कच्चे धागे और अहंकार की दीवार

रिया के इन कड़वे और जहरीले शब्दों ने डाइनिंग टेबल पर एक गहरा सन्नाटा बिखेर दिया। हर कोई सन्न रह गया। मीरा, जिसने हमेशा अमन को अपने छोटे भाई या यूं कहें कि अपने बेटे की तरह माना था, उसके लिए यह आरोप किसी खंजर के घोंपे जाने से कम नहीं था। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली।

सन्न तो अमन भी रह गया था, उसे अपनी पत्नी से इतनी घटिया सोच की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। गुस्से में आकर अमन ने रिया को सबके सामने खूब खरी-खोटी सुनाई और उसे तमीज में रहने की हिदायत दी। रिया अपनी गलती मानने की बजाय रूठ कर पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।

शहर के एक शांत मोहल्ले में बसे ‘शांति-निवास’ में आज ढोल-नगाड़ों की गूंज थी। रिया ने लाल जोड़े में, अमन की दुल्हन बनकर इस घर में अपना पहला कदम रखा था। घर की बड़ी बहू और रिया की जेठानी, मीरा ने आरती की थाल सजाकर, अपनी आँखों में ढेर सारा स्नेह लिए उसका स्वागत बिल्कुल अपनी छोटी बहन की तरह किया।

घर में सासू माँ का देहांत कई साल पहले हो चुका था। परिवार में ससुर जी (दीनानाथ जी), जेठ (समर), जेठानी (मीरा), उनके दो छोटे बच्चे और अब ये नवविवाहित जोड़ा, अमन और रिया थे। मीरा पहले एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका थी, लेकिन सासू माँ के गुजर जाने के बाद घर की जिम्मेदारियां बढ़ गईं, इसलिए उसने बाहर की नौकरी छोड़कर घर पर ही बच्चों को ऑनलाइन ट्यूशन और कोचिंग देनी शुरू कर दी थी। इस तरह वह घर को भी बड़ी कुशलता से संभाल रही थी और आर्थिक रूप से भी पूरी तरह आत्मनिर्भर थी।

शुरुआती कुछ दिन तो बहुत अच्छे बीते, लेकिन जैसे-जैसे दिन हफ्तों में बदलने लगे, घर की दिनचर्या वापस अपनी पटरी पर आने लगी। घर में किसी भी चीज़ की जरूरत होती, तो हर किसी की ज़बान पर बस एक ही नाम होता— “मीरा”। दीनानाथ जी को सुबह की चाय चाहिए हो, समर को दफ्तर जाने के लिए अपनी फाइल न मिल रही हो,

या अमन को अपनी कोई मनपसंद शर्ट प्रेस करवानी हो, पूरे घर में “मीरा भाभी, यह कहाँ है?”, “मीरा, वो दे देना” की ही आवाज़ें गूंजती रहती थीं। रिया, जो कि एक आधुनिक और महत्वाकांक्षी लड़की थी, उसे यह सब अजीब लगने लगा। वह खुद को इस घर में एक मेहमान या फिर एक अनदेखा हिस्सा महसूस करने लगी।

रिया को लगता था कि नई नवेली दुल्हन होने के नाते घर का केंद्र बिंदु उसे होना चाहिए था, लेकिन यहाँ तो हर चीज़ की धुरी उसकी जेठानी मीरा ही थी। धीरे-धीरे यह अनदेखापन रिया के मन में जलन का बीज बोने लगा। जब भी रिया रसोई में कोई नई डिश बनाने की कोशिश करती, तो ससुर जी अक्सर उसमें कोई न कोई कमी निकाल देते। वे बहुत ही सहज भाव से कहते, “बेटा रिया, इसमें थोड़ा नमक कम है, कल जब खाना बनाओ तो एक बार मीरा से पूछ लेना, उसे सबके स्वाद का बिल्कुल सही अंदाज़ा है।” दीनानाथ जी की यह बात रिया के दिल में तीर की तरह चुभ जाती। उसे अपनी जेठानी मीरा अब परिवार की मार्गदर्शक या बड़ी बहन कम, और अपनी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी ज्यादा लगने लगी थी। उसे लगने लगा कि मीरा जानबूझकर पूरे घर पर अपना हुक्म चलाती है और उसे नीचा दिखाने की कोशिश करती है।

