शाम ढल चुकी थी, लेकिन घर के आंगन में पसरा सन्नाटा जैसे और भी गहरा होता जा रहा था। यह वही आंगन था जहाँ कुछ महीनों पहले तक बच्चों की किलकारियां, बड़ों की हंसी-ठिठोली और चाय की चुस्कियों के साथ दिन भर की बातें गूंजा करती थीं। लेकिन बाबूजी, यानी रामनाथ जी के अचानक हुए देहांत ने इस घर की जैसे आत्मा ही छीन ली थी। उनका जाना इतना आकस्मिक था कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं मिला। घर के हर कोने में उनकी यादें बसी थीं, लेकिन सबसे ज्यादा अगर कोई इस वियोग से टूटा था, तो वह थीं कावेरी देवी। रामनाथ जी और कावेरी देवी का साथ पैंतालीस सालों का था। एक ऐसा साथ जिसमें कभी शब्दों की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ी; आंखों ही आंखों में दोनों एक-दूसरे का हाल समझ लिया करते थे।
कावेरी देवी पिछले कई दिनों से अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी रहती थीं। उनकी नजरें शून्य में कहीं खोई रहती थीं। न तो वह ठीक से खाना खा रही थीं और न ही रात भर उनकी आंखों में नींद आती थी। उनकी बहू, अंजलि, घर के कामकाज निपटाते हुए बार-बार अपनी सास की तरफ देखती और उसकी आंखें भर आतीं। अंजलि ने महसूस किया था कि उसकी सास का शरीर दिन-ब-दिन कमजोर होता जा रहा है। उनके चेहरे की वह चमक, जो हमेशा पूरे घर को रोशन करती थी, अब एक गहरे अवसाद में बदल चुकी थी। अंजलि जानती थी कि बाबूजी के जाने का गम बहुत बड़ा है, लेकिन वह यह भी जानती थी कि अगर कावेरी देवी को इसी तरह अकेले उनके हाल पर छोड़ दिया गया, तो वे धीरे-धीरे खुद को खत्म कर लेंगी।
रात के करीब दस बज रहे थे। अंजलि का पति, समीर, अपने कमरे में लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। बाबूजी के जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारियां अचानक समीर के कंधों पर आ गई थीं। वह भी अंदर ही अंदर टूट चुका था, लेकिन घर के मुखिया की भूमिका निभाते हुए उसने अपने आंसू पी लिए थे। अंजलि धीरे से कमरे में आई और समीर के पास बैठ गई।
समीर ने लैपटॉप बंद किया और अंजलि की तरफ देखकर एक फीकी मुस्कान के साथ बोला, “क्या हुआ अंजलि? तुम इतनी परेशान क्यों लग रही हो?”
अंजलि ने एक गहरी सांस ली और कहा, “समीर, मैं पिछले कई दिनों से माँ जी को देख रही हूं। उन्होंने खुद को बिल्कुल समेट लिया है। ना तो वो ढंग से खाना खा रही हैं, ना ही रात को सो पाती हैं। आज भी वो बालकनी में अंधेरे में बैठी थीं, बिल्कुल गुमसुम। बाबूजी के अचानक चले जाने से वो जैसे अंदर से टूट गई हैं और इस अकेलेपन ने उन्हें घेर लिया है। मुझे उनकी बहुत चिंता हो रही है समीर।”
समीर का गला रुंध गया। अपनी भावनाओं को काबू में करने की कोशिश करते हुए उसने कहा, “मैं जानता हूं अंजलि। बाबूजी का जाना हम सबके लिए एक ऐसा झटका है जिससे उबरना आसान नहीं है। वो इस घर की नींव थे। उनकी छत्रछाया में हम सब सुरक्षित महसूस करते थे। उनके अनुभवों ने हमेशा हमें सही रास्ता दिखाया। अब वो साया उठ गया है…” कहते-कहते समीर की आंखों से आंसू छलक पड़े और वह सुबकने लगा।
अंजलि ने समीर का हाथ अपने हाथों में लिया और उसे सांत्वना देते हुए बोली, “समीर, जो चला गया, हम उसे वापस नहीं ला सकते। यह विधि का विधान है जिसे हमें स्वीकार करना ही होगा। लेकिन जो हमारे पास हैं, हमें उन्हें भी तो नहीं खोना है। माँ जी का यूं अकेले रहना, घंटों शून्य को ताकना, नींद ना लेना और ठीक से खाना ना खाना… यह सब उनके स्वास्थ्य के लिए बहुत खतरनाक है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो हम उन्हें भी खो देंगे।”
समीर ने अपने आंसू पोंछे और गंभीरता से बोला, “तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो अंजलि। मैं कल ही, बल्कि कल सुबह सबसे पहले उन्हें डॉक्टर मेहरा के पास लेकर जाऊंगा। वो जरूर उन्हें कोई अच्छी दवा या नींद की गोलियां दे देंगे जिससे माँ को थोड़ा आराम मिले।”
अंजलि ने तुरंत ना में सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं समीर, माँ जी का इलाज किसी डॉक्टर या क्लिनिक के पास नहीं है। उनका इलाज कोई दवा नहीं कर सकती। उनका इलाज हमारे ही पास है।”
समीर ने हैरानी से अंजलि की तरफ देखा, “क्या मतलब? हमारे पास? हम क्या कर सकते हैं? हम डॉक्टर तो नहीं हैं ना।”
अंजलि ने मुस्कुराते हुए समीर की आंखों में देखा और कहा, “समीर, याद करो जब तुम छोटे थे और तुम्हें किसी बात से डर लगता था, या जब तुम कभी बहुत उदास और अकेला महसूस करते थे, तो तुम क्या करते थे?”
