खोखली दीवारें

 अविनाश और सौरभ, जो लाखों रुपये महीने कमाते थे, जो बड़े-बड़े मैनेजमेंट के गुरु थे, आज एक अनपढ़ कामवाली के सामने बौने नज़र आ रहे थे।

बाहर बरामदे में बैठे दीनानाथ जी ने कमला ताई की एक-एक बात सुनी थी। उनके कांपते होठों पर एक फीकी सी हंसी तैर गई। उन्होंने एक गहरी सांस ली और बुदबुदाए, “ये बड़े लोग… जिनके घर जितने बड़े होते हैं, उनके दिल उतने ही छोटे होते जाते हैं। पैसा इंसान को सुविधाएं दे सकता है, लेकिन इंसानियत नहीं।”

दीनानाथ जी अपनी कुर्सी से उठे। उनकी रीढ़ की हड्डी जो अब तक बुढ़ापे और दुख से झुकी हुई थी, अचानक एकदम सीधी हो गई। वो अपनी लाठी टेकते हुए अंदर आए। उनके चेहरे पर अब कोई दुख या मोह नहीं था।

शहर के उस आलीशान और शांत इलाके में दीनानाथ जी का पुराना घर आज अजीब से शोर से भरा हुआ था। यह शोर किसी खुशी या उत्सव का नहीं था, बल्कि स्वार्थ और रिश्तों के बंटवारे का था। अभी मुश्किल से बीस दिन ही बीते थे जब दीनानाथ जी की धर्मपत्नी सुशीला इस दुनिया को अलविदा कह गई थीं।

पैंसठ साल की उम्र में अपनी जीवनसंगिनी को खो देने का जो दुख था, वह तो दीनानाथ जी के सीने में एक पत्थर की तरह बैठ गया था, लेकिन उस दुख से भी बड़ा एक और दर्द उनके सामने मुँह बाए खड़ा था, जो उनके खुद के खून ने उन्हें दिया था।

दीनानाथ जी के दो बेटे थे—अविनाश और सौरभ। दोनों ही पढ़ाई-लिखाई में तेज़ थे और दीनानाथ जी ने अपनी पाई-पाई जोड़कर, अपना पुश्तैनी खेत बेचकर दोनों को देश के सबसे बड़े इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाया था। आज अविनाश बेंगलुरु में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और सौरभ दिल्ली में एक नामी आईटी फर्म का डायरेक्टर।

दोनों की शादियां भी बड़े और संपन्न परिवारों में हुई थीं। उनकी पत्नियां, तान्या और विशाखा, दोनों ही आधुनिक ख्यालों वाली और अपने-अपने करियर में व्यस्त महिलाएं थीं। जब तक सुशीला जी ज़िंदा थीं, घर में एक रौनक थी। बेटे-बहुएं साल में एकाध बार आते, दो-चार दिन मेहमानों की तरह रुकते और चले जाते। सुशीला जी सब संभाल लेती थीं, लेकिन उनके जाने के बाद अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह था कि दीनानाथ जी का क्या होगा?

ड्राइंग रूम में बहस छिड़ी हुई थी और दीनानाथ जी बाहर बरामदे में अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर चुपचाप आँखें मूंदे बैठे थे। उनके कानों में अंदर चल रही हर आवाज़ साफ-साफ पड़ रही थी।

अविनाश की आवाज़ थोड़ी तेज़ थी, “देखो सौरभ, तुम जानते हो मेरा काम कैसा है। मुझे महीने में पंद्रह दिन तो देश से बाहर रहना पड़ता है। तान्या भी अपनी पी.आर. एजेंसी चलाती है। सुबह आठ बजे हम दोनों घर से निकलते हैं और रात को नौ बजे से पहले किसी की वापसी नहीं होती। घर में सिर्फ एक कामवाली होती है। ऐसे में बाबूजी को हम अपने साथ कैसे रख सकते हैं? उन्हें समय पर दवा चाहिए, खाना चाहिए। अगर उन्हें कुछ हो गया, तो हम तो पीछे से देखने वाले भी नहीं हैं।”

