सहारा – एम. पी. सिंह 

बिल माँ बाप का रामु अपने दादा दादी के साथ गाँव में रहता था. जब वो 5 साल का था, दादी भी नही रही, इसलिए दादा ने जैसे तैसे बड़ा किया। 14 साल की उम्र में दादा भी साथ छोड़ गए। पेट भरने के लिए उसने पढ़ाई छोड़ दी और एक स्कूटर रिपेयर की दुकान … Read more

“सहारा” – गीता अस्थाना

प्रभात -बेला की सूर्य -किरणें क्षितिज पर आगमन कर चुकी थीं। धरती पर सुनहरी रश्मियाँ  बिखर कर अपने आने का आभास से जनजीवन में उर्जा भर रही थीं। वृक्षों पर पक्षियों का चहचहाना,गायों का रंभाना सूर्योदय होने का प्रमाणित कर रही थीं। कुछ लोग अपने दैनिक जीवन कार्य में संलग्न हो चुके थे और कुछ … Read more

सहारा – करुणा मलिक 

अम्मा, मैं बता रही हूँ कि इस मकान का सहारा है बस तुम्हें, हरगिज़ भी सुनील की बात मानकर इसे बेचने की मत सोचना , याद है ना ताई की दुर्गति, मकान नाम करते ही बिल्लू भाई ने जीते जी मार ही डाला था।  ना लाली, ऐसी बात नहीं है । पहली बात तो अपना … Read more

बेसहारों का सहारा – गीता वाधवानी

 मालती अपनी मां सुषमा के गले रखकर रो पडी और कहने लगी-” मम्मी, यह आप क्या कह रही हो, पापा आप कह दो यह सब झूठ है। ”   मम्मी और पापा दोनों ने कहा-” नहीं मालती, यह सब झूठ नहीं है सच है। ”   मालती -” नहीं मैं नहीं मानती इस सच को? ”   मम्मी-”  … Read more

सहारा – आरती झा आद्या

“माँ, आज फिर देर हो जाएगी?” रसोई से आती हल्की-सी खनखनाहट के बीच श्रेयांश की आवाज़ में झुँझलाहट साफ़ थी। सावित्री ने पलटकर बेटे को देखा। चेहरे पर थकान थी, पर मुस्कान वैसे ही सजी थी जैसे बरसों से सजी रहती थी। “बस आधा घंटा और… तेरे पापा की दवा दे दूँ, फिर नाश्ता लगाती … Read more

 बेनाम रिश्तों की अनकही दास्तान – आर्या विनोद

 श्रुति अपनी डेस्क पर रखा अपना सारा सामान समेट रही थी। पिछले दो सालों से जिस आर्किटेक्चरल प्रोजेक्ट पर वह और उसकी कंपनी काम कर रही थी, वह आज सफलतापूर्वक पूरा हो गया था। अब उसकी कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो चुका था और कल से उसे इस ऑफिस में नहीं आना था। फाइलों को … Read more

कर्मों का अनकहा हिसाब: एक निस्वार्थ कदम

अनिकेत के जीवन में पिछले कुछ महीने किसी डरावने सपने से कम नहीं थे। पिता के अचानक हुए देहांत के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उसके युवा कंधों पर आ गिरी थी। घर में एक बीमार माँ और कॉलेज के अंतिम वर्ष में पढ़ रही छोटी बहन रिया थी। पिता की जमा-पूंजी माँ के इलाज … Read more

बेनाम रिश्तों की अनकही दास्तान – कृतिका भण्डारी

शाम के धुंधलके में बारिश की हल्की फुहारें शहर की सड़कों को भिगो रही थीं। ऑफिस की दसवीं मंजिल पर स्थित केबिन में खामोशी छाई हुई थी। यह खामोशी किसी उदासी की नहीं, बल्कि एक लंबे और सफल सफर के खत्म होने की थी। श्रुति अपनी डेस्क पर रखा अपना सारा सामान समेट रही थी। … Read more

जब स्वाभिमान ने तोड़ी अपमान की बेड़ियां – निधि सहाय

अवनि आज बहुत देर तक आईने के सामने खड़ी रही। कांच में उभरने वाला अक्स उसे अपना सा नहीं लग रहा था। यह वह अवनि तो बिल्कुल नहीं थी जो पांच साल पहले इस घर में दुल्हन बनकर आई थी। तब वह छरहरी थी, उसके चेहरे पर एक अलग सा नूर था और उसके पति … Read more

**एक अधूरी तस्वीर: दर्द और प्यार का सफर** – मीरा महेश

काव्या ने अपनी माँ, नंदिनी को सिर्फ दीवारों पर टंगी उन बेजान तस्वीरों में ही देखा था। उन तस्वीरों में नंदिनी की आँखें इतनी जीवंत लगती थीं, मानो वो अभी तस्वीर से बाहर आकर काव्या को गले लगा लेंगी। काव्या के लिए उसकी माँ किसी परीकथा की उस रानी जैसी थी, जिसके किस्से उसने अपनी … Read more

error: Content is protected !!