*भरोसा* – तोषिका

तुम्हे मुझ पर *भरोसा* है ना? अपनी पत्नी रेखा का हाथ पकड़ते हुए अंकित बोला।

खुद से भी ज्यादा। मुझे पता है, आप जो भी करोगे वो सही ही करोगे।

तो फिर चलो यहां से, जल्दबाजी में अंकित बोला।

रेखा बोली “कहा जाना है, अभी तक तो रिया भी स्कूल से नहीं आई है।”

वो बस आती ही होगी, मैने अपने दोस्त को भेजा है उसे लाने के लिए। पसीने से लथपथ हुआ अंकित बोला।

रेखा को कुछ नहीं समझ आ रहा था, फिर वो बोली “हो क्या गया है आपको अंकित? आप तो ऐसे बर्ताव कर रहे है, जैसे आपने कोई गुनाह करा हो और आपको कोई लेने आ रहा है। ऊपर से इतना पसीना। सब ठीक तो है ना?”

अंकित बोला “हां सब ठीक है, तुमने अभी मुझ पर भरोसा दिखाया है और अब ये सवाल?”

अंकित भरोसा है, लेकिन आपकी फिक्र भी है और जब तक आप मुझे नहीं बताएंगे कि क्या हुआ है, मैं यहां से कही नहीं जाने वाली। ऐसा बोल कर रेखा वही पास पड़े सोफा पर बैठ गई।

अंकित उसके पास घुटनों के बल बैठा और बोला “देखो रेखा, मैं जानता हू कि….”

इतनी ही देर में दरवाजे में किसी ने दस्तक दी, अंकित एक दम से घबरा गया, उसके सीने में ऐसा दर्द उठा जैसे कोई कांटा चूबा रहा हो, और ये सब रेखा देख रही थी।

जब दरवाजा खोला तो वहां रिया थी और अंकित का दोस्त और फिर वो बोला “भाभी आपने सारी तैयारी कर ली है ना?”

रेखा को कुछ नहीं समझ आ रहा था कि अंकित का दोस्त क्या पूछ रहा है और ये शिकन की रेखा उसके माथे पर साफ झलक रही थी, जिसको देखते ही अंकित के दोस्त ने बोला “भाई, तूने भाभी को बात नहीं बताई? तूने कहा था तू बता देगा।”

अंकित ने अपना मुंह छुपाना चाहा, पर फिर वह बोला “अभी इन सब बातों का समय नहीं है, मैं बाद में रेखा को सब बता दूंगा।”

क्या बताना है मुझे? ऐसा क्या है, जो मुझे नहीं पता है? रेखा ने हैरान होते हुए कहा।

अंकित बोला “दरअसल बात ये है कि …कि मैने जो पैसे उधार लिए थे ना… उसको चुकाने के लिए, मैने हमारे रिश्तों की मर्यादा को लांघ दिया था।

रेखा वहां पर सुन खड़ी की खड़ी रह गई। उसको यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसका पति अंकित भी कुछ ऐसा कर सकता है, वो पति, जो हमेशा ईमानदारी से कामना जानता था और दूसरों को भी बोलता था, वो खुद भी ऐसा करेगा उसने सोचा ना था।

इतना सब रेखा सोच ही रही थी कि जिस चीज से अंकित बचना चाहता था, वो उसके घर पर आ गए और जबरदस्ती उसको खींच रहे थे और बोला “ऐसे लोग हमारे इस मोहल्ले में नहीं रहने चाहिए।” 

रेखा को जब होश आया तो उसने अपना पत्नी धर्म निभाया और बोला “ये मेरे और मेरे पति का बीच का मामला है, तो इसका फैसला लेने का हक भी मुझे है। आप लोग जाइए यहां से”।

कई देर तक तू तू मैं मैं के बाद वो लोग वहां से गए और फिर अंकित ने रेखा से माफी मांगी लेकिन रेखा, वहां से अपनी बेटी रिया और खुद चली गई, और अंकित वहां बस गिड़गिड़ाता रहा। साथ में उसके साथ उसका दोस्त उसको सांत्वना देता रहा। थोड़ी देर बाद रेखा कमरे से बाहर आई

और उसने अंकित को बोला कि “मुझे आपसे ये उम्मीद नहीं थी अंकित, आप मेरे पास भी तो आ सकते थे मदद मांगने, मैं अपने जेवर गिरवी रख देती या कैसे भी करके हम इस बात का हल निकालते। लेकिन आपने तो हमारे रिश्ते न ही विश्वास नहीं दिखाया

और आप कही बाहर चले गए ऐसा काम करने, जिसको बोलते हुए भी मुझे शर्म आ रही है। आज से हमारा रिश्ता होगा लेकिन वो सिर्फ एक मां बाप का ही होगा, जो भी है बस रिया की वजह से है। हमारा अब पति पत्नी वाला ऐसा कोई रिश्ता नहीं रहेगा।”

अंकित बोला “मैने जो भी किया अपने परिवार के लिए किया।” रेखा ने अपनी आवाज कठोर रखते हुए बोला “परिवार? अंकित आप परिवार की बात कर रहे है? परिवार वो होता है जिस पर भरोसा होता है, जहां सुख और दुख दोनों बांटते है।”

इतना बोल कर रेखा वापिस अपने कमरे में चली गई क्योंकि उसको एक मां का फ़र्ज़ अच्छी तरह से निभाना था।

*कुछ सालों बाद*

रेखा, रिया और अंकित एक छत के नीचे रह कर भी एक नहीं थे, वो बस अपनी मां बाप होने की जिम्मेदारी निभा रहे है ताकि, रिया का भविष्य सफल रहे। लेकिन जो दीवार रेखा और अंकित के बीच खड़ी हुई है, वो कम नहीं हुई और ना ही बड़ी, वो ही कि वो ही है।

लेखिका

तोषिका

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