समीर कुछ पल के लिए सोच में पड़ गया। पुरानी यादें उसके जहन में ताजा हो गईं। उसने धीरे से कहा, “मैं… मैं दौड़कर माँ के पास चला जाता था। उनकी गोद में सिर रखकर मुझे लगता था जैसे दुनिया की सारी परेशानियां खत्म हो गई हों। उनकी एक थपकी से मेरा सारा डर दूर हो जाता था…” बोलते-बोलते समीर रुक गया। उसे अंजलि की बात का गहरा अर्थ समझ में आने लगा था। “ओह… मैं समझ गया अंजलि तुम क्या कहना चाह रही हो।”
“हां समीर,” अंजलि ने प्यार से कहा। “अब वक्त आ गया है कि हम माँ को यह अहसास दिलाएं कि वो आज भी हमारे लिए उतनी ही जरूरी हैं। कल से नहीं, बल्कि आज रात से ही तुम उनके साथ उनके कमरे में रहोगे। दिन में मैं और हमारा बेटा आरव उनके आस-पास रहेंगे। हम उन्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे। मैं उनसे घर की छोटी-छोटी बातों पर सलाह लूंगी ताकि उन्हें लगे कि उनकी जरूरत है। और रात को, जब वो सबसे ज्यादा अकेलापन महसूस करती हैं, तब तुम उनके पास होगे।”
अंजलि ने आगे कहा, “तुम उनके पास सोना और उनसे अपने बचपन की बातें करना। उन्हें याद दिलाना कि कैसे तुम अपनी नादानियों से उन्हें परेशान करते थे और वो तुम्हें डांटती थीं। कैसे वो तुम्हें समझाती थीं। उन्हें वो पुराना वक्त याद दिलाना। उन्हें यह महसूस कराना कि उनका बेटा आज भी उनसे उतना ही जुड़ा हुआ है और आज भी उसे अपनी माँ की उतनी ही जरूरत है जितनी बचपन में थी।”
समीर अंजलि की इस गहरी सोच और समझदारी से गदगद हो गया। उसने अंजलि का हाथ चूमते हुए कहा, “तुमने मेरी आंखें खोल दीं अंजलि। मैं आज रात से ही माँ के पास उनके कमरे में सोऊंगा।”
“यही सबसे अच्छा होगा समीर। उन्हें इस वक्त हमारी जरूरत है,” अंजलि ने संतोष भरी सांस लेते हुए कहा।
रात काफी गहरी हो चुकी थी। घर में चारों तरफ सन्नाटा था। समीर ने धीरे से कावेरी देवी के कमरे का दरवाजा खोला। कमरे में सिर्फ एक नाईट बल्ब की हल्की सी पीली रोशनी थी। कावेरी देवी अपने बिस्तर पर लेटी थीं, लेकिन उनकी आंखें खुली थीं और वो छत की तरफ देख रही थीं। आहट सुनकर उन्होंने करवट ली।
“कौन… कौन है वहां?” कावेरी देवी की कमजोर और कांपती हुई आवाज आई।
समीर धीरे से उनके बिस्तर के पास गया और बिस्तर के किनारे बैठ गया। “माँ… मैं हूं, आपका समीर।”
कावेरी देवी ने चौंककर उठने की कोशिश की। “समीर? तू यहां? बेटा काफी रात हो गई है। तू अभी तक सोया नहीं? क्या कुछ काम था या मेरी तबीयत के लिए पूछने आया है? मैं ठीक हूं बेटा, तू जाकर आराम कर।”
समीर ने अपनी माँ को वापस लिटाया और उनका हाथ अपने हाथ में लेकर बोला, “हां माँ, आज मैं आपके पास यहीं सोऊंगा। आपके कमरे में।”
कावेरी देवी की आंखों में हैरानी थी। “क्या? तू यहां सोएगा? मगर बेटा, अंजलि और आरव अकेले कैसे रहेंगे? तुझे तो उनके पास होना चाहिए। मेरी चिंता मत कर, मुझे अब नींद कम ही आती है।”
समीर ने जिद करते हुए कहा, “नहीं माँ… मैंने कह दिया ना, आज से मैं आपके पास ही सोऊंगा।”
कावेरी देवी के चेहरे पर अचानक एक चिंता की लकीर उभर आई। एक ठेठ हिंदुस्तानी माँ की तरह उनके दिमाग में सबसे पहला खयाल यही आया कि शायद पति-पत्नी में कोई अनबन हो गई है। उन्होंने समीर का हाथ कसकर पकड़ लिया और बोलीं, “सच बता समीर, क्या तेरा अंजलि से कोई झगड़ा हुआ है? देख बेटा, वो बहुत ही समझदार और प्यारी बच्ची है। उसने कभी इस घर को पराया नहीं समझा। अगर तेरी कोई गलती है तो जाकर उससे माफी मांग ले और अगर उसकी कोई गलती है तो उसे माफ कर दे। ऐसे छोटी-छोटी बातों पर रूठकर अलग सोना अच्छी बात नहीं है। जा, अभी जा और मना ले उसे।”
