घर की असली लक्ष्मी

देवांश के हर एक शब्द ने मालती आंटी के अहंकार पर करारा प्रहार किया था। उनके चेहरे का रंग उड़ गया था। पहली बार उन्हें आईना दिखाया गया था, और वह आईना किसी गैर ने नहीं, बल्कि उनके अपने बेटे ने दिखाया था जिसे वे अपनी सबसे बड़ी जागीर समझती थीं।

हरिशंकर जी भी आगे आए। उन्होंने मालती देवी के कंधे पर हाथ रखा और बहुत ही भरे हुए गले से कहा, “मालती, देवांश बिल्कुल सच कह रहा है। हम व्यापार में इतने अंधे हो गए कि हमने इंसानों और रिश्तों का भी मोल लगाना शुरू कर दिया। जानकी हमारे घर की मर्यादा है, और आज तुमने जो किया, उससे हमारा सिर नीचा हुआ है।”

कार्तिक मास की वो सुनहरी सुबह हर साल की तरह इस बार भी ढेर सारी उमंगें लेकर आई थी। इंदौर शहर की हवा में हल्की सी गुलाबी ठंड घुल चुकी थी। आसमान पर अभी भोर की लालिमा पूरी तरह बिखरी भी नहीं थी कि मेरी नींद खुल गई। धनतेरस और रूप चौदस तो जैसे पलक झपकते ही बीत गए थे और आज दीपपर्व का मुख्य दिन था। घर में त्योहार का मतलब होता है जिम्मेदारियों की एक लंबी फेहरिस्त, जो सुबह की पहली चाय की चुस्की के साथ ही शुरू हो जाती है।

मैंने सबसे पहले तुलसी के पौधे के पास एक छोटा सा दीपक जलाया और फिर रसोई में जाकर सासू माँ और ससुर जी के लिए अदरक वाली चाय चढ़ाई। अभी चाय की भाप कपों से उठ ही रही थी कि भीतर के कमरे से ग्यारह साल के आरव की आवाज गूंजी, “मम्मी, मेरा नया कुर्ता कहाँ रखा है? और मेरे जूते पॉलिश हुए या नहीं?”

आरव अब सातवीं कक्षा में आ गया था, मगर अपनी चीजों को सलीके से रखने का हुनर उसने अब तक नहीं सीखा था। उसके ठीक पीछे नौ साल की अवनि अपनी फ्रॉक की सिलवटें ठीक करती हुई बाहर निकली। उसने चुपचाप अपने बिखरे हुए खिलौने समेटे, अपनी किताबों की मेज ठीक की और मुस्कुराते हुए बोली, “शुभ दीपावली मम्मी! लाइए, मैं दादी जी के कमरे में चाय रख आती हूँ।”

मैं अवनि को देखकर मन ही मन मुस्कुरा उठी। अक्सर लोग कहते हैं कि बेटियाँ जन्म से ही वक्त से आगे चलती हैं, उनमें घर-आंगन को संभालने की एक कुदरती समझ होती है। अवनि को देखकर मुझे यह बात हमेशा सच लगती थी। मेरे पति, मलय, एक बहुराष्ट्रीय बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर थे। त्योहारों पर उनका काम और बढ़ जाता था, पर फिर भी वे परिवार के हर छोटे-बड़े उल्लास में पूरी शिद्दत से शामिल होते थे। कुल मिलाकर हमारा परिवार बहुत सहज, शांत और सुखी था, जहाँ खुशियों की कोई नुमाइश नहीं थी, बस एक-दूसरे के प्रति गहरा आदर था।

हमारे इस शांतिपूर्ण जीवन में छह-सात महीने पहले एक नया मोड़ आया था, जब हमारे ठीक सामने वाले आलीशान बंगले में रायबहादुर परिवार रहने आया। उस भव्य कोठी के मालिक थे हरिशंकर रायबहादुर, जो कपड़ा उद्योग के एक जाने-माने और बड़े व्यापारी थे। हाल ही में उन्होंने अपने कारोबार का विस्तार करते हुए इंदौर के मुख्य बाजार में एक बहुत बड़ा वस्त्र प्रतिष्ठान खोला था। परिवार में हरिशंकर जी के अलावा उनकी धर्मपत्नी मालती देवी, उनकी दो विवाहिता बेटियाँ जो बड़े घरानों में ब्याही थीं, उनका इकलौता बेटा देवांश, बहू जानकी और तीन साल की एक नन्हीं पोती मिशिका थी।

