आबरू की बेड़ियाँ

  इस घर का हर सदस्य कान खोलकर सुन ले!” प्रताप सिंह जी की आवाज़ हवेली की दीवारों से टकराकर गूँज उठी। “अपनी बेटी को ऐसे वहशी जानवर और नरक से आज़ाद करवाने से किसी खानदान पर धब्बा नहीं लगता! धब्बा तब लगता है, जब हम समाज के डर से अपनी ही फूल-सी बेटियों को जलती … Read more

अंधेरा छंटने के बाद

 आलोक के हाथों में जमीन की रजिस्ट्री के कागजात थे, और सामने खड़ी उनकी पत्नी नंदिनी की आंखों में आंसू और गुस्से का सैलाब उमड़ रहा था। “आप एक बार फिर सोच लीजिए आलोक। यह सिविल लाइंस वाला प्लॉट हमने अपने पेट काटकर, एक-एक पाई जोड़कर सिर्फ इसलिए खरीदा था ताकि जब हमारे ईशान के … Read more

आँगन का बँटवारा

राजवर्धन जी की आँखों से पश्चाताप के गर्म आँसू बह निकले। समाज की उस सड़ी-गली मानसिकता पर उन्हें आज घृणा हो रही थी, जिसका हिस्सा वह खुद बन गए थे। समाज का यह कैसा दोहरा मापदंड है? जब बात अपनी बेटी की आती है, तो हर पिता चाहता है कि ससुराल में उसे रानी बनाकर … Read more

दहलीज़ के इस पार भी, उस पार भी

“पापा, मम्मी… प्लीज मत रोइए न। मैं आपसे दूर कहाँ जा रही हूँ? मैं तो हमेशा आपके दिल की धड़कन बनकर आपके सीने में रहूँगी। आपकी ये परी जब भी आपको याद आएगी, एक वीडियो कॉल पर आपके सामने होगी। और पापा, मैंने रोहन से बात की है, हम कोशिश करेंगे कि अगले साल तक … Read more

आँगन की पराई गौरेया

 “ पल्लवी के पैरों में जैसे आज पंख लग गए थे। अपनी भारी सिल्क की साड़ी का पल्लू कमर में खोंसे वह कभी हलवाई के पास भागती, तो कभी मंडप की सजावट देखती। आखिर उसके इकलौते छोटे भाई कार्तिक की शादी जो थी! पिता के गुजर जाने के बाद पल्लवी और उसकी माँ शारदा जी … Read more

अफवाहों की आंधी

चित्रा ने आगे बढ़कर उंगली दिखाते हुए कहा, “तमाशा हम नहीं कर रहे कामिनी, तमाशा तो तुमने बनाया है शराफत का! सुबह मंदिर के बाहर खड़ी होकर बड़ा रोना रो रही थी न कि सिया किसी के साथ भाग गई? ये क्यों नहीं बताया कि तुम्हारे अपने सपूत ने सिया को अगवा किया था? अपने … Read more

नेह की टूटी डोर

नंदिनी के पैरों के नीचे से ज़मीन सरक गई थी। जिस दामिनी के बच्चों की पढ़ाई के लिए उसने अपने आरव के ट्यूशन के ख़र्चों में कटौती की, जिस दामिनी के मायके वालों की आवभगत में उसने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी, और जिस अम्मा जी के घुटनों के ऑपरेशन के लिए उसने अपने गहने … Read more

अनकहे जज़्बातों की सरगम

  जानते हो विहान, मेरे सारे संदेह तब धुल गए जब मैंने अनुराधा की आंखों में तुम्हारे लिए छलकती हुई पवित्रता को देखा। अगर उसके मन में कोई चोर होता, कोई अपराधबोध होता, तो वह तुम्हारा जिक्र मुझसे छुपाती। लेकिन उसने जिस निडरता, जिस बेबाकी और जिस आत्मसम्मान के साथ अपने अतीत के इस हिस्से को … Read more

अनकहे स्वाद

 रीता आगे बोलती गई, “भैया, अम्मा की जीभ चटोरी नहीं है, उनकी आत्मा प्यासी है! सत्तर साल से वह औरत सिर्फ दूसरों की थालियाँ भरती रही और खुद झूठे बहाने बनाकर भूखी सोती रही। आज जब उन्हें लगा कि अब वो अपने बेटे के भरे-पूरे घर में थोड़ा सा सुख भोग सकती हैं, तो डॉक्टर … Read more

आंगन की वह सफेद लकीर

“नाप ले नीरज, इस नीम के पेड़ से लेकर उस तुलसी के चौरे तक का हिस्सा आज से तेरा हुआ, और पूरब के वो दो कमरे मेरे। और हाँ, कल सुबह होते ही राजमिस्त्री आ जाएगा, इस आंगन के ठीक बीचों-बीच आठ फीट ऊँची पक्की दीवार उठ जाएगी। अब यह रोज-रोज का क्लेश और ताने-उलाहने … Read more

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