वात्सल्य का नया सवेरा

शिखा ने एक गहरी सांस ली। “विकास, मैं पिछले कई हफ्तों से देख रही हूं कि माँ जी अंदर ही अंदर घुल रही हैं। वह रात-रात भर सोती नहीं हैं, कल रात भी ढाई बजे बरामदे में अकेली बैठी थीं। उनका खाना-पीना भी नाम मात्र का रह गया है। बाबूजी के अचानक चले जाने का … Read more

“अंधेरे में एक रौशनी”

शाम ढल चुकी थी, लेकिन घर के आंगन में पसरा सन्नाटा जैसे और भी गहरा होता जा रहा था। यह वही आंगन था जहाँ कुछ महीनों पहले तक बच्चों की किलकारियां, बड़ों की हंसी-ठिठोली और चाय की चुस्कियों के साथ दिन भर की बातें गूंजा करती थीं। लेकिन बाबूजी, यानी रामनाथ जी के अचानक हुए … Read more

रिश्तों की डोर: पतंग और आसमान

“तुम्हारे बड़े भाई माधव ने उस धागे की तरह हमेशा तुम्हें थामे रखा,” श्रीधर जी ने आगे कहा। “जब एक्सीडेंट के बाद तुम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, तब उसी धागे ने तुम्हें गिरने नहीं दिया था। आज जब तुम अपने पैरों पर खड़े हो गए हो, तो तुम्हें लग रहा है … Read more

चंदा नहीं चाहिए – लतिका श्रीवास्तव

गाँव का वह छोटा-सा शासकीय विद्यालय सुबह होते ही बच्चों की आवाज़ों से भर जाता था। विद्यालय के सामने कच्ची सड़क थी और उसके दोनों ओर दूर तक फैले खेत। खेतों में रोपा लगाते ग्रामीण नई उम्मीदों की फसल बोने की तैयारी में थे। बरामदे के पास खड़ा पुराना नीम का पेड़ गर्मी की दोपहर … Read more

कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

सुबह के सात बज रहे थे। रसोई में चाय की खुशबू फैल रही थी और खिड़की के बाहर अमलतास के पीले फूल हवा के साथ झूम रहे थे। मीरा ने चाय का कप ट्रे में रखा और हमेशा की तरह पहले सास-ससुर के कमरे की ओर बढ़ी। “माँजी, चाय रख दूँ?” अंदर से आवाज आई, … Read more

असली खूबसूरती – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

दिल्ली जैसे बड़े शहर की चमक-दमक में रहने वाली रिया हमेशा अपनी खूबसूरती पर गर्व करती थी। महंगे कपड़े, ब्रांडेड मेकअप और सोशल मीडिया पर हजारों फॉलोअर्स—यही उसकी दुनिया थी। ऑफिस में भी लोग उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे, और रिया को लगता था कि खूबसूरती ही सब कुछ है। उसी ऑफिस में एक … Read more

स्वाभिमान मेरा भी – सीमा सिंघी

बारिश की हल्की-हल्की फुहारें खिड़की पर दस्तक दे रही थीं। रसोई में चाय बनाते हुए नंदिनी की नज़र दीवार पर टंगी अपनी डिग्रियों पर पड़ी। कभी इन्हीं डिग्रियों पर उसे गर्व हुआ करता था, लेकिन आज वे सिर्फ़ धूल से ढके हुए कागज़ लग रहे थे। “तुम करती ही क्या हो? दिन भर घर में … Read more

असली पूँजी

“मौसा जी, आप देखिए इन चेहरों को। इनमें से कोई भी आज यहाँ रस्म अदायगी के लिए नहीं आया है। ये सब वो लोग हैं जिनके घरों का चूल्हा पापा की वजह से जला है, जिनकी ज़िंदगियां पापा ने बचाई हैं। मेरे बैंक अकाउंट में करोड़ों रुपये हैं, लेकिन मेरे मरने पर शायद ही कोई … Read more

दौलत का अंधापन

इस विचार मात्र से ही प्रकाश की रूह काँप उठी। उसे अपने बाबूजी के वो आखिरी शब्द याद आने लगे—’जब ठोकर लगेगी तब समझ आएगा’। आज उसे वो ठोकर लग चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि जिस पेड़ से टूटकर वह खुद को आज़ाद समझ रहा था, असल में वह सूख रहा था। … Read more

रिश्ते की डोर

कैफे के शीशे वाले दरवाजे से बाहर निकलते हुए समीर की पीठ धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही थी, और अंदर बैठी काव्या को ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर से उसकी रूह निकलकर जा रही हो। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, लेकिन उसके अंदर का अहंकार उसे रोने … Read more

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