मेरी माँ अस्सी साल की हो गई हैं।
उनका हमारे नए वातावरण में, नए घर में कतई जी नहीं लगता। अगर उनका बस चले तो वे हमें छोड़कर वापस अपने पुराने मकान में चली जाएँ। लेकिन मजबूरी है। इस उम्र में वे अकेली कैसे रहेंगी? खाना, झाड़ू-पोंछा तो फिर भी कोई कामवाली कर भी दे, लेकिन खुद का ख्याल रखना, वह भी इस उम्र में, बड़ा मुश्किल होता है।
जब तक माँ में यह आत्मविश्वास था कि वे अपना सब कुछ अपने आप कर लेंगी, तब तक वे एक-दो बार ही हमारे पास आईं। लेकिन जब से उन्हें कुछ स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ हुईं, उनका मनोबल जवाब दे गया। उन्हें भी लगने लगा है कि अब उन्हें किसी सहारे की जरूरत है।
जब से माँ हमारे नए मकान में आई हैं, तब से मेरा पुराने मकान से जैसे मोह ही छूट गया है। ठीक वैसे ही जैसे हम जब तक किसी बस या ट्रेन में सफर करते हैं, हमारा अपनी सीट के साथ जुड़ाव रहता है और जैसे ही हमारा स्टेशन आ जाता है, हम उस सीट को छोड़कर अगले पड़ाव की तरफ चल पड़ते हैं।
माँ यदा-कदा मुझसे कहती रहतीं—
“उस घर को संभाल ले, बेटा। मकान पर इतने लंबे समय तक ताला लगा रहना बहुत बुरी बात होती है। एक बार जाकर जरूर खोलना चाहिए।”
मैं अक्सर कोई न कोई बहाना बना देता—
“आज समय नहीं है, माँ।”
“आज काम बहुत है।”
“फिर कभी चला जाऊँगा।”
पुराने मकान पर इतने समय तक न जाने का एक और बड़ा कारण था—हमारा पुराना मकान तंग और संकरी गलियों में था। वहाँ तक गाड़ी नहीं जा सकती थी। मन होते हुए भी कई बार वहाँ जाने का विचार छोड़ देता।
इसी बहानेबाजी में पाँच साल निकल गए।
लेकिन मेरे इस व्यवहार से माँ को मुझ पर गुस्सा आने लगा। वे जब भी मुझसे बात करतीं, उनके स्वर में शिकायत होती। और सच कहूँ तो उनकी शिकायत मुझे भीतर से चुभती।
एक दिन मैंने झुंझलाकर कह दिया—
“थोड़ा सब्र रखो, माँ! मैं जाऊँगा। आजकल में जरूर जाऊँगा पुराना घर संभालने।”
इस आश्वासन के बाद भी मैं घर पर ऑनलाइन मीटिंग्स में उलझा रहता।
यही कारण है कि दोस्तों से, परिवार से और कभी-कभी खुद से भी दूरी महसूस होने लगी। मैं भीतर ही भीतर बहुत खाली महसूस करने लगा।
इस खालीपन को भरने के लिए मैंने अनेक जतन किए।
सबसे पहले योग किया।
फिर मेडिटेशन।
फिर पार्क में टहलना।
लाइफ कोच की मदद ली।
लेकिन कुछ काम नहीं आया।
खालीपन कम होने की बजाय बढ़ता ही गया।
इसी खालीपन के इलाज के लिए एक दिन मुझे एक युक्ति सूझी—मैंने अपनी बाँसुरी उठा ली।
यह वही बाँसुरी थी, जो कॉलेज के दिनों में मेरे मित्र कपिल ने मुझे भेंट की थी।
बचपन से ही यह शौक कसमसाकर मेरे दिल के किसी कोने में दुबककर बैठा था। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह बाँसुरी अपने मधुर स्वरों से मेरे खालीपन को भर देगी।
मेरे लिए बाँसुरी-साधना बहुत ही मुश्किल, दुष्कर और लगभग असाध्य कार्य था। यूट्यूब की मदद से कुछ-कुछ सीखने का प्रयास किया।
मेरे खालीपन का कुआँ धीरे-धीरे स्वर-लहरियों से गुंजायमान होने लगा।
अब कुछ स्वर मेरे वश में भी आने लगे थे। पुराने गानों की कभी कोई धुन ठीक से बजा लेना भी बड़ी उपलब्धि लगता था।
आज इतवार का दिन था और बच्चों के पेपर चल रहे थे, इसलिए मैंने सोचा—क्यों न एक पंथ, दो काज किए जाएँ!
