देहरी के पार का आसमान

 कौशल्या जी की आंखों से खुशी और आत्मग्लानि के मिले-जुले आंसू बह निकले, “मैंने अपनी झूठी जिद और उस निर्जीव ईंट-पत्थर की हवेली के मोह में अपनी जिंदगी के सात सबसे खूबसूरत साल अकेले घुट-घुट कर गंवा दिए। जिस सुख, शांति और स्वर्ग को मैं वहां ढूंढ रही थी, वह तो यहां तुम बच्चों की बांहों में था। आज मुझे समझ आया कि असली घर दीवारों से नहीं, अपनों के साथ से बनता है। अगर मैं उस दिन न आती, तो शायद इसी मुगालते में मर जाती कि दुनिया में सिर्फ स्वार्थ बचा है। तुमने मुझे एक सास नहीं, अपनी सगी मां जैसा मान दिया है सुमेधा। मेरे दिल का अंधेरा तुमने बिना किसी शिकायत के मिटा दिया।”

आंगन के कोने में लगा हारसिंगार का पुराना पेड़ इस साल भी सफेद-नारंगी फूलों की चादर बिछाए खड़ा था। कौशल्या जी ने हाथ में पकड़ी खुरपी वहीं मिट्टी में टिका दी और घुटनों पर दोनों हथेलियां रखकर बड़ी मशक्कत से सीधी खड़ी हुईं। कमर में एक तीखी टीस उठी, जिसने उन्हें याद दिला दिया कि अब शरीर पहले जैसा फुर्तीला नहीं रहा। पैंसठ की उम्र पार करते ही हड्डियों ने जैसे जवाब देना शुरू कर दिया था। कभी जिस विशाल पुश्तैनी हवेली में दस-बारह लोगों की चहल-पहल, बच्चों की किलकारियां और बर्तनों की खनक गूंजती थी, आज उसी घर के विशाल दालान में केवल एक बूढ़ी औरत की धीमी सांसों और दीवारों से टकराती टिक-टिक करती घड़ी की आवाजें शेष थीं।

सात बरस पहले जब पति अमरेश जी अचानक दिल का दौरा पड़ने से शांत हो गए, तो जैसे कौशल्या जी की पूरी दुनिया ही उजड़ गई। रोना-धोना थमा, रिश्तेदार सांत्वना देकर अपने-अपने ठिकानों को लौट गए, और हवेली के उस विशाल कमरे में रह गईं केवल कौशल्या जी और उनकी तन्हाई। उनका इकलौता बेटा, अनिरुद्ध, जो पूना की एक बड़ी बहुराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में ऊंचे पद पर कार्यरत था, पिता की तेरहवीं बीतते ही हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया था। उसने आंसुओं से भरी आंखों से विनती की थी कि मां अब इस सूने कस्बे में अकेले नहीं रहेगी, वह साथ चले।

मगर कौशल्या जी ने उस वक्त ऐसी हठ पकड़ी कि किसी की एक न सुनी। उनका तर्क सीधा और अटल था—”इसी चौखट पर मेरी डोली उतरी थी, इसी देहरी को पूजकर मैंने सुहाग का सिंदूर सजाया, और अब यहीं से मेरी अर्थी भी विदा होगी। ईंट-गारे के इन कमरों में तुम्हारे बाबूजी की सुगंध बसी है। मैं इसे छोड़कर फ्लैट के किसी पिंजरे में घुटने नहीं जाऊंगी।”

अनिरुद्ध ने समझाने की बहुत कोशिश की, पर मां की जिद के आगे वह बेबस हो गया। अनिरुद्ध की शादी सुमेधा से हुई थी। समाज, टीवी सीरियलों, मोहल्ले की गपशप और पत्रिकाओं में छपी सास-बहू की रंजिश भरी कहानियों ने कौशल्या जी के अंतर्मन में एक अदृश्य डर की गांठ बांध दी थी। उन्हें हमेशा लगता था कि पढ़ी-लिखी, आधुनिक और नौकरीपेशा बहुएं बूढ़े सास-ससुर को सिर्फ एक जिम्मेदारी या बोझ मानती हैं। अपने ही बेटे के घर में पराए बनकर रहने, बात-बात पर नजरें झुकने और आत्मसम्मान खोने के डर ने उनकी देहरी को एक मजबूत किले में बदल दिया था, जिसके बाहर पैर रखने की उनकी हिम्मत ही नहीं होती थी।

