सुनंदा ने कसम खाई थी कि जिस उपेक्षा, अकेलेपन और तिरस्कार के साए में उसका अपना बचपन बीता था, उसकी परछाई भी नयनतारा पर नहीं पड़ने देगी। उसने अपनी हर सांस, अपनी हर ख्वाहिश अपनी बेटी के नाम कर दी। नयनतारा भी विलक्षण प्रतिभा की धनी निकली। जब वह छोटी थी, तो स्कूल से लौटते ही मां के पसीने को अपने नन्हे आंचल से पोंछती। अगर कभी सुनंदा को हल्का सा भी सिरदर्द होता, तो नयनतारा उसके सिर को अपनी छोटी-छोटी हथेलियों से दबाने बैठ जाती। वह सिर्फ एक बेटी नहीं थी, वह सुनंदा की वह मां बन गई थी जिसे उसने जन्म लेते ही खो दिया था।
रसोई से छनकर आती शुद्ध घी में सिकती पूरियों और मेवों से सजी खीर की सौंधी खुशबू पूरे मकान को महका रही थी। सुनंदा सुबह चार बजे से ही पैर पर पहिए बांधे इधर से उधर घूम रही थी। कभी वह बैठक के पर्दों की सिलवटें ठीक करती, कभी डाइनिंग टेबल पर बिछी मेजपोश को सहेजती, तो कभी भागकर फिर से चूल्हे की आंच धीमी करने लगती। उसके चेहरे पर फैली चमक आज पैंतालीस वर्ष की उम्र में भी किसी सोलह साल की अल्हड़ किशोरी जैसी लग रही थी। उसके भीतर का उल्लास शब्दों का मोहताज नहीं था। आज उसकी बिटिया, उसकी नयनतारा, सात समंदर पार जर्मनी से अपनी कैंसर इम्यूनोलॉजी की डॉक्टरेट पूरी करके पूरे पांच साल बाद वतन लौट रही थी। वह केवल एक डिग्री लेकर नहीं आ रही थी, बल्कि सुनंदा के उन तमाम आंसुओं, अपमानों और तानों का मुकम्मल जवाब बनकर लौट रही थी, जो उसने अपनी ज़िंदगी की तपती दोपहरी में चुपचाप झेले थे।
सुनंदा जब भी पीछे मुड़कर देखती, तो उसे अपनी ज़िंदगी किसी सूखे रेगिस्तान जैसी लगती, जहां हर कदम पर कांटे बिछे थे। उसका जन्म जयपुर के एक पुराने, संभ्रांत लेकिन बेहद रूढ़िवादी हवेलीनुमा घर में हुआ था। वह मनहूस घड़ी आज भी परिवार के पुराने लोगों की बातों में अक्सर दर्ज मिलती थी, जब सुनंदा ने अपनी पहली सांस ली और उसकी मां गायत्री देवी ने प्रसव कक्ष में ही अपनी आखिरी सांस छोड़ दी। प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव ने एक हंसती-खेलती मां को सदा के लिए छीन लिया था। उस दिन हवेली में बेटी के जन्म पर थाली नहीं बजी, बल्कि मातम का सन्नाटा पसर गया।
सुनंदा के पिता, भवानी शंकर जी, जो एक प्रतिष्ठित राजकीय महाविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे, पत्नी के असामयिक निधन से भीतर तक बिखर गए। वह इतने अंतर्मुखी और संवेदनहीन हो गए कि उन्होंने अपनी ही नवजात बच्ची को अपनी पत्नी की मौत का प्रत्यक्ष कारण मान लिया। बच्ची का रोना उन्हें पत्नी की चीखों जैसा लगता। लिहाजा, उन्होंने धीरे-धीरे घर से ही किनारा कर लिया। सुबह सूरज निकलने से पहले कॉलेज निकल जाना, देर शाम तक लाइब्रेरी में बैठना और रात को जब घर लौटना, तो सीधे अपने अध्ययन कक्ष में जाकर दरवाजा बंद कर लेना—यही उनकी दिनचर्या बन गई थी। उन्होंने कभी अपनी बेटी को सीने से लगाकर यह नहीं पूछा कि उसने दूध पिया या नहीं।
