अनकहे शब्दों का सफर

 मैंने थोड़ा सख्त लेकिन प्यार भरे लहज़े में कहा, “सुमित, मेरी बात बहुत ध्यान से सुनना। तुम पैसा कमाते हो, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन एक रिश्ते को सिर्फ पैसों से नहीं सींचा जा सकता। तुम्हारी पत्नी कोई मशीन नहीं है जो घर का काम करे और तुम्हारे आने पर चुपचाप खड़ी रहे। ज़रा सोचो, बाईस साल की लड़की… जब वो टीवी पर या आस-पास दूसरी लड़कियों को सजते-संवरते, घूमते देखती होगी, तो क्या उसका मन नहीं करता होगा? वो दिन भर घर की चारदीवारी में बच्ची को संभालती है, बर्तन धोती है, कपड़े धोती है। उसकी भी एक दुनिया है, जो सिर्फ तुम तक सीमित है। और जब तुम शाम को घर आकर उसे वक्त देने के बजाय उसकी कमियां निकालते हो, या उस पर हाथ उठाते हो, तो उसका दिल कितना टूटता होगा?”

सुमित अब शांत था और मेरी बातों को बहुत गहराई से सुन रहा था।

“मर्द होने का मतलब पत्नी पर हाथ उठाना नहीं होता, सुमित। जिस दिन तुम उस पर हाथ उठाते हो, तुम अपना सम्मान उसकी नज़रों में खो देते हो। तुम कहते हो ना कि तुम उसके बिना नहीं रह सकते? तो फिर अपनी अकड़ को छोड़ो। अपना फोन निकालो, स्पीकर पर डालो और उसे अभी कॉल करो। और सुनो, सिर्फ कॉल नहीं करना है, तुम्हें उससे माफी मांगनी है।”

रात के ग्यारह बज चुके थे और देहरादून एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी। बाहर झमाझम बारिश हो रही थी और खिड़की के शीशे पर टकराती बूंदें एक अजीब सा शोर पैदा कर रही थीं। मैं अपनी एक मेडिकल कांफ्रेंस से लौट रही थी। दिन भर की थकान के बावजूद मेरी आँखों में नींद नहीं थी, इसलिए मैं अपनी एक किताब पढ़ने में मगन थी।

तभी मेरी नज़र सामने वाली बर्थ पर बैठे एक युवक पर गई। वह पिछले दो घंटे से बेहद बेचैन था। उसकी उम्र मुश्किल से पच्चीस या छब्बीस साल रही होगी। वह बार-बार अपना फोन निकालता, कोई नंबर मिलाता और फिर गुस्से में फोन को सीट पर पटक देता। उसकी आँखों में एक अजीब सी लाली थी और माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। अचानक उसका फोन बजा। उसने झपट कर फोन उठाया और बिना कुछ सुने ही चीखने लगा।

“तू समझती क्या है खुद को? जा कर बैठ जा अपने भाई के घर! मैं भी देखता हूँ कि वो तुझे कितने दिन खिलाते हैं। तूने मेरी ज़िंदगी नरक कर दी है। आज तूने जो किया है ना, इसके बाद मैं खुद की जान दे दूंगा और इल्जाम तेरे घरवालों पर लगाऊंगा। खत्म कर दूंगा सब कुछ आज!”

उसकी आवाज़ में इतना गुस्सा और हताशा थी कि आस-पास के कुछ यात्री जाग गए। फोन कट चुका था। वह लड़का अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपाकर फूट-फूट कर रोने लगा। उसकी हालत देखकर मुझे एक पल के लिए डर लगा। चलती ट्रेन में अगर कोई ऐसी मानसिक स्थिति में हो, तो वह कुछ भी कर सकता है—खुद को नुकसान पहुँचा सकता है या किसी और को।

मुझसे रहा नहीं गया। एक डॉक्टर होने के नाते, और उससे भी पहले एक इंसान होने के नाते, मैंने अपनी किताब बंद की और अपनी पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ा दी।

“पानी पी लीजिए,” मैंने बेहद शांत और नरम आवाज़ में कहा।

उसने लाल आँखों से मेरी तरफ देखा। शायद उसे किसी से हमदर्दी की उम्मीद नहीं थी। उसने कांपते हाथों से बोतल ली और पानी पिया।

