खामोश समझौता

ये बातें सुजाता जी के दिल को छलनी कर देती थीं। जिस औरत ने जीवन भर अपने दम पर दुनिया का सामना किया था, आज उसे अपने ही घर में, अपने ही पहनावे और अस्तित्व के लिए ताने सुनने पड़ रहे थे। काव्या की माँ जब भी घर आतीं, तो वह भी काव्या की ही भाषा बोलतीं। “अरे सुजाता जी, अब आप घर की चाबियाँ काव्या को सौंप दीजिए। आपने बहुत राज कर लिया, अब बेटी को घर की मालकिन बनने दीजिए। और वैसे भी, आपके ज़माने के तौर-तरीके अब पुराने हो गए हैं।” उन दोनों माँ-बेटी की बातों में सुजाता जी के लिए रत्ती भर भी सम्मान नहीं होता था।

सुजाता जी अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी शून्य में ताक रही थीं। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, लेकिन उनके अंदर एक भयानक सूखा पड़ा हुआ था। एक समय था जब इस घर की हर दीवार उनकी हंसी और उनके रौबदार कदमों की आहट से गूंजती थी। लेकिन आज, वह इसी घर में एक अदृश्य साया बनकर रह गई थीं। शीशे के सामने खड़े होकर जब भी वह खुद को देखतीं, तो उन्हें वह पुरानी सुजाता कहीं नज़र नहीं आती—वह सुजाता जो शहर के एक प्रतिष्ठित सरकारी बैंक की सीनियर ब्रांच मैनेजर हुआ करती थी, जिसके एक इशारे पर पूरा स्टाफ काम पर लग जाता था, और जिसकी कड़कदार आवाज़ में गज़ब का आत्मविश्वास झलकता था।

उनके पति, प्रकाश जी का निधन तब हो गया था जब उनका इकलौता बेटा समीर महज़ सात साल का था। उस कच्ची उम्र में वैधव्य का पहाड़ टूटने के बावजूद सुजाता जी ने हार नहीं मानी थी। उन्होंने आंसुओं को अपनी कमज़ोरी नहीं, बल्कि अपनी ढाल बनाया। दिन-रात एक करके उन्होंने समीर को पाला, उसे बेहतरीन शिक्षा दी और समाज में अपना एक ऐसा मुकाम बनाया जहाँ लोग उनकी मिसालें देते थे। उनके उठने-बैठने का तरीका, उनकी सलीके से पहनी हुई सूती साड़ियाँ, माथे पर एक सधी हुई बिंदी और चेहरे पर एक गरिमामयी मुस्कान—यह उनकी पहचान थी। वह दो साल पहले ही बैंक से शानदार विदाई लेकर रिटायर हुई थीं। उन्होंने सोचा था कि अब वह अपनी बाकी की ज़िंदगी सुकून से, अपने शौक पूरे करते हुए बिताएंगी।

लेकिन उनके इन सभी सपनों पर उस दिन से ग्रहण लगना शुरू हो गया, जिस दिन उनके घर में समीर की पत्नी, काव्या ने कदम रखा। समीर और काव्या एक ही मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे। सुजाता जी ने बहुत ही खुले विचारों के साथ काव्या को अपनी बहू के रूप में स्वीकारा था। उन्होंने कभी सास वाला रुतबा नहीं दिखाया, बल्कि एक दोस्त बनने की कोशिश की। लेकिन काव्या की सोच बिल्कुल अलग थी। काव्या एक बेहद महत्वाकांक्षी और आत्मकेंद्रित लड़की थी, जिसे इस बात से सख्त ऐतराज़ था कि घर में सुजाता जी का इतना प्रभाव क्यों है।

काव्या को सुजाता जी का स्मार्ट होना, उनका सलीके से तैयार होना, और उनका आत्मविश्वास खटकता था। काव्या की नज़र में एक सास की छवि वही पुरानी, दबी-कुचली, और दिन भर पूजा-पाठ में लगी रहने वाली बुजुर्ग महिला की थी, जिसका काम सिर्फ घर के एक कोने में पड़े रहना हो। सुजाता जी का अपनी सहेलियों के साथ क्लब जाना, नई-नई किताबें पढ़ना या घर के मामलों में अपनी राय देना, काव्या को बर्दाश्त नहीं होता था।

