बहती गंगा में हाथ धोना – शनाया अहम 

बात उन दिनों की है जब राधिका कॉलेज में पढ़ रही थी, ये उसका कॉलेज का पहला ही साल था। राधिका पढ़ाई में तो होशियार थी ही, वो पाक कला में भी निपुण थी। उसके हाथ में जादू था और हर तरह का खाना वो मिनटों–सेकेंडों में बना देती थी। जो भी उसका बनाया खाना … Read more

भूल अपना समझने की  – अंजना ठाकुर 

विनोद जी ने बहुत दौलत कमाई थी। मेहनत, लगन और अपने तेज़ दिमाग से उन्होंने अपना कारोबार गाँव-शहर तक फैला दिया था। लोगों की नज़र में विनोद जी की ज़िंदगी किसी राजा से कम नहीं थी—बड़ा सा घर, प्रतिष्ठा, नौकर-चाकर, और चारों तरफ़ नाम। पर उनके दिल के किसी कोने में एक मलाल हमेशा चुभता … Read more

अधूरे रिश्ते – किरण फुलवारी

ट्रेन में बैठी ख्याति के मन में कई सारे विचार चल रहे थे। खिड़की के बाहर पीछे छूटते खेत, दूर भागती बिजली की तारें और स्टेशन के छोटे-छोटे बोर्ड—सब जैसे उसके भीतर उठते तूफान के सामने फीके पड़ गए थे। रक्षाबंधन के एक दिन पहले ही वह अपने पीहर आई थी, बड़े भाई के बुलाने … Read more

बाबुल की यादें ” – कमलेश आहूजा

रमा बड़े दिनों बाद बहू-बेटे के साथ अपने पुराने घर आई थी। शहर में बेटे की नौकरी लग जाने के बाद वह वहीं रहने लगी थी, इसलिए यह घर कई महीनों से बंद पड़ा था। बाहर से देखने पर भी घर की खामोशी और भीतर की उदासी साफ झलकती थी—दरवाज़े की कुंडी पर जमी धूल, … Read more

रिश्तो के भी रंग – संजय सिंह

मधु और माधव का भरा पूरा परिवार था ।परिवार में चार बेटे ,चार बहुएं  मौजूद थी। बड़े बेटे राजू की दो बेटियां थी । उससे छोटे बेटे मनीष का एक बेटा था । तीसरे नंबर वाले बेटे के आगे दो बेटियां थी । सबसे छोटे बेटे को एक बेटी और एक बेटा था ।परिवार में … Read more

प्यार के दो मीठे बोल – संजय सिंह

 शाम का समय सूरज की किरणें दिन की भांति आग ना बरसा कर थोड़ी ठंडक के एहसास को हल्का-हल्का गर्म कर रही थी। सूरज की रोशनी बरामदे में गिर रही थी। कुछ पक्षी अपने पूरे दिन का परिश्रम करके अंतिम परिश्रम करके कुछ दाने चुग कर घरों की तरफ पलायन करने को तैयार थे ।चारों … Read more

प्यार के दो मीठे बोल..बुजुर्गों का सहारा” – कमलेश आहूजा

सरोज के पति छोड़ के क्या गए,कि प्यार के दो बोल के लिए तरस गई थी वह।अब तो घर में जिसे देखो वही उसे काटने को दौड़ता था।बेटा रोहित ऑफिस के काम में इतना व्यस्त रहता है कि उसे सरोज से बात करने का समय ही नहीं मिलता और अगर कभी सरोज आगे बढ़कर कहे … Read more

अकेलापन – लतिका श्रीवास्तव

वह बूढ़ी औरत मुझे रोज गली के प्रवेश द्वार के बगल में बनी एक कोठरी नुमा घर के सामने ही बैठी मिलती।बहुत उदास क्लांत थकी सी लगती। अविनाश अपनी अतिव्यस्तता की जल्दबाजी में चाह कर भी क्षणांश के लिए भी वहां ठहर नहीं पाता था।लेकिन प्रतिदिन की उसकी वही उसी जगह की उपस्थिति की आदत … Read more

प्यार – खुशी

रागिनी अपने माता पिता की लाडली बेटी थी।शादी के 6 वर्ष बाद होने के कारण माता पिता उस पर जान लुटाते थे।दादा दादी दीवानचंद और करुणा भी उसे प्यार करते थे।मां सीता उसे सही गलत का फर्क बताती पर पिता श्याम का कहना था मै अपनी बेटी के लिए घर दामाद लाऊंगा जो इसके साथ … Read more

प्यार के दो मीठे बोल – तोषिका

एक कमल नाम का बूढ़ा आदमी खिड़की से ढलती शाम देख रहा था, जैसे उसका भी जाने का समय भी बस निकट ही हो। तभी पीछे से उनके बेटे प्रणव की भारी आवाज़ आई “पापा आकर खाना खा लीजिए, ठंडा हो जाएगा।” तभी उसने कहा कि उसको भूख नहीं है, अभी वो खाना नहीं खाना … Read more

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