वह एक बड़ा संयुक्त परिवार था। घर में बड़े ताऊ-ताई, छोटे चाचा-चाची और उनके पांच बच्चे थे। भरा-पूरा परिवार होते हुए भी सुनंदा वहां एक अवांछित अतिथि की तरह जी रही थी। चाचा-चाची के अपने बच्चे थे, ताऊजी के लड़के-लड़कियां अपनी दुनिया में मग्न थे। ताई जी घर की मुख्तार थीं, जिनकी नजरों में सुनंदा बस एक जिम्मेदारी का बोझ थी। अगर कभी सुनंदा को भूख लगती और वह रोने लगती, तो उसे झिड़कियां मिलतीं। कई-कई दोपहरें ऐसी गुजरीं जब वह आंगन के कोने में, नीम के पेड़ की छांव में बैठी अपनी नन्हीं उंगलियों और अंगूठे को चूसते-चूसते थककर जमीन पर ही सो जाती थी। बूढ़ी परदादी कभी-कभार छुपकर उसके मुंह में बताशा या कटोरी भर दूध रख देतीं, लेकिन बहुओं के कड़वे बोल और घर के क्लेश के डर से वो भी खुलकर बच्ची को दुलार नहीं पाती थीं।
सुनंदा ने बचपन में ही समझ लिया था कि इस दुनिया में रोने से आंसू पोंछने वाला कोई हाथ आगे नहीं आता। उसने खुद को खुद ही पाला। पुराने बस्तों से निकली फटी हुई कॉपियां, चचेरे भाई-बहनों की छोड़ी हुई पुरानी किताबें और पेंसिल के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर उसने अपनी पढ़ाई शुरू की। वह पढ़ने में असाधारण रूप से तेज थी। स्कूल में जब भी उसके पहले दर्जे में पास होने का रिपोर्ट कार्ड आता, तो घर में कोई उसकी पीठ थपथपाने वाला नहीं होता था। पिता केवल दस्तखत करके कागज मेज पर सरका देते, बिना उसकी आंखों में झांके।
समय अपनी गति से सरकता रहा। सुनंदा ने सरकारी कॉलेज से वनस्पति विज्ञान में स्नातक की परीक्षा सर्वोच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली। अब वह तेईस वर्ष की हो चुकी थी। घर में उसकी मौजूदगी ताई और चाची को और अधिक खटकने लगी थी। हर दिन बात-बात पर ताने कसे जाते कि “पराया धन घर में बैठा रोटियां तोड़ रहा है।” आखिरकार, परदादी की बीमारी और उनकी अंतिम इच्छा की दुहाई देकर पिता पर दबाव बनाया गया। भवानी शंकर जी ने अपने एक पुराने परिचित, जो अब भोपाल में बस चुके थे, के मंझले बेटे सुमित के साथ सुनंदा का रिश्ता पक्का कर दिया।
विवाह बेहद सादगी और रूखेपन के साथ संपन्न हुआ। कोई शहनाई का उल्लास नहीं था, कोई मायके वालों की आंखों में छलकती विदाई की ममता नहीं थी। पिता ने दूर खड़े होकर रस्म अदायगी के तौर पर हाथ जोड़े, थोड़ा सा स्त्रीधन और विदाई का लिफाफा थमाया और अपनी नजरें फेर लीं। सुनंदा उस दिन रोई भी नहीं, क्योंकि जहां अपना कोई था ही नहीं, वहां से बिछड़ने का दर्द कैसा?
