परछाईयों की तलाश – अनीता रवि

ऐसे लगता है जैसे सारी मनौतियाँ पूरी करने कर के गंगा नहा आई हूँ या हज से लौटी हूँ या पवित्र रोमनगरी से हो आई हूँ  । शब्‍दों के धागे जैसे मन की भावनाओं को गूँथ ही नहीं पा रहे । बस महक रही हूँ मैं अखंड तृप्ति के फूलों की सुगंध से । विश्‍वास … Read more

विश्वासघात – मधु वशिष्ठ

तनु धीरे-धीरे थाने के अंदर  गई और वहां बैठे पुलिसकर्मी से अपनी एफआईआर लिखने के लिए कहा। थाने में उसकी अतिरिक्त बहुत से लोग बैठे थे तभी वहां पर घूमती एक महिला पुलिसकर्मी  ने कहा आप अपनी  रिपोर्ट पीछे वाली टेबल पर बैठी महिला पुलिसकर्मी को लिखवाइए। तनु वहां पर गई , उसकी आंखें आंसुओं … Read more

कच्चे धागे – एम. पी. सिंह

पूनम की डोली ससुराल पहुची, वो बहुत खुश थी। परिवार में ननद और ससुर के अलावा कोई नहीं था। पति अंगद की अच्छी नोकरी थी। सब ठीक चल रहा था, ओर जल्दी ही वो पति औऱ ससुर की चहेती बन गई। परंतु पूनम की ननद बिमला ज्यादा घुल मिल नहीं रही थीं।  उसे भाभी की … Read more

बहू की विदाई – शुभ्रा बैनर्जी

बचपन से जानती थी सुषमा मधु को।मधु ,सुषमा की सहेली की इकलौती बेटी थी।सुषमा और सविता(मधु की मां)का मायका एक ही कस्बे में था।दोनों ने बारहवीं कक्षा तक साथ में ही पढ़ाई की थी।सुषमा का ब्याह कॉलेज पूरा होते ही शहर में रहने वाले सरकारी नौकरी में कार्यरत एक क्लर्क से हो गई।सविता ज्यादा पढ़ … Read more

त्याग की मूरत और स्वार्थ का आईना

शहर की चकाचौंध और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच, माधव अपनी पत्नी कामिनी और सात साल की बेटी रिया के साथ एक आलीशान फ्लैट में रहता था। माधव ने अपने जीवन में बहुत तरक्की की थी। एक साधारण से घर से निकलकर उसने अपनी एक अच्छी खासी कंस्ट्रक्शन कंपनी खड़ी कर ली थी। इस सफलता … Read more

ससुराल की देहरी और मायके का आँगन: एक अनकही सच्चाई

अलार्म की तीखी आवाज़ ने काव्या की नींद तोड़ दी। उसने फोन की स्क्रीन पर समय देखा—सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड में रजाई से बाहर निकलने का बिल्कुल मन नहीं था, लेकिन रसोई की जिम्मेदारियां उसे पुकार रही थीं। काव्या की शादी को अभी महज़ आठ महीने ही हुए … Read more

ज़िंदा लाश: एक बहन का खौफ़नाक इंसाफ़

अदालत के उस विशाल और शांत कमरे में आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। यह सन्नाटा किसी डर का नहीं, बल्कि एक स्तब्ध कर देने वाले सच का था। कटघरे में अट्ठाईस वर्षीय देविका खड़ी थी। उसके चेहरे पर न तो कोई पछतावा था, न कोई खौफ और न ही किसी तरह की घबराहट। … Read more

लौटते कदमों की आहट

 लड़की की आँखों में एक अजीब सी चमक आई, लेकिन यह चमक सम्मान की नहीं, बल्कि एक तीखे सवाल की थी। उसने कहा, “तो फिर अंकल, जब आप इतने बड़े आदमी हैं, तो आपने इस भूखी बच्ची को दस रुपये का बिस्किट क्यों नहीं दिला दिया? आप तो बैठकर बस देखते रहे।” अंकल थोड़ा सकपका … Read more

एक अनकही विदाई

 “पापा… ये क्या हो गया? आपने बताया क्यों नहीं कि आपकी तबीयत खराब है? आपको कोई परेशानी थी तो मुझसे कहना चाहिए था, आख़िर मैं आपका बेटा हूँ!” अभिनव के आँसू श्रीनाथ जी के हाथों पर गिर रहे थे। श्रीनाथ जी ने एक बहुत ही फीकी, लेकिन दर्द भरी मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा। … Read more

कांच के रिश्ते और आभासी दुनिया

 रामेश्वर जी ने एक व्यंग्यात्मक लेकिन दर्द भरी मुस्कान के साथ कहा, “यही तो दुख है बेटा। दुनिया तुम्हें श्रवण कुमार समझ रही है, लेकिन तुम्हारे माता-पिता यहाँ प्यासे बैठे हैं। तुमने लिखा कि ‘स्वर्ग माता-पिता के चरणों में है’, लेकिन इस घर में कदम रखे तुम्हें आठ घंटे हो गए हैं, और तुमने एक … Read more

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