आबरू की बेड़ियाँ
इस घर का हर सदस्य कान खोलकर सुन ले!” प्रताप सिंह जी की आवाज़ हवेली की दीवारों से टकराकर गूँज उठी। “अपनी बेटी को ऐसे वहशी जानवर और नरक से आज़ाद करवाने से किसी खानदान पर धब्बा नहीं लगता! धब्बा तब लगता है, जब हम समाज के डर से अपनी ही फूल-सी बेटियों को जलती … Read more