इस पर सौरभ ने तुरंत पल्ला झाड़ते हुए कहा, “तो भैया, मैं कौन सा खाली बैठा हूँ? हमारा तो दिल्ली वाला फ्लैट वैसे भी सिर्फ थ्री बीएचके (3 BHK) है। एक कमरा हमारा है, दूसरा बच्चों का है, और तीसरे को मैंने अपना होम-ऑफिस बना रखा है क्योंकि मुझे अक्सर रात में भी विदेशी क्लाइंट्स के साथ मीटिंग करनी होती है। बाबूजी को कहाँ ठहराएंगे? और विशाखा तो वैसे ही अपनी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के चक्कर में चौबीसों घंटे दौड़ती रहती है। वह तो साफ कह चुकी है कि उससे किसी बूढ़े इंसान की सेवा नहीं हो पाएगी।”

तभी अंदर से तान्या (बड़ी बहू) की तीखी आवाज़ आई, “अरे, सेवा करने की तो बात ही छोड़िए। बाबूजी को अस्थमा की शिकायत है। रात भर खांसते हैं। बच्चों की नींद खराब होगी, उनकी पढ़ाई डिस्टर्ब होगी। और फिर बुढ़ापे की सौ बीमारियां होती हैं। कभी बीपी हाई हो गया, कभी शुगर घट गई। हम ऑफिस का काम देखेंगे या इनको अस्पताल लेकर दौड़ेंगे? प्रैक्टिकल होकर सोचिए आप दोनों। इमोशनल होने से ज़िंदगी नहीं चलती।”

छोटी बहू विशाखा ने भी सुर में सुर मिलाया, “बिल्कुल सही कह रही हैं दीदी। मेरा तो मानना है कि बाबूजी को किसी अच्छे से ‘ओल्ड एज होम’ (वृद्धाश्रम) में शिफ्ट कर देते हैं। आजकल बड़े अच्छे-अच्छे वीआईपी वृद्धाश्रम खुल गए हैं। हम दोनों भाई मिलकर हर महीने पैसे भेज दिया करेंगे। वहाँ उनके हमउम्र लोग भी होंगे, उनका मन भी लगा रहेगा और मेडिकल फैसिलिटी भी चौबीस घंटे मिलेगी। इसमें बुराई ही क्या है?”

बरामदे में बैठे दीनानाथ जी की बंद आँखों से एक आँसू छलक कर उनकी झुर्रियों वाली गालों पर आ गिरा। उन्हें वो दिन याद आ गए जब अविनाश को पीलिया हुआ था और उन्होंने पंद्रह दिन तक रात-रात भर जागकर उसकी पट्टियां बदली थीं। उन्हें वो दिन याद आ गया जब सौरभ के कॉलेज की फीस भरने के लिए उन्होंने अपना स्कूटर बेच दिया था और सालों तक पैदल ही ऑफिस गए थे। क्या आज वो इतने बड़े बोझ बन गए थे कि उनके अपने घर में उनके लिए एक कोना तक नहीं बचा था?

अंदर बहस अभी भी जारी थी कि तभी घर की साफ-सफाई करने वाली महिला, कमला ताई, वहाँ आ गई। कमला ताई पिछले दस सालों से इस घर में काम कर रही थी। सुशीला जी के जाने के बाद से वो दीनानाथ जी का थोड़ा बहुत ख्याल भी रख लेती थी। कमला ताई ने एक कोने से झाड़ू लगाना शुरू किया। अंदर का माहौल देखकर वो समझ तो गई थी कि क्या चर्चा चल रही है, लेकिन वो गरीब महिला कुछ बोलने की हैसियत नहीं रखती थी।

तभी तान्या की नज़र कमला ताई पर पड़ी। अपनी खीज मिटाने के लिए उसने कमला को टोकते हुए कहा, “अरे कमला, ज़रा ठीक से सफाई किया कर। देख सोफे के नीचे कितनी धूल है। वैसे भी अब हम यह मकान बेचने वाले हैं। बाबूजी वृद्धाश्रम जाएंगे और हम अपने-अपने शहर। तू अपना कोई दूसरा काम ढूंढ लेना अगले महीने से।”

