मृगतृष्णा: एक अधूरे सच की कहानी

इस बार सुमित्रा जी ठीक नीरजा के पीछे खड़ी थीं और उन्होंने अपने ‘वारिस’ का हर एक शब्द सुन लिया था। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी बेटी को हमेशा पराया समझा, जिस बेटे की खातिर उन्होंने अपने पति की सारी ज़िंदगी की कमाई लुटा दी, आज वो बेटा … Read more

अतीत की दहलीज पर

“मैं तुम्हें वापस पाने की जिद नहीं कर रहा हूँ, अनन्या। मैं जानता हूँ मैंने तुम्हारा बहुत दिल दुखाया है। मैं बस इतना चाहता था कि तुम यह जान लो कि तुम्हारी लड़ाई गलत नहीं थी। गलत मैं था। मुझे बस इस एहसास के साथ नहीं जीना था कि तुम मुझे एक डरपोक और धोखेबाज … Read more

स्वाभिमान की चौखट

“तूने बिल्कुल सही किया बेटा,” रामदीन जी ने शिखा का माथा चूमते हुए कहा। “मैं एक बाप होकर जो नहीं कह पाया, वो तूने कह दिया। मेरी बेटियां मेरे गुरूर हैं, कोई बाज़ार में बिकने वाला सामान नहीं। अनुराधा की शादी जब होगी, तब होगी, लेकिन आज के बाद मेरी किसी बेटी को ऐसे अपमान … Read more

एहसास के धागे

मेघा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह गुस्से से तमतमाती हुई समीर के पास गई। “समीर! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई पापा से यह सब कहने की? तुम्हें पता नहीं है कि उन्हें अस्थमा है? वो यहाँ हमारे घर काम करने आए हैं क्या? कार साफ करने के लिए कॉलोनी में लड़के आते हैं, … Read more

मज़बूत विश्वास

“माँ जी, मैंने आपको कितनी बार मना किया है कि आप रसोई के किसी भी काम में हाथ मत लगाया कीजिए। ये बर्तन मैं खुद मांज लूंगी और रोटियां भी सेंक लूंगी। आप बस अपने कमरे में जाकर आराम कीजिए।” मेघा ने अपनी सास कमला देवी के हाथ से आटे की परात लेते हुए बहुत … Read more

आत्मसम्मान

“महक , मेरी बात ध्यान से सुनो…” मीरा ने एक गहरी साँस लेते हुए अपनी छोटी बहन की आँखों में देखा। “आज तुम जिस मोड़ पर खड़ी हो, सालों पहले मैं भी ठीक वहीं खड़ी थी। तुम कहती हो कि तुम्हें अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीनी है, ये समाज और इसके बनाए नियम तुम्हें … Read more

निस्वार्थ त्याग

रिया  अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी होकर कॉलेज के एक फंक्शन के लिए तैयार हो रही थी। तभी उसके पिता, मदन जी, अपने एक पैर से हल्का सा लंगड़ाते हुए कमरे में आए। उनके हाथ में रिया  की प्रेस की हुई ड्रेस थी। मदन जी के चेहरे पर एक पुराना, गहरा जलने का … Read more

एक नई शुरुआत

“मैं वहां खड़ा रहा, बुत बनकर,” अमन ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा। “मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था। एक तरफ वो लोग थे जो बिना सोचे-समझे खाना फेंक रहे थे, और दूसरी तरफ वो मासूम जो उसी जूठन को अपनी ज़िंदगी मानकर खा रहे थे। ये कैसी दुनिया है नेहा? एक ही शहर … Read more

यादों की पगडंडी और सूना आँगन

रघुनाथ जी के लिए अपने ही घर के एक कोने में बैठकर अपनी बहू कृतिका की शिकायतें सुनना अब दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। आज सुबह भी कृतिका फोन पर अपनी सहेली से बात कर रही थी और उसकी आवाज़ रसोई से होते हुए रघुनाथ जी के कमरे तक साफ़ आ रही थी। “अरे … Read more

किराए का बचपन

मेघा को तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई। रातों की नींद जो पिछले कई महीनों से हराम थी, वह अब वापस लौट आई थी। रात को कियान रोता, तो सुभद्रा ही उठकर उसे संभालती। अब मेघा सुबह उठकर आराम से योग करती, अपना डाइट नाश्ता लेती और सज-धज कर ऑफिस निकल जाती। वीकेंड्स पर भी … Read more

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