**सिंदूरी वादे की अनकही दास्तान**

लड़के वाले तो सिर्फ लड़की देखने आए थे, लेकिन जब दोनों परिवारों के बुजुर्ग एक साथ बैठे, तो तय हुआ कि बार-बार आने-जाने का खर्च और समय क्यों बर्बाद किया जाए। शुभ मुहूर्त भी था और लड़का भी साथ ही आया था, तो क्यों न आज ही हाथ पीले कर दिए जाएं और दुल्हन को … Read more

ममता का अनमोल आँचल

सुधा की शादी को पूरे दस साल बीत चुके थे, लेकिन उसके आंगन में अब तक किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी। मायके से लेकर ससुराल तक, हर जगह उसकी सूनी गोद को लेकर तरह-तरह की बातें होती थीं। कोई ताने मारता, तो कोई हमदर्दी जताता, लेकिन सुधा के दिल का दर्द कोई नहीं … Read more

दर्द की इंतहा – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका ‘

“माँ, मैं शादी नहीं करना चाहती।” नंदिनी ने इतना कहा और चुप हो गई। कमरे में कुछ पल के लिए ऐसी खामोशी छा गई, जैसे किसी ने अचानक चलते पंखे की आवाज भी बंद कर दी हो। माँ ने उसकी ओर देखा। “क्यों?” “क्योंकि मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ। नौकरी करना चाहती हूँ। अपने पैरों … Read more

खामोश संघर्ष की गूँज

नीता अपने आलीशान बंगले के हरे-भरे लॉन में बैठी सुबह की चाय की चुस्कियाँ ले रही थी। सर्दियों की गुनगुनी धूप में वह अपने बेटे रोहन के भविष्य को लेकर गहरी चिंता में डूबी थी। रोहन शहर के सबसे महंगे और नामी स्कूल में पढ़ता था। उसकी हर छोटी-बड़ी फरमाइश पूरी करने के लिए नीता … Read more

मोहब्बत की कसौटी: चाहना और निभाना

रघुनाथ जी अपने घर के बरामदे में बैठे हुए बाहर हो रही झमाझम बारिश को देख रहे थे। उनके हाथों में चाय का प्याला था, जिससे उठती हुई भाप उनके चश्मे के शीशे को थोड़ा धुंधला कर रही थी। लेकिन उनके मन के भीतर चल रही उधेड़बुन बाहर की बारिश से कहीं ज़्यादा तेज़ थी। … Read more

त्याग के पन्ने

“बेटा, अगर मेरे रहने से इस घर की शांति भंग होती है, तो मैं आज ही यह घर छोड़ दूंगी। मुझे बुढ़ापे में किसी पर बोझ बनकर नहीं रहना।” कांपते हाथों से अपनी पुरानी सूती साड़ी का पल्लू सँभालते हुए, बासठ वर्षीय सावित्री देवी ने अपने भारी मन से ये शब्द कहे। उनके चेहरे की … Read more

उम्मीद के धागे

अस्पताल की सफेद, ठंडी दीवारों के बीच एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी, जिसे सिर्फ वेंटिलेटर की एकरस ‘बीप-बीप’ की आवाज़ ही तोड़ रही थी। आईसीयू के बाहर, कांच की दीवार से माथा टिकाए विक्रम खड़ा था। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए थे और चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता … Read more

ममता की तराजू: पच्चीस साल बनाम एक महीना

शालिनी का मन आज सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी और उदासी के भंवर में गोते खा रहा था। घर का हर कोना उसे काटने को दौड़ रहा था। आज उसकी इकलौती बेटी काव्या की शादी को ठीक एक महीना पूरा हो गया था। यह एक महीना शालिनी के लिए किसी युग के बीतने … Read more

खामोश समझौते: एक बेटी की अनकही चिट्ठी

आज आसमान में काले बादल घिरे हुए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। जब भी मौसम ऐसा होता है, काव्या के मन के किसी गहरे कोने में दबी हुई यादें ताज़ा हो जाती हैं। खिड़की के पास खड़ी काव्या के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी—उसके बाबूजी की। पच्चीस साल बीत गए थे बाबूजी … Read more

कांच के रिश्ते और सपनो की गुल्लक

मेरे बचपन की यादें मेरी माँ की साड़ी के पल्लू और उनके हाथों से बने गाजर के हलवे की खुशबू से जुड़ी थीं। जब तक माँ थीं, हमारा घर एक घर था। पिताजी दफ्तर से आते, तो पूरा घर उनकी हंसी से गूंज उठता था। लेकिन मेरे चौदहवें जन्मदिन से ठीक दो महीने पहले, एक … Read more

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