रिया अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी होकर कॉलेज के एक फंक्शन के लिए तैयार हो रही थी। तभी उसके पिता, मदन जी, अपने एक पैर से हल्का सा लंगड़ाते हुए कमरे में आए। उनके हाथ में रिया की प्रेस की हुई ड्रेस थी। मदन जी के चेहरे पर एक पुराना, गहरा जलने का निशान था जो उनके रूप को काफी साधारण और कुछ हद तक डरावना बना देता था। कपड़े बिस्तर पर रखते समय उनका हाथ काँपा और गलती से ड्रेस के साथ रखा रिया का महंगा परफ्यूम ज़मीन पर गिरकर टूट गया।
रिया का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने आईने से नज़रें हटाईं और चीखते हुए कहा, “पापा! आपसे कोई भी काम ठीक से क्यों नहीं होता? आप देख कर नहीं चल सकते क्या? मेरा इतना महंगा परफ्यूम तोड़ दिया। आप मेरे कमरे में आते ही क्यों हैं?”
मदन जी ने सहम कर टूटे हुए काँच के टुकड़ों को समेटना शुरू किया। उनकी आँखें नम थीं, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस धीमी सी आवाज़ में ‘माफ़ करना बेटा’ कहकर वे अपने लंगड़ाते कदमों के साथ कमरे से बाहर निकल गए।
तभी रिया की माँ, सुजाता, जो रसोई से यह सब सुन रही थीं, गुस्से में तमतमाते हुए कमरे में दाखिल हुईं। सुजाता एक बेहद खूबसूरत, पढ़ी-लिखी और गरिमामयी महिला थीं। शहर के एक बड़े स्कूल में प्रिंसिपल होने के नाते उनका एक अलग ही रुतबा था।
“रिया ! अपनी ज़बान पर लगाम रखो। तुम अपने पिता से इस लहज़े में कैसे बात कर सकती हो?” सुजाता ने कड़क आवाज़ में कहा।
रिया ने भी पलटकर जवाब दिया, “माँ, आप मुझे मत सिखाइए। मैं थक गई हूँ इस रोज़-रोज़ के तमाशे से। आप खुद को देखिए और उन्हें देखिए। कहाँ आप इतनी सुंदर, इतनी स्मार्ट और कहाँ पापा… एक मामूली से क्लर्क, ऊपर से ये लंगड़ापन और चेहरे का वो भयानक निशान। मेरे दोस्त जब घर आते हैं तो मुझ पर हँसते हैं। वो मज़ाक उड़ाते हैं कि मेरी किस्मत अच्छी है जो मेरा चेहरा और मेरी अक्ल आप पर गई है, पापा पर नहीं। मुझे उनके साथ बाहर जाने में शर्म आती है माँ!”
सुजाता की आँखें गुस्से से लाल हो गईं। “रिया , अपना मुँह बंद रखो! तुम कुछ नहीं जानती हो।”
रिया अपनी ज़िद पर अड़ी रही। “नहीं माँ, मैं सब जानती हूँ। मैंने सब देखा है। आप पापा से प्यार नहीं करतीं। आपका यह बेमेल रिश्ता सिर्फ एक समझौता है। आपने बस तरस खाकर या किसी मजबूरी में उनसे शादी की होगी। लेकिन ज़िंदगी ऐसे नहीं काटी जाती। मैं आपकी तरह इस घुटन में नहीं जी सकती।”
इससे पहले कि रिया एक शब्द और बोल पाती, कमरे में एक ज़ोरदार गूंज उठी। सुजाता ने अपना हाथ उठाया और रिया के गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया।
रिया झटके से पीछे हटी। उसने अपना गाल पकड़ लिया और अवाक होकर अपनी माँ को देखने लगी। सुजाता का पूरा शरीर गुस्से और एक गहरे दर्द से काँप रहा था। उनकी आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा।
“तुम जिस इंसान के रूप-रंग पर आज इतनी शर्मिंदगी महसूस कर रही हो ना, आज उसी इंसान की वजह से तुम्हारा इस दुनिया में वजूद है!” सुजाता की आवाज़ में एक ऐसा दर्द था जो सालों से सीने में दफ्न था।
रिया अवाक थी। “मतलब? आप क्या कह रही हैं माँ?”
