कुछ दिनों बाद, एक शाम रामदीन को अचानक सीने में बहुत तेज़ दर्द उठा। वे पसीने से तर-बतर होकर ज़मीन पर गिर पड़े। सुमित्रा की चीख निकल गई। पड़ोसियों की मदद से उन्हें तुरंत पास के अस्पताल ले जाया गया। डाक्टरों ने बताया कि उन्हें एक गंभीर हार्ट अटैक आया है और उनकी हालत बहुत नाज़ुक है। सुमित्रा घबराहट और आंसुओं में डूबी हुई थीं। उन्हें लगा कि शायद यह रामदीन का आखिरी वक्त है और ऐसे में बेटे का पास होना ज़रूरी है।
कांपते हाथों से सुमित्रा ने आकाश को फोन मिलाया। दो-तीन बार फोन कटने के बाद आखिरकार आकाश ने फोन उठाया। “हैलो आकाश… बेटा जल्दी से लखनऊ आ जा। तेरे बाबूजी को हार्ट अटैक आया है, उनकी हालत बहुत खराब है। डाक्टर कह रहे हैं कि कुछ भी हो सकता है। एक बार आकर उनका मुँह देख ले बेटा।” सुमित्रा फोन पर बुरी तरह बिलख रही थीं।
अस्पताल के आईसीयू वार्ड के बाहर बैंच पर बैठे रामदीन की आँखें पथरा गई थीं। उनके 22 वर्षीय बेटे आकाश का भयानक एक्सीडेंट हुआ था। डाक्टरों ने साफ कह दिया था कि सिर की गंभीर चोट के लिए फौरन एक बड़ा ऑपरेशन करना पड़ेगा, जिसमें करीब आठ लाख रुपये का खर्च आएगा। रामदीन एक साधारण से स्कूल टीचर थे। अपनी सारी जमा-पूंजी और पीएफ का पैसा निकालने के बाद भी वे बमुश्किल तीन लाख रुपये ही जुटा पाए थे। बाकी के पांच लाख रुपयों का इंतज़ाम कहाँ से होगा, यह सोच-सोच कर उनकी पत्नी सुमित्रा का रो-रोकर बुरा हाल था। रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों के सामने हाथ फैलाने के बाद भी कोई खास मदद नहीं मिल सकी। बेबसी के उस घोर अंधकार में रामदीन को अपनी बड़ी बेटी अंजलि का खयाल आया, जिसकी शादी उन्होंने तीन साल पहले पुणे में की थी।
कांपते हाथों से रामदीन ने अंजलि को फोन मिलाया। फोन अंजलि के पति, यानी रामदीन के दामाद विक्रम ने उठाया। “हैलो बाबूजी, सब ठीक तो है? इतनी रात को फोन किया?” विक्रम की शांत आवाज़ सुनकर रामदीन अपने आँसू नहीं रोक पाए। रुंधे हुए गले से उन्होंने आकाश के एक्सीडेंट और पैसों की कमी की सारी बात कह डाली। “बाबूजी, मेरे पास सिर्फ तीन लाख हैं, बाकी पांच लाख का इंतज़ाम नहीं हो पा रहा है। मेरा तो बेटा…” रामदीन फूट-फूट कर रो पड़े। विक्रम ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, “बाबूजी, आप बिल्कुल हौसला मत हारिए। पैसों की चिंता आप मुझ पर छोड़ दीजिए। मैं अभी अंजलि को लेकर पहली फ्लाइट से लखनऊ पहुँच रहा हूँ। आप बस आकाश के ऑपरेशन की तैयारी करवाइए।”
अगली सुबह अंजलि और विक्रम अस्पताल पहुँच गए। विक्रम ने अपनी सेविंग्स से पूरे पांच लाख रुपये अस्पताल में जमा करवा दिए। ऑपरेशन सफल रहा और डाक्टरों की मेहनत रंग लाई। आकाश की जान बच गई। रामदीन और सुमित्रा ने विक्रम का हाथ पकड़कर जो दुआएं दीं, उनका कोई मोल नहीं था।
समय अपनी रफ्तार से बीतता गया। इस हादसे को दस साल गुज़र चुके थे। आकाश के ठीक होने के बाद रामदीन ने अपने पुश्तैनी मकान का एक हिस्सा बेचकर उसे एमबीए की पढ़ाई के लिए दिल्ली भेज दिया था। आकाश पढ़ाई में होशियार था, इसलिए उसे एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत अच्छे पैकेज पर नौकरी मिल गई। दिल्ली की चकाचौंध में आकाश ऐसा रंगा कि उसने वहीं अपनी साथ काम करने वाली एक अमीर लड़की, शिखा से कोर्ट मैरिज कर ली। शिखा के पिता का दिल्ली में अपना बड़ा बिजनेस था, और आकाश शादी के बाद अपने ससुर के दिए हुए एक आलीशान फ्लैट में ही रहने लगा।
शुरुआत में सब कुछ सामान्य लगा, लेकिन धीरे-धीरे आकाश के व्यवहार में एक अजीब सा बदलाव आने लगा। उसका लखनऊ आना बिल्कुल कम हो गया। रामदीन और सुमित्रा महीनों तक उसके फोन का इंतज़ार करते रहते, लेकिन आकाश के पास अपने माँ-बाप से बात करने की फुरसत ही नहीं थी। दीवाली हो या होली, वह हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर आने से मना कर देता। सुमित्रा जब भी फोन पर उसे याद करके रोतीं, तो वह झिड़क देता कि “माँ, मेरे पास इतना टाइम नहीं होता, मुझे बहुत काम रहते हैं।” धीरे-धीरे आकाश ने शिखा के परिवार को ही अपना परिवार मान लिया था और अपने बूढ़े माँ-बाप को पूरी तरह से भुला दिया।
