, वह हर अपमान का घूंट चुपचाप पी जाती और सुभद्रा के मनमुताबिक ही काम करने का प्रयास करती।
इलाहाबाद के पुराने और प्रतिष्ठित मोहल्ले में सेठ दीनानाथ का घर अपनी भव्यता और रुतबे के लिए जाना जाता था। दीनानाथ जी शहर के नामी व्यापारी थे, जिनका कारोबार और सम्मान दोनों ही आसमान छूते थे। उनकी सफलता की चमक दूर-दूर तक थी, लेकिन इस चमक से सबसे ज्यादा अगर किसी की आँखें चुंधियाती थीं, तो वे थीं उनके ही छोटे भाई रमाकांत की पत्नी, सुभद्रा। रमाकांत जी एक सरकारी दफ्तर में साधारण क्लर्क थे और उनका जीवन बहुत ही सामान्य था।
सुभद्रा के मन में अपने जेठ की इस अपार सफलता और उनके बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को लेकर एक गहरी कुंठा ने घर कर लिया था। जब भी वह अपने साधारण बच्चों और दीनानाथ जी के विदेश में पढ़े, होनहार बेटों—आकाश और प्रकाश—की तुलना करतीं, तो ईर्ष्या से उनका मन कसैला हो जाता। लेकिन सुभद्रा इस कला में माहिर थीं कि उन्होंने अपनी इस जलन को कभी अपने चेहरे पर नहीं आने दिया। बाहर से वह पूरे परिवार की सबसे फिक्रमंद, स्नेहमयी और संस्कारी महिला होने का दिखावा करती थीं। ऐसे लोग अक्सर अपनी छोटी-सी खुशी से संतुष्ट नहीं होते, बल्कि दूसरों की बड़ी खुशियों को देखकर ज्यादा दुखी रहते हैं।
दीनानाथ जी की पत्नी के देहांत के बाद, घर की पूरी जिम्मेदारी सुभद्रा के ही हाथों में आ गई थी। दीनानाथ जी और उनके दोनों बेटे सुभद्रा को अपनी सगी माँ के समान ही सम्मान और प्रेम देते थे। कुछ समय बाद, घर में आकाश और प्रकाश की शादियाँ हुईं। आकाश की पत्नी का नाम नीता था और प्रकाश की पत्नी का नाम राधिका। दोनों देवरानी-जेठानी कम और सगी बहनें ज्यादा लगती थीं। उनके बीच का प्रेम देखकर मोहल्ले के लोग मिसालें दिया करते थे। अपनी सास के न होने की कमी वे अपनी चची सास (सुभद्रा) के प्यार में पूरी करने की कोशिश करती थीं।
लेकिन, विवाह के कुछ महीने बाद ही नीता को घर के माहौल में एक अजीब सी घुटन का अहसास होने लगा। सुभद्रा का व्यवहार उसके प्रति धीरे-धीरे बदलने लगा था। बात-बात पर ताने मारना, उसके किए कामों में बेवजह मीन-मेख निकालना और सबके सामने उसे नीचा दिखाने का कोई भी मौका सुभद्रा हाथ से नहीं जाने देती थीं।
इस वैमनस्य का एक बहुत बड़ा कारण था। दरअसल, सुभद्रा चाहती थीं कि बड़े बेटे आकाश की शादी उनके मायके की एक दूर की रिश्तेदार से हो, ताकि घर पर उनका वर्चस्व और मजबूत हो सके। लेकिन आकाश ने नीता को पसंद किया था और दीनानाथ जी ने खुशी-खुशी अपने बेटे की पसंद को स्वीकार कर लिया था। सुभद्रा के लिए यह उनके अहंकार पर एक गहरी चोट थी। उनका कुंठित मन इस बात को कभी पचा नहीं पाया कि उनकी बात को अहमियत नहीं दी गई।
इसीलिए, वह अक्सर घर में आने-जाने वाले रिश्तेदारों के सामने जानबूझकर तेज आवाज में कहतीं, “अरे, आकाश बाबू तो अपनी पसंद की मेमसाब ले आए हैं। देखते हैं, हमारे इन पुराने रीति-रिवाजों वाले घर में ये नए जमाने की लड़की कितने दिन टिक पाती है। मैंने तो लाख समझाया था कि लड़की ऐसी लाओ जो घर को समझे, पर मेरी सुनता कौन है यहाँ!”
