अंजलि पिछले हफ्ते ही अपनी बीमार माँ को देखने के लिए अपने मायके भोपाल गई हुई थी। घर में सिर्फ सुमित्रा देवी और रोहन थे। सुमित्रा देवी को लगा कि अंजलि की गैरमौजूदगी में रोहन को समझाना आसान होगा। रात के खाने के बाद, जब रोहन हॉल में बैठकर अपना लैपटॉप बंद कर रहा था, सुमित्रा देवी उसके पास आकर बैठ गईं।
“रोहन बेटा, मुझे तुझसे कुछ जरूरी बात करनी है,” सुमित्रा देवी ने गंभीर स्वर में कहा।
“हां माँ, कहिए ना, क्या बात है?” रोहन ने अपनी थकान को छिपाते हुए पूछा।
“देख बेटा, मैं अब बूढ़ी हो रही हूँ। मेरी आंखें अब इस घर में एक वारिस को देखने के लिए तरस गई हैं। अंजलि से अब कोई उम्मीद नहीं है। मैंने तेरे मामा जी से बात की है। उनकी नजर में एक बहुत अच्छी लड़की है। तू अंजलि को उसके मायके में ही रहने दे और उसे तलाक के कागजात भिजवा दे। मैं तेरी दूसरी शादी…”
जयपुर के एक शांत और पुराने मोहल्ले में स्थित ‘आशीर्वाद भवन’ बाहर से देखने में जितना भव्य और सुकून भरा लगता था, उसके भीतर की शांति उतनी ही खोखली हो चुकी थी। इस घर की मालकिन, सुमित्रा देवी, अपने उसूलों और पुरानी मान्यताओं की पक्की थीं। उनके पति का देहांत कई साल पहले हो चुका था, जिसके बाद उन्होंने अकेले ही अपने इकलौते बेटे, रोहन को पाल-पोस कर बड़ा किया और उसे एक सफल इंजीनियर बनाया। रोहन की शादी को आठ साल बीत चुके थे। उसकी पत्नी, अंजलि, स्वभाव से बेहद शांत, संस्कारी और पढ़ी-लिखी लड़की थी। वह एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी और घर के हर छोटे-बड़े काम को पूरी जिम्मेदारी से संभालती थी। सुमित्रा देवी को अंजलि से कोई शिकायत नहीं थी, सिवाय एक बात के—आठ साल बीत जाने के बाद भी अंजलि की गोद सूनी थी।
शुरुआत के दो-तीन साल तो हंसी-मजाक और रिश्तेदारों के हल्के-फुल्के तानों में निकल गए, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, सुमित्रा देवी का धैर्य जवाब देने लगा। घर में जब भी कोई पूजा-पाठ होता या किसी रिश्तेदार के घर बच्चे का जन्म होता, सुमित्रा देवी के ताने अंजलि के दिल को छलनी कर देते। “पता नहीं मेरे पिछले जन्म के कौन से पाप थे जो मुझे ये दिन देखना पड़ रहा है। मेरी सहेलियों के पोते-पोतियां स्कूल जाने लगे हैं, और मेरे घर में बच्चों की किलकारी तक नहीं गूंजी। ये कुलच्छनी मेरे खानदान का नाम डुबो कर मानेगी।”
अंजलि ये सब चुपचाप सुन लेती। वह कभी पलटकर जवाब नहीं देती थी। रात के अंधेरे में जब रोहन काम से लौटता, तो अंजलि अक्सर तकिये में मुंह छिपाकर रोती हुई मिलती। रोहन अपनी पत्नी से बेहद प्यार करता था। वह अपनी माँ का भी पूरा सम्मान करता था, इसलिए वह दोनों के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश में खुद को अंदर ही अंदर घुटता हुआ महसूस करता था।