ससुराल भोपाल में था। सुमित एक दवा निर्माता कंपनी में क्वालिटी कंट्रोल ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। वे एक सीधे-सादे, सुलझे हुए और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे, लेकिन उनका परिवार पारंपरिक और कठोर था। घर में सास कल्याणी देवी का सख्त अनुशासन चलता था। उनकी दो ननदें थीं, जिनकी शादी हो चुकी थी लेकिन मायके में उनका हस्तक्षेप अटूट था। सास का स्पष्ट मानना था कि बहू को चौखट के भीतर सिमटकर केवल सेवा और परंपरा का पालन करना चाहिए।
सुनंदा के लिए यह माहौल नया नहीं था। वह तो बचपन से ही उपेक्षा और बंधनों की भट्टी में तपकर कुंदन बनी थी। उसने बिना किसी शिकायत के पूरे घर का कामकाज संभाल लिया। सुबह पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक वह मशीन की तरह जुटती। सुमित उसके इस मौन समर्पण को देखते थे। वे अपनी मां के दबंग स्वभाव के आगे खुलकर विद्रोह तो नहीं कर पाते थे, लेकिन अकेले में सुनंदा के प्रति उनका व्यवहार बहुत सम्मानजनक और प्रेमपूर्ण था। वे जानते थे कि उनकी पत्नी ने बचपन में कितने अभाव झेले हैं। शादी के करीब डेढ़ साल बाद, जब सुमित का तबादला इंदौर के एक बड़े प्लांट में हो गया, तो सुनंदा के जीवन में पहली बार राहत की ताजी हवा आई। सास-ससुर के संयुक्त साए से दूर, इंदौर के एक छोटे से दो कमरों के किराए के घर में दोनों ने अपनी स्वतंत्र गृहस्थी बसाई।
शादी के तीन साल बीतने के बाद सुनंदा गर्भवती हुई। इस खबर ने उस छोटे से घर को खुशियों के गुलजार में बदल दिया। सुमित फूले नहीं समा रहे थे। सुनंदा को लगा जैसे ईश्वर ने अंततः उसकी झोली में खुशियों के मोती डालने का फैसला कर लिया है। वह हर दिन आने वाले नन्हे मेहमान के लिए स्वेटर बुनती, उसके लिए लोरी सोचती। लेकिन नियति को अभी उसकी और परीक्षा लेनी थी।
आठवां महीना चल रहा था। एक शाम जब वह बालकनी में सूखे कपड़े उतार रही थी, अचानक पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों की तरफ जा गिरी। तीन-चार सीढ़ियां लुढ़कते हुए वह फर्श पर आ गिरी। असहनीय दर्द से वह कराह उठी। पड़ोसियों की मदद से सुमित उसे तुरंत शहर के सबसे बड़े जनाना अस्पताल ले गए।
अस्पताल का वह सफेद कमरा और डॉक्टरों की भागदौड़ किसी डरावने सपने जैसी थी। कई घंटों के जटिल ऑपरेशन के बाद डॉक्टर बाहर आए। सुनंदा ने एक अत्यंत कमजोर लेकिन जीवित बच्ची को जन्म दिया था। सुमित की जान में जान आई, लेकिन अगले ही पल मुख्य सर्जन के शब्दों ने उनके पैरों तले से जमीन खिसका दी। डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा, “मिस्टर सुमित, अंदरूनी चोट और गर्भाशय के बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने के कारण हमें यूट्रस निकालना पड़ा। मां और बच्ची दोनों की जान बहुत मुश्किल से बची है, लेकिन एक बेहद कड़वी सच्चाई यह है कि आपकी पत्नी अब जीवन में कभी दोबारा गर्भधारण नहीं कर पाएंगी।”
खबर जब भोपाल पहुंची, तो सास कल्याणी देवी अपनी दोनों बेटियों के साथ तुरंत इंदौर आ धमकीं। अस्पताल के वार्ड में जहां सुनंदा अपनी नन्हीं सी बच्ची को सीने से लगाए दर्द से कराह रही थी, वहां संवेदना की जगह ताने बरसने लगे। सास ने छाती पीटते हुए अस्पताल के गलियारे में ही हंगामा खड़ा कर दिया, “हाय री फूटी किस्मत! हमारे कुल का दीपक बुझ गया! एक तो लड़की पैदा की, ऊपर से हमेशा के लिए बांझ हो गई! अब हमारे खानदान का नाम कौन आगे बढ़ाएगा? कौन देगा हमारे बेटे को मुखाग्नि? यह तो हमारे घर का सर्वनाश करने आई है!”