सुजाता फर्श पर बैठ गईं और रोते हुए अपने अतीत के वो पन्ने खोलने लगीं जिन्हें उन्होंने मदन जी के साथ मिलकर हमेशा के लिए दफना दिया था।
“तुम्हें अपनी खूबसूरती और अपने नाम पर बहुत घमंड है ना रिया ? तो सुन लो सच… जिस पिता को तुम कोस रही हो, तुम्हारे रगों में उनका खून ही नहीं है। इक्कीस साल पहले, जब मैं कॉलेज में थी, तो मुझे एक लड़के से प्यार हुआ था। उसने मुझसे शादी का झूठा वादा किया और जब मैं तुम्हारे साथ गर्भवती हो गई, तो वह रातों-रात शहर छोड़कर भाग गया। मेरे अपने परिवार ने, मेरे माँ-बाबूजी ने बदनामी के डर से मुझे धक्के मारकर घर से निकाल दिया था।”
रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसकी सांसें जैसे गले में ही अटक गईं।
सुजाता ने आगे कहा, “मैं नदी किनारे खड़ी होकर अपनी जान देने वाली थी। तब मदन, जो हमारे मोहल्ले की एक छोटी सी दुकान में काम करते थे, उन्होंने मुझे रोका। वो मेरी सच्चाई जानते थे। समाज मुझे पत्थर मारने को तैयार था, मैं एक कुंवारी माँ बनने वाली थी। तब इस देवदूत इंसान ने समाज की सारी गालियां अपने सिर पर ले लीं और मुझसे शादी की। सिर्फ इसलिए नहीं कि उन्हें मुझसे कुछ चाहिए था, बल्कि इसलिए ताकि ‘तुम्हें’ एक जायज़ नाम मिल सके। अगर मदन नहीं होते, तो आज तुम समाज की नज़रों में एक नाजायज़ औलाद होतीं। अनाथ आश्रम के किसी कोने में पड़ी होतीं। उन्होंने अपने जले हुए चेहरे और लंगड़ाते कदमों के साथ दिन-रात मज़दूरी की, ताकि तुम एक अच्छे स्कूल में पढ़ सको। उन्होंने तुम्हारी खातिर दुनिया भर के ताने सहे, लेकिन कभी तुम्हें यह महसूस नहीं होने दिया कि तुम उनकी अपनी बेटी नहीं हो।”
यह खौफनाक और दिल चीर देने वाला सच सुनते ही रिया के हाथ-पाँव बर्फ की तरह ठंडे पड़ गए। उसके दिमाग में वो सारे पल घूमने लगे जब उसने अपने पिता का अपमान किया था, उनके रूप का मज़ाक उड़ाया था। उसके पैरों की ताकत जैसे खत्म हो गई और वह धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ी।
उसकी आँखों से आंसुओं की नदियां बहने लगीं। सुजाता ने आगे बढ़कर रिया के सिर को अपनी गोद में रख लिया और उसके बालों को सहलाने लगीं। रिया का रोम-रोम पश्चाताप की आग में जल रहा था। जिस इंसान को वह जीवन भर अपने लिए एक शर्मिंदगी का कारण मानती रही, असल में वही इंसान उसके जीवन का सबसे बड़ा रक्षक था।
तभी दरवाज़े पर आहट हुई। मदन जी कमरे के दरवाज़े पर खड़े थे। उनके हाथों में रिया के लिए पानी का एक गिलास था। उनके चेहरे पर अभी भी वही चिंता थी कि उनकी बेटी उन पर गुस्सा है। रिया ने जैसे ही उन्हें देखा, वह अपनी माँ की गोद से उठी और दौड़कर मदन जी के पैरों में गिर पड़ी।
“मुझे माफ़ कर दीजिए पापा… मुझे माफ़ कर दीजिए!” रिया दहाड़ें मारकर रो रही थी। उसने मदन जी के पैरों को अपने आंसुओं से भिगो दिया। मदन जी घबरा गए और उन्होंने तुरंत अपनी बेटी को उठाकर सीने से लगा लिया।
रिया ने आज पहली बार अपने पिता के उस जले हुए चेहरे में दुनिया का सबसे खूबसूरत इंसान देखा था। उसे समझ आ गया था कि पिता का रिश्ता खून का मोहताज नहीं होता, बल्कि उस निस्वार्थ त्याग और प्रेम का होता है जो एक लावारिस ज़िंदगी को अपना नाम दे दे। आज उस घर में एक बेटी का झूठा अहंकार हमेशा के लिए टूट गया था और एक सच्चे पिता का सम्मान स्थापित हो गया था।
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लेखिका : नीलू थापर