घर पर ज्यादा देर बाँसुरी की प्रैक्टिस करता तो बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान होता। दूसरी तरफ पुराने घर को संभालने का माँ से किया हुआ अपना वादा भी पूरा करना ही था।
मैंने अपनी बाँसुरी उठाई और लगभग पाँच साल के लंबे अंतराल के बाद अपने पुराने घर का दरवाजा खोला।
दरवाजा खुलते ही लगा जैसे वह घर भी मुझे पहचान गया हो।
दरवाजे की संवाद-सी करती हुई चरमराहट, दीवारों से झड़ती पुताई की परतें, खिड़कियों के टूटे शीशे, जगह-जगह लगे मकड़ी के जाले जैसे मुझसे कह रहे थे—
“हुजूर, आते-आते बहुत देर कर दी।”
यह घर भी मुझसे कुछ नाराज-नाराज-सा नजर आया।
मैंने दो मजदूरों की मदद से सारा घर साफ कराया।
हमारे इस घर का परिवेश बहुत साधारण था। कमोबेश, यह आज भी वैसा ही था, जैसा आज से तीस-चालीस वर्ष पहले रहा होगा।
आज भी आसपास वे लोग ही रहते हैं, जो दिन भर मेहनत करते हैं।
कोई खोमचे का ठेला लगाता है।
कोई सर्दियों में मूँगफली तो गर्मियों में कुल्फी बेचता है।
कोई शादी-ब्याह में डीजे बजाता है।
कोई हलवाई का काम करता है।
इन परिवारों को दिन-रात की जद्दोजहद के बाद बमुश्किल इतने रुपये मिल पाते हैं कि उनके घर में चूल्हा जल जाए। इन घरों में हर साँझ एक बल्ब का जलना पूरी जिंदगी रोशन होने के समान लगता था।
उस दिन पुराने घर में छोटे-छोटे काम करके, साफ-सफाई में हाथ बँटाकर ऐसा लगा जैसे मैं केवल घर को नहीं, अपने भीतर को भी साफ कर रहा हूँ।
खालीपन को भरने का मुझे यह जरिया सुकून भरा लगा।
धीरे-धीरे सूरज गहरी लालिमा के साथ क्षितिज के उस पार डूब रहा था।
पक्षी अपने-अपने घरों की तरफ आकाश मार्ग से लौटने लगे।
गली में अँधेरा वैसे ही पसरा नजर आया, जैसे मेरे भीतर खालीपन।
कुछ लोग अपना काम पूरा करके घर लौट रहे थे और कुछ लोग रात में किसी होटल, पार्टी आदि में वेटर या कैटरर का काम करने के लिए अपने घरों से निकल रहे थे।
मंदिरों की घंटियों की आवाज और मस्जिद से उठती अजान की ध्वनि आकाश में बादलों की तरह एक-दूसरे से टकरा रही थी।
मैं सोच रहा था—
न किसी प्रार्थना ने, न हमारी आजादी ने और न ही हमारी शासन-व्यवस्था ने मेरे पुराने घर के आसपास ऐसा कोई सामाजिक परिवर्तन किया, जिससे ये लोग अपने संघर्ष भरे जीवन से कुछ आजादी पा जाते।
रात का अँधेरा धीरे-धीरे छत की मुंडेर पर आकर बैठ गया और मैं भी।
मैंने बाँसुरी निकाली।
और बजाने लगा—
“वो दिल कहाँ से लाऊँ…”
चाँद की रोशनी में छत की मुंडेर से सामने गली का नजारा दिखाई दे रहा था। हमारे घर के सामने रहने वाले अंकल और आंटी, जो अपने-अपने जीवन के सत्तर वर्ष पार कर चुके थे, गली में चारपाई पर चुपचाप बैठे थे।
मुंडेर पर बैठकर मैं कुछ देर “वो दिल कहाँ से लाऊँ…” बजाने का प्रयास करता रहा।
कभी स्वर ठीक लग जाते तो कभी बिगड़ भी जाते।
रात और गहरा गई।
मैंने घर पर ताला लगाया।
तभी मेरी निगाह गली में बैठी आंटी पर गई, जो सब्जी बना रही थीं।
मैंने पूछ लिया—
“अंकल कहाँ गए, आंटी?”