जब वे लोग यहाँ शिफ्ट हुए थे, तब पड़ोस धर्म निभाते हुए हमने उनके सामान को व्यवस्थित करवाने और शुरुआती दिनों के भोजन-पानी का पूरा ख्याल रखा था। इसी अपनेपन के चलते मालती आंटी का हमारे घर आना-जाना शुरू हो गया था। वे दिन में कम से कम एक बार मेरी सासू माँ के पास बैठने जरूर आती थीं। बातों-बातों में वे अपने बेटे के बड़े व्यापार, अपनी बेटियों के ससुराल के ठाठ-बाट और अपने पुश्तैनी गहनों के किस्से बड़े चाव से सुनातीं। मगर जब भी उनकी बहू जानकी का जिक्र आता, उनके चेहरे की चमक अचानक तल्खी में बदल जाती। जानकी एक बेहद संस्कारी, रूपवान और पढ़ी-लिखी लड़की थी, जो एक मध्यमवर्गीय परिवार से आई थी। सुबह पाँच बजे से रात के ग्यारह बजे तक वह पूरे बंगले की व्यवस्था में जुटी रहती थी, नौकरों की फौज होने के बावजूद रसोई से लेकर पूजाघर तक की हर बारीक चीज वह खुद संभालती थी। लेकिन मालती आंटी के मुख से कभी उसके लिए प्रशंसा का एक मीठा शब्द नहीं निकला। वे हमेशा यही कहतीं, “बस ठीक ही है, हमारे स्तर के हिसाब से ढलने में उसे अभी सदियाँ लगेंगी।” मेरी सासू माँ बहुत सुलझी हुई महिला थीं, वे ऐसी बातों पर केवल एक धीरी सी मुस्कान देकर बात टाल दिया करती थीं।

आज दीपावली की दोपहर में मालती आंटी खुद हमारे घर आमंत्रण देने आई थीं। उन्होंने बड़े गर्व से कहा था, “भाभी जी, शाम को हमारे नए प्रतिष्ठान और घर पर बहुत बड़ी महालक्ष्मी पूजा है। शहर के तमाम बड़े उद्योगपति, अधिकारी और हमारे सारे रिश्तेदार आ रहे हैं। पंडित जी विशेष रूप से बनारस से पधारे हैं। आप लोग पूरे परिवार के साथ शाम सात बजे जरूर आइएगा।”

दोपहर ढलने लगी थी। मैंने रसोई की खिड़की से बाहर देखा, तो सामने वाले बंगले के विशाल दालान में जानकी घुटनों के बल बैठी हुई थी। वह बड़ी तन्मयता से पूरे आंगन में चावल के आटे, सिंदूर और सूखे रंगों से एक बेहद भव्य अल्पना और रंगोली उकेर रही थी। उसकी उँगलियों में गजब का हुनर था, पर उसके चेहरे पर त्योहार की कोई चमक नहीं थी। उसकी आँखें झुकी हुई थीं और मुद्रा इतनी गंभीर थी जैसे वह किसी उत्सव की नहीं, बल्कि किसी परीक्षा की तैयारी कर रही हो। थोड़ी देर में मालती आंटी की ऊँची और सख्त आवाज आंगन में गूंजी, “जानकी! रंगोली के चक्कर में ही बैठी रहोगी क्या? बाहर के तोरण कौन बांधेगा? और वो मेवों की थालियाँ अभी तक तैयार क्यों नहीं हुईं? मेहमान आने शुरू हो जाएंगे तो क्या तमाशा बनाओगी?”

जानकी ने बिना कोई उत्तर दिए, आहिस्ता से अपना पल्लू संभाला और उठकर तोरण सजाने लगी। उसकी यह गहरी चुप्पी मेरे मन को बहुत भारी कर गई। जिस घर में अथाह दौलत थी, नौकर-चाकर थे, सुख-सुविधाओं का अंबार था, वहाँ उस घर की बहू के चेहरे पर ऐसी बेबसी और उदासी क्यों थी?

