तुमसे जो वस्तु मंगाई थी वो ले
आई तुम??? बड़ी-बड़ी दाढ़ी और चेहरे से काईंया दिखने वाले उस तांत्रिक ने जब ये प्रश्न किया तो उसकी बड़ी बहू नंदिता हड़बड़ा गई और कांपते स्वर में बोली – जी जी हां लाई हूं…
अपने आंचल के कोने से किसी स्त्री के अंतःवस्त्र निकाल कर उस तांत्रिक जो कि उसका ससुर था उसे सौंप दिया।
तांत्रिक के चेहरे पर एक कलुषित मुस्कान तैर गई अब वो पहले से दस गुना कुटिल और काइयां दिखने लगा था…
उसके सम्मुख जलती हुई यज्ञ की अग्नि उसके चेहरे पर पड़ रही थी जिसके कारण उसका चेहरा स्पष्ट दिखाई दे रहा था..
कुछ देर तक उस अंतःवस्त्र को अपनी मुठ्ठी में मसलता रहा वो..
ऐसा लग रहा था जैसे किसी का गला घोंट रहा हो..
अपनी वाणी में जहर घोलते और एक-एक शब्द को चबाते हुए बोला – अब देखता हूं वो अहंकारी स्त्री कैसे मेरे कदमों में आकर नहीं गिरती है…
तंत्र साधना का बादशाह हूं मैं..
उसे मेरे वश में होना हीं होगा..
इतना कहकर उसने अपने नेत्र मूंद लिए..
वो अंतःवस्त्र जो उसकी बहू नंदिता ने चुरा कर लाया था वो किसी और के नहीं बल्कि उसके सगे भाई की बड़ी बहू दामिनी के थे।
जिस पर वो अपनी तंत्र साधना कर के अपने वश में करना चाहता था…
उस तांत्रिक के मंसूबे इतने घटिया थे कि वो ये भी भूल गया कि भाई की बहू भी बहू हीं होती है..
और अपनी बेटी के समान बहू के अंतःवस्त्र को इस प्रकार चुराना कितना बड़ा अधर्म और पाप है….
परंतु उसे क्यों हो भला अधर्म और पाप की चिंता क्यों कि इतिहास गवाह है कि संपत्ति के लोभ में स्त्रीयों का अपमान करना अधर्मियों के लिए कोई बड़ी बात नहीं होती….
परंतु ईश्वर को शायद कुछ और हीं मंजूर था…
उसने जैसे हीं वो अंतःवस्त्र अग्नि में डाला पूरे यज्ञ की अग्नि से काला धुआं उठने लगा और तत्क्षण वो अग्नि बुझ गई।
तांत्रिक चीख पड़ा – नहीं ये कदापि नहीं हो सकता।
मैं हार नहीं सकता।
उसकी क्रोध की अग्नि भड़क उठे तिलमिलाते हुए वहां पर मौजूद सारी वस्तुएं फेंकने लगा….
कौन है?? जिसने मेरी शक्तियों को चुनौती दी है..
आखिर कौन सी ऐसी दिव्य शक्ति है जिसने मेरी साधना भंग की है..
अपने बालों और दाढ़ी को नोचते हुए चीखता रहा…
मैं क्यों उस लड़की को हर बार अपने वश में नहीं कर पा रहा…
उसका ये रूप देख सभी लोग वहां से हट गए…
अपनी नाकामी पर क्रोध से भरा वो तांत्रिक हाथ मलता रह गया और कोसों दूर दामिनी चैन की नींद सो रही थी…
तांत्रिक मन हीं मन कलपता रहा रात भर…
मैं तुम्हें झुका कर रहूंगा एक दिन…
ये कहानी उन रिश्तों की सच्चाई की है जिसे दामिनी ने हमेशा अपना सगा और सम्माननीय समझा था…
दामिनी अपनी हीं दुनिया में मस्त रहने वाली एक अल्हड़ और प्यार करने वाली लड़की थी..
दिल की सच्ची इरादों की पक्की…
सकारात्मक सोच और पवित्र विचारों वाली..
अपने ईश्वर पर अथाह विश्वास और श्रद्धा रखने वाली…
जबसे दामिनी बहू बन कर आई
ससुराल का माहौल हीं बदल गया…
जिस घर में नकारात्मक ऊर्जा भरी रहती थी वहां हर सुबह धूप अगरबत्ती और भजन की सुगंध फैलने लगीं…
उसके आने से सबकुछ अच्छा-अच्छा सा होने लगा…
ये बात उसके बड़े ससुर को बिल्कुल भी नहीं सुहाता था क्योंकि वो काला जादू का एक ऐसा बेताज बादशाह था जिसने दामिनी के ससुर को अपने वश में कर रखा था….
