गजेंद्र ने भरी सभा में देविका को वे कानूनी कागज थमा दिए और धमकी दी कि अगर उन्होंने शांति से हवेली नहीं छोड़ी, तो वह पुलिस और अदालत का सहारा लेकर उन्हें बेइज्जत करके बाहर निकालेंगे। देविका यह सुनकर टूट गईं। एक तरफ बेटी की शादी सर पर थी, अगर यह विवाद बाहर जाता तो ससुराल वाले शादी तोड़ सकते थे, और दूसरी तरफ उनके पति की आखिरी निशानी उनके हाथों से छिन रही थी। हवेली के मुनीम और वकील भी गजेंद्र के जाली दस्तावेजों की चालाकी नहीं पकड़ पाए। देविका को लगा कि अब उनके पास हार मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
उज्जैन शहर के बाहरी छोर पर स्थित ‘सूर्य महल’ अपनी भव्यता और रियासत के लिए पूरे इलाके में मशहूर था। इस महल की मालकिन ठकुराइन देविका अपने कड़े अनुशासन और उसूलों के लिए जानी जाती थीं। उनके पति के देहांत के बाद उन्होंने ही पूरी रियासत और व्यापार को अपने मजबूत इरादों से संभाल रखा था। देविका की एक ही संतान थी, उनकी लाडली बेटी नंदिनी। नंदिनी रूप और गुणों की धनी थी, जिसका स्वभाव अपनी मां के विपरीत बेहद कोमल और दयालु था।
सूर्य महल में कई नौकर-चाकर थे, लेकिन ठकुराइन देविका की सबसे खास और भरोसेमंद सेविका थी शारदा। शारदा सालों से हवेली की देखभाल कर रही थी और देविका की हर जरूरत को बिना कहे समझ जाती थी। शारदा की भी एक बेटी थी, जिसका नाम मीरा था। मीरा उम्र में बिल्कुल नंदिनी के बराबर थी। चूंकि शारदा का हवेली में काफी सम्मान था, इसलिए मीरा भी अपनी मां के साथ अक्सर हवेली के अंदरूनी हिस्सों में आ-जा सकती थी। बचपन से ही नंदिनी और मीरा में गहरी दोस्ती हो गई थी। दोनों साथ खेलतीं, हवेली के बागों में दौड़ लगातीं और तितलियां पकड़तीं।
जब नंदिनी आठ वर्ष की हुई, तो ठकुराइन देविका ने उसकी उच्च शिक्षा का प्रबंध किया। हवेली में ही बड़े-बड़े गुरुजनों और शिक्षकों को बुलाया गया, जो नंदिनी को साहित्य, गणित, दर्शनशास्त्र और रियासत का कामकाज संभालने की शिक्षा देने लगे। जब नंदिनी पढ़ाई करती, तब मीरा दरवाजे की ओट में छिपकर सब कुछ बड़े ध्यान से सुना करती। जो शिक्षक नंदिनी को पढ़ाते, मीरा उसे अपने मन में बिठा लेती और हवेली के पीछे कच्ची मिट्टी पर लकड़ी से लिखकर उसका अभ्यास करती।
एक दिन शारदा ने अपनी बेटी को मिट्टी पर कुछ गणित के कठिन सवाल हल करते हुए देख लिया। उसने हैरानी से पूछा कि उसने यह सब कहां से सीखा। मीरा ने रोते हुए अपनी मां से कहा कि उसका भी मन करता है कि वह उन किताबों को छुए, उन गुरुजनों से ज्ञान प्राप्त करे। वह रोज नंदिनी के साथ बैठकर पढ़ना चाहती है। अपनी छह-सात साल की बेटी के आंसुओं ने शारदा के दिल को झकझोर कर रख दिया। वह जानती थी कि एक नौकरानी की बेटी का हवेली की वारिस के साथ बैठकर शिक्षा ग्रहण करना समाज के नियमों के खिलाफ था। लेकिन अपनी कुशाग्र और होनहार बच्ची के भविष्य के लिए उसने एक बहुत बड़ा फैसला लिया।
अगले दिन सुबह, जब ठकुराइन देविका पूजा करके उठीं, तो शारदा उनके चरणों में गिर पड़ी। देविका ने आश्चर्य से पूछा, “क्या बात है शारदा? आज अचानक इस तरह मेरे पैरों में क्यों गिर गई? तुमने सालों इस हवेली की वफादारी से सेवा की है, अगर कोई परेशानी है तो निसंकोच कहो। मैं तुम्हारी हर संभव मदद करूंगी।”