शाम होते ही हमारा पूरा मोहल्ला दीपों की जगमगाहट से खिल उठा। हमारे घर के आंगन में भी मिट्टी के दीयों ने अंधकार को परास्त कर दिया था। हमने सासू माँ, ससुर जी और बच्चों के साथ मिलकर विधि-विधान से लक्ष्मी-गणेश का पूजन किया, घर की बनी गुझिया और शकरपारे का भोग लगाया। बच्चों ने आंगन में फुलझड़ियाँ और अनार जलाकर त्योहार का आनंद लिया। ठीक सवा सात बजे मलय ने कहा, “शिखा, चलो अब रायबहादुर जी के यहाँ हो आते हैं, उन्होंने बहुत मान से बुलाया है।”

हम सब जब उनके बंगले की ओर बढ़े, तो दूर से ही उनका घर किसी राजमहल की तरह दमक रहा था। मुख्य द्वार से लेकर अंदर के दालान तक बिजली की दूधिया लड़ियों, गेंदे और मोगरे के ताजे फूलों की महक फैली हुई थी। उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठान के बहीखातों की पूजा का भी वहीं भव्य प्रबंध किया गया था। शहर के कई प्रतिष्ठित व्यापारी, नेता और महंगे लिबासों में सजे मेहमान वहाँ उपस्थित थे।

मालती आंटी ने गहरे मैरून रंग की भारी कांजीवरम साड़ी पहन रखी थी, जिसके साथ उन्होंने कुंदन और पन्ने का भारी हार धारण किया हुआ था। उनका हर अंदाज अपनी संपन्नता का अहसास कराने वाला था। हमें देखते ही वे आगे बढ़ीं और मुस्कुराकर बोलीं, “अरे भाभी जी, आइए-आइए! देखिए न, मेहमानों का ताँता लगा हुआ है, मुझे तो सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिल रही।”

कुछ ही पलों में जानकी रसोई की तरफ से मेवों और मिठाइयों के बड़े-बड़े चांदी के थाल सजाकर बाहर आई। उसने गहरे हरे रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, माथे पर सिंदूर की चौड़ी रेखा थी और चेहरे पर वही चिर-परिचित शालीनता। वह बेहद खूबसूरत लग रही थी, पर उसकी आँखों की उदासी उस भारी श्रृंगार के पीछे भी छुप नहीं पा रही थी।

पंडित जी ने शंख बजाकर पूजा का शुभारंभ किया और यजमान के रूप में देवांश और जानकी को पूजा की चौकी पर बैठने का संकेत दिया। देवांश अपने पिता के साथ व्यापार में हाथ बंटाता था, स्वभाव से शांत था, मगर अक्सर अपनी माँ के रौब के आगे चुप ही रहता था। जैसे ही दोनों पूजा पर बैठे, जानकी के मायके से उसके पिता, बड़ा भाई और भाभी भी हॉल में प्रविष्ट हुए। उनके पहनावे में बहुत सादगी थी—पिताजी ने साधारण सा कुर्ता-पाजामा और भाई ने एक सादा पैंट-कमीज पहन रखी थी। उनके हाथों में मिठाइयों के दो साधारण डिब्बे और कुछ फल थे।

जानकी के पिता ने आगे बढ़कर बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर मालती आंटी और हरिशंकर जी को प्रणाम किया, “समधन जी, राम-राम। शुभ दीपावली।”

मालती आंटी ने उनके अभिवादन का उत्तर केवल गर्दन को हल्का सा झटका देकर दिया। उनके चेहरे पर एक उपेक्षा भरा भाव साफ देखा जा सकता था। उन्होंने उन साधारण डिब्बों को ऐसे देखा मानो वे उनकी भव्य महफिल के लायक ही न हों। उन्होंने एक नौकर को इशारा किया कि वो डिब्बे एक तरफ रख दिए जाएं, और खुद दूसरे अमीर मेहमानों की आवभगत में लग गईं। जानकी के पिता और भाई एक कोने में चुपचाप खड़े हो गए। जानकी ने जब यह देखा, तो उसका चेहरा एकदम फक पड़ गया। उसका मन अपने मायके वालों के इस मौन अपमान से छलनी हो गया था, पर वह पूजा की वेदी पर बैठी कुछ कह नहीं सकती थी।