एक दिन दोपहर के समय रामदीन के पुराने मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर आकाश का नाम देखकर रामदीन के चेहरे पर चमक आ गई। उन्होंने जल्दी से फोन उठाया, “हैलो बेटा, कैसे हो तुम? बहू कैसी है?” उधर से आकाश की आवाज़ में कोई अपनापन नहीं था, बल्कि एक अजीब सी बेचैनी थी। “मैं ठीक हूँ पिताजी। मुझे आपसे एक बहुत ज़रूरी काम था। मैं शिखा के पापा के साथ मिलकर एक नया बिजनेस शुरू कर रहा हूँ, जिसके लिए मुझे पंद्रह लाख रुपयों की तुरंत ज़रूरत है। आप कल तक मेरे अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करवा दीजिए, मैं कुछ महीनों में लौटा दूँगा।”
रामदीन सन्न रह गए। उन्होंने भारी मन से कहा, “बेटा आकाश, तुम तो जानते हो कि मेरे पास जो कुछ था, वह तुम्हारी पढ़ाई और एक्सीडेंट में ही खर्च हो गया। जो थोड़ा बहुत पैसा है, वह हमारी बुढ़ापे की दवाइयों के लिए है। और फिर, तुम्हारे ऑपरेशन के वक्त विक्रम से जो पांच लाख रुपये लिए थे, मैं आज तक उनका वह कर्ज़ नहीं चुका पाया हूँ। अब मेरे पास कुछ नहीं बचा है। मैं पंद्रह लाख रुपये कहाँ से लाऊँगा?”
यह सुनते ही आकाश का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह बदतमीज़ी पर उतर आया और चिल्लाकर बोला, “मुझे पता था कि आप यही रोना रोएंगे! आज तक आपने मेरे लिए किया ही क्या है? जो किया, वो तो हर माँ-बाप करते हैं। जब पैसे दे ही नहीं सकते थे, तो मुझे सपने क्यों दिखाए? आज के बाद मुझे फोन मत करना!” खटाक से फोन कट गया।
फोन से आती टू-टू की आवाज़ रामदीन के कानों में सीसे की तरह उतर गई। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी ज़िंदगी की हर जमा-पूंजी लुटा दी थी, आज उसी बेटे ने उनके प्यार और त्याग को शून्य साबित कर दिया था। इस सदमे ने रामदीन को भीतर तक तोड़ दिया। वे बिस्तर से लग गए और गुमसुम रहने लगे। न किसी से बात करते, न ठीक से खाना खाते। बस छत की तरफ शून्य में ताकते रहते।
कुछ दिनों बाद, एक शाम रामदीन को अचानक सीने में बहुत तेज़ दर्द उठा। वे पसीने से तर-बतर होकर ज़मीन पर गिर पड़े। सुमित्रा की चीख निकल गई। पड़ोसियों की मदद से उन्हें तुरंत पास के अस्पताल ले जाया गया। डाक्टरों ने बताया कि उन्हें एक गंभीर हार्ट अटैक आया है और उनकी हालत बहुत नाज़ुक है। सुमित्रा घबराहट और आंसुओं में डूबी हुई थीं। उन्हें लगा कि शायद यह रामदीन का आखिरी वक्त है और ऐसे में बेटे का पास होना ज़रूरी है।
कांपते हाथों से सुमित्रा ने आकाश को फोन मिलाया। दो-तीन बार फोन कटने के बाद आखिरकार आकाश ने फोन उठाया। “हैलो आकाश… बेटा जल्दी से लखनऊ आ जा। तेरे बाबूजी को हार्ट अटैक आया है, उनकी हालत बहुत खराब है। डाक्टर कह रहे हैं कि कुछ भी हो सकता है। एक बार आकर उनका मुँह देख ले बेटा।” सुमित्रा फोन पर बुरी तरह बिलख रही थीं।
लेकिन उधर से आकाश की जो आवाज़ आई, उसने सुमित्रा के मातृत्व को छलनी कर दिया। आकाश ने बेहद रूखे और ठंडे स्वर में कहा, “माँ, मैंने पहले ही कहा था कि मुझे अब आप लोगों से कोई मतलब नहीं है। मेरे पास इतना फालतू टाइम नहीं है कि मैं हर छोटी-बड़ी बात पर वहाँ भागता फिरूँ। आप अंजलि और विक्रम को बुला लीजिए, वैसे भी आप लोगों ने सारा प्यार उसी पर तो लुटाया है। आइंदा मुझे परेशान मत कीजिएगा।” और इसके साथ ही फोन हमेशा के लिए कट गया।
सुमित्रा सन्न खड़ी रह गईं। उनके हाथ से फोन छूटकर ज़मीन पर गिर गया। अस्पताल के उस सन्नाटे में उन्हें एहसास हो गया था कि उन्होंने अपना बेटा उसी दिन खो दिया था, जिस दिन वह दौलत की अंधी दौड़ में शामिल हुआ था।
दोस्तों, यह कहानी हमारे समाज की उस कड़वी सच्चाई को दर्शाती है जहाँ बच्चे अपने स्वार्थ के अंधेपन में माता-पिता के उस त्याग को भूल जाते हैं जो उन्होंने अपना पेट काटकर किया होता है। आप आकाश के इस व्यवहार के बारे में क्या सोचते हैं? क्या माता-पिता को अपनी सारी संपत्ति बच्चों पर लुटा देनी चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।
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