नयी सुबह की मीठी धूप और एक अनकही रीत

 “अरे मीरा बेटा, तुम इतनी जल्दी क्यों उठ गईं? अभी तो छह भी नहीं बजे हैं। आज तो रविवार है, तुम्हें आराम करना चाहिए था,” निर्मला देवी ने बहुत ही स्नेह से कहा। मीरा हड़बड़ा गई। उसे लगा कि शायद उसने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी है या फिर उसकी सास उसे ताना मार … Read more

खोखली दीवारें

 अविनाश और सौरभ, जो लाखों रुपये महीने कमाते थे, जो बड़े-बड़े मैनेजमेंट के गुरु थे, आज एक अनपढ़ कामवाली के सामने बौने नज़र आ रहे थे। बाहर बरामदे में बैठे दीनानाथ जी ने कमला ताई की एक-एक बात सुनी थी। उनके कांपते होठों पर एक फीकी सी हंसी तैर गई। उन्होंने एक गहरी सांस ली … Read more

रिश्तों की उलझी डोर और एक मीठी पहल

 “देख बेटा, विशाखा अभी नादान है। नई-नई इस घर में आई है। तू उसकी जेठानी है, बड़ी बहन जैसी है। अगर वो कोई काम अच्छा करे, तो उसकी तारीफ कर दिया कर। मीठे बोल बोलने में हमारे पैसे तो खर्च नहीं होते, लेकिन सामने वाले का दिल जरूर जीत लिया जाता है। अगर तू उसकी … Read more

स्नेह के बदलते सांचे

कौशल्या देवी आज सुबह से ही अजीब सी खीझ से भरी हुई थीं। रसोई के बर्तन ऐसे खटक रहे थे जैसे वे भी उनकी झुंझलाहट में सुर मिला रहे हों। उनके कदमों की आहट और बड़बड़ाहट पूरे घर में गूंज रही थी। कभी वह दाल के डिब्बे को जोर से रखतीं तो कभी फ्रिज का … Read more

माटी का कर्ज और स्वाभिमान

“क्या? तुम पागल हो गए हो समीर?” शिखा लगभग चीख पड़ी। “तुम उन लोगों के लिए अपना घर छोड़ोगे?” “हाँ शिखा,” समीर की आवाज में अब एक अजीब सा दर्द था। “क्योंकि बात मेरे वजूद की है, मेरी जड़ों की है। मैं आज जो भी हूँ, जिस घर में तुम ये किटी पार्टियां करती हो, … Read more

दिवाली का वो अनोखा उजियारा

सुधीर जी ने पास बैठी उस बीस साल की लड़की के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “ये मेरी बेटी श्रेया है। पिछले चार सालों से इसकी आंखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी थी। दुनिया इसके लिए सिर्फ एक अंधेरा कमरा बन गई थी। लेकिन… आठ महीने पहले, इसे किसी फरिश्ते की आंखें मिलीं। … Read more

इज्जत

लाल सुर्ख जोड़े में सजी राधिका आईने के सामने बैठी थी। आज उसका रूप निखर कर आ रहा था, लेकिन यह चमक सिर्फ महंगे लहंगे या पुश्तैनी गहनों की नहीं थी। यह चमक उस सुकून और विजय की थी जिसे पाने के लिए उसने एक लंबा, मानसिक और भावनात्मक सफर तय किया था। बाहर आंगन … Read more

मुझे माफ़ कर दे छोटे…

सुरेखा भाभी ने आगे कहा, “वही तो! अगर इतना ही प्यार है अपनी माँ से, तो ले क्यों नहीं जाता अपने साथ? वहां जाकर कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा! लेकिन नहीं, वहां तो साहब को अपनी आज़ादी चाहिए। यहाँ हम दिन-रात खटते रहें और नाम उसका होता रहे कि ‘छोटा बेटा बहुत होनहार है’। सच … Read more

 परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं बनता

रघुनाथ जी रो पड़े। उन्होंने शेखर को गले से लगा लिया। उनका बरसों का जमा हुआ दुख, वह धोखा, वह पीड़ा, सब शेखर के कंधों पर आँसुओं के रूप में बह निकली। “तुम सच कह रहे हो बेटा… मैंने जिसे अपना समझा, वह पराया निकला… और जिसे मैंने एक दिन यूँ ही इंसानियत के नाते … Read more

शादी के बाद रोमांस

रोहन के लिए मीरा  का उस घर में होना एक अजीब सा मीठा अहसास था। वह रोज़ सुबह उसे चाय बनाते देखता, आंगन में तुलसी को जल चढ़ाते देखता और शाम को अपनी किताबों में उलझे हुए देखता। मीरा  की हंसी से जैसे पूरा घर गूंज उठता था। रोहन दिल ही दिल में मीरा  को … Read more

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