पंडित जी ने मंत्रोच्चार शुरू किया, “ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्…”

पंडित जी ने अक्षत और फूल आगे बढ़ाते हुए कहा, “बहू रानी, अपने दाहिने हाथ से यह अक्षत कलश पर अर्पित कीजिए।”

जानकी ने जैसे ही अपना हाथ आगे बढ़ाया, मालती आंटी की तीखी नजरें उसके हाथों पर टिक गईं। अचानक मालती आंटी की भृकुटि तन गई। उनका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। भरी सभा में, जहाँ दर्जनों सम्मानित मेहमान और रिश्तेदार बैठे थे, मालती आंटी का कड़क स्वर गूंज उठा, “ठहरो पंडित जी!”

पूरे हॉल में अचानक सन्नाटा छा गया। मंत्रों की गूंज थम गई। सब लोग अचरज से मालती आंटी की तरफ देखने लगे।

मालती आंटी आगे बढ़ीं और जानकी की कलाई को लगभग झटकते हुए बोलीं, “जानकी! तुम्हारे हाथ का वो पुश्तैनी सोने का कंगन कहाँ है, जो हमने तुम्हें मुंह दिखाई में दिया था? और वो हीरे की अंगूठी कहाँ गई जो देवांश ने सगाई में पहनाई थी? तुम्हारे दोनों हाथ ऐसे सूने क्यों पड़े हैं आज के पावन दिन पर?”

जानकी कांप उठी। वह हकलाने लगी, “माँ जी… वो… सुबह से भोग की तैयारी और आंगन की सजावट में… हाथ में पानी का काम था, तो मैंने… मैंने वो उतारकर अलमारी की दराज में रख दिए थे… फिर आप लोगों के कहने पर जल्दी-जल्दी मेहमानों के नाश्ते का प्रबंध करने लगी, तो मुझे याद ही नहीं रहा कि…”

“बस करो!” मालती आंटी ने उसकी बात बीच में ही काट दी। उनकी आवाज में भरा विषैला व्यंग्य पूरे कमरे में तैर गया। वे जानकी के मायके वालों की तरफ देखते हुए तल्ख लहजे में बोलीं, “याद कैसे रहेगा? जब कोई चीज अपने मायके से मिली हो, तब तो इंसान उसकी कद्र करे! अपने घर से तो तुम फूटी कौड़ी भी साथ नहीं लाई थीं। यह तो हमारे खानदान का बड़प्पन था कि हमने तुम्हें सोने से लाद दिया। और आज इतने बड़े त्योहार पर, इतने बड़े लोगों के सामने तुम ऐसे भिखारिनों की तरह सूने हाथ लिए बैठ गई हो? हमारी नाक कटवाने में तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आई?”

जानकी के कानों में वे शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। उसका पूरा शरीर कांपने लगा। उसके पिता का सिर शर्म और बेबसी से झुक गया, बूढ़ी आँखों से आंसुओं की दो बूंदें उनके गालों पर ढुलक गईं। जानकी की आँखों से अपमान और गहरे दर्द का सैलाब बह निकला। वह जमीन की ओर ताकती रही, उसका गला रुंध गया था और वह एक शब्द भी नहीं बोल पा रही थी।

उस क्षण मुझे ऐसा लगा जैसे उस भव्य घर में कोई पूजा नहीं हो रही थी, बल्कि एक जीती-जागती स्त्री की आत्मा की बलि दी जा रही थी। मेरा खून खौल उठा। मैं सोचने लगी कि क्या यही लक्ष्मी की पूजा है? जिस घर में दीवारों पर सोने के पानी की नक्काशी हो, चांदी के बर्तनों में मेवे परोसे जा रहे हों, लेकिन उस घर की उस बहू का सरेआम तिरस्कार किया जा रहा हो जो सुबह से उस घर को मंदिर बनाने में जुटी थी—क्या वहाँ कभी सच में माँ लक्ष्मी का वास हो सकता है?

