एक ज़िद्दी इश्क – नमिता पंडित

 सुहानी अभी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही एक सफेद रंग की एसयूवी आकर ठीक उसके सामने रुकी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और इससे पहले कि सुहानी कोई प्रतिक्रिया दे पाती, शौर्य ने उसका हाथ पकड़ा और उसे गाड़ी में बैठने का इशारा किया। उसकी आँखों में एक अजीब सी जल्दबाज़ी और एक ऐसा अधिकार … Read more

किस रूप में… – उषा भारद्वाज

  मोना रसोई में काम कर रही थी।बाहर तेज बारिश हो रही है। थोड़ी देर में ओले भी गिरने लगे । वो खिड़की से बाहर देखने लगी। तभी एक बूढ़ा कमजोर सा भिखारी दिखाई दिया जो सामने पेड़ के नीचे खड़ा था। वो पूरी तरह भीग गया था।  उसने कुछ सोचा फिर  छाता लेकर उसके पास … Read more

सहारा – मधु वशिष्ठ

डोर बैल की आवाज सुनकर भाभी बाहर गईं। थोड़ी देर में उनकी चिल्लाने की आवाज सुनकर मैं भी बाहर निकली तो मैंने देखा भाभी बाहर खड़े कुछ सफाई कर्मचारी जैसे दिखने वाले लोगों से जोर जोर से बोल रही थीं।  कहां काम करते हो तुम ? क्या सरकार तुम्हें तनख्वाह नहीं देती ? जब तुम्हें … Read more

बच्चों के इम्तिहान, मम्मी परेशान – एम. पी. सिंह

 हास्य कहानी  मार्च का महीना शुरू होते ही घर का माहौल बदल जाता है। कारण, बच्चों के इम्तिहान,  पर असली परीक्षा तो मम्मी की ही शुरू हो जाती है। वैसे, मम्मी तो बच्चों के लिए हमेशा ही परेशान रहती है. इम्तिहान के दिनों मैं बच्चे भी मम्मी का पूरा पूरा फायदा उठाते है. कभी बोलते … Read more

*बड़े भाई हो, बाप मत बनो* – तोषिका

आप मेरे *बड़े भाई हो, बाप मत बनो*। इतनी टोका ताकि तो पापा भी नहीं करते थे मेरे काम में जितना आप कर देते हो। चीखते हुए विशाल बोला अपने बड़े भाई देव से। उधर मंदिर से वापिस आती सुधा को घर के बाहर से चीखने की आवाज आई तो सुधा ने जल्दी से घर … Read more

अप्रैल फूल – एम. पी. सिंह

हमारी कॉलोनी मैं शीतल कुमार नाम का एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ रहता है. उसके नाम के जैसा ही उसका चरित्र था. खाना बनाना, कपड़े धोना, हर आने जाने वाली औरतो से बातें करना. सारी कॉलोनी की खबर रखना उसकी हॉबी थीं. इसके अलावा आते जाते लोगों से मजाख भी करता था, कई बार … Read more

सहारा – संजय सिंह।

 रात का समय था ।तकरीबन 10:00 बज रहे थे ।राम पूरा दिन काम करके अपनी थकान को मिटाने के लिए बिस्तर पर लेटा हुआ था। सोने की तैयारी कर रहा था। उसके बिस्तर के सामने एक मोमबत्ती जल रही थी ।उसी की रोशनी सारे कमरे को रोशन कर रही थी।राम मन ही मन में सोचने … Read more

हम कलंकित नहीं हैं – प्रतिभा भारद्वाज (प्रभा)

एक आलीशान मकान के बाहर जैसे ही अंजना पहुंची उसके पांव वहीं ठिठक गए, उस घर को आखिर वह भूल भी कैसे सकती थी…. आज से लगभग 25 साल पहले ही तो वह इस घर में आती थी एक बूढ़ी महिला की देखभाल करने;  अंजना एक नर्स थी जिसे इस घर में इस बूढ़ी महिला … Read more

स्वाभिमान मेरा भी है – आरती झा आद्या

रंगोली बचपन से ही थोड़ा ऊँचा सुनती थी, पर उसके भीतर जीवन के रंग बेहद गहरे थे। उसकी हँसी में उजास था, सपनों में खुला आसमान विस्तार ले रहा था। अभी वह इक्कीसवें वर्ष में कदम ही रख ही रही थी कि उसके पेट पर सफेद छोटे धब्बे उभर आए। जब डॉक्टर ने जाँच के … Read more

कभी भी किसी पर आंख मूंद कर भरोसा मत करना चाहिए। – सीमा सिंघी

बाजार के बीचो-बीच रमेश जी की कपड़े की दुकान खूब अच्छी चल रही थी क्योंकि रमेश जी की पारखी नजर लोगों की पसंद ना पसंद को बहुत अच्छी तरह समझने लगी थी इसीलिए जिस तरह के ग्राहक आते। उन्हें उसी तरह के कपड़े दिखाकर खुश कर देते। रमेश जी की दुकान से कोई भी ग्राहक … Read more

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