पिछले कुछ महीनों से सुमित्रा देवी ने एक नई रट लगा रखी थी। वे चाहती थीं कि रोहन अंजलि को तलाक देकर दूसरी शादी कर ले। उनके दूर के एक रिश्तेदार की बेटी कुंवारी थी और सुमित्रा देवी ने मन ही मन उसे अपनी अगली बहू मान लिया था। वे हर रोज रोहन के दिमाग में यह बात डालने की कोशिश करतीं कि वंश को आगे बढ़ाना ही एक पुरुष का सबसे बड़ा धर्म है और अंजलि इस धर्म में सबसे बड़ी बाधा है।
अंजलि पिछले हफ्ते ही अपनी बीमार माँ को देखने के लिए अपने मायके भोपाल गई हुई थी। घर में सिर्फ सुमित्रा देवी और रोहन थे। सुमित्रा देवी को लगा कि अंजलि की गैरमौजूदगी में रोहन को समझाना आसान होगा। रात के खाने के बाद, जब रोहन हॉल में बैठकर अपना लैपटॉप बंद कर रहा था, सुमित्रा देवी उसके पास आकर बैठ गईं।
“रोहन बेटा, मुझे तुझसे कुछ जरूरी बात करनी है,” सुमित्रा देवी ने गंभीर स्वर में कहा।
“हां माँ, कहिए ना, क्या बात है?” रोहन ने अपनी थकान को छिपाते हुए पूछा।
“देख बेटा, मैं अब बूढ़ी हो रही हूँ। मेरी आंखें अब इस घर में एक वारिस को देखने के लिए तरस गई हैं। अंजलि से अब कोई उम्मीद नहीं है। मैंने तेरे मामा जी से बात की है। उनकी नजर में एक बहुत अच्छी लड़की है। तू अंजलि को उसके मायके में ही रहने दे और उसे तलाक के कागजात भिजवा दे। मैं तेरी दूसरी शादी…”
“माँ! बस कीजिए!” रोहन अचानक अपनी जगह से खड़ा हो गया। उसकी आंखों में गुस्सा और लाचारी एक साथ तैर रहे थे। “आप ये कैसी बातें कर रही हैं? अंजलि कोई पुरानी हो चुकी मशीन है क्या जिसे जब मन किया बदल दिया? वो मेरी पत्नी है, मेरी जीवनसंगिनी है!”
सुमित्रा देवी भी तैश में आ गईं। “पत्नी है तो पत्नी का फर्ज भी तो निभाए! आठ साल हो गए, एक औलाद नहीं दे पाई तुझे। क्या तू पूरी जिंदगी बिना बच्चों के गुजार देगा? कल को जब हम दोनों मर जाएंगे, तो तेरा कौन सहारा होगा? मेरी मर्ज़ी तुझे खूब पता है रोहन। मैं इस घर में एक पोता चाहती हूँ, चाहे उसके लिए तुझे कुछ भी करना पड़े।”
रोहन ने एक गहरी सांस ली। वह अब तक अपनी माँ का दिल दुखाने से बचता रहा था, लेकिन आज पानी सिर से ऊपर जा चुका था। उसे लगा कि अगर आज उसने सच नहीं बताया, तो उसकी माँ अंजलि का मानसिक उत्पीड़न कभी बंद नहीं करेगी।
“आप पोता चाहती हैं ना माँ? लेकिन आप ये भूल रही हैं कि बच्चा पैदा करने के लिए सिर्फ एक औरत की कोख ही नहीं, एक मर्द की भी जरूरत होती है। आप चाहती क्या हैं? मैं अंजलि को छोड़ दूं? ठीक है, लेकिन उसके बाद क्या?” रोहन की आवाज में एक अजीब सी कड़वाहट थी।