मुझसे अब और चुप नहीं रहा गया। इससे पहले कि मैं कुछ बोलती, पूजा की चौकी से देवांश धीरे से उठा।

देवांश का यह रूप शायद उस घर में किसी ने पहले कभी नहीं देखा था। उसके चेहरे पर कोई उग्रता नहीं थी, मगर उसकी आँखों में एक ऐसा आत्मसम्मान और दृढ़ता थी जिसने सबको चौंका दिया। वह सीधा अपनी माँ के सामने आकर खड़ा हो गया।

“माँ, बस कीजिए,” देवांश की आवाज बहुत शांत थी, मगर उस सन्नाटे में वह आवाज बहुत गहरी सुनाई दी।

मालती आंटी अवाक रह गईं, “देवांश! तू अपनी माँ के सामने बोल रहा है? देख नहीं रहा, इसने हमारा कितना अपमान कराया है?”

“अपमान जानकी ने नहीं कराया माँ, अपमान तो आपने इस पूरे भरे समाज के सामने अपने ही परिवार का कर दिया है,” देवांश ने बेहद संजीदगी से कहा। फिर वह मुड़ा और उसने अपने ससुर जी के कांपते हाथों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसने झुककर उनके चरण छुए और उन्हें सम्मानपूर्वक आगे लाकर सोफे पर बिठाया।

देवांश ने अपनी माँ की आँखों में देखते हुए कहा, “माँ, आप जिस सोने के कंगन और हीरे की अंगूठी के खो जाने या न पहनने पर इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर रही हैं, क्या उनकी कीमत जानकी के इस निस्वार्थ समर्पण से ज्यादा है? जानकी अपने मायके से क्या लाई, यह गिनवाने से पहले क्या आपने कभी यह सोचा कि वह अपना पूरा जीवन, अपने सारे सपने और अपना वजूद हमारे घर को संवारने के लिए लेकर आई है?”

हॉल में खड़े मेहमान स्तब्ध थे। हरिशंकर जी भी चुपचाप अपने बेटे को देख रहे थे।

देवांश ने आगे कहा, “सुबह चार बजे से जब हम सब सो रहे थे, जानकी उठकर इस घर के कोने-कोने को चमका रही थी। उसने अपने हाथों से आपके लिए, हमारे मेहमानों के लिए पकवान बनाए। उसने आंगन में जो रंगोली बनाई, उसमें उसके दिल की भक्ति थी। उसने किसी नौकर पर भरोसा नहीं किया क्योंकि वह चाहती थी कि हमारी पूजा में कोई कमी न रहे। काम करते-करते उसके हाथ थक गए, उसने गहने उतारकर सुरक्षित रख दिए और काम की आपाधापी में खुद को सजाना भूल गई—तो क्या यह उसका अपराध हो गया? माँ, अगर शरीर पर करोड़ों का सोना लादकर भी दिल में दूसरों के लिए आदर और प्रेम न हो, तो वह दौलत कूड़ा है। जानकी हमारे घर की बहू बाद में है, पहले इस घर की असली लक्ष्मी है। और जिस घर में जीती-जागती लक्ष्मी की आँखों में अपमान के आंसू आ जाएं, वहाँ पत्थर की मूर्तियों के आगे कितने भी दीये जला लीजिए, महालक्ष्मी कभी प्रसन्न नहीं हो सकतीं।”

देवांश के हर एक शब्द ने मालती आंटी के अहंकार पर करारा प्रहार किया था। उनके चेहरे का रंग उड़ गया था। पहली बार उन्हें आईना दिखाया गया था, और वह आईना किसी गैर ने नहीं, बल्कि उनके अपने बेटे ने दिखाया था जिसे वे अपनी सबसे बड़ी जागीर समझती थीं।

हरिशंकर जी भी आगे आए। उन्होंने मालती देवी के कंधे पर हाथ रखा और बहुत ही भरे हुए गले से कहा, “मालती, देवांश बिल्कुल सच कह रहा है। हम व्यापार में इतने अंधे हो गए कि हमने इंसानों और रिश्तों का भी मोल लगाना शुरू कर दिया। जानकी हमारे घर की मर्यादा है, और आज तुमने जो किया, उससे हमारा सिर नीचा हुआ है।”