शुरुआत में काव्या ने सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा, लेकिन धीरे-धीरे उसने अपने शब्दों के बाण छोड़ने शुरू कर दिए। कभी डाइनिंग टेबल पर तो कभी ड्राइंग रूम में, वह अक्सर ऐसी बातें कह देती जो सीधे सुजाता जी के दिल पर वार करतीं। “मम्मी जी, अब आप रिटायर हो चुकी हैं, आपको इतना एक्टिव रहने की क्या ज़रूरत है? ये सब हम युवाओं पर छोड़ दीजिए,” काव्या अक्सर तंज़ कसते हुए कहती। कभी-कभी वह और भी तीखे वार करती, “आप इस उम्र में इतनी ब्राइट साड़ियाँ पहन कर कहाँ जाती हैं? लोग क्या कहेंगे कि बुढ़ापे में भी सजने-संवरने का शौक नहीं गया! आपको तो अब सादे कपड़े पहनने चाहिए, आखिर प्रकाश अंकल को गए हुए भी तो इतने साल हो गए हैं।”

ये बातें सुजाता जी के दिल को छलनी कर देती थीं। जिस औरत ने जीवन भर अपने दम पर दुनिया का सामना किया था, आज उसे अपने ही घर में, अपने ही पहनावे और अस्तित्व के लिए ताने सुनने पड़ रहे थे। काव्या की माँ जब भी घर आतीं, तो वह भी काव्या की ही भाषा बोलतीं। “अरे सुजाता जी, अब आप घर की चाबियाँ काव्या को सौंप दीजिए। आपने बहुत राज कर लिया, अब बेटी को घर की मालकिन बनने दीजिए। और वैसे भी, आपके ज़माने के तौर-तरीके अब पुराने हो गए हैं।” उन दोनों माँ-बेटी की बातों में सुजाता जी के लिए रत्ती भर भी सम्मान नहीं होता था।

सुजाता जी अंदर ही अंदर घुटने लगी थीं। वह किससे कहतीं? समीर से? नहीं, समीर अपनी नई गृहस्थी और ऑफिस के काम में इतना उलझा हुआ था कि उसे घर की इन बारीक राजनीति का कोई अंदाज़ा ही नहीं था। और अगर सुजाता जी उसे बतातीं भी, तो क्या होता? घर में क्लेश बढ़ता, समीर अपनी पत्नी और माँ के बीच पिसता, और सुजाता जी यह कतई नहीं चाहती थीं। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी समीर की खुशी के लिए ही तो जी थी। अब उसके बसे-बसाए घर में आग लगाना उन्हें गंवारा नहीं था।

बस, इसी ‘शांति’ को बनाए रखने के लिए सुजाता जी ने खामोशी का समझौता कर लिया। उन्होंने खुद को समेटना शुरू कर दिया। सबसे पहले उन्होंने अपनी पसंद की वो खूबसूरत साड़ियाँ पहनना छोड़ दिया। उनकी अलमारी के एक कोने में वो साड़ियाँ तह करके रख दी गईं, और उनकी जगह ढीले-ढाले, फीके रंग के सूती कपड़ों ने ले ली। उन्होंने अपने बाल रंगना और उन्हें सलीके से कटवाना बंद कर दिया। उनके चेहरे से वह आत्मविश्वास वाली मुस्कान गायब हो गई और उसकी जगह एक डरी-सहमी सी उदासी ने ले ली।

सुजाता जी ने घर से बाहर निकलना भी कम कर दिया। उनकी सहेलियां फोन करतीं, तो वह कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देतीं। काव्या घर के सारे फैसले अपने मनमाने ढंग से लेने लगी। उसने घर का पूरा इंटीरियर बदल दिया, पुराने वफादार नौकरों को निकाल कर अपनी पसंद के लापरवाह नौकर रख लिए, और यहाँ तक कि सुजाता जी के कमरे का सामान भी बिना पूछे इधर-उधर कर दिया। सुजाता जी सब कुछ अपनी आँखों के सामने होते हुए देखतीं, सब कुछ गलत होते हुए महसूस करतीं, लेकिन उनके होंठ सिले रहते। उन्होंने देखा और अनदेखा करने की कला में महारत हासिल कर ली थी।

