उम्मीदों के नए रंग

सुबह की पहली किरण के साथ ही घर में बर्तनों की खटपट शुरू हो गई थी। चौंतीस वर्षीय सुमन अपनी दाईं ओर हल्का सा झुककर चलती हुई रसोई की तरफ बढ़ रही थी। बचपन में पोलियो का शिकार होने के कारण उसके पैर में जो लचक आ गई थी, वह उम्र के साथ और भी … Read more

खामोश दीवारें और सुलगते जज़्बात

“मैडम जी, दरवाज़ा तो खोलिए, कितनी देर से आवाज़ लगा रही हूँ!” कामवाली शांता की ऊँची आवाज़ सुनकर अंजलि जैसे किसी गहरे सपने से जागी। उसने झटके से अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाई और जाकर दरवाज़ा खोल दिया। पुणे के एक बेहद पॉश इलाके में बने उस आलीशान विला को बाहर … Read more

सपनों की राख और गृहस्थी की बेड़ियाँ

“मैंने तो तुझे पहले ही आगाह किया था विकास! यह लड़की सिर्फ तेरे पैसों पर ऐश करना जानती है। पढ़ाई-लिखाई तो बस एक बहाना है काम से बचने का। अगर सच में इसने किताबें खोली होतीं, तो आज इसका यह हाल न होता। तू ही अपनी पत्नी के मोह में अंधा हो गया था। अब … Read more

अधूरी कोख, मुकम्मल ममता

नंदिनी की उम्र बत्तीस साल हो चुकी थी और उसने यह मान लिया था कि उसकी ज़िंदगी की किताब में ‘परिवार’ नाम का पन्ना कभी नहीं जुड़ेगा। पुणे शहर की एक पुरानी और शांत कॉलोनी में पली-बढ़ी नंदिनी हमेशा से एक भरा-पूरा परिवार चाहती थी। लेकिन ज़िंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम उसे ख्यालों … Read more

आँगन का गुलमोहर

मुम्बई की एक गगनचुंबी इमारत की पच्चीसवीं मंजिल पर स्थित कॉन्फ्रेंस रूम में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी। बाहर सावन की झमाझम बारिश हो रही थी और अंदर सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल प्रोजेक्टर की हल्की भिनभिनाहट तोड़ रही थी। शहर की जानी-मानी अर्बन प्लानर और आर्किटेक्ट, राधिका अपने नए प्रोजेक्ट का … Read more

वो अनचाही नेमत: एक बेटी का वजूद

“माँ! ओ माँ! कहाँ हो आप? जल्दी से बाहर आइए, मेरा शुभ मुहूर्त निकला जा रहा है। आज मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन है, मुझे अपने हाथों से दही-चीनी खिलाकर विदा कीजिए।” घर के आंगन में गूंजती यह चहकती हुई आवाज़ डॉ. नव्या की थी। रसोई से अपने पल्लू में हाथ पोंछती हुई सुमित्रा … Read more

खामोशी की दरारें

दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक आज विकास को हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी। वह डाइनिंग टेबल के एक छोर पर बैठा अखबार के पन्नों में उलझने का नाटक कर रहा था, और ठीक उसके सामने बैठी नीता बिना कोई आवाज़ किए अपने कप की चाय खत्म कर रही थी। दोनों के बीच … Read more

खामोशियों का पुल

सिद्धार्थ और अनन्या की शादी को सात साल बीत चुके थे। जो भी उन्हें बाहर से देखता, यही कहता कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं। सिद्धार्थ एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और अनन्या एक स्वतंत्र लेखिका। उनका घर शहर के सबसे पॉश इलाके में था। घर में सुख-सुविधा की हर चीज़ … Read more

वो छाँव जो कभी बोझ नहीं बनी: एक पोते का समर्पण

शहर के उस शांत और एकांत श्मशान घाट पर आज आसमान भी जैसे मातम मना रहा था। हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी और हवा में एक अजीब सी उदासी घुली हुई थी। श्मशान के बीचों-बीच जलती हुई चिता की लपटें बारिश की बूंदों से संघर्ष कर रही थीं। चिता के ठीक सामने पच्चीस साल का … Read more

मुस्कुराहट के पीछे छिपे आँसू: एक बेटी की विदाई

बचपन से ही हर लड़की की तरह मैंने भी अपनी शादी को लेकर न जाने कितने ही सपने संजोए थे। लाल जोड़ा, हाथों में रची गहरी मेहंदी, ढोल-नगाड़ों की थाप और एक ऐसा राजकुमार जो मुझे ब्याह कर ले जाएगा। लेकिन इन तमाम खुशनुमा सपनों के बीच एक डरावना सच भी हमेशा मेरे जहन में … Read more

error: Content is protected !!