जो बोओगे,वही काटोगे – मृणालिका दुबे

सुनीता की सुबह रोज़ चार बजे शुरू होती थी। मुर्गे की पहली बाँग से भी पहले उसकी आँख खुल जाती। नींद चाहे पूरी हुई हो या नहीं, उसे उठना ही पड़ता था। सबसे पहले वो रसोई में जाती, गैस पर चाय चढ़ाती, फिर आटा गूँधती, बच्चों के टिफिन तैयार करती और साथ-साथ सास के लिए … Read more

जो बोया वही पाया – विनीता सिंह

धूल भरी गलियों वाले उस छोटे से गांव में रामदीन बहुत मेहनती था। सुबह हो या शाम, खेत में हल चलाता, बीज बोता। पसीना बहाता, लेकिन उसकी आंखों में उम्मीद की चमक। “थी जो बोया, वही पाया,”उनके पिता का यह कथन उसके खून में घुला था। पत्नी सुशीला दो मासूम बच्चों—लल्ला और गुड़िया—के साथ घर … Read more

*विश्वास की डोर बहुत मजबूत होता है* – तोषिका

घर में शहनाइयां बज रही है, खुशी का माहौल है। सारा शोर एक बंद दरवाजे के पीछे बंद हो गया और उस शोर में नवी को एक कड़कती आवाज आई “बहु आज से इस घर की और मेरे बेटे की जिम्मेदारी तुम्हारी है।” *१ साल बाद* आज कल आप दफ्तर से इतनी लेट आने लग … Read more

विश्वास – खुशी 

नलिन नीलू की आंखों में देख रहा था।नीलू की आंखों में पानी था।नलिन बोला नीलू मेरा एक बार एयरफोर्स में सिलेक्शन होने दो  मैं तुम्हारे पिता से तुम्हारा हाथ मांग लूंगा।अभी मेरी परिस्थिति ऐसी नहीं है।नलिन तुम मुझे भी तो समझो मै तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।प्लीज़ नीलू कुछ दिन बस फिर हम एक होंगे … Read more

अब और नहीं कार्तिक – वीणा सिंह

आज माया का तीसरा दिन है आईसीयू में…माया को ब्रेन स्ट्रोक के कारण आईसीयू में एडमिट करना पड़ा है… रूपेश जी तीन दिन से पागल से हॉस्पिटल में भगवान से दुआ मांग रहे हैं अपनी जीवन संगिनी के स्वास्थ्य के लिए…               डॉक्टर ने अचानक रुपेश जी को सूचना दी पेशेंट होश में आ गई है.. … Read more

जैसी करनी वैसी भरनी – कविता भडाना

“आज फिर से सारा मोहल्ला अपनी अपनी छतों पर जमा होकर रामलाल के घर होने वाले हंगामे को चटखारे लेकर देख रहा था” रामलाल के दोनों बेटे बटवारे को लेकर आपस में हिंसक तरीके से लड़ रहे थे, दोनों की पत्नी और बच्चे भी अपने अपने स्तर पर मोर्चा संभाले हुए थे, गाली गलौच से … Read more

अपने हुए पराए – सीमा सिंघी

समीर तेरी सूरत देखे पूरे पांच साल हो गए । अब तो भारत आजा बेटा। अपने देश जहां अपना इंदौर शहर है।  जिसे हम हक से अपना कह सकते हैं। तुम तो कुछ महीनो के लिए गए थे मगर,वे महीने कब साल में बदल गए, पता ही नहीं चला। मुझे तुम्हारी, बहू की और बच्चों … Read more

प्यार और त्याग से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती – हर्षिता सिंह

“नहीं भाभी, यह तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता। आप चाहे कितना भी इमोशनल ड्रामा कर लें, लेकिन मुझे वह कमरा हर हाल में खाली चाहिए ही चाहिए।” सुमेधा ने अपनी बात को बिना किसी लाग-लपेट के बिल्कुल साफ-साफ शब्दों में अपनी जेठानी विशाखा से कह दिया। सुमेधा की आवाज़ में एक अजीब सी कठोरता … Read more

असली खुशी…अपनों के साथ… – मोहिनी मिश्रा

दोपहर के करीब दो बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर जूठे बर्तनों का ढेर लगा था और विशाखा जल्दी-जल्दी उन्हें समेट कर सिंक में डाल रही थी। अभी-अभी उसके पति सुमित और दोनों बच्चे खाना खाकर अपने-अपने कमरों में गए थे। विशाखा की नज़र बार-बार दीवार घड़ी पर जा रही थी। आज महीने का वो … Read more

निस्वार्थ

इस बार देवकीनंदन ने भी अपने जोड़े हुए आखिरी तीन हज़ार रुपये उस फंड में डाल दिए। उन्हें पता था कि 100 लोगों में से उनका नाम निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं है, लेकिन डूबते को तिनके का सहारा ही बहुत होता है। उन्होंने रात भर अपनी आँखों में आंसू लिए भगवान विश्वनाथ से … Read more

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