ताकि वो उनकी संपत्ति पर अपना एकाधिकार जमाए रखें…
दामिनी को शुरूआत से हीं ऐसा महसूस होता था कि इस घर में कुछ तो गड़बड़ है..
परंतु उसकी बातें कोई सुने तब तो…
अपने परिवार को उस तांत्रिक से बचाने के लिए दामिनी हर संभव प्रयास करती रही..
अपनी सकारात्मक ऊर्जा के दम पर उसने अपने परिवार पर एक सुरक्षा कवच बना रखा था…
परंतु वो चाहकर भी अपने ससुर को उस तांत्रिक के वशीकरण से बाहर नहीं निकाल पा रही थी…
उसे घृणा थी अपने बड़े ससुर से उसके कुकृत्यों से..
और उसके बड़े ससुर को भय था उसकी सकारात्मक ऊर्जा से..
कि कहीं दामिनी के कारण उसका वशीकरण खत्म हो गया तो सारी संपत्ति हाथ से निकल जाएगी..
धन के लिए इतनी गहरी साजिश
इतनी नीचता और इतने गिरे हुए कर्म…
दामिनी के तांत्रिक ससुर ने भले हीं उसको अपने वश में नहीं कर पाया हो परंतु उसके जीवन में थोड़ी-बहुत उथल-पुथल तो मचा हीं दी थी…
दामिनी अक्सर परेशान और चिंतित सी रहने लगी थी..
छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना और अपने हीं लोगों से लड़ पड़ना…
उसकी गृहस्थी की नाव डगमगाने लगी..
जब कभी भी वो गुस्से में चीख चिल्लाकर सबको दुःख पहुंचा देती तब उसे आभास होता कि कुछ तो है जिस पर उसका संतुलन नहीं हो पा रहा है..
परेशान हो कर जब वो समाधान के लिए पुरोहित यज्ञनारायण जी के पास गयी जिन्हें वो बड़े भैया कहा करती थी तब जो सच्चाई उसे मालूम हुई उसे जान कर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
दामिनी को जब उसके धर्म भाई पुरोहित यज्ञनारायण जी ने ये सच्चाई बताई कि किस प्रकार उसके तांत्रिक ससुर ने उस पर काला जादू करने का प्रयास किया था तो दामिनी क्रोध से लाल हो गई…
उस घटिया इंसान की इतनी हिम्मत???
परंतु कहते हैं कि बुराई कितनी भी मजबूत क्यों ना लेकिन अच्छाई के आगे उसे झुकना हीं पड़ता है और वहीं उसके साथ भी हुआ…
रिश्तों के भी रंग समय के साथ बदरंग हो जाते है, रिश्तों का ये रूप को देखकर दामिनी स्तब्ध थी..
उसके बड़े ससुर तो धन के लोभी थे हीं परंतु जेठानी
उन्होंने भी उनका साथ दिया..
दामिनी जबसे आई थी जेठानी के साथ उसका व्यवहार बड़ा हीं सुमधुर था परंतु उसे नहीं पता था कि जेठानी भी अपने ससुर के साथ मिलकर उसको धोखा देगी..
शायद यहीं सच्चाई है कि धन किसी को भी किसी का शत्रु बना सकता है..
जिसे बड़ी बहन की तरह सम्मान दिया उसने ये किया??
दामिनी का सर चकराने लगा..
ये रिश्ते नाते जितने दिखावे में अच्छे और प्यारे लगते हैं ना हकीकत की दुनिया में उतने हीं घिनौने और भयानक होते हैं..
परंतु दामिनी कहें भी तो किससे??
घरवालों को तो अपने ताऊजी पर इतना भरोसा है कि वो कभी इस बात पर यकीन नहीं करेंगे…
दामिनी ने सोच लिया कि जिस प्रकार ताऊजी ने उसके साथ छल से वार किया वो भी छल से हीं जवाब देगी..
और चल पड़ी वो किसी को बिना बताए अपनी मंजिल की तरफ…
उस तांत्रिक और उसकी काली दुनिया को जला कर भस्म करने…
जिसने रिश्तों की मर्यादा तक का भी ख्याल नहीं किया….
और उसका साथ दिया उसके धर्म-भाई पुरोहित यज्ञनारायण जी ने…
जिन्होंने उसे उसके ताऊजी की सच्चाई बताई थी..
अब ये लड़ाई केवल संपत्ति की नहीं बल्कि दामिनी के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी थी…
ताऊ ने महाभारत की कहानी दुहराने का दुस्साहस किया था तो विनाश तो होना हीं था…
जब भी किसी ने जाने अनजाने में नारी का अपमान किया है उसके कुल का विनाश किसी ना किसी रूप में स्वयं नारायण करते हैं और आज एक अकेली पांचाली अपने धर्म भाई के साथ कलयुग के इस दुर्योधन का विनाश करने निकल पड़ीं…
डोली पाठक
पटना बिहार