मालती आंटी ने नजर उठाकर जानकी की ओर देखा। वह अब भी सिसक रही थी, मगर उसके चेहरे पर अपने पति के इस समर्थन से एक असीम संतोष था। मालती आंटी की नजरें जानकी के पिता पर पड़ीं, जो अपनी बेटी के दामाद के इस संस्कार को देखकर हाथ जोड़े खड़े थे।

अचानक मालती आंटी के भीतर कुछ टूट गया। बरसों से जमा हुआ झूठी शान और अहंकार का वह भारी पहाड़ एक ही पल में पिघलकर बह गया। उनकी आँखों में पश्चाताप की नमी तैर आई। वे धीमी चाल से जानकी के पास पहुँचीं। उन्होंने अपने कांपते हाथों से जानकी के दोनों गालों पर बहते आंसुओं को पोंछा।

“मुझे माफ कर दे, बहू,” मालती आंटी का स्वर भरभरा गया था, “अहंकार की पट्टी मेरी आँखों पर बंधी थी, इसलिए मैं असली धन को पहचान ही नहीं पाई। तूने हमारे घर को मंदिर बनाया, और मैंने उस मंदिर की देवी को ही रुला दिया। मुझे क्षमा कर दे, बेटी।”

जानकी ने अपनी सास के हाथों को पकड़ लिया और उनके गले से लग गई। पूरे हॉल का वातावरण, जो कुछ देर पहले तनाव और कड़वाहट से भरा हुआ था, एकाएक भावुकता और पवित्रता की चादर में लिपट गया। उपस्थित मेहमानों की आँखों में भी प्रशंसा के भाव थे।

मालती आंटी ने स्वयं आगे बढ़कर जानकी के पिता और भाई से क्षमा मांगी और उन्हें आदरपूर्वक पूजा की वेदी के सबसे मुख्य स्थान पर बिठाया। फिर उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी हीरे की एक सुंदर अंगूठी निकाली और जानकी की उंगली में पहनाते हुए मुस्कुराकर कहा, “यह किसी दहेज या लेन-देन का मोल नहीं है बिटिया, यह इस घर की लक्ष्मी के चरणों में एक माँ का नतमस्तक होना है। अब चल, पूजा का शुभ मुहूर्त निकल रहा है।”

पंडित जी के चेहरे पर भी एक संतोष भरी मुस्कान खिल गई। उन्होंने पुनः उच्च स्वर में शंखनाद किया और मंत्र गूंजने लगे। इस बार जब देवांश और जानकी ने साथ मिलकर कलश पर पुष्प और अक्षत अर्पित किए, तो जानकी के चेहरे पर जो तेज और मुस्कान थी, वह उस कमरे में जल रहे सैकड़ों दीयों की रोशनी से भी कहीं अधिक उज्ज्वल थी।

मैं और मलय हाथ जोड़े उस दृश्य को देख रहे थे। आज सचमुच अंधकार पर प्रकाश की विजय हुई थी। वह प्रकाश मिट्टी के दीयों का नहीं था, वह प्रकाश था समझदारी का, संवेदनशीलता का और रिश्तों के सच्चे सम्मान का। उस रात जब हम अपने घर लौटे, तो मन में एक असीम शांति थी। वह दीपावली केवल एक पर्व नहीं रही थी, बल्कि एक परिवार के पुनर्जन्म की साक्षी बन गई थी।

समाज में आज भी कई घरों में बहुओं को केवल इस तराजू में तौला जाता है कि वे अपने मायके से क्या लेकर आईं, जबकि उनका सबसे बड़ा दान उनका अपना संपूर्ण जीवन होता है। क्या आपको लगता है कि हर बेटे को देवांश की तरह अपनी पत्नी के आत्मसम्मान के लिए सही समय पर सही बात कहनी चाहिए? इस विषय पर आपके क्या विचार हैं, कमेंट बॉक्स में अपने अनुभव और राय जरूर साझा करें।

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