“उसके बाद तू दूसरी शादी करेगा और तेरा घर खुशियों से भर जाएगा,” सुमित्रा देवी ने अपनी बात पर अड़ते हुए कहा।
“मज़ाक चल रहा है क्या माँ? मैं अंजलि से तलाक नहीं लूंगा। आप मेरी जिंदगी के फैसले लेना छोड़ दीजिए। मेरा और अंजलि का और इम्तिहान मत लीजिए।” रोहन अब पूरी तरह से बिगड़ चुका था।
“इम्तिहान मैं नहीं ले रही, तेरी किस्मत ले रही है! जब तक वो बांझ इस घर में रहेगी, इस घर का आंगन सूना ही रहेगा!” सुमित्रा देवी ने चीखते हुए कहा।
रोहन ने अपनी आंखें बंद कीं, अपने गुस्से को काबू किया और फिर तेज़ी से अपने कमरे की तरफ गया। कुछ ही पलों में वह वापस लौटा। उसके हाथ में एक मोटी सी नीली फाइल थी। उसने वह फाइल अपनी माँ की गोद में फेंक दी।
“क्या है ये?” सुमित्रा देवी ने फाइल को घूरते हुए पूछा।
“ये हमारी तकदीर का वो सच है, जिसे मैं और अंजलि पिछले तीन सालों से आपसे छिपा रहे थे। खोलकर पढ़िए इसे। और अगर अंग्रेजी समझ में न आए, तो मैं हिंदी में अनुवाद कर देता हूँ,” रोहन की आवाज अब बिल्कुल ठंडी और खौफनाक हो चुकी थी।
सुमित्रा देवी ने कांपते हाथों से फाइल खोली। उसमें कई सारे मेडिकल टेस्ट, ब्लड रिपोर्ट और डॉक्टरों के पर्चे थे।
“ये मेरी और अंजलि की मेडिकल रिपोर्ट्स हैं माँ। पिछले तीन सालों में हमने शहर के बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखा लिया है। सारे टेस्ट हो चुके हैं। और पता है डॉक्टरों ने क्या कहा? डॉक्टरों के अनुसार, अंजलि बिल्कुल स्वस्थ है। उसमें माँ बनने की पूरी क्षमता है। कमी अंजलि में नहीं, मुझमें है माँ। मैं… मैं कभी पिता नहीं बन सकता।”
रोहन के ये शब्द किसी बम के धमाके की तरह सुमित्रा देवी के कानों में गूंजे। फाइल उनके हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गई। उनका मुंह खुला का खुला रह गया और आंखें फटी रह गईं।
“नहीं… नहीं, ये झूठ है। मेरा बेटा… मेरा बेटा ऐसा नहीं हो सकता। ये डॉक्टर सब पैसे लूटने के लिए झूठ बोलते हैं। तूने किसी अच्छे डॉक्टर को नहीं दिखाया होगा,” सुमित्रा देवी बड़बड़ाने लगीं, मानो वे सच को स्वीकार करने से इंकार कर रही हों।
“झूठ नहीं है माँ, यही कड़वा सच है!” रोहन ने नम आंखों से कहा। “हमने एक नहीं, चार अलग-अलग अस्पतालों में टेस्ट करवाए हैं। सब की रिपोर्ट एक ही है। मुझमें वो क्षमता ही नहीं है कि मैं किसी को औलाद का सुख दे सकूं। अंजलि अगर चाहे, तो आज मुझे छोड़कर किसी भी और इंसान से शादी कर सकती है और एक स्वस्थ बच्चे की माँ बन सकती है। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया!”
