हम फिर मिलेंगे कभी – वीणा राज 

ठंड के मौसम में चाय की भाप मन को आत्मिक तुष्टि का एहसास करा रही थी. जगजीत सिंह की ग़ज़ल, कप से उठता भाप और पेड़ों से छनकर आती धूप ने बालकनी में बैठी तृषा को स्वर्गिक आनन्द दे रखा था . साथ में मूंगफली के गुलाबी दानों को एक एक कर मुंह में डालती … Read more

सबक – खुशी

चारु एक सम्पन्न परिवार की लड़की थी इसलिए जिद्दी स्वभाव की थी । परिवार में माता रत्ना पिता राजन दो भाई  सुनील और अनिल और भाभियां नीता और प्रिया थे ।सारा दिन चारु भाभियों को भी परेशान करती उनकी झूठी सच्ची लगा मां और भाईयों से डॉट  पड़ती तो उसे बड़ा मजा आता।समय बीता चारु … Read more

ज़ुबान की मर्यादा – महक दुआ

“सुनीता भाभी, कुछ तो मर्यादा रखिए अपनी जुबान की। मैं इस घर की बेटी हूँ, कोई बाहर से आई लालची औरत नहीं,” अंजलि ने अपने आंसुओं को पलकों पर ही रोकते हुए भारी गले से कहा। वह अभी-अभी अपनी बीमार माँ के कमरे से बाहर निकली थी और वापस अपने घर जाने के लिए अपना … Read more

माँ का अपमान – वर्षा मंडल

“मम्मी जी! कहां छुप कर बैठ गई हैं आप?” शिखा ने रसोई के दरवाजे से लगभग चीखते हुए अपनी सास रमा जी को आवाज लगाई। उसकी आवाज में इतना गुस्सा और कड़वाहट थी कि पूरे घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। “क्या हुआ बहू? क्यों इतना चिल्ला रही हो?” रमा जी अपने हाथ … Read more

बहू मायके से दूरी बनाकर रखो – आरती देवी 

निर्मला देवी के ये शब्द शिखा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। उसे लगा जैसे उसे किसी परिवार का हिस्सा नहीं बनाया गया है, बल्कि एक ऐसा कर्मचारी नियुक्त किया गया है जिसे सिर्फ नियम और शर्तें माननी हैं। शिखा ने हमेशा से एक ऐसे ससुराल का सपना देखा था … Read more

परिवार की नींव – सीमा श्रीवास्तव 

बाहर सड़क पर गाड़ियों का शोर था, लेकिन सत्तर वर्षीय सावित्री देवी के इस चार कमरों वाले आलीशान फ्लैट में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम घड़ी की टिक-टिक आज हथौड़े की तरह उनके कानों पर बज रही थी। आज उनके इकलौते पोते, रोहन की शादी थी। शादी … Read more

समाज का डर – नेहा पटेल

रघुनाथ जी के कदम आज इतने भारी लग रहे थे जैसे उनके पैरों में मन भर का सीसा बांध दिया गया हो। साठ साल की उम्र में उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे। एक सरकारी स्कूल के रिटायर्ड हेडमास्टर होने के नाते पूरे मोहल्ले में उनकी एक अलग प्रतिष्ठा थी। लोग उनके आगे … Read more

कर्ज – निधि गुप्ता

देव वहीं आंगन की मिट्टी में माथा टेके फूट-फूट कर रो रहा था। आज उसके पास गाड़ी थी, बड़ा पद था, दौलत थी, लेकिन वो सब कुछ उस बीस हज़ार रुपये के कर्ज के सामने बहुत छोटा और बेमानी लग रहा था। सफलता का जश्न उस दिन मातम में बदल चुका था। सूरज ढलने को … Read more

अनपढ़ माँ – रमा शुक्ला

सुधीर बाबू की आंखों से एक आंसू छलक कर उनके गाल पर आ गया, “तेरी उस अनपढ़ और गँवार मां ने मेरे पढ़े-लिखे फैसले को फाड़ कर डस्टबिन में फेंक दिया। वह मुझसे और डॉक्टरों से लड़ पड़ी। उसने कहा, ‘मैं लंदन नहीं जानती, मैं करियर नहीं जानती, मैं बस इतना जानती हूं कि मेरे … Read more

अपनों की कीमत – गरिमा चौधरी 

सुधा बोलते-बोलते अपने बच्चों के बारे में बताने लगी। “और आप जानती हैं दीदी? लोग कहते हैं कि बच्चों को बीमारों से दूर रखना चाहिए। लेकिन मेरे दोनों बच्चे, आरव और मिष्टी, स्कूल से आते ही सबसे पहले अपनी दादी के कमरे में जाते हैं। सुबह-शाम उनके पास बैठकर अपनी तोतली ज़बान में उन्हें स्कूल … Read more

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