समीर अपनी माँ की इस भोली सी चिंता पर हल्का सा मुस्कुरा दिया। उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन होंठों पर मुस्कान। “नहीं माँ… ऐसा कुछ नहीं है। अंजलि सचमुच बहुत अच्छी है। हमारा कोई झगड़ा नहीं हुआ है। मैं तो बस…”
समीर ने एक पल के लिए ठहराव लिया और फिर अपनी माँ के पहलू में ऐसे लेट गया जैसे कोई छोटा बच्चा लेटता है। उसने अपनी माँ का हाथ अपने सिर पर रख लिया और बोला, “माँ, आपको याद है बचपन में जब भी तेज बारिश होती थी या बिजली कड़कती थी, तो मैं डर के मारे दौड़कर आपके पास आ जाता था? तब आप मुझे अपने आंचल में छिपा लेती थीं और कहती थीं कि जब तक तू मेरी गोद में है, दुनिया का कोई डर तुझे छू भी नहीं सकता।”
कावेरी देवी की आंखों से आंसू छलक पड़े। उनके कांपते हुए हाथ अपने आप समीर के बालों को सहलाने लगे। एक लंबे अरसे बाद उनके अंदर का वह मातृत्व फिर से जाग उठा था जिसे बाबूजी के जाने के बाद उन्होंने जैसे कहीं गहरे दफन कर दिया था। “हां बेटा… मुझे सब याद है। तू बहुत डरपोक था बचपन में। अंधेरे से बहुत डरता था।”
समीर ने अपनी आंखें बंद कर लीं और माँ के स्पर्श की उस गर्माहट को महसूस करने लगा। “माँ, मैं आज भी डरता हूं। बाबूजी के जाने के बाद यह घर मुझे बहुत खाली और डरावना लगने लगा है। मुझे आज भी आपकी उसी थपकी और आंचल की जरूरत है। मेरे पास मत सोने के लिए कहिए माँ… मुझे डर लगता है।”
समीर के इन शब्दों ने जैसे कावेरी देवी के अंदर जमे हुए आंसुओं के समंदर का बांध तोड़ दिया। वे फूट-फूट कर रोने लगीं। समीर ने भी अपनी आंखें नहीं रोकीं। दोनों माँ-बेटे एक-दूसरे के गले लगकर अपने उस दर्द को बह जाने दे रहे थे, जो पिछले कई दिनों से उनके दिलों में घुटन पैदा कर रहा था। कावेरी देवी रोते-रोते अपने पति की बातें करने लगीं, उनके साथ बिताए पलों को याद करने लगीं। समीर चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा, बीच-बीच में हुंकार भरता रहा।
कमरे के दरवाजे के बाहर खड़ी अंजलि यह सब देख रही थी। उसकी आंखों में भी आंसू थे, लेकिन ये आंसू सुकून के थे। उसने देखा कि कैसे उसकी सास के चेहरे का तनाव आंसुओं के साथ बह रहा था और कैसे समीर के रूप में उनका खोया हुआ संबल उन्हें वापस मिल गया था।
उस रात कावेरी देवी ने महीनों बाद एक गहरी और सुकून भरी नींद ली। उनका हाथ अभी भी समीर के सिर पर था। अंजलि जानती थी कि यह सिर्फ शुरुआत है, अभी दर्द पूरी तरह से गया नहीं है। लेकिन उसे यह भी पता था कि अब उसकी सास इस गहरे अवसाद के अंधेरे में अकेली नहीं हैं। अब उनके पास वह प्यार और साथ है जो उन्हें वापस जीवन की ओर खींच लाएगा। बाबूजी की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती थी, लेकिन अपनों के प्यार और साथ ने उस खालीपन को एक खूबसूरत याद में बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। घर में अब फिर से एक नई सुबह की उम्मीद जाग उठी थी, जहां सन्नाटे की जगह अब यादों की मीठी गूंज होने वाली थी।
आपकी राय:
दोस्तों, जब घर के बुजुर्ग किसी अपने को खोते हैं, तो उन्हें सबसे ज्यादा किस चीज की जरूरत होती है? क्या अंजलि ने जो तरीका अपनाया, वह दवाओं से ज्यादा कारगर था? क्या आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अपने बुजुर्गों को वह भावनात्मक सहारा दे पाते हैं जिसके वे हकदार हैं? अपनी राय हमें कमेंट करके जरूर बताएं, आपके विचारों का हमें इंतजार रहेगा।
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# “अंधेरे में एक रौशनी”