ननदें भी पीछे नहीं रहीं। उन्होंने भी विष बुझे तीरों की बौछार कर दी, “भैया की पूरी ज़िंदगी खराब कर दी इस मनहूस ने। अपनी मां को खा गई थी, अब हमारे भाई का वंश खा गई।”
उस पल, सुनंदा के भीतर कुछ टूटा—लेकिन वो कांच नहीं था, वो लोहा था जो आग में तपकर फौलाद बन गया था। उसने अपनी छाती से चिपकी उस नन्ही, अबोध जान को देखा, जो अपनी बंद मुट्ठियों से मां का आंचल टटोल रही थी। सुनंदा को अपना बीता हुआ कल याद आ गया—जब वह भूखी रोती थी और कोई उसे उठाने वाला नहीं था, जब उसे मनहूस कहकर कोनों में धकेल दिया गया था।
उसकी आंखों के आंसू अचानक सूख गए। उसने ड्रिप लगी बांह को हल्का सा संभाला, बिस्तर पर उठकर सीधी बैठी और पहली बार अपनी आवाज की पूरी ताकत से गरज उठी। उसकी आवाज में ऐसी गूंज थी कि पूरे वार्ड का सन्नाटा खिंच गया।
“बस! बहुत हो गया!” सुनंदा की आंखें अंगारे की तरह दहक रही थीं। उसने सीधे अपनी सास की आंखों में देखा, “एक शब्द और नहीं मां जी! आज तक आपने मुझे जो कहा, मैंने सिर झुकाकर सह लिया क्योंकि मैं इस घर की बहू थी। लेकिन आज इस पल से, मैं सिर्फ एक मां हूं! मेरी बेटी के खिलाफ अगर किसी ने एक भी जहरीला लफ्ज़ निकाला, तो मैं भूल जाऊंगी कि मेरा आपसे क्या रिश्ता है। जिसे मेरे बच्चे से ऐतराज है, जिसे लगता है कि यह वंश नहीं है, वो इसी वक्त इस कमरे से, और हमारी ज़िंदगी से बाहर निकल जाए!”
सास अवाक रह गईं। उन्होंने कभी उस दबी-कुचली, शांत सुनंदा का यह रौद्र रूप नहीं देखा था। उन्होंने बेटे की तरफ देखा, “देख रहा है सुमित? अपने मां-बाप का ऐसा अपमान करवाएगा इस औरत से?”
सुमित आगे बढ़े। उन्होंने अपनी मां की तरफ देखा, फिर बिस्तर पर बैठी अपनी पत्नी और उस नन्हीं सी गुड़िया को देखा। सुमित ने झुककर सुनंदा के कांपते हाथों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया और मुड़कर दृढ़ता से कहा, “मां, सुनंदा बिल्कुल सही कह रही है। मेरी बेटी ही मेरा वंश है, मेरा अभिमान है। अगर आप लोग इसे अपना नहीं सकते, तो बेहतर होगा कि आप लोग भोपाल लौट जाएं। हम अपनी दुनिया खुद बसा लेंगे।”
उस दिन सास और ननदें पैर पटकती हुई वापस लौट गईं, लेकिन उस अस्पताल के कमरे में एक नए युग की शुरुआत हुई थी। सुनंदा ने अपनी बेटी का नाम रखा—’नयनतारा’, यानी आंखों का तारा। वह सचमुच उन दोनों की आंखों का नूर बन गई।
सुनंदा ने कसम खाई थी कि जिस उपेक्षा, अकेलेपन और तिरस्कार के साए में उसका अपना बचपन बीता था, उसकी परछाई भी नयनतारा पर नहीं पड़ने देगी। उसने अपनी हर सांस, अपनी हर ख्वाहिश अपनी बेटी के नाम कर दी। नयनतारा भी विलक्षण प्रतिभा की धनी निकली। जब वह छोटी थी, तो स्कूल से लौटते ही मां के पसीने को अपने नन्हे आंचल से पोंछती। अगर कभी सुनंदा को हल्का सा भी सिरदर्द होता, तो नयनतारा उसके सिर को अपनी छोटी-छोटी हथेलियों से दबाने बैठ जाती। वह सिर्फ एक बेटी नहीं थी, वह सुनंदा की वह मां बन गई थी जिसे उसने जन्म लेते ही खो दिया था।
नयनतारा की लगन और कुशाग्र बुद्धि ने उसे हमेशा स्कूल और कॉलेज में अव्वल रखा। जीव विज्ञान में उसकी गहरी रुचि थी। जब उसने भारतीय विज्ञान संस्थान से मास्टर्स पूरा किया, तो उसे जर्मनी के विश्वविख्यात कैंसर रिसर्च सेंटर से पूर्ण छात्रवृत्ति के साथ डॉक्टरेट और अनुसंधान का सीधा निमंत्रण मिला। वह एक अत्यंत दुर्लभ और गौरवशाली अवसर था।