दिन बीतते गए, मौसम बदले और साल भी खिसकते चले गए। शरीर धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा। घुटनों का गठिया इतना बढ़ गया कि दालान से रसोई तक जाना भी किसी जंग जीतने जैसा लगता था। हर दूसरे दिन सिर चकराना, बीपी का अनियंत्रित होना और रात के सन्नाटे में छाती में उठने वाली घबराहट उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई। दूधवाला कभी आता, कभी न आता। कामवाली बाई दो दिन काम करती और चार दिन गायब रहती। कई बार तो ऐसा हुआ कि बुखार में तपने के बावजूद उन्हें खुद उठकर गरम पानी करना पड़ा, क्योंकि पूछने वाला कोई न था।

फिर पिछले महीने अचानक रात के दो बजे कौशल्या जी का पैर फिसल गया। वह आंगन में गिर पड़ीं और उठने की सुध न रही। गनीमत रही कि पड़ोस में रहने वाली उनकी बचपन की सहेली और दूर की रिश्तेदार मालती देवी सुबह किसी काम से आई थीं। दरवाजा खुला देख अंदर आईं तो कौशल्या जी को फर्श पर दर्द से कराहते पाया। अस्पताल ले जाया गया, जहां एक्स-रे के बाद पता चला कि गनीमत रही कोई हड्डी नहीं टूटी, केवल गहरी चोट और मोच आई थी।

अनिरुद्ध को खबर मिली तो वह उसी रात पहली फ्लाइट पकड़कर भागता हुआ आया। अस्पताल के बिस्तर पर लेटी मां के पीले चेहरे और कमजोर कांपते हाथों को देखकर वह फफक कर रो पड़ा। उसने अपनी हथेलियों में मां के पैर थाम लिए और बोला, “मां, कब तक अपनी इस बेमतलब जिद पर अड़ी रहोगी? तुम्हारी हर रात मुझे बेचैन रखती है कि वहां तुम किस हाल में होगी। अब मेरा कोई बहाना मत सुनना। आपका पोता आरव छह साल का हो चुका है, वह दिन-रात दादी-दादी की रट लगाए रहता है। सुमेधा ने भी कहा है कि इस बार मां को लिए बिना वापस कदम मत रखना। चलो हमारे साथ, पूना में तुम्हारा अपना घर है।”

कौशल्या जी की आंखें भर आईं। वह हमेशा की तरह अपनी वही पुरानी दलील देने ही वाली थीं कि अस्पताल के कमरे में चाय का थर्मस लेकर दाखिल हुईं मालती देवी ने उनके कंधे पर हाथ रख दिया। जब अनिरुद्ध डॉक्टर से डिस्चार्ज के कागज लेने बाहर गया, तो मालती देवी ने कौशल्या जी के कान के करीब झुककर बड़े स्नेह और सख्ताई से समझाया, “देख कौशल्या, अब बड़प्पन और हठ को अलग रखने का वक्त आ गया है। तू समझती है कि इस वीरान हवेली की पहरेदारी करके तू अमरेश भाई साहब की यादों को बचा रही है? नहीं, तू बस अपने बच्चों के प्यार को ठुकरा रही है। आज बेटा और बहू हाथ जोड़कर मान-मनुहार कर रहे हैं, उनका मन दुखता है। अगर कल को तू बिस्तर पकड़ लेगी और वे मजबूरी में तुझे ले जाएंगे, तो उसमें वो मिठास नहीं रहेगी जो आज के इस बुलावे में है। जिंदगी हमेशा मौका नहीं देती। डरना छोड़ और अपने परिवार के बीच जा।”

मालती देवी की उन खरी बातों ने कौशल्या जी के भीतर बरसों से जमी बर्फ को पिघला दिया। उन्होंने अपनी आत्मा में झांका। सचमुच, अकेलेपन की इस सजा को वह स्वाभिमान का नाम देकर जी रही थीं। जब अनिरुद्ध कमरे में लौटा, तो कौशल्या जी ने आंचल से आंसू पोंछते हुए धीरे से सिर हिला दिया, “चल बेटा… मैं चलती हूं।”

आज कौशल्या जी को पूना आए ठीक चार महीने हो चुके थे।

शाम ढल चुकी थी। बाहर की बालकनी से ठंडी बयार आ रही थी और पूना की ऊंची इमारतों के पीछे सूरज अपनी लाली समेट रहा था। कौशल्या जी अपने कमरे में बैठी खिड़की से बाहर का नजारा देख रही थीं। वह अपने अंतर्मन में चल रहे भावों के भंवर में इतनी खोई थीं कि उन्हें कमरे में गहराते अंधेरे का भी भान नहीं रहा। वह सोच रही थीं कि कैसे इंसानी दिमाग अपनी ही बुनी हुई पूर्वाग्रहों की जेल में कैद रहता है।