हालाँकि, मीरा के मन में ऐसा कोई भी विचार नहीं था। वह तो रिया को घर की सबसे छोटी और नासमझ सदस्य मानकर उसे हर छोटी-बड़ी बात सिखाने और समझाने का प्रयास करती थी। वह चाहती थी कि रिया जल्द ही इस घर के तौर-तरीकों को अपना ले और सबकी चहेती बन जाए। लेकिन रिया के मन का मैल उसे मीरा की हर बात में साजिश नजर आने पर मजबूर कर देता था। चिढ़ के मारे रिया ने घर के कामों से खुद को पूरी तरह काटना शुरू कर दिया। जब मीरा रसोई में पसीने से लथपथ होकर पूरे घर का खाना बना रही होती, रिया अपने कमरे में फोन पर लगी रहती। यहाँ तक कि उसने मीरा के दोनों बच्चों का अपने कमरे में आना भी बंद करवा दिया। वह उन्हें डांट कर भगा देती। जैसे ही अमन दफ्तर के लिए निकलता, रिया अपने कमरे की कुंडी अंदर से लगा लेती और घंटों बाहर ही नहीं आती। घर की साफ-सफाई से लेकर रसोई तक का सारा बोझ मीरा के कंधों पर आ गया था। मीरा बहुत समझदार महिला थी, वह रिया के इस बदलते और रूखे व्यवहार को बहुत अच्छी तरह देख और समझ रही थी। लेकिन वह नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से घर में कोई क्लेश हो या भाइयों के बीच कोई दरार आए, इसलिए परिवार को एक सूत्र में पिरोए रखने के लिए वह सब कुछ चुपचाप बर्दाश्त करती रही।

पर इंसान के धैर्य का भी एक बांध होता है। और एक रविवार की दोपहर वह बांध टूट गया। उस दिन छुट्टी होने के कारण घर के सभी सदस्य डाइनिंग टेबल पर एक साथ बैठकर खाना खा रहे थे। मीरा ने अमन की पसंद के छोले भटूरे और गाजर का हलवा बनाया था। खाना इतना स्वादिष्ट था कि सब उँगलियाँ चाटते रह गए। अमन से रहा नहीं गया और उसने चहकते हुए कहा, “वाह भाभी! आपके हाथों में तो सच में जादू है। आपके हाथ का बना खाना खाकर तो दिन ही बन जाता है, ऐसा स्वाद दुनिया के किसी फाइव-स्टार होटल में भी नहीं मिल सकता।”

अमन के मुँह से मीरा की यह तारीफ रिया के लिए किसी ज्वालामुखी के फटने जैसी थी। पिछले कई दिनों से उसके अंदर पल रही जलन और गुस्सा अचानक शब्दों के रूप में फूट पड़ा। रिया ने अपनी प्लेट को जोर से खिसकाते हुए गुस्से से कहा, “जब आपकी भाभी आपको इतनी ही पसंद थीं और उन्हीं के हाथों का खाना आपको इतना अच्छा लगता है, तो फिर आपने मुझसे शादी ही क्यों की? कुंवारे ही रह जाते, और जीवन भर अपनी भाभी के पल्लू से बंधे रहते!”

रिया के इन कड़वे और जहरीले शब्दों ने डाइनिंग टेबल पर एक गहरा सन्नाटा बिखेर दिया। हर कोई सन्न रह गया। मीरा, जिसने हमेशा अमन को अपने छोटे भाई या यूं कहें कि अपने बेटे की तरह माना था, उसके लिए यह आरोप किसी खंजर के घोंपे जाने से कम नहीं था। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। सन्न तो अमन भी रह गया था, उसे अपनी पत्नी से इतनी घटिया सोच की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। गुस्से में आकर अमन ने रिया को सबके सामने खूब खरी-खोटी सुनाई और उसे तमीज में रहने की हिदायत दी। रिया अपनी गलती मानने की बजाय रूठ कर पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।