कमला ताई ने अपने माथे का पसीना पोंछा और शांति से बोली, “जी बहू जी, आप फिक्र ना करें, मैं सफाई अच्छे से कर दूंगी। और मेरे काम की चिंता आप मत कीजिए, भगवान ने दो हाथ दिए हैं, कहीं ना कहीं मेहनत-मज़दूरी करके अपने परिवार का पेट पाल ही लूंगी।”

विशाखा जो सोफे पर पैर रखकर मोबाइल में कुछ देख रही थी, उसने अचानक कमला ताई की तरफ देखकर पूछा, “वैसे कमला, तेरे घर में है कौन-कौन? तेरा पति तो शायद कुछ साल पहले ही गुज़र गया था ना? अब तो तू अकेली ही होगी, क्या ज़रूरत है इतनी भागदौड़ करने की?”

कमला ताई ने झाड़ू किनारे रखा और हाथ जोड़कर बोली, “नहीं बहू जी, मैं अकेली कहाँ हूँ। मेरे परिवार में तो छह लोग हैं।”

यह सुनकर दोनों बहुएं और बेटे चौंक गए। सौरभ ने पूछा, “छह लोग? तुम्हारे तो खुद के सिर्फ दो ही बच्चे थे ना? फिर बाकी के लोग कौन हैं?”

कमला ताई के चेहरे पर एक अजीब सा संतोष था। उसने गहरी सांस ली और बताना शुरू किया, “साहब, मेरे दो बच्चे तो हैं ही, एक बेटा और एक बेटी। लेकिन तीन साल पहले मेरे बड़े जेठ और जेठानी को हैजा हो गया था। इलाज के पैसे नहीं थे, दोनों चल बसे। उनके पीछे उनके तीन छोटे-छोटे बच्चे रह गए थे, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं था। तो मैं उन तीनों को अपने घर ले आई। अब वो पांचों बच्चे मेरे पास ही रहते हैं।”

कमला की बात सुनकर तान्या ने आँखें सिकोड़ते हुए पूछा, “तू पागल है क्या कमला? दूसरों के बच्चों का बोझ अपने सिर पर क्यों ले लिया? तू दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करके मुश्किल से सात-आठ हज़ार रुपये महीना कमाती होगी। खुद के बच्चे तो पल नहीं रहे होंगे, ऊपर से तीन और ले आई? उन्हें किसी अनाथालय में क्यों नहीं डाल दिया? और छठा इंसान कौन है तेरे घर में?”

कमला ताई मुस्कुराई। उस मुस्कान में इतनी गहराई थी जिसे वो पढ़ी-लिखी और अमीर बहुएं समझ नहीं सकती थीं। उसने कहा, “छठे मेरे ससुर जी हैं बहू जी। वो पिछले पांच साल से लकवे के शिकार हैं, बिस्तर से उठ नहीं सकते। रही बात बच्चों को अनाथालय भेजने की या ससुर जी को वृद्धाश्रम भेजने की… तो बहू जी, ये हमसे नहीं हो पाएगा। जब जेठ-जेठानी ज़िंदा थे, तो उन्होंने हर सुख-दुख में हमारा साथ दिया था। और ससुर जी ने तो अपना पेट काटकर हम सबको बड़ा किया है। आज जब वो लाचार हैं, तो मैं उन्हें कैसे छोड़ दूं? और बच्चे बोझ नहीं होते बहू जी, बच्चे तो भगवान का रूप होते हैं।”

विशाखा ने व्यंग्य कसते हुए कहा, “बड़ी महान बन रही है तू। खिलाती क्या है उन्हें? और ससुर के इलाज का खर्च कैसे उठाती है? खुद तो सूखी रोटी खाती होगी।”

कमला ताई की आवाज़ में अब एक गज़ब का आत्मविश्वास था, “बहू जी, गरीब ज़रूर हूँ, लेकिन दिल से कंगाल नहीं हूँ। मैं चार घरों में काम करती हूँ, मेरा बड़ा बेटा शाम को ढाबे पर बर्तन धोता है। हम सब मिलकर रुखी-सूखी खा लेते हैं, लेकिन एक साथ बैठकर खाते हैं। जब मैं थक कर घर जाती हूँ, तो वो अनाथ बच्चे दौड़कर मेरे गले लग जाते हैं

