“समझदारी का मोती” – संगीता अग्रवाल

क्या बेटियों की शादी में लाखों रुपये सिर्फ चार घंटे के दिखावे और झूठी शान पर फूंक देना समझदारी है? एक सास जो हमेशा अपनी बहू को ‘कम अक्ल’ मानती थी, उसे कैसे एक तूफानी रात में समझ आया कि उसकी बहू ने अपनी उसी ‘बेवकूफी’ से उसकी बेटी का पूरा भविष्य संवार दिया है? … Read more

“रिश्तों की छांव” – रश्मि प्रकाश

जब आज़ादी की चाहत में एक नई बहू ने भरे-पूरे परिवार को ‘नौकरानी’ बनने का ताना देकर छोड़ दिया, तो क्या अकेलेपन की उन चार दीवारों ने उसे वो सुकून दिया जिसकी उसे तलाश थी? पढ़िए, कैसे एक जेठानी के मौन और समर्पण ने देवरानी को जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाया। स्वाति की आँखें … Read more

 “फर्ज़ की चौखट” – मुकेश पटेल

समाज कहता है कि शादी के बाद बेटी ‘पराया धन’ हो जाती है, लेकिन जब उस ‘पराये धन’ के अपने ही माता-पिता बेसहारा हो जाएं, तो क्या एक बेटी को रिवाजों के नाम पर अपना फर्ज़ भूल जाना चाहिए? पढ़िए एक इकलौती बेटी की कहानी, जिसने समाज की दोहरी मानसिकता को आईना दिखाते हुए अपने … Read more

रेशम के धागे

क्या एक सास का अपनी पुरानी यादों और पसंद से मोह, एक नई बहू के प्यार और अनकही कोशिशों पर भारी पड़ सकता है? एक मामूली सी दिखने वाली साड़ी कैसे दो पीढ़ियों के बीच की उस अदृश्य दीवार को गिरा सकती है जिसे सालों की रवायतों ने खड़ा किया हो, पढ़िए इस मार्मिक कहानी … Read more

मायके का लिफाफा – करुणा मलिक

सुनिता सोच में डूब गई। वो कौन सी अपने भाइयों की इकलौती बहन थी? सुनिता समेत वे कुल चार बहनें थीं। तीनों बड़ी बहनों की शादी की जिम्मेदारियां भाइयों ने पिता के गुजरने के बाद अपने कंधों पर उठाई थीं। दोनों भाइयों की अपनी भी तो गृहस्थी थी, उनका अपना भी खर्च था। रमेश भइया … Read more

ससुराल हैं, जंग-ए-मैदान नहीं – रोनिता

आओ जीजी आओ..! कब से तुम्हारी ही राह तक रही हूं, बेटी की शादी और उसकी इकलौती मासी सबसे आखिर में पहुंच रही है.. सरला जी ने कहा  मालती जी:  हां अब मेरी ऐसी किस्मत कहां है? जब मन करे, जहां मन करे जब चाहे चली जाओ! हम औरतों का जीवन भी बड़ा विचित्र होता … Read more

सबसे गहरा जख्म अपने ही देते हैं – संजय सिंह

अलार्म की घंटी बजी। राजू का हाथ अलार्म की तरफ बढ़ा।अलार्म की घड़ी को हाथ में पकड़कर टेबल लैंप को ऑन किया और देखा ।सुबह के 6:00 चुके हैं। रोजाना की तरह राजू अलार्म को बंद करके एकदम से उठा। कमरे की बड़ी लाइट ऑन करके, माता-पिता के कमरे की तरफ गया ।माता-पिता पहले ही … Read more

*सबसे गहरा ज़ख्म अपने ही देते हैं* – प्रतिमा पाठक

“अरे कलमुही! क्या रोना-धोना लगा रखा है? रोज सुबह-सुबह शुरू हो जाती है। कुछ चाय-नाश्ता मिलेगा या तेरे आँसुओं से ही पेट भरना होगा?” रमा की सास आशा देवी की कड़वी आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी। रमा चुपचाप आँसू पोंछकर रसोई में चली गई। शरीर से वह बेहद कमजोर हो चुकी थी। अभी एक … Read more

मेहरबान किस्मत – गीता वाधवानी

 सुभद्रा जी, वृद्धाश्रम में अपने साथ रहने वाली एक सहेली विमला  को वापस घर जाते देख रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि विमला की किस्मत कितनी अच्छी है पोती की समझदारी के कारण उन्हें अपना घर परिवार वापस मिल गया। दरअसल विमला के पोते को पता चल गया था कि उसकी … Read more

मेरा आईना – लतिका श्रीवास्तव

मां क्या जरूरत थी ये सब करने की अब इस उम्र में ..!! अमन की आवाज का लहजा तीखा और व्यंग्यपूर्ण था। शुभी के ठहरे कदम तेजी से वहां तक आ गए। क्या बात है इस तरह क्यों बोल रहे हैं आप उसने गर्दन झुकाए कुर्सी पर बैठी सास जी नीरजा की ओर देखते हुए … Read more

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