उन्होंने कहा—
“बेटा, अभी उठकर भीतर गए हैं। आज तूने बड़ी अच्छी धुन बजाई, बेटा।”
ताला लगाकर मैं उनके पास चला गया।
मेरी माँ का इनके साथ बड़ा अच्छा लगाव था। माँ जब भी आंटी को मसाज के लिए बुलातीं, वे कभी मना नहीं करती थीं।
आंटी ने माँ का हालचाल पूछा और फिर बोलीं—
“उन्हें भी साथ ले आता, बेटा।”
मैंने कहा—
“आंटी, अब माँ बहुत वृद्ध हो गई हैं। चला-फिरा नहीं जाता, इसलिए मैं ही आ गया।”
फिर मैंने कहा—
“आंटी, मैं अंकल को भी नमस्ते करना चाहता हूँ।”
उन्होंने कहा—
“भीतर चले जाओ, बेटा।”
मैं घर के भीतर गया।
जिन अंकल को मैंने पाँच साल पहले लगभग स्वस्थ देखा था, वे आज बहुत दुबले-पतले हो गए थे। बिल्कुल सपाट सिर, सूखा हुआ चेहरा और शरीर चारपाई पर जैसे सिकुड़कर रह गया था।
वे शून्य में निहारते हुए चुपचाप लेटे थे।
मैंने धीरे से कहा—
“नमस्कार, अंकल।”
वे अचानक उठ बैठे।
बोले—
“बेटा, आज तो तुमने बहुत पुरानी धुन बजाई।”
मैं मुस्कराया।
वे बोले—
“मैंने यह फिल्म अपनी जवानी में देखी थी, बेटा। अब फिल्म का नाम तो याद नहीं… लेकिन इस गाने ने आज मुझे भीतर तक झकझोर दिया।”
इतना कहते-कहते वे मुझसे लिपट गए।
और सुबकियाँ भरकर रोने लगे।
मैं उन्हें देखता रहा।
मुझे लग रहा था जैसे बाँसुरी के किसी कोमल स्वर ने उनके भीतर दबे किसी ऐसे दर्द को छू दिया हो, जिसे उन्होंने बरसों से किसी के सामने आने नहीं दिया था।
वह दर्द उनकी आँखों से झरने की तरह बह रहा था।
मैंने अंकल को अपनी बाहों में थामे रखा।
फिर धीरे से पूछा—
“ऐसा क्या याद आ गया, अंकल?”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
आँखों में आँसू थे।
बोले—
“बेटा… इस गाने के बोल—‘वो दिल कहाँ से लाऊँ, तेरी याद जो भुला दे…’ शायद मेरे लिए ही लिखे गए थे।”
फिर कुछ क्षण चुप रहे।
“कैसे भुलाऊँ अपने पिछले दिन, बेटा…?”
इतने में पीछे से आंटी भी आ गईं।
उन्होंने कहा—
“हाँ बेटा, तेरे अंकल ठीक कहते हैं।”
फिर वे चारपाई के पास बैठ गईं।
कुछ देर तक अंकल को देखती रहीं।
फिर बोलीं—
“कितना भरा-पूरा घर था, ना हमारा!”