और ससुर जी अपने कांपते हाथों से मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं… वो जो सुकून है ना बहू जी, वो दुनिया की किसी दौलत से नहीं खरीदा जा सकता। मैं ये मानती हूँ कि मैं उन्हें नहीं पाल रही, बल्कि उनके भाग्य से, उनके हिस्से का भगवान मुझे दे रहा है। अगर इंसान के अंदर ममता और दया ही ना बचे, तो वो इंसान कैसा?”

कमला ताई की बातें वहां बैठे चारों लोगों के मुंह पर किसी करारे तमाचे जैसी थीं। ड्राइंग रूम में अचानक सन्नाटा छा गया। अविनाश और सौरभ, जो लाखों रुपये महीने कमाते थे, जो बड़े-बड़े मैनेजमेंट के गुरु थे, आज एक अनपढ़ कामवाली के सामने बौने नज़र आ रहे थे।

बाहर बरामदे में बैठे दीनानाथ जी ने कमला ताई की एक-एक बात सुनी थी। उनके कांपते होठों पर एक फीकी सी हंसी तैर गई। उन्होंने एक गहरी सांस ली और बुदबुदाए, “ये बड़े लोग… जिनके घर जितने बड़े होते हैं, उनके दिल उतने ही छोटे होते जाते हैं। पैसा इंसान को सुविधाएं दे सकता है, लेकिन इंसानियत नहीं।”

दीनानाथ जी अपनी कुर्सी से उठे। उनकी रीढ़ की हड्डी जो अब तक बुढ़ापे और दुख से झुकी हुई थी, अचानक एकदम सीधी हो गई। वो अपनी लाठी टेकते हुए अंदर आए। उनके चेहरे पर अब कोई दुख या मोह नहीं था।

उन्होंने अपने बेटों की तरफ देखा और बेहद शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोले, “तुम दोनों को अपने-अपने काम और अपने फ्लैट की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैंने अपना फैसला कर लिया है। मैं तुममें से किसी के भी साथ नहीं जाऊंगा और ना ही किसी वृद्धाश्रम में जाऊंगा।”

बेटे और बहुएं एक साथ चौंके। अविनाश ने पूछा, “तो फिर आप कहाँ रहेंगे बाबूजी?”

दीनानाथ जी ने कमला ताई की तरफ देखा और कहा, “मैं इसी शहर में, अपने एक पुराने दोस्त के पास रहूंगा, जो एक गैर-सरकारी संस्था (NGO) चलाते हैं। मेरे पास मेरी पेंशन आती है, जिससे मेरा गुज़ारा आराम से हो जाएगा। तुम लोग इस घर को बेच देना और पैसे आपस में बांट लेना। लेकिन याद रखना, आज तुमने मुझे नहीं छोड़ा है, बल्कि आज तुमने अपने जीवन से उस आशीर्वाद को हमेशा के लिए खो दिया है, जो तुम्हारी तिजोरियों से कहीं ज़्यादा कीमती था।”

यह कहकर दीनानाथ जी ने अपनी छड़ी उठाई और अपने कमरे की तरफ चल दिए। उनके पीछे खड़े उनके बेटे और बहुएं सिर्फ एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे। उनके पास करोड़ों की दौलत, गाड़ियां, फ्लैट और बैंक बैलेंस सब कुछ था, लेकिन एक गरीब कामवाली ने उन्हें उनकी असल औकात और उनकी खोखली अमीरी का आइना दिखा दिया था।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के इस भागदौड़ भरे जीवन में इंसान अपनी जड़ों को ही काटना शुरू कर चुका है? बुढ़ापे में माता-पिता को सिर्फ एक बोझ समझना, क्या हमारे समाज के गिरते हुए नैतिक मूल्यों का संकेत नहीं है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : वर्षा मंडल 

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