काव्या को लगता था कि उसने जंग जीत ली है। सुजाता जी उसकी आँखों में वह घमंड और विजय का भाव साफ पढ़ सकती थीं। काव्या अब सुजाता जी को एक बेकार और असहाय बुढ़िया से ज्यादा कुछ नहीं समझती थी।

लेकिन इस खामोशी की सबसे भारी कीमत सुजाता जी के मानसिक स्वास्थ्य को चुकानी पड़ रही थी। जब काव्या की मनमानियों के कारण घर की व्यवस्था बिगड़ने लगी, बजट गड़बड़ा गया, और नौकरों की चोरी पकड़ी गई, तो समीर परेशान हो उठा। एक दिन जब काव्या की किसी बड़ी गलती के कारण समीर को भारी नुकसान हुआ, तो समीर झल्लाता हुआ सुजाता जी के कमरे में आया।

“माँ! आपने देखा काव्या ने क्या किया? उसने बिना सोचे-समझे इतना बड़ा फैसला ले लिया। और आप… आप तो घर में ही रहती हैं, आपको तो दुनियादारी की समझ है। आपने काव्या को रोका क्यों नहीं? आपने उसे टोका क्यों नहीं?” समीर ने झुंझलाते हुए कहा।

सुजाता जी ने अपने बेटे के चेहरे को देखा। उस चेहरे में उन्हें कभी अपना पति प्रकाश नज़र आता था, तो कभी वह छोटा सा समीर जो हर बात के लिए अपनी माँ के आंचल में छुप जाता था। लेकिन आज, सुजाता जी के पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे। वह बस हल्की सी, बेजान मुस्कान मुस्कुराईं और बिना कुछ कहे उठकर कमरे की बालकनी में चली गईं।

समीर पैर पटकता हुआ वापस चला गया। उसे समझ नहीं आया कि उसकी माँ, जो कभी शेरनी की तरह दहाड़ती थीं, आज इतनी शांत और बेपरवाह कैसे हो गई हैं।

उस रात सुजाता जी बहुत देर तक आईने के सामने खड़ी रहीं। उन्होंने अपने बिखरे हुए सफेद बालों को देखा, अपनी झुर्रियों को छुआ, और अपनी उन आँखों को देखा जिनमें अब कोई चमक नहीं बची थी। उन्हें अपने ही बदले हुए रूप से डर लगने लगा था। क्या वह वाकई वही सुजाता थीं? वह सोचने लगीं कि जब प्रकाश जी का देहांत हुआ था, तब वह मौत के उस भयानक सदमे से भी उबर गई थीं। तब भी वह इससे कहीं ज्यादा बेहतर, मजबूत और खूबसूरत दिखती थीं। लेकिन आज, एक ही घर में रहते हुए, बिना किसी शारीरिक बीमारी के, वह तिल-तिल कर मर रही थीं।

उन्हें महसूस होने लगा कि अगर उन्होंने जल्द ही अपने आप को इस मनोवैज्ञानिक घुटन से बाहर नहीं निकाला, तो वह डिप्रेशन का शिकार हो जाएंगी या शायद अपना मानसिक संतुलन ही खो बैठेंगी। दूसरों का घर बसाने के चक्कर में वह अपना खुद का वजूद मिटा चुकी थीं। काव्या ने घर पर ही कब्ज़ा नहीं किया था, उसने सुजाता जी की आत्मा पर कब्ज़ा कर लिया था। और सुजाता जी ने बिना लड़े हथियार डाल दिए थे।

आईने में खुद को देखते हुए, सुजाता जी के मन में एक गहरा द्वंद्व चल रहा था। क्या उन्हें इसी तरह घुट-घुट कर जीना चाहिए? या फिर उन्हें अपने स्वाभिमान की राख से दोबारा उठना चाहिए? उन्हें एहसास हो रहा था कि सम्मान कभी भी झुकने से नहीं मिलता, बल्कि अपनी जगह मज़बूती से खड़े रहने से मिलता है। खामोशी ने उनके घर को टूटने से तो शायद बचा लिया था, लेकिन उस खामोशी ने उन्हें खुद से ही तोड़ दिया था।

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