इन तीखे शब्दों में सुभद्रा के चोटिल अहंकार और अपनी बात न रखे जाने का मलाल साफ झलकता था। नीता उनकी आँखों में हमेशा एक खटकने वाले कांटे की तरह रही। भले ही नीता कितनी भी समझदारी और सलीके से घर का काम कर ले, सुभद्रा के मुँह से उसके लिए कभी प्रशंसा का एक शब्द नहीं निकलता था। नीता एक सुलझी हुई लड़की थी। वह जानती थी कि अगर उसने इन बातों का जवाब दिया, तो घर की शांति भंग हो जाएगी और उसके पति आकाश को मानसिक क्लेश से गुजरना पड़ेगा। इसलिए, वह हर अपमान का घूंट चुपचाप पी जाती और सुभद्रा के मनमुताबिक ही काम करने का प्रयास करती।
लेकिन नीता जितना झुकती गई, सुभद्रा का दुस्साहस उतना ही बढ़ता गया। उन्होंने एक बहुत ही सोची-समझी और खतरनाक कूटनीति अपनाई। उन्होंने नीता और आकाश के खिलाफ एक अदृश्य मोर्चा खोल दिया और इसके लिए उन्होंने मोहरा बनाया छोटे बेटे प्रकाश और उसकी पत्नी राधिका को।
सुभद्रा ने राधिका को अपने झूठे प्रेम और पक्षपात के जाल में उलझाना शुरू कर दिया। वह हर छोटी-बड़ी बात में राधिका की झूठी तारीफें करतीं, उसे नीता से बेहतर साबित करने की कोशिश करतीं और प्रकाश को यह अहसास दिलातीं कि वही इस घर का असली वारिस है। जहर की एक छोटी सी बूंद भी पूरे घड़े के दूध को फाड़ने के लिए काफी होती है। सुभद्रा द्वारा घोला गया यह मीठा जहर अपना काम करने लगा था।
शुरुआती दिनों में राधिका और नीता एक-दूसरे से हर बात साझा करती थीं। नीता, बड़ी होने के नाते, राधिका को इस नए घर के तौर-तरीके सिखाती और उसे हर कदम पर सम्भालती। लेकिन जैसे-जैसे राधिका का झुकाव सुभद्रा की तरफ बढ़ने लगा, उसने नीता से दूरी बनानी शुरू कर दी। सुभद्रा राधिका के कान भरतीं, “अरी राधिका, तू तो इतनी भोली है। ये नीता सारा राजपाट अपने पति के नाम करवाना चाहती है। तू अपना हक मांगना सीख, वरना ये जेठानी तुझे नौकरानी बनाकर रखेगी।”
सुभद्रा की इन बातों ने राधिका के सोचने-समझने की शक्ति पर पर्दा डाल दिया था। जो राधिका कल तक नीता को अपनी बड़ी बहन मानती थी, अब उसे नीता की हर बात में स्वार्थ और साजिश नजर आने लगी। यहाँ तक कि अगर नीता राधिका की भलाई के लिए भी कुछ कहती, तो राधिका उसे ताना समझकर पलटकर जवाब दे देती।
अच्छाई को अपना असर दिखाने में उम्र लग जाती है, लेकिन बुराई बहुत तेजी से फैलती है। सुभद्रा के इस पक्षपातपूर्ण रवैए ने उस घर के निर्मल और शांत वातावरण को पूरी तरह से दूषित कर दिया। जिस घर के आंगन में कभी दोनों भाइयों और उनकी पत्नियों के ठहाके गूंजते थे, वहाँ अब एक अजीब सा सन्नाटा और तनाव पसर गया था। आपसी प्यार और विश्वास का स्थान अब एक अंधी प्रतिस्पर्धा और शक ने ले लिया था।
राधिका अब सुभद्रा के इशारों पर नाचने वाली कठपुतली बन चुकी थी, जो यह नहीं समझ पा रही थी कि सुभद्रा का यह ‘प्रेम’ केवल आकाश और नीता को नीचा दिखाने का एक जरिया मात्र है। वहीं दूसरी ओर, प्रकाश भी अपनी पत्नी के सुर में सुर मिलाने लगा था। उसे लगने लगा था कि उसके पिता और बड़ा भाई उसे उसका सही हक नहीं दे रहे हैं। घर के बँटवारे की बातें अब दबी जुबान में दीवारों से टकराने लगी थीं।
नीता और आकाश सब कुछ समझ रहे थे, लेकिन वे बेबस थे। वे अपनों से ही क्या लड़ते? सुभद्रा अपने मकसद में कामयाब हो रही थीं। उन्होंने बिना कोई हथियार उठाए, केवल अपनी ईर्ष्या और मीठी बातों की कूटनीति से, दीनानाथ जी के उस मजबूत परिवार को दो हिस्सों में बांट कर रख दिया था। घर की दीवारें अब दरकने लगी थीं, और उन दरारों में सुभद्रा के संतोष की कुटिल मुस्कान छिपी थी।
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