शारदा ने हाथ जोड़कर कांपते हुए स्वर में कहा, “मालकिन, आपने मुझे हमेशा अपने परिवार के सदस्य की तरह माना है। आज मैं आपसे अपने लिए कुछ नहीं, बल्कि अपनी बेटी मीरा के लिए एक भीख मांगना चाहती हूं। मेरी मीरा की पढ़ने में बहुत रुचि है। वह छिप-छिप कर छोटी मालकिन की पढ़ाई सुनती है। मेरी बस यही विनती है कि आप मीरा को भी नंदिनी बिटिया के साथ बैठकर शिक्षा ग्रहण करने की अनुमति दे दें।”
यह सुनते ही देविका के माथे पर बल पड़ गए। उनका अभिमान आहत हुआ। एक नौकरानी की बेटी उनकी इकलौती वारिस की बराबरी करे, यह उन्हें बिल्कुल रास नहीं आया। उन्होंने कठोर स्वर में कहा, “शारदा, तुम अपनी मर्यादा भूल रही हो। मैं मानती हूं कि नंदिनी और मीरा सखियां हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तुम आसमान के तारों को छूने की जिद करो। शिक्षा पाना अच्छी बात है, मैं मीरा का दाखिला किसी पाठशाला में करा दूंगी, लेकिन वह नंदिनी की बराबरी में बैठकर गुरुजनों से शिक्षा ले, यह संभव नहीं है।”
शारदा आंखों में आंसू भरकर बोली, “मालकिन, मुझे मेरी औकात याद है। लेकिन मैं आपसे यह अवसर इसलिए मांग रही हूं ताकि कल को मेरी बेटी इस हवेली के ही काम आ सके। मैं वचन देती हूं कि मेरी बेटी की यह विद्या हमेशा छोटी मालकिन की ढाल बनकर रहेगी।”
देविका काफी देर तक सोचती रहीं। शारदा की वफादारी पर उन्हें कोई संदेह नहीं था। आखिरकार उन्होंने कहा, “ठीक है शारदा, मैं तुम्हारी बात मान लेती हूं। लेकिन याद रहे, यह मेरा तुम्हारे ऊपर कोई साधारण उपकार नहीं है। इसके बदले तुम्हें और तुम्हारी बेटी को एक वचन देना होगा। मीरा चाहे कितनी भी बड़ी विदुषी क्यों न बन जाए, वह ताउम्र नंदिनी की परछाई बनकर रहेगी। उसकी विद्या केवल इस हवेली की भलाई और नंदिनी की रक्षा के लिए इस्तेमाल होगी। अगर कभी उसने नंदिनी से आगे निकलने या उसका अहित करने की कोशिश की, तो मैं उसी दिन तुम दोनों को यहां से निकाल दूंगी।”
शारदा ने रोते हुए यह शर्त स्वीकार कर ली। उस दिन के बाद से मीरा हवेली के मुख्य कक्ष में नंदिनी के साथ बैठकर गुरुजनों से शिक्षा प्राप्त करने लगी। समय अपनी गति से बीतता रहा। दोनों बच्चियां धीरे-धीरे युवावस्था में कदम रखने लगीं। नंदिनी जहां चित्रकला और साहित्य में निपुण हो रही थी, वहीं मीरा की बुद्धि गणित, कानून और व्यापारिक दांव-पेचों में बहुत तेज थी। गुरुजन भी मीरा की कुशाग्र बुद्धि से हैरान रहते थे। देविका को कभी-कभी मीरा की यह प्रतिभा देखकर असुरक्षा महसूस होती थी, लेकिन मीरा हमेशा अपनी मर्यादा में रहती। वह नंदिनी को अपनी बड़ी बहन और मालकिन का सम्मान देती और ठकुराइन की हर आज्ञा का पालन करती। दोनों लड़कियों का बंधन वक्त के साथ और भी गहरा हो गया था।
एक दिन हवेली के बगीचे में टहलते हुए नंदिनी ने हंसते हुए मीरा से कहा, “मीरा, कुछ ही महीनों में मेरा विवाह हो जाएगा। मैं अपने ससुराल चली जाऊंगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम मुझे भूल जाओगी और यहां हवेली का सारा राजपाट खुद संभालने लगोगी?”