उनकी आवाज भर्रा गई।
“दो लड़के थे हमारे। दोनों हट्टे-कट्टे। दोनों ड्राइवरी करते थे। बड़े चाव से दोनों की शादियाँ की थीं।”
आंटी की आँखों में जैसे अचानक कोई पुराना दृश्य उतर आया।
“उन दिनों मेरे पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे। मैं तो आकाश में उड़ने के सपने देखा करती थी। तेरे अंकल भी।”
वे हल्का-सा मुस्कराईं।
“सोचते थे, अभी हमारे बच्चे ड्राइवरी कर रहे हैं। कल हो सकता है हमारे घर की अपनी टैक्सी हो जाए। हम भी अच्छा जीवन जी पाएँगे।”
फिर उनकी आवाज टूट गई।
“दोनों से बहुत उम्मीदें थीं, बेटा। मेरे दोनों लड़के बहुत लायक थे।”
इतना कहते ही आंटी भी सुबकने लगीं।
उन्होंने अपने पल्लू से आँखें पोंछीं और कुछ क्षण पुराने दिनों में खोई रहीं।
मेरे पैर जैसे जमीन में गड़ गए।
मैं हिल भी नहीं पाया।
आंटी बोलीं—
“आज फिर उनकी याद बरसों बाद ऐसे आ रही है, जैसे वो दोनों अभी चलकर घर आ जाएँगे।”
मैं उन्हें देखता रहा।
मुझे भी सब याद आ गया।
एक ही दिन आंटी के दोनों जवान बेटे और एक जवान बहू शादी के बाद हरिद्वार गए थे।
लेकिन लौटते समय दो ट्रेनों की टक्कर में वे कभी वापस घर नहीं लौटे।
उस दिन हमारी गली में बहुत बड़ा मातम पसरा था।
जिन घरों से कभी हँसी की आवाजें आती थीं, वहाँ अचानक ऐसा सन्नाटा छा गया था कि कई दिनों तक किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि वे लोग सचमुच अब कभी वापस नहीं आएँगे।
आंटी बोलती रहीं—
“बेटा, अब तक तो जैसे-तैसे हम दोनों ने अपना जीवन धीरे-धीरे घसीट लिया।”
उन्होंने अंकल की तरफ देखा।
“लेकिन अब आगे अँधेरा मुँह बाए खड़ा है।”
कुछ क्षण बाद बोलीं—
“इस उम्र में भी मुझे लोगों के घरों में मसाज करके घर चलाना पड़ता है।”
उनकी आवाज में शिकायत नहीं थी।
बस थकान थी।
बहुत गहरी थकान।
“अब यूँ लगता है कि जिस दिन मैं नहीं रही, तो तेरे अंकल को कौन संभालेगा?”
उन्होंने अंकल का हाथ पकड़ लिया।
“और अगर तेरे अंकल मुझसे पहले चले गए… तो फिर मैं किसके सहारे रहूँगी?”
वे कुछ पल चुप रहीं।
फिर बहुत धीमे से बोलीं—
“और कितने दिन…?”
कमरे में अचानक ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे रात ने भी उनकी बात सुन ली हो।
आंटी ने मेरी तरफ देखा।
उनकी आँखों में आँसू थे।
लेकिन उन आँसुओं से भी ज्यादा उनमें एक सवाल था।
एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब शायद मेरे पास तो क्या, किसी के पास नहीं था।
वे बोलीं—
“बेटा… मैं भी यही सोचती हूँ कि…”
उनकी आवाज काँप गई।
“वो दिल कहाँ से लाऊँ… कि दुनिया छोड़कर चली जाऊँ, समय आने से पहले।”
मैं उन्हें देखता रहा।
वे बोलीं—
“लेकिन जाने से पहले भगवान से एक बात जरूर पूछना चाहती हूँ…”
कुछ क्षण रुककर उन्होंने ऊपर देखा।
“क्या बिगाड़ा था हमने भगवान का?”
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“पहले इतनी उम्मीदें थीं…”
आवाज और धीमी हो गई।
“और अब इतना साहस भी नहीं दे रहा कि छोड़ जाए यह शरीर इस धरती पर…”
मैं कुछ नहीं कह पाया।
क्या कहता?
मैं सोचता रह गया—कहाँ मेरा खालीपन और कहाँ अंकल-आंटी का अँधेरा, जिसे न सूरज की रोशनी और न ही चाँद-सितारों की रोशनी रोशन कर सकती थी।
गहराता हुआ वह अँधेरा शायद यही पंक्तियाँ दोहरा रहा था—
“वो दिल कहाँ से लाऊँ…”
अंकल-आंटी शून्य में निहार रहे थे।
मेरी हथेली पर टप-टप कर बूँदें झर रही थीं।
-रमन शांडिल्य बुध्दूराम
20.09.2026
भिवानी