सब दर्द एक जैसे होते हैं

सुमन के ये शब्द रिया के कानों में गूंजने लगे। अभी कल शाम ही तो उसने अपनी सास सुजाता जी से ठीक यही अल्फाज कहे थे। सुजाता जी ने तो सिर्फ सुई में धागा डालने को कहा था, बीमार भी नहीं थीं, फिर भी रिया ने उन्हें झिड़क दिया था। आज जब उसकी अपनी माँ … Read more

हम पिता भी गलत होते हैं

सुधीर जी ने खन्ना के कंधे पर हाथ रखा। “खन्ना, गलती हम पिता की ही होती है। हम अक्सर अपनी बेटियों के लिए ‘सुरक्षा’ ढूंढते हैं और हमें लगता है कि सुरक्षा सिर्फ पैसों में है। हम भूल जाते हैं कि एक लड़की को एसी कमरे और नौकर-चाकर से ज्यादा एक ऐसे साथी की ज़रूरत … Read more

रिश्तों की जमापूंजी

 “क्या बात है मीरा? मैं देख रहा हूँ कि जब से मैं घर आया हूँ, तुम कुछ परेशान सी हो। तुम्हारी आँखों में भी एक अजीब सी उदासी है। भाई से बात हुई थी तुम्हारी, क्या रिया की शादी की तैयारियों को लेकर तुम वहाँ न जा पाने की वजह से दुखी हो? अगर ऐसी … Read more

अदृश्य डोर: ममता का संदूक

नीलिमा  अब अपने आँसू नहीं रोक पाई। उसने रोते हुए ससुर जी के अस्पताल जाने वाली बात बताई और फिर फफकते हुए बोली, “दीदी, मुझे बहुत ज़ोर से भूख लगी है। पिछले तीन दिन से मैंने पेट भर के कुछ नहीं खाया है। यहाँ सब इतने परेशान हैं कि मैं किसी से कुछ कह भी … Read more

सच्ची आस्था का मार्ग

रमाकांत ने एक सरसरी निगाह उस वृद्धा पर डाली और फिर झुंझलाते हुए बोले, “अरे देवकी, तुम भी कहाँ इन सब के चक्कर में पड़ रही हो। ये तीर्थ स्थान है, यहाँ ऐसे हज़ारों लोग रोज़ आते हैं। हमारा संकल्प टूट जाएगा। चलो जल्दी, हमें बहुत देर हो रही है।” रमाकांत ने देवकी को फिर … Read more

काँपते हाथों का वो आख़िरी नंबर

 वह आवाज़… वह लहज़ा… वह नफ़रत… सब कुछ स्पीकर के ज़रिए उस प्रतीक्षालय की दीवारों से टकराकर वापस लौट रहा था। मेरे हाथ में पकड़ा हुआ फ़ोन अचानक मुझे किसी दहकते हुए अंगारे जैसा लगने लगा। मेरी नज़रें स्क्रीन से उठकर उन माँ के चेहरे पर गईं, और जो मैंने देखा, वह मैं ताउम्र नहीं … Read more

बंद लिफाफे का सफर

कबीर ने गहराई से कहा, “तुम दूसरों में खुशी ढूंढ रही हो, शिखा। तुम मानव से उम्मीद कर रही हो कि वह तुम्हें समझे, मुझसे उम्मीद कर रही हो कि मैं तुम्हारी बात सुनूं। लेकिन तुम उस शिखा को भूल गई हो, जो कॉलेज के मैगजीन के लिए कितनी शानदार कविताएं लिखती थी। जो अपने … Read more

खामोश दीवारें और एक बहन की पीड़ा

मेरी छोटी बहन राधिका का स्वभाव शुरू से ही पानी की तरह निर्मल और पारदर्शी रहा है। छल-कपट, चालाकी या दुनियादारी की पेचीदगियां जैसे उसे कभी छू कर भी नहीं गुजरीं। घर में सब से छोटी होने के कारण वह सबकी लाडली तो थी, लेकिन उसमें नखरे या ज़िद नाम की कोई चीज़ नहीं थी। … Read more

उम्मीद की छाँव

शहर की उस आलीशान सोसायटी के बड़े से लॉन में आज चहल-पहल कुछ ज्यादा ही थी। रंग-बिरंगे फूलों और झिलमिलाती लाइटों से सजे उस मंडप में खुशियों का शोर गूंज रहा था। मौका था स्मृति की देवरानी, नव्या की गोदभराई का। पूरे परिवार में एक अलग ही उल्लास था, आखिर घर में सालों बाद किसी … Read more

अनकहे शब्दों का सफर

 मैंने थोड़ा सख्त लेकिन प्यार भरे लहज़े में कहा, “सुमित, मेरी बात बहुत ध्यान से सुनना। तुम पैसा कमाते हो, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन एक रिश्ते को सिर्फ पैसों से नहीं सींचा जा सकता। तुम्हारी पत्नी कोई मशीन नहीं है जो घर का काम करे और तुम्हारे आने पर चुपचाप खड़ी रहे। ज़रा … Read more

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