रोहन एक पल के लिए रुका, उसकी आवाज रुंध गई थी। “उसने सिर्फ मेरा घर, मेरी इज्जत और आपकी भावनाओं को बचाने के लिए ये सच अपने सीने में दफन कर लिया। वो चुपचाप आपके सारे ताने सहती रही। आपने उसे बांझ कहा, कुलच्छनी कहा, अपशगुनी कहा… और वो सब कुछ सुनकर भी मेरे लिए इस घर में टिकी रही, क्योंकि वो जानती थी कि जिस दिन आपको ये सच पता चलेगा, आप टूट जाएंगी। समाज आप पर हंसेगा कि सुमित्रा देवी का इकलौता बेटा ही…” रोहन आगे नहीं बोल पाया।
कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया। सिर्फ दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक और सुमित्रा देवी के भारी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। सुमित्रा देवी को ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके सिर पर हथौड़ा मार दिया हो। उनका सारा घमंड, सारी पुरानी मान्यताएं, और उनके तानों का एक-एक शब्द अब उन्हें खुद को डसने लगा था। एक स्त्री होकर वे एक दूसरी स्त्री का दर्द नहीं समझ पाईं। समाज की उस खोखली सोच का शिकार होकर वे हर बात के लिए बिना सोचे-समझे अपनी बहू को जिम्मेदार ठहराती रहीं, जबकि असल में उनकी बहू उनकी इज्जत को अपने आंसुओं से सींच रही थी। आत्मग्लानि के बोझ तले सुमित्रा देवी जमीन में गड़ी जा रही थीं।
रोहन ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, “कुछ दिन पहले हम दोनों एक अनाथालय गए थे। वहां हमने एक प्यारी सी छोटी बच्ची को देखा था। हमने फैसला किया था कि हम उसे गोद लेंगे। लेकिन हम आपको बता नहीं पा रहे थे क्योंकि हमें लगा कि आप किसी अनाथ बच्चे को अपने खानदान का वारिस मानने से इंकार कर देंगी। अब बोलिए माँ, क्या अंजलि को मुझसे तलाक ले लेना चाहिए? क्या अब आप उसे यही सलाह देंगी कि वो इस ‘कमी वाले’ इंसान को छोड़कर अपनी नई दुनिया बसा ले?”
सुमित्रा देवी फूट-फूट कर रोने लगीं। वे उठीं और रोहन के सीने से लग गईं। “मुझे माफ कर दे मेरे बच्चे। मुझे माफ कर दे। मैं कितनी अंधी हो गई थी अपनी चाहत में। मैंने उस बेचारी बच्ची पर कितने जुल्म किए। उसने तेरे लिए अपना मातृत्व तक दांव पर लगा दिया और मैं उसे ही कोसती रही।”
कुछ देर तक रोने के बाद सुमित्रा देवी ने खुद को संभाला। उन्होंने अपने आंसू पोछे और रोहन के चेहरे को अपने हाथों में लेकर कहा, “रोहन, अंजलि से कह कि वो जल्दी वापस आ जाए। और मुझे बता, कब चलना है अपनी उस गुड़िया को घर लाने? उसके आने से पहले मुझे घर में बहुत सी तैयारियां भी तो करनी हैं। मैं खुद जाकर अपनी पोती को इस घर में लाऊंगी।”
रोहन की आंखों में भी आंसू आ गए, लेकिन उसके दिमाग में अभी भी एक सवाल कौंध रहा था, जिसे पूछे बिना वो रह नहीं सका।
“माँ, एक बात पूछूं? सच-सच बताइएगा,” रोहन ने अपनी माँ की आंखों में आंखें डालकर कहा। “मान लीजिए, अगर इन रिपोर्ट्स में सचमुच अंजलि की ही कोई कमी होती। अगर सच में वो कभी माँ नहीं बन सकती थी… तब भी क्या आप अनाथालय से उस गुड़िया को घर लाने के लिए इतनी ही खुशी से तैयार हो जातीं? या फिर आप सचमुच मुझे दूसरी शादी करने के लिए मजबूर करती रहतीं?”
सुमित्रा देवी के पास रोहन के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। वे खामोश खड़ी रहीं। उनकी खामोशी में समाज का वो कड़वा सच छिपा था जहाँ औरत की कमी पर उसे घर से निकाल दिया जाता है, लेकिन मर्द की कमी को औरत अपनी आंसुओं की चादर से ढक कर जीवन भर उसका साथ निभाती है। रोहन का वो सवाल सिर्फ सुमित्रा देवी के लिए नहीं था, बल्कि उस पूरे समाज के लिए था जो हमेशा एक औरत को ही कठघरे में खड़ा करता है।
क्या आपको लगता है कि रोहन का अपनी माँ से पूछा गया आखिरी सवाल जायज था? अगर आप अंजलि की जगह होते, तो क्या आप भी समाज और परिवार के तानें सहकर अपने पति की इज्जत बचाते? और क्या हमारे समाज में पुरुष और महिला के लिए मातृत्व/पितृत्व को लेकर नियम सचमुच इतने अलग हैं? अपने विचार और इस कहानी पर अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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