इस एक घटना ने घर के माहौल को पूरी तरह बदल कर रख दिया। मीरा का दिल इस कदर टूट चुका था कि उसने अब कुछ कड़े फैसले लेने का मन बना लिया। अगले दिन से मीरा ने अपने देवर और देवरानी से एक स्पष्ट दूरी बना ली। उसने घर की शांति के लिए झगड़ा तो नहीं किया, लेकिन अपना विरोध जताने का एक शांत तरीका जरूर निकाल लिया। उसने साफ कर दिया कि वह अब केवल ससुर जी, अपने पति समर और बच्चों का ही काम करेगी। रसोई भी अब बँट गई थी। मीरा ने अमन और रिया का खाना बनाना बंद कर दिया। घर के सभी सदस्यों— ससुर जी और यहाँ तक कि समर ने भी मीरा के इस फैसले को बिल्कुल सही ठहराया, क्योंकि रिया को उसकी गलती का अहसास कराना बहुत जरूरी हो गया था।

अब रिया के लिए हर दिन एक नई पहाड़ जैसी चुनौती बन गया। जो रिया सुबह आराम से आठ बजे उठती थी, उसे अब अमन के दफ्तर जाने से पहले, सुबह छह बजे उठकर नाश्ता और लंच बनाना पड़ता था। रसोई का काम उसे कभी ढंग से आता नहीं था। कभी सब्जी में नमक तेज हो जाता, तो कभी रोटियां जल जातीं। अमन, जो पहले मीरा के हाथ का लजीज खाना खाकर दफ्तर जाता था, अब रिया के हाथ का बेस्वाद खाना खाकर या फिर बिना खाए ही बाहर से कुछ खा लेने की बात कहकर निकल जाता। इस सब की वजह से रिया और अमन के बीच दूरियां और भी बढ़ने लगीं। रात को अमन थका-हारा आता और चुपचाप सो जाता। रिया को अब समझ में आ रहा था कि एक गृहणी का काम कितना मुश्किल होता है, जिसे मीरा इतने सालों से बिना किसी शिकायत के हंसते-हंसते कर रही थी।

जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, रिया को दिन में तारे दिखाई देने लगे थे। शारीरिक थकान से ज्यादा उसे मानसिक थकान घेर रही थी। वह देख रही थी कि मीरा अब भी अपने हिस्से का काम उतनी ही कुशलता से कर रही है, उसके बच्चे खुश हैं, समर और ससुर जी उसका पहले से भी ज्यादा सम्मान करते हैं। मीरा के पास ट्यूशन के बच्चों की भी कमी नहीं थी, वह आत्मनिर्भर थी और घर में उसकी अहमियत उसके काम की वजह से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और सबके प्रति उसके प्रेम की वजह से थी।

रिया को अब यह गहराई से समझ में आने लगा था कि किसी भी घर में और घर वालों के दिलों में अपनी जगह जबरदस्ती, जलन या लड़-झगड़ कर कभी नहीं बनाई जा सकती। सम्मान और प्यार हमेशा प्यार देकर और सबका ख्याल रखकर ही कमाया जाता है। मीरा ने कभी उसका हक नहीं छीना था, बल्कि वह तो इस परिवार की वो मजबूत नींव थी जिस पर पूरा घर टिका था। रिया को अपने कहे एक-एक शब्द पर पछतावा होने लगा था। उसे अहसास हो गया था कि अहंकार की दीवार खड़ी करने से सिर्फ अपना ही नुकसान होता है, जबकि रिश्तों की डोर को प्यार और समझदारी से ही मजबूत किया जा सकता है।

क्या आप भी सोचते हैं कि…

अक्सर नए रिश्तों में हम अपना वजूद साबित करने की जल्दबाजी में उन लोगों को ही अपना दुश्मन मान बैठते हैं जो असल में हमारे सबसे बड़े शुभचिंतक होते हैं? अपने अहंकार को पीछे छोड़कर एक-दूसरे को समझने की कोशिश करना ही परिवार को जोड़े रखने की असली चाबी है। इस विषय पर आपके क्या विचार हैं, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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#कच्चे धागे और अहंकार की दीवार

 लेखिका : अंजना कपूर

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