मीरा ने मुस्कुराते हुए नंदिनी का हाथ पकड़ लिया और कहा, “दीदी, मेरी विद्या और मेरा जीवन दोनों आपकी अमानत हैं। आप जहां भी रहेंगी, मेरी निष्ठा हमेशा आपके और इस हवेली के साथ रहेगी।”
कुछ समय बाद, नंदिनी का विवाह एक प्रतिष्ठित और बहुत बड़े घराने में तय हो गया। हवेली में चारों ओर खुशियों का माहौल था। विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं। लेकिन इसी बीच हवेली पर एक बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ। देविका के पति के दूर के चचेरे भाई, गजेंद्र सिंह, जो सालों से शहर से बाहर थे, अचानक हवेली आ धमके। उनके इरादे बिल्कुल भी नेक नहीं थे। गजेंद्र सिंह को पता था कि देविका एक विधवा हैं और उनकी एकमात्र बेटी का विवाह होने वाला है। उन्होंने वकीलों के साथ मिलकर कुछ जाली दस्तावेज तैयार करवाए थे, जिनमें यह सिद्ध किया गया था कि सूर्य महल और उसकी सारी संपत्ति पर असली कानूनी हक गजेंद्र का है, और देविका को यह हवेली एक हफ्ते के भीतर खाली करनी होगी।
गजेंद्र ने भरी सभा में देविका को वे कानूनी कागज थमा दिए और धमकी दी कि अगर उन्होंने शांति से हवेली नहीं छोड़ी, तो वह पुलिस और अदालत का सहारा लेकर उन्हें बेइज्जत करके बाहर निकालेंगे। देविका यह सुनकर टूट गईं। एक तरफ बेटी की शादी सर पर थी, अगर यह विवाद बाहर जाता तो ससुराल वाले शादी तोड़ सकते थे, और दूसरी तरफ उनके पति की आखिरी निशानी उनके हाथों से छिन रही थी। हवेली के मुनीम और वकील भी गजेंद्र के जाली दस्तावेजों की चालाकी नहीं पकड़ पाए। देविका को लगा कि अब उनके पास हार मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
तभी सभा के बीचों-बीच मीरा खड़ी हो गई। उसने गजेंद्र सिंह के हाथों से वे दस्तावेज लिए और उन्हें गहराई से पढ़ने लगी। गजेंद्र ने हंसते हुए ताना मारा, “देखो भाभी जी, अब क्या आपके घर की एक दासी की बेटी मुझे कानून सिखाएगी?”
मीरा ने उसकी बातों को नजरअंदाज करते हुए दस्तावेजों के एक-एक पन्ने का बारीकी से मुआयना किया। बचपन से ही उसने जो कानून, संपत्ति के नियम और पुराने कर-दस्तावेजों की शिक्षा ली थी, वह आज उसके काम आ रही थी। कुछ ही देर में मीरा की आंखों में एक चमक आ गई। उसने ठकुराइन देविका की तरफ देखते हुए कहा, “मालकिन, आपको हवेली छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। ये सारे कागज पूरी तरह से जाली हैं।”
सभा में सन्नाटा छा गया। मीरा ने गजेंद्र की तरफ मुड़कर कड़कती हुई आवाज में कहा, “गजेंद्र बाबू, आपने जो वसीयतनामा बनवाया है, उस पर जो मुहर लगी है, वह पुराने रियासत काल की है, जिसे सरकार ने दस साल पहले ही अमान्य घोषित कर दिया था। इसके अलावा, जिस तारीख का आपने दावा किया है, उस तारीख के राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार इस संपत्ति का पूर्ण मालिकाना हक ठकुराइन देविका के नाम पर ही हस्तांतरित हो चुका था, जिसका मूल प्रमाण पत्र बैंक के लॉकर में सुरक्षित है। अगर मैं इन जाली कागजातों को लेकर अभी पुलिस अधीक्षक के पास चली जाऊं, तो जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप में आपको और आपके वकील को सात साल की कठोर कारावास की सजा हो सकती है।”
मीरा ने एक-एक कानूनी धारा और नियम ऐसे गिनाए कि गजेंद्र और उसके वकील के पसीने छूट गए। उन्हें समझ में आ गया कि इस लड़की ने उनके सारे झूठ की पोल खोल दी है। बेइज्जती और जेल जाने के डर से गजेंद्र अपने वकीलों के साथ वहां से भाग खड़ा हुआ।
हवेली में एक बार फिर से खुशी की लहर दौड़ गई। ठकुराइन देविका, जो हमेशा अपने रुतबे और अभिमान में रहती थीं, आज उनकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने आगे बढ़कर मीरा को अपने गले से लगा लिया। आज उन्होंने एक दासी की बेटी को नहीं, बल्कि उस बेटी को गले लगाया था जिसने उनके परिवार की लाज और हवेली का गौरव बचाया था।
देविका ने रूंधे हुए गले से कहा, “मीरा, मैंने तुझे शिक्षा देकर तुझ पर कोई उपकार नहीं किया था, बल्कि तुमने आज मेरे परिवार को बचाकर मेरे सारे कर्ज उतार दिए। मैंने एक दासी की बेटी को पढ़ाया था, लेकिन आज मुझे मेरी दूसरी बेटी मिल गई है।”
यह दृश्य देखकर शारदा और नंदिनी की आंखें भी छलक आईं। नंदिनी का विवाह बहुत ही धूमधाम से संपन्न हुआ। देविका ने समाज की परवाह किए बिना मीरा को अपनी हवेली के मुख्य प्रबंधक का पद सौंपा और बाद में एक योग्य और शिक्षित अधिकारी से उसका भी कन्यादान अपनी बेटी की तरह किया।
मीरा और नंदिनी ने यह साबित कर दिया कि जब अवसर और शिक्षा सही हाथों में जाती है, तो वह न केवल एक इंसान का, बल्कि पूरे समाज का भविष्य रोशन कर देती है। सच्ची मित्रता और वफादारी किसी जन्म या ओहदे की मोहताज नहीं होती।
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