उन्होंने सोचा था कि पूना का फ्लैट एक पिंजरा होगा, जहां बहू अपनी मर्जी चलाएगी, जहां उन्हें एक कोने में उपेक्षित बैठना पड़ेगा। मगर यहां आकर तो पूरी तस्वीर ही बदल गई थी। सुमेधा, जिसे वह केवल एक आधुनिक कॉर्पोरेट वर्किंग वुमन समझती थीं, उसके भीतर तो एक अत्यंत संवेदनशील, ममतामयी और संस्कारी बेटी छिपी थी। पहले ही दिन सुमेधा ने घर के सबसे बड़े, हवादार और धूप वाले कमरे को उनके लिए सजाया था। उनके भगवान के मंदिर को इतने सलीके से स्थापित किया था कि उन्हें जरा भी परायापन न लगे।

सुबह की पहली चाय सुमेधा अपने हाथों से बनाकर लाती, वह भी बिना चीनी और कम पत्ती वाली, जैसी उन्हें पसंद थी। ऑफिस निकलने से पहले वह कौशल्या जी की दवाइयों की गोलियां अलग-अलग डिब्बियों में निकालकर रखती, दोपहर के खाने का निर्देश रसोई में काम करने वाली बाई को समझाती और दिन में दो बार फोन करके हाल पूछना कभी न भूलती। और पोता आरव… आरव तो जैसे उनके जीवन का खिलता हुआ बगीचा बन गया था। स्कूल से आते ही उसका बस्ता एक तरफ गिरता और वह सीधे दादी की गोद में समा जाता। पंचतंत्र की कहानियां, परियों के किस्से और स्कूल की शरारतें सुनाते-सुनाते कब दिन कट जाता, पता ही नहीं चलता था।

तभी बाहर का मुख्य दरवाजा खुला और कदमों की जानी-पहचानी आहट हुई। सुमेधा ऑफिस से लौटी थी। कंधे पर लैपटॉप बैग लटकाए वह सीधे कौशल्या जी के कमरे की तरफ बढ़ी। कमरे में अंधेरा देखकर उसने तुरंत दीवार पर हाथ मारकर लाइट का स्विच ऑन कर दिया। दूधिया रोशनी से पूरा कमरा जगमगा उठा।

सुमेधा ने बैग कुर्सी पर रखा और नकली नाराजगी से भौंहें सिकोड़ते हुए बोली, “मां जी! आप फिर अंधेरे में बैठ गईं? मैंने कितनी बार कहा है कि शाम होते ही बालकनी की और कमरे की लाइट जला लिया कीजिए। आंखों पर जोर पड़ता है और वैसे भी अंधेरे में बैठने से मन भारी होता है। और मैं शर्त लगा सकती हूं कि आपने शाम की ग्रीन टी भी नहीं पी होगी?”

कौशल्या जी की तंद्रा टूटी। उन्होंने बहू के चेहरे की तरफ देखा, जिस पर दिनभर की थकान साफ झलक रही थी, फिर भी उसकी आंखों में उनके लिए बेपनाह अपनापन और चिंता तैर रही थी।

कौशल्या जी तुरंत पलंग से उतरीं और सुमेधा के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “अरे मेरी बच्ची, तू दिनभर कंप्यूटर के आगे खटकर अभी-अभी आई है। मुंह-हाथ धो, थोड़ा सुस्ता ले। मैं अभी रसोई में जाकर तेरे और अनिरुद्ध के लिए अदरक वाली बढ़िया चाय बनाती हूं। साथ में मैंने दोपहर में आरव के कहने पर सूजी और मेवे की कुरकुरी मट्ठियां बनाई थीं, वो भी लाती हूं।”

सुमेधा ने तपाक से उनका हाथ पकड़ लिया और प्यार से बोली, “मां जी, आप क्यों कष्ट कर रही हैं? आपके घुटने में दर्द रहता है। मैं बना लेती हूं।”

“अरे हट पगली! अपनी बेटी को चाय पिलाने में मां की हड्डियां मजबूत होती हैं, दुखती नहीं। तू जा, फ्रेश हो जा,” कौशल्या जी ने लाड़ से उसे डांटते हुए कहा।

