दो पीढ़ियों का रिश्ता

लंदन की सर्द और भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर, जब कार ने बनारस की संकरी और जानी-पहचानी गलियों में प्रवेश किया, तो कबीर के चेहरे पर एक अजीब सी सुकून भरी मुस्कान तैर गई। कबीर और उसकी पत्नी मायरा शादी के तीन साल बाद पहली बार भारत आ रहे थे। मायरा वैसे तो भारतीय मूल … Read more

सौतन

मान्या  पिछले कई दिनों से एक अजीब सी बेचैनी से गुजर रही थी। आठ साल की शादीशुदा जिंदगी में उसने कभी रोहन पर शक करने का कोई कारण नहीं पाया था। रोहन एक जिम्मेदार पति और उनके पांच साल के बेटे, आरव का बहुत प्यारा पिता था। दोनों की जिंदगी एक शांत नदी की तरह … Read more

भाई का निस्वार्थ प्रेम

“तू बहुत बड़ा मूर्ख है, केदार! तुझे क्या लगा, मुझे तेरी चोरी का पता नहीं चलेगा?” सोमनाथ रुंधे गले से बोला। केदार भी रोते हुए मुस्कुराया, “और आप? आप कब से इतने चालाक हो गए भैया कि मेरे ही बक्से में सेंध मार दी?” दोनों भाई एक-दूसरे के गले लगकर बच्चों की तरह रो रहे … Read more

पहली रसोई

विवाह वाले घर की रौनक देखते ही बनती थी। पिछले एक हफ्ते से चल रही शहनाइयों की गूंज, ढोलक की थाप और महिलाओं के लोकगीतों ने पूरे घर को एक उत्सव में बदल दिया था। अब शादी संपन्न हो चुकी थी, लेकिन विदाई के बाद भी रिश्तेदारों और मेहमानों का जमावड़ा कम नहीं हुआ था। … Read more

असली घर

शहनाई की गूंज अब मद्धम पड़ चुकी थी और विदाई की बेला ने हर आँख को नम कर दिया था। मंडप के एक कोने में खड़ी अनुराधा अपनी बेटी नव्या को निहार रही थी। नव्या, जो अब अपने बचपन के आँगन को छोड़कर एक नए संसार में कदम रखने जा रही थी, उसकी आँखों में … Read more

संस्कार के बीज

रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। पैंसठ वर्षीय सुमित्रा देवी अपनी पंसदीदा किताब के कुछ पन्ने पलट कर बस सोने की ही तैयारी कर रही थीं। उनका यह पच्चीस सौ स्क्वायर फुट का दो मंजिला घर, जिसे उन्होंने अपने पति के गुजर जाने के बाद अपनी पाई-पाई जोड़कर बनाया था, अब उनकी एकांत दुनिया … Read more

दिल के रिश्ते

“अनन्या, उठो। लगता है नीचे अंकल की तबीयत ज्यादा खराब है,” सिद्धार्थ ने अपनी पत्नी को जगाते हुए कहा। दोनों दौड़कर नीचे गए। देवकी जी ने रोते हुए दरवाजा खोला। अंदर रमाकांत जी सीने पर हाथ रखे सोफे पर गिरे हुए थे और उन्हें सांस लेने में भयंकर तकलीफ हो रही थी। उनका चेहरा पसीने … Read more

मेरी बेटियां बोझ नहीं है

“भाभी, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी बच्चियों को इस तरह मनहूस और बोझ कहना बंद कर दीजिए। जब मुझे और इनके पिता को इनका कोई भार नहीं लगता, तो आप लोग क्यों इनके भविष्य की चिंता में अपना खून जला रही हैं?” सुमेधा ने अपनी तीन छोटी-छोटी बेटियों को सीने से चिपकाते … Read more

गिरवी रखा हुआ मकान

“पापा कहाँ हैं माँ?” घर की दहलीज पर कदम रखते ही सुमित ने अपनी माँ, सुलोचना जी से पूछा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी थकावट और आँखों में एक छिपी हुई उलझन थी। सुलोचना जी बरामदे में बैठी स्वेटर बुन रही थीं। उन्होंने सुमित की आवाज़ सुनकर एक बार नज़र उठाई, लेकिन अगले ही … Read more

दुख का भारी पत्थर

आज माधवी और राघव की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह—सिल्वर जुबली—थी। पिछले एक हफ्ते से दोनों के बच्चे, आर्यन और शिखा, इस पार्टी की तैयारियों में दिन-रात एक किए हुए थे। शहर के सबसे बड़े बैंक्वेट हॉल से लेकर मेहमानों की लिस्ट तक, सब कुछ तय हो चुका था। माधवी अपने कमरे में आईने के सामने … Read more

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