रिश्तेदारों ने फिर से फुसफुसाना शुरू किया था, “अकेली लड़की को विदेश भेजना ठीक नहीं, शादी की उम्र हो रही है, हाथ पीले करो।” लेकिन सुनंदा और सुमित चट्टान की तरह अपनी बेटी के पीछे खड़े रहे। सुनंदा ने अपनी बची-खुची सोने की चूड़ियां बेचकर उसके शुरुआती खर्च का इंतजाम किया और मुस्कुराते हुए उसे एयरपोर्ट पर विदा किया था। उसने बेटी से बस एक बात कही थी, “नयन, कभी पीछे मुड़कर मत देखना। दुनिया चाहे जो कहे, तू सिर्फ अपने सपनों की उड़ान देखना।”
आज वही नयनतारा लौट रही थी। वह सिर्फ एक डिग्री लेकर नहीं लौट रही थी, बल्कि उसने ब्लड कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए एक नया बायोमार्कर विकसित किया था, जिसके लिए उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया था और अब वह भारत सरकार के एक शीर्ष संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में कार्यभार संभालने वाली थी।
तभी दरवाजे के बाहर एक सफेद टैक्सी आकर रुकी। कार के हॉर्न की तेज आवाज से सुनंदा का ध्यान टूटा। वह बदहवास सी दरवाजे की ओर भागी।
टैक्सी का दरवाजा खुला। गहरे नीले रंग के फॉर्मल सूट में, कंधे पर लैपटॉप बैग टांगे, आत्मविश्वास से लबरेज एक छरहरी, खूबसूरत युवती बाहर निकली। उसके चेहरे पर वही तेज था जो सुनंदा के आत्मसम्मान का अक्स था।
“मां!” नयनतारा ने पुकारा।
सुनंदा चौखट पर ही ठिठक गई। उसकी आंखों से खुशी के मोतियों की अविरल धारा बह निकली। नयनतारा दौड़ती हुई आई और सीधे सुनंदा के गले लग गई। दोनों मां-बेटी आंसुओं में भीग गईं। सुमित भी पीछे आकर खड़े हो गए और अपनी भीगी आंखों से दोनों को बांहों में समेट लिया।
नयनतारा ने अलग होकर मां के चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया और उसके माथे को चूमते हुए कहा, “मां, आज मैं जो कुछ भी हूं, जहां भी हूं, सिर्फ तुम्हारी उस एक हुंकार की वजह से हूं जो तुमने उस दिन अस्पताल के कमरे में भरी थी। अगर उस दिन तुमने मेरे लिए दुनिया से लड़ना न चुना होता, तो शायद आज मैं भी किसी कोने में अपनी पहचान ढूंढ रही होती।”
सुनंदा ने अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए आसमान की ओर देखा। आज उसके मन से अपने स्वर्गीय माता-पिता, अपने उपेक्षित बचपन और उन तमाम तानों का आखिरी दर्द भी धुल गया था। उसे समझ आ गया था कि जिंदगी में अगर काली रातें लंबी होती हैं, तो सुबह का सूरज भी उतना ही प्रखर और चमकदार होता है। जो पौधा सबसे ज्यादा आंधियों को झेलता है, उसकी जड़ें उतनी ही गहरी होती हैं।
दोस्तों, एक बेटी केवल एक परिवार का हिस्सा नहीं होती, बल्कि वह पूरे कुल का स्वाभिमान और शक्ति बन सकती है, बशर्ते उसे एक मां का विश्वास और पिता का अटूट संबल मिले।
आपको सुनंदा के संघर्ष और नयनतारा की इस सफलता की यात्रा कैसी लगी? क्या हमारे समाज को आज भी बेटियों को ‘वंश’ के संकीर्ण तराजू में तोलने की मानसिकता से पूरी तरह मुक्ति नहीं पा लेनी चाहिए? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर साझा करें। आपकी हर एक प्रतिक्रिया किसी न किसी के नजरिए को बदलने की ताकत रखती है।
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मूल लेखिका : डॉ. पारुल अग्रवाल,
नोएडा