गर्व भरी नज़र से

मेरी एक बेहद करीबी दोस्त हुआ करती थी, नाम था अंजलि। अंजलि का परिवार शहर के नामी और रसूखदार लोगों में गिना जाता था। उसके परिवार को लोग ‘डॉक्टर्स फैमिली’ कहते थे। उसके पिता डॉ. माथुर शहर के सबसे बड़े न्यूरोसर्जन थे, माँ डॉ. रश्मि एक जानी-मानी गायनेकोलॉजिस्ट थीं और अंजलि का बड़ा भाई, विक्रम, … Read more

मातृत्व

“चुप कर पागल लड़के! कहाँ जाने की बात कर रहा है रात के इस पहर?” उन्होंने बैग को पलंग के नीचे धकेलते हुए डांटा, लेकिन इस डांट में वो पुराना वाला स्नेह था। “क्या समझता है तू अपनी माँ को? मेरी कोख से जन्मा है तू, क्या मैं तेरी तकलीफ नहीं समझूंगी? ठीक है… नहीं … Read more

दिखावा – संगीता अग्रवाल

लोगों की आँखों में आँसू आ गए थे। एक दोस्त गुस्से में बोल पड़ा, “लानत है ऐसे बेटे पर! ऐसे इंसान को तो सरेआम सजा मिलनी चाहिए। कौन था वो नरपिशाच?” माधव ने एक गहरी साँस ली। उसकी नज़रें सीधे सुशांत पर जाकर टिक गईं। सुशांत, जो अब तक बड़े आराम से खड़ा था, अचानक … Read more

मनहूस

“अरे कोई है? जरा इस मनहूस को मेरी आँखों के सामने से हटाओ! मैंने तो सोचा था कि इस बार घर में कुल का दीपक जलेगा, लेकिन मेरी किस्मत ही खोट निकली। फिर से पत्थर का जन्म हो गया।” शांति देवी ने अपने कानों पर हाथ रखते हुए जैसे ही ये शब्द कहे, पूरे कमरे … Read more

परवरिश

अभिनव ने पिता के आँसू पोंछते हुए कहा, “पिताजी, परेशानी तो तब होती है जब नीयत में खोट हो। आपने हमें जो संस्कार दिए हैं, जो ईमानदारी और बड़ों का सम्मान करना सिखाया है, क्या वो बस किताबी बातें थीं? आपने अपनी पूरी ज़िंदगी हमारी पढ़ाई और भविष्य के लिए कुर्बान कर दी, अब जब … Read more

 ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल

निहारिका को देखते ही वह अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ और एक सौम्य मुस्कान के साथ बोला, “हेलो निहारिका, मैं शशांक। आपसे मिलकर अच्छा लगा।” निहारिका ने हाथ मिलाने की ज़हमत तक नहीं उठाई। वह कुर्सी खींचकर बैठी और अपने महंगे गॉगल्स टेबल पर पटकते हुए बोली, “देखिए शशांक, मैं यहाँ सिर्फ अपनी माँ की … Read more

परिवार के प्रति जिम्मेदारी

रोहन जैसे ही दफ्तर से थका-हारा घर लौटा, उसने देखा कि कमरे की लाइटें बंद हैं। उसने स्विच ऑन किया तो उसकी नजर सोफे के एक कोने में सिकुड़ कर बैठी अपनी पत्नी सौम्या पर पड़ी। सौम्या का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था, आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं और उसके होंठ अभी भी … Read more

अनपढ़ माँ

“क्या हुआ पापा? आप खुश नहीं हैं क्या? इतनी बड़ी कामयाबी मिली है मुझे,” समीर ने हैरानी से पूछा। रामनाथ जी ने गहरी साँस ली और बहुत ही शांत लेकिन चुभने वाले स्वर में कहा, “मैं बहुत खुश था समीर, लेकिन अभी कुछ ही पलों में तुमने मुझे यह अहसास दिला दिया कि मेरी और … Read more

तीज की चुनरी, भारत का तिरंगा – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

सावन जब धरती पर उतरता है, तब वह केवल वर्षा नहीं लाता; वह स्मृतियों की भीगी हुई पोटली, लोकगीतों की गूँज, मेहंदी की महक और भारतीय स्त्री के मन का अनंत उत्सव भी साथ लाता है। पीपल की डाल पर पड़ा झूला केवल रस्सियों का सहारा नहीं होता, वह पीढ़ियों से चली आती संस्कृति का … Read more

एहसास के धागे

 श्रुति तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थी। विक्रम के कमरे से बाहर जाते ही उसके अंदर का लावा फूट पड़ा। “माँ आ रही हैं? मतलब मेरी सास! इन्हें भी आज ही आना था? जब भी हम दोनों कहीं बाहर जाने का, अपने लिए कुछ वक्त निकालने का सोचते हैं, तो महारानी जी मुंह … Read more

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