खामोश संघर्ष की गूँज

नीता अपने आलीशान बंगले के हरे-भरे लॉन में बैठी सुबह की चाय की चुस्कियाँ ले रही थी। सर्दियों की गुनगुनी धूप में वह अपने बेटे रोहन के भविष्य को लेकर गहरी चिंता में डूबी थी। रोहन शहर के सबसे महंगे और नामी स्कूल में पढ़ता था। उसकी हर छोटी-बड़ी फरमाइश पूरी करने के लिए नीता … Read more

मोहब्बत की कसौटी: चाहना और निभाना

रघुनाथ जी अपने घर के बरामदे में बैठे हुए बाहर हो रही झमाझम बारिश को देख रहे थे। उनके हाथों में चाय का प्याला था, जिससे उठती हुई भाप उनके चश्मे के शीशे को थोड़ा धुंधला कर रही थी। लेकिन उनके मन के भीतर चल रही उधेड़बुन बाहर की बारिश से कहीं ज़्यादा तेज़ थी। … Read more

त्याग के पन्ने

“बेटा, अगर मेरे रहने से इस घर की शांति भंग होती है, तो मैं आज ही यह घर छोड़ दूंगी। मुझे बुढ़ापे में किसी पर बोझ बनकर नहीं रहना।” कांपते हाथों से अपनी पुरानी सूती साड़ी का पल्लू सँभालते हुए, बासठ वर्षीय सावित्री देवी ने अपने भारी मन से ये शब्द कहे। उनके चेहरे की … Read more

उम्मीद के धागे

अस्पताल की सफेद, ठंडी दीवारों के बीच एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी, जिसे सिर्फ वेंटिलेटर की एकरस ‘बीप-बीप’ की आवाज़ ही तोड़ रही थी। आईसीयू के बाहर, कांच की दीवार से माथा टिकाए विक्रम खड़ा था। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए थे और चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता … Read more

ममता की तराजू: पच्चीस साल बनाम एक महीना

शालिनी का मन आज सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी और उदासी के भंवर में गोते खा रहा था। घर का हर कोना उसे काटने को दौड़ रहा था। आज उसकी इकलौती बेटी काव्या की शादी को ठीक एक महीना पूरा हो गया था। यह एक महीना शालिनी के लिए किसी युग के बीतने … Read more

खामोश समझौते: एक बेटी की अनकही चिट्ठी

आज आसमान में काले बादल घिरे हुए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। जब भी मौसम ऐसा होता है, काव्या के मन के किसी गहरे कोने में दबी हुई यादें ताज़ा हो जाती हैं। खिड़की के पास खड़ी काव्या के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी—उसके बाबूजी की। पच्चीस साल बीत गए थे बाबूजी … Read more

कांच के रिश्ते और सपनो की गुल्लक

मेरे बचपन की यादें मेरी माँ की साड़ी के पल्लू और उनके हाथों से बने गाजर के हलवे की खुशबू से जुड़ी थीं। जब तक माँ थीं, हमारा घर एक घर था। पिताजी दफ्तर से आते, तो पूरा घर उनकी हंसी से गूंज उठता था। लेकिन मेरे चौदहवें जन्मदिन से ठीक दो महीने पहले, एक … Read more

उम्मीदों के नए रंग

सुबह की पहली किरण के साथ ही घर में बर्तनों की खटपट शुरू हो गई थी। चौंतीस वर्षीय सुमन अपनी दाईं ओर हल्का सा झुककर चलती हुई रसोई की तरफ बढ़ रही थी। बचपन में पोलियो का शिकार होने के कारण उसके पैर में जो लचक आ गई थी, वह उम्र के साथ और भी … Read more

खामोश दीवारें और सुलगते जज़्बात

“मैडम जी, दरवाज़ा तो खोलिए, कितनी देर से आवाज़ लगा रही हूँ!” कामवाली शांता की ऊँची आवाज़ सुनकर अंजलि जैसे किसी गहरे सपने से जागी। उसने झटके से अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाई और जाकर दरवाज़ा खोल दिया। पुणे के एक बेहद पॉश इलाके में बने उस आलीशान विला को बाहर … Read more

सपनों की राख और गृहस्थी की बेड़ियाँ

“मैंने तो तुझे पहले ही आगाह किया था विकास! यह लड़की सिर्फ तेरे पैसों पर ऐश करना जानती है। पढ़ाई-लिखाई तो बस एक बहाना है काम से बचने का। अगर सच में इसने किताबें खोली होतीं, तो आज इसका यह हाल न होता। तू ही अपनी पत्नी के मोह में अंधा हो गया था। अब … Read more

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