पंद्रह मिनट बाद दोनों बालकनी में रखी बेंत की कुर्सियों पर आमने-सामने बैठी थीं। भाप उड़ाती चाय की चुस्कियों के बीच बाहर ठंडी हवा के झोंके आ रहे थे। आरव ड्राइंग रूम में बैठकर अपने खिलौनों से खेल रहा था और उसकी खिलखिलाहट बालकनी तक पहुंच रही थी।

कौशल्या जी ने चाय का घूंट भरा और अचानक उनका गला रुंध गया। उनकी आंखें नम हो गईं।

सुमेधा ने घबराकर कप मेज पर रखा, “क्या हुआ मां जी? तबीयत ठीक नहीं लग रही क्या? या फिर घर की याद आ रही है?”

कौशल्या जी ने सुमेधा का हाथ अपने दोनों कांपते हाथों में थाम लिया और एक गहरी सांस लेकर बोलीं, “नहीं बेटी, आज मुझे किसी बीते कल की नहीं, बल्कि अपने उस अंधेपन की याद आ रही है जिसने मुझे इतने साल अपनों से दूर रखा। सच्ची सुमेधा, हम बुजुर्ग अपने ही बनाए खोल में कैद होकर बैठ जाते हैं। दुनिया भर की बुराइयां, टीवी की कहानियां और चार लोगों की बातें सुनकर हम यह मान बैठते हैं कि आने वाली पीढ़ी स्वार्थी है, रिश्तेदारियां मतलब की हैं और बहू कभी बेटी नहीं बन सकती। हम उम्मीद तो करते हैं कि बच्चे हमारा सम्मान करें, पर खुद उनके प्यार पर भरोसा करने से डरते हैं।”

सुमेधा चुपचाप स्नेह से अपनी सास की बातें सुन रही थी।

कौशल्या जी की आंखों से खुशी और आत्मग्लानि के मिले-जुले आंसू बह निकले, “मैंने अपनी झूठी जिद और उस निर्जीव ईंट-पत्थर की हवेली के मोह में अपनी जिंदगी के सात सबसे खूबसूरत साल अकेले घुट-घुट कर गंवा दिए। जिस सुख, शांति और स्वर्ग को मैं वहां ढूंढ रही थी, वह तो यहां तुम बच्चों की बांहों में था। आज मुझे समझ आया कि असली घर दीवारों से नहीं, अपनों के साथ से बनता है। अगर मैं उस दिन न आती, तो शायद इसी मुगालते में मर जाती कि दुनिया में सिर्फ स्वार्थ बचा है। तुमने मुझे एक सास नहीं, अपनी सगी मां जैसा मान दिया है सुमेधा। मेरे दिल का अंधेरा तुमने बिना किसी शिकायत के मिटा दिया।”

सुमेधा की आंखें भी छलक आईं। उसने आगे बढ़कर कौशल्या जी को गले से लगा लिया और मुस्कुराते हुए बोली, “मां, ताली दोनों हाथों से बजती है। अगर आप अपने दिल के दरवाजे हमारे लिए न खोलतीं, तो हम चाहे जितना प्रयास करते, आपको खुश नहीं रख पाते। आपने हमें अपनी ममता की छांव दी है, और एक घर तभी पूरा होता है जब उसमें बड़ों का आशीर्वाद हो। पुरानी बातें भूल जाइए, अब तो आपका यह नया आशियाना हमेशा यूं ही खुशियों से महकेगा।”

उसी समय अनिरुद्ध भी ऑफिस से लौट आया। मां और पत्नी को इस तरह एक-दूसरे में घुले-मिले देखकर उसके चेहरे पर एक अपार सुकून की मुस्कान तैर गई। कौशल्या जी ने खिलखिलाते हुए अपने बेटे को देखा और महसूस किया कि जब मन के सारे संशय और डर मिट जाते हैं, तो देहरी के पार भी एक बहुत खूबसूरत और असीम आसमान बांहें फैलाए इंतजार कर रहा होता है।

क्या आपको भी लगता है कि अक्सर हमारे घरों में बुजुर्ग अपने अकेलेपन और डर को स्वाभिमान समझकर बच्चों से दूर रहते हैं, जबकि बच्चे सिर्फ उनके प्यार और साथ के भूखे होते हैं? इस बारे में आपकी क्या राय है, हमें लिखकर जरूर बताएं।

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 मूल लेखिका : नीरजा कृष्णा

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