जिस रिश्ते में सम्मान और भरोसा न हो… – निधि गुप्ता

शादी के शुरुआती दिन किसी खूबसूरत ख्वाब की तरह होते हैं, लेकिन रोहन और निध‍ि के लिए यह ख्वाब बहुत जल्दी एक डरावनी हकीकत में बदलने लगा था। दोनों ने एक-दूसरे को पसंद करके शादी की थी। निध‍ि एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर मैनेजर थी—आत्मविश्वासी, बेबाक और अपने उसूलों पर जीने वाली लड़की। रोहन एक … Read more

मैं बेटे की खुशियां उसे वापस लौटाऊँगी – नेहा पटेल  

कमरे में पसरा घना सन्नाटा और उस सन्नाटे को चीरती हुई घड़ी की टिक-टिक। सुलोचना जी ने कांपते हाथों से खाने की थाली मेज पर रखी। पिछले एक महीने से उनके घर का यही दृश्य था। उनका इकलौता बेटा रोहन, जो कभी पूरे घर में अपनी हंसी और चुलबुलेपन से रौनक ला देता था, आज … Read more

इस पापी माँ को माफ कर दे – सीमा श्रीवास्तव

सुमित्रा जी के जीवन का एकमात्र सहारा उनका इकलौता बेटा अंशुल था। पति के कम उम्र में ही गुजर जाने के बाद, सुमित्रा जी ने अपना पूरा जीवन अंशुल को एक अच्छा इंसान और एक सफल व्यक्ति बनाने में लगा दिया था। अंशुल भी अपनी माँ से बहुत प्यार करता था और उनकी हर छोटी-बड़ी … Read more

कुलकलंकिनी

राधिका के मुंह से ‘हिस्से’ का नाम सुनते ही घर का माहौल एकदम से बदल गया। जो पिता कुछ देर पहले बेटी के आंसुओं पर पिघल रहा था, उसकी आंखें अचानक कठोर हो गईं। भाई विकास, जो बचपन में राधिका के लिए किसी से भी लड़ जाता था, आज उसी राधिका पर गरजने लगा। उसने … Read more

रिश्तो की कीमत – मधु वशिष्ठ

गांव में जाने के बाद ही पता चला कि मां काफी समय से बीमार है। खटिया पर लेटी हुई भाभी के कहने पर भी मां विश्वास नहीं कर पा रही थी कि सीमा और मैं वास्तव में उनसे मिलने ही आए हैं। काफी कमजोर हो गई थी मां। अब उसका पूरा चेहरा झुर्रियों से भरा … Read more

“आधुनिक दुनिया में संस्कार” – तृप्ति देव

नेहा एक मध्यमवर्गीय परिवार की समझदार और संस्कारी लड़की थी। उसके घर में बचपन से ही अच्छे संस्कारों का वातावरण था। दादी हमेशा उसे समझाती थीं—  “बेटी, जिंदगी में कितनी भी आधुनिक बन जाना, लेकिन अपनी मर्यादा और आत्मसम्मान कभी मत खोना।” और अपने संस्कार बहुत मूल्यवान होते हैं जहां अच्छे संस्कार होते वहां पर … Read more

“ममता की कोई कीमत नहीं – डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

हम लोग दूसरे जगह शिफ्ट हो रहे थे l सारा सामान पैक हो चुका था….कुछ हो रहा था….गाड़ी दरवाजे पर लगी थी ताकि हमलोगों को जाने में देरी ना हो जाए l.   मैं बार -बार ताई को आवाज दे रहीं थी कि वो जल्दी से बिट्टू को दूध पीला दे…मुझसे वह ढंग से नहीं पी … Read more

जीना सीखे – कंचन श्रीवास्तव आरज़ू

आज ब्रेकरी की दुकान पर अचानक की मुलाकात ने रोमा का भ्रम दूर कर दिया ।रेखा की बातें सुनकर लगा कि इंसान की हिम्मत,साहस और धैर्य उसके जीवन को बदल सकता है ।उसका सोचना गलत था कि हम सफ़र के गुजरने के बाद उम्र बोझ लगने लगती है सब कुछ होने के बावजूद भी जिंदगी … Read more

पड़ाव – डॉ बीना कुण्डलिया

आँगन के पीछे बगीचे में बिछें फोल्डिंग बैड पर पड़े पड़े हरीश बाबू लम्बी लम्बी सांसें ले रहे। अब तो जोरों से खांसने भर की भी ताकत नहीं बची थी उनके शरीर में, शरीर सूखकर मात्र लकड़ी का ढांचा सा रह गया था । कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं जो चीखते चिल्लाते नहीं बस … Read more

अमावस  का सच – एम. पी. सिंह

बाबूलाल कें खेत की मुंडेर पर एक बरगद का पेड़ था ओर उसकें पास एक झोपडी मैं एक ब्रम्चारी साघु बाबा रहता था. आसपास कें सब गाँव मैं मशहूर था कि पेड़ पर भूत रहता हैं. बाबा सुबह शाम पेड़ कें नीचे पूजा पाठ करता जिससे गावं कें लोग भूत कें प्रकोप से बचें रहते. … Read more

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