“क्या नाम है आपका?” मैंने पूछा।

“सुमित,” उसने रुंधे गले से जवाब दिया।

“सुमित, मैं एक डॉक्टर हूँ और उम्र में तुमसे काफी बड़ी हूँ। तुम्हारी बड़ी बहन जैसी हूँ। मुझे नहीं पता कि तुम्हारी ज़िंदगी में क्या तूफान चल रहा है, लेकिन इतना जानती हूँ कि जान दे देना किसी भी समस्या का हल नहीं है। अगर तुम चाहो तो अपना मन हल्का कर सकते हो। शायद बात करने से कोई रास्ता निकल आए।”

मेरी इन बातों ने जैसे किसी बांध का दरवाज़ा खोल दिया। सुमित एक छोटे बच्चे की तरह सुबकने लगा।

“मैडम जी, मैं क्या करूँ? मैं गैरेज में सुबह आठ बजे से रात के दस बजे तक काम करता हूँ। पसीने में नहाया रहता हूँ ताकि घर में कोई कमी न रहे। और मेरी पत्नी? उसे मेरी कोई कद्र नहीं है। हर बात पर झगड़ा करती है। आज सुबह खाने में नमक तेज़ था, मैंने बस इतना कहा कि ध्यान से बनाया कर, तो वो पलट कर जवाब देने लगी। मुझे गुस्सा आ गया और मैंने… मैंने उसे एक थप्पड़ मार दिया। उसने भी गुस्से में मुझे धक्का दे दिया। फिर वो अपनी बच्ची को लेकर अपने मायके चली गई। और अब उसकी माँ फोन पर मुझे धमकियां दे रही है कि वो मुझ पर दहेज का और पुलिस का केस कर देगी। मैं मर जाऊंगा मैडम जी, पर कोर्ट-कचहरी के धक्के नहीं खाऊंगा।”

वह अपनी ही धुन में बोलता जा रहा था। उसके शब्दों में गुस्सा कम और डर ज्यादा था। वह अपनी पत्नी की शिकायतें कर रहा था, लेकिन उसके लहज़े से साफ लग रहा था कि वह अंदर से बुरी तरह टूट चुका है।

मैंने उसे पूरी तरह अपनी भड़ास निकालने दी। जब वह थोड़ा शांत हुआ, तब मैंने उससे एक बहुत ही साधारण सा सवाल पूछा।

“सुमित, तुम्हारी पत्नी की उम्र क्या है?”

उसने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “बाइस साल।”

मैं अंदर ही अंदर सिहर गई। “और तुम्हारी बच्ची कितनी बड़ी है?”

“चार साल की,” उसने जवाब दिया।

यानी अठारह साल की उम्र में उस लड़की ने एक बच्चे को जन्म दे दिया था। जिस उम्र में लड़कियों को अपनी पढ़ाई, अपने भविष्य और अपनी आज़ादी की फिक्र होती है, उस उम्र में उसे एक माँ और पत्नी की भारी ज़िम्मेदारियों के नीचे दबा दिया गया था।

मैंने सुमित की आँखों में सीधे देखते हुए पूछा, “सुमित, तुम आखिरी बार अपनी पत्नी को लेकर बाहर घूमने कब गए थे? कोई फिल्म दिखाने या बस ऐसे ही चाट-पकौड़ी खिलाने?”

सुमित ने बड़ी हैरानी से मुझे देखा। “मैडम जी, मेरे पास इन सब चीज़ों के लिए फुरसत कहाँ है? मैं दिन भर गाड़ियाँ रिपेयर करता हूँ, थक कर चूर हो जाता हूँ। घर जाकर बस खाना खाता हूँ और सो जाता हूँ। मैं कमा तो रहा हूँ ना उसके लिए! फिर वो नाराज़ क्यों होती है?”

लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान आ गई, “पर मैडम जी, वो खाना बहुत अच्छा बनाती है। जब वो गुस्सा नहीं होती ना, तो बिना कुछ सजे-संवरे भी बहुत सुंदर लगती है। मेरी बच्ची बिल्कुल उसी पर गई है। मैं उसके बिना रह नहीं सकता, पर वो मुझे समझती ही नहीं है।”

मुझे समस्या की जड़ समझ आ चुकी थी। कम उम्र की शादी, संवाद की कमी और रिश्ते में प्यार को व्यक्त न कर पाना—यही इस झगड़े की असल वजह थी।

मैंने थोड़ा सख्त लेकिन प्यार भरे लहज़े में कहा, “सुमित, मेरी बात बहुत ध्यान से सुनना। तुम पैसा कमाते हो, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन एक रिश्ते को सिर्फ पैसों से नहीं सींचा जा सकता। तुