नीता अपने आलीशान बंगले के हरे-भरे लॉन में बैठी सुबह की चाय की चुस्कियाँ ले रही थी। सर्दियों की गुनगुनी धूप में वह अपने बेटे रोहन के भविष्य को लेकर गहरी चिंता में डूबी थी। रोहन शहर के सबसे महंगे और नामी स्कूल में पढ़ता था। उसकी हर छोटी-बड़ी फरमाइश पूरी करने के लिए नीता और उसके पति राकेश ने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
लाखों रुपये की ट्यूशन फीस, विदेशी किताबें, लैपटॉप और हर सुख-सुविधा देने के बावजूद रोहन का पढ़ाई में मन नहीं लगता था। पिछले ही हफ्ते उसके प्री-बोर्ड के नतीजे आए थे, जो बेहद निराशाजनक थे। नीता को रह-रह कर यही चिंता सता रही थी कि
अगर रोहन के अच्छे नंबर नहीं आए, तो उसे किसी बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला कैसे मिलेगा। राकेश ने तो यहाँ तक कह दिया था कि डोनेशन देकर किसी प्राइवेट कॉलेज में सीट खरीद लेंगे, लेकिन नीता के लिए यह समाज में नाक कटने जैसी बात थी।
इन्हीं ख्यालों में उलझी नीता की नज़र सुशीला पर पड़ी। सुशीला उनके घर में पिछले आठ महीनों से साफ-सफाई और बर्तन का काम कर रही थी। वह पैंतालीस-पचास वर्ष की एक बेहद शांत, संकोची और परिश्रमी महिला थी। हमेशा एक साफ लेकिन रंग उड़ी हुई सूती साड़ी पहने, सिर पर पल्लू रखे वह सुबह ठीक आठ बजे घर में दाखिल होती
और बिना एक पल बर्बाद किए अपने काम में जुट जाती। नीता ने आज तक सुशीला को कभी काम से जी चुराते या किसी से फालतू बात करते नहीं देखा था। सुशीला के चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता और थकान हमेशा छाई रहती थी, जिसे देखकर नीता को अक्सर उस पर दया आ जाती थी।
नीता का मानना था कि सुशीला जैसी औरतें जीवन में केवल दुख भोगने के लिए ही बनी हैं। वह अक्सर सुशीला को रात का बचा हुआ खाना, पुराने कपड़े और कभी-कभार कुछ अतिरिक्त पैसे दे दिया करती थी। सुशीला भी बिना किसी शिकायत या लालच के, अत्यंत कृतज्ञता के साथ उन चीज़ों को स्वीकार कर लेती थी। नीता को लगता था कि सुशीला का जीवन बस इन्हीं झाड़ू-पोंछे और जूठे बर्तनों के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है, जिसका कोई भविष्य नहीं है।
एक दिन नीता के घर पर उसकी कुछ सहेलियों की किटी पार्टी थी। ड्राइंग रूम में शहर की जानी-मानी और रसूखदार महिलाएँ बैठी थीं। बातों का सिलसिला महँगी साड़ियों और गहनों से होता हुआ बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य तक पहुँच गया। नीता की एक सहेली, वंदना, बड़ी ही निराशा के साथ कह रही थी, “आजकल बच्चों को पढ़ाना कितना मुश्किल हो गया है। मेरे बेटे को आईआईटी की कोचिंग के लिए हमने कोटा भेजा है। हर महीने लाखों का खर्च है, फिर भी कोई गारंटी नहीं कि उसका सिलेक्शन होगा या नहीं। आजकल तो बिना मोटी डोनेशन के कहीं कोई बात ही नहीं बनती।”
तभी सुशीला ट्रे में चाय और नाश्ता लेकर वहाँ आई। वह चुपचाप टेबल पर कप सजाने लगी। वंदना की नज़र सुशीला पर पड़ी और वह तंज कसते हुए बोली, “अरे नीता, असल ज़िंदगी तो इन लोगों की है। न बच्चों को बड़े स्कूलों में पढ़ाने की चिंता, न करियर का टेंशन। ये लोग तो अपने बच्चों को भी थोड़ा बड़ा होते ही किसी ढाबे या कोठी में काम पर लगा देते हैं। दो पैसे घर में आने लगते हैं। हमारी तरह इन्हें लाखों रुपये पानी की तरह थोड़ी बहाने पड़ते हैं।”
ड्राइंग रूम में एक हल्की सी हँसी गूंज उठी। नीता ने भी मुस्कुराते हुए हामी भरी। सुशीला ने सब कुछ सुना, लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। उसने चुपचाप अपना काम खत्म किया और सिर झुकाकर कमरे से बाहर निकल गई। नीता को उस वक्त लगा कि शायद सुशीला को इन बातों का मतलब भी समझ नहीं आया होगा।
इस घटना के कुछ दिन बाद, सुबह के समय जब सुशीला काम खत्म करके जाने लगी, तो वह ठिठक कर नीता के पास खड़ी हो गई। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और थोड़ी झिझक थी।
“क्या बात है सुशीला? कुछ चाहिए क्या?” नीता ने अपना मोबाइल देखते हुए लापरवाही से पूछा।
“मेमसाब, मुझे अगले हफ्ते से पंद्रह दिन की छुट्टी चाहिए थी,” सुशीला ने धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा।
छुट्टी का नाम सुनते ही नीता के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। “पंद्रह दिन? पागल हो गई हो क्या सुशीला? अगले हफ्ते से घर में पुताई का काम शुरू होना है, मेहमानों का आना-जाना लगा रहेगा और तुम पंद्रह दिन की छुट्टी मांग रही हो? आखिर ऐसा क्या काम आ गया? गाँव जाना है क्या?”
सुशीला ने अपने पल्लू को उँगलियों में लपेटते हुए कहा, “नहीं मेमसाब, गाँव नहीं जाना है। मुझे अपने पति के साथ रुड़की जाना है।”
“रुड़की? वहाँ क्या है? किसी रिश्तेदार के यहाँ शादी है क्या?” नीता ने झल्लाहट भरे स्वर में पूछा।
“नहीं मेमसाब… वह… मेरे बेटे का दीक्षांत समारोह है। उसे उसकी डिग्री मिलने वाली है। वहाँ बहुत बड़े-बड़े लोग आ रहे हैं, तो उसने कहा है कि बाबूजी और अम्मा, तुम दोनों को ज़रूर आना है,” सुशीला के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान तैर गई जो नीता ने पिछले आठ महीनों में कभी नहीं देखी थी।
नीता ठिठक गई। उसने अपना फोन किनारे रखा और सुशीला को ध्यान से देखा। “दीक्षांत समारोह? डिग्री? तुम्हारा बेटा क्या करता है, सुशीला? और रुड़की में कहाँ पढ़ता है?” नीता के स्वर में अब गुस्से की जगह गहरे आश्चर्य ने ले ली थी।
सुशीला ने बहुत ही सहजता से जवाब दिया, “मेमसाब, मेरा बेटा आईआईटी रुड़की में पढ़ता है। कंप्यूटर वाली पढ़ाई की है उसने। चार साल पूरे हो गए, अब उसी की डिग्री मिलेगी। उसे किसी बहुत बड़ी विदेशी कंपनी में नौकरी भी मिल गई है। कह रहा था कि अब मुझे और उसके बाबूजी को काम करने की ज़रूरत नहीं है।”
नीता को लगा जैसे किसी ने उसके कानों के पास ज़ोर का धमाका कर दिया हो। वह अवाक रह गई। आईआईटी रुड़की? वह संस्थान जिसके लिए नीता और उसकी सहेलियाँ लाखों रुपये खर्च करने और दिन-रात एक करने के बावजूद अपने बच्चों का दाखिला नहीं करवा पाती थीं, वहाँ इस बर्तन मांजने वाली सुशीला का बेटा पढ़ रहा था?
नीता ने जैसे खुद को सँभालते हुए पूछा, “तुम्हारा बेटा आईआईटी में? लेकिन सुशीला, वहाँ तो दाखिला मिलना बहुत मुश्किल होता है। बहुत महँगी कोचिंग करनी पड़ती है। तुम लोगों ने यह सब कैसे किया? तुम्हारे पति क्या करते हैं?”
सुशीला के चेहरे पर एक शांत गर्व और संघर्ष की गहरी दास्तान झलकने लगी। वह बोली, “मेमसाब, मेरे पति पास की एक हाउसिंग सोसाइटी में रात के समय सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं और दिन में एक दुकान पर हिसाब-किताब का काम देखते हैं। मैं सुबह से शाम तक सात घरों में झाड़ू-पोंछा और खाना बनाने का काम करती हूँ। हम दोनों मिलकर महीने का लगभग अस्सी-नब्बे हज़ार रुपये कमा लेते हैं।”
नीता की आँखें फटी की फटी रह गईं। एक सिक्योरिटी गार्ड और एक मेड मिलकर महीने के अस्सी-नब्बे हज़ार कमा रहे थे, यह नीता की सोच से परे था।
सुशीला आगे बताने लगी, “मेमसाब, हमने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। हम जानते थे कि हमारे पास पैसे नहीं हैं, लेकिन हमारे बेटे आर्यन में बचपन से ही पढ़ाई की लगन थी। हमने उसे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। हम खुद फटे कपड़े पहन लेते थे, दो वक्त की जगह एक वक्त सूखी रोटी खा लेते थे, लेकिन उसकी किताबों और स्कूल की फीस में कभी कोई कमी नहीं आने दी। कोचिंग के लिए हमारे पास लाखों रुपये नहीं थे, तो उसने पुरानी किताबें खरीद कर और इंटरनेट की मदद से दिन-रात खुद ही पढ़ाई की। वह रात-रात भर जागकर पढ़ता था। हम बस इतना कर सकते थे कि उसके लिए रात को चाय बना दें और उसकी हिम्मत न टूटने दें।”
सुशीला की आँखें भर आई थीं, लेकिन वे आँसू दुख के नहीं, बल्कि वर्षों की उस कठोर तपस्या के सफल होने की खुशी के थे। “जब उसका रिजल्ट आया और उसने बताया कि उसका दाखिला इतने बड़े कॉलेज में हो गया है, तो हम दोनों पति-पत्नी सारी रात भगवान की मूरत के सामने बैठकर रोते रहे थे। वहाँ की फीस भी कम नहीं थी मेमसाब, लेकिन सरकार की तरफ से कुछ मदद मिल गई और बाकी हमने अपनी पाई-पाई जोड़कर भर दी। आज हमारी मेहनत सफल हो गई मेमसाब।”
नीता सुशीला को देखती रह गई। उसके दिमाग में वंदना की वह बात गूँज रही थी कि ‘इन लोगों को बच्चों के करियर की कोई चिंता नहीं होती।’ नीता को आज एहसास हुआ कि असली चिंता, असली संघर्ष और असली समर्पण क्या होता है। सुशीला और उसके पति ने कोई बहाना नहीं बनाया, परिस्थितियों का रोना नहीं रोया, बेरोजगारी का हवाला देकर हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी मेहनत को अपना हथियार बनाया और चुपचाप, बिना किसी दिखावे के, अपने बेटे के लिए एक ऐसा आसमान तैयार कर दिया जहाँ तक पहुँचने के लिए नीता जैसे रसूखदार लोग भी तरसते थे।
नीता को अपनी उस छोटी सोच पर गहरी शर्म महसूस होने लगी जो फटे कपड़ों और झाड़ू-पोंछे को देखकर इंसान का स्तर तय कर लेती थी। उसने महसूस किया कि समाज में कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। मेहनत की रोटी खाने वाला इंसान कभी छोटा नहीं हो सकता। जो लोग हमेशा संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं, वे केवल अपनी कमजोरियों को छिपाते हैं। सुशीला और उसके पति ने यह साबित कर दिया था कि अगर इंसान के अंदर कुछ कर गुज़रने की सच्ची लगन और कठोर परिश्रम करने की क्षमता हो, तो कोई भी मंजिल हासिल की जा सकती है।
नीता ने अपनी कुर्सी से उठकर सुशीला के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। सुशीला घबरा गई, “अरे मेमसाब, क्या कर रही हैं, मेरे हाथ गंदे हैं।”
“गंदे नहीं सुशीला, तुम्हारे ये हाथ हम सबसे ज्यादा पवित्र और कर्मठ हैं,” नीता की आँखों से भी आँसू छलक पड़े थे। “तुमने आज मुझे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया है। मुझे माफ़ कर देना कि मैंने तुम्हें हमेशा एक दया की दृष्टि से देखा, जबकि असल में तुम मुझसे और मेरे जैसे लाखों लोगों से बहुत ऊपर हो। तुम शौक से पंद्रह दिन की छुट्टी पर जाओ। और हाँ, मेरी तरफ से अपने बेटे को इस शानदार कामयाबी के लिए बहुत-बहुत आशीर्वाद देना।”
सुशीला के चेहरे पर एक कृतज्ञता भरी मुस्कान खिल उठी। वह नीता को प्रणाम करके वहाँ से चली गई। नीता काफी देर तक वहीं खड़ी रही। आज हवा में उसे अपने बगीचे के फूलों की महक से ज्यादा सुशीला के पसीने की वह महक महसूस हो रही थी, जिसमें ईमानदारी, संघर्ष और एक शानदार भविष्य की गूँज छिपी थी। नीता ने मन ही मन तय कर लिया कि वह अब अपने बेटे रोहन को पैसे और सुविधाओं के मोहजाल से निकालकर मेहनत और हकीकत की दुनिया से रूबरू कराएगी। सुशीला आज नीता की नज़रों में एक मामूली कामवाली से उठकर एक आदर्श और प्रेरणास्रोत बन चुकी थी, जिसका कद किसी भी बड़े ओहदेदार से कहीं ज्यादा ऊँचा था।
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