“ममता की कोई सौतेली छाँव नहीं होती” – नेहा पटेल

बाहर झमाझम बारिश हो रही थी और आठ साल का शौर्य अपनी ड्राइंग बुक में कुछ रंग भर रहा था। कमरे में एक अजीब सी खामोशी थी, जिसे सिर्फ खिड़की से टकराती बारिश की बूंदें ही तोड़ रही थीं। पलंग पर बैठी देवकी जी, जो शौर्य की नानी थीं, अपनी चश्मे के पीछे से उस … Read more

आँसुओं का पश्चाताप – सीमा श्रीवास्तव

“नाटक मत कीजिए भैया!” नंदिनी की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई। “पिताजी का यह मकान करोड़ों का है। आपने मुझे एक मामूली सी शादी देकर घर से विदा कर दिया और पूरी जायदाद पर कुंडली मारकर बैठ गए। विकास का बिज़नेस डूब रहा है और उन्हें पैसों की सख्त ज़रूरत है। मुझे इस घर में … Read more

“रिश्तों की मीठी शरारत” – आरती देवी

दिवाली बीते अभी कुछ ही दिन हुए थे और आज भाई दूज का पावन पर्व था। शहर के एक शांत और हरे-भरे मोहल्ले में स्थित सुमित्रा देवी के घर में सुबह से ही एक अलग तरह की रौनक बिखरी हुई थी। घर के आंगन में गेंदे के फूलों और आम के पत्तों की बंदनवार महक … Read more

“रंग बदलते रिश्ते ” – कमलेश आहूजा

मीना सुबह के काम से निपटी ही थी कि,भाभी का फाेन आ गया।मीना ने फोन उठाया-“नमस्ते भाभी,कैसे हैं आप लोग?” “मीना हम सब ठीक हैं। तुम्हें एक गुड न्यूज़ देनी थी,अंजु का रिश्ता पक्का कर दिया है।शादी भी अगले महीने है,बस तुम जल्द से जल्द आ जाना सब काम तुम्हें ही करना है आख़िर तुम … Read more

गरीबी का रंग – शुभ्रा बैनर्जी 

“अरे रहने दे बेटा,तेरी छोटी बुआ को बुलाने से कोई फायदा नहीं।नहीं आएगी इस बार भी।मुंह फुलाए बैठी रहेगी अपने घर,और यही सोचती रहेगी कि मैं क्यों नहीं गया उसे बुलाने। कितने साल हो गए उसे,यहां आए।बाकी तीनों जिज्जी हर त्योहार में सपरिवार आ जाती हैं एक बार बुलाने से।बस तेरी छोटी बुआ ही नहीं … Read more

बहू को आराम क्यों नहीं…..!! – अमिता कुचया

बहू, 20 लोगों के लिए पूरियां तुम्हें ही तलनी होंगी… और हाँ, जल्दी करना! मेहमान आते ही होंगे।” मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई। वो अभी तीन दिन पहले ही ट्रेन से आई थी। रास्ते भर लेटी-लेटी आई थी, क्योंकि उसका अभी-अभी ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टर ने साफ कहा था – “कम से कम एक महीना … Read more

रिश्तों के भी रंग – बिमला रावत जड़धारी

राहुल अपनी मम्मी का अंतिम संस्कार करके घर पहुंचा साथ में उसके पापा, जीजा जी, रिश्तेदार और पड़ोसी थे सब अपने अपने घर जा रहे थे। थोड़ी देर में उसके दोनों जीजा जी भी अपने घर चले गए । घर में दोनों बहनें ,पापा और राहुल थे। पंडित जी भी कल आने का बोल कर … Read more

*रिश्तों के भी रंग* – तोषिका

रंग हमारी पहचान बन गए है, आजकल रंग के बिना कुछ भी नहीं है। ऐसा मिष्टी अपने आप से ही बोल रही थी कि तभी पीछे से उसकी नानी आई और बोली *रिश्तों के भी रंग होते है* और आज तक उन रंगों को कोई भी रंग पीछे नहीं छोड़ पाया है। अरे नानी मैं … Read more

रिश्तों के भी रंग – डोली पाठक

तुमसे जो वस्तु मंगाई थी वो ले आई तुम??? बड़ी-बड़ी दाढ़ी और चेहरे से काईंया दिखने वाले उस तांत्रिक ने जब ये प्रश्न किया तो उसकी बड़ी बहू नंदिता हड़बड़ा गई और कांपते स्वर में बोली – जी जी हां लाई हूं…  अपने आंचल के कोने से किसी स्त्री के अंतःवस्त्र निकाल कर उस तांत्रिक … Read more

रिश्तो के रंग बदलते हैं – गीता वाधवानी

 दो पक्की सहेलियां ममता और नम्रता। बचपन से साथ-साथ। स्कूल में साथ-साथ और उसके बाद कॉलेज में साथ-साथ फिर उसके बाद नौकरी  भी साथ-साथ। दोनों के घर भी साथ-साथ ही थे।       फिर एक दिन अचानक नम्रता के लिए राज का रिश्ता आया। लंबा, गेहुआ रंग हैंडसम राज। ममता बहुत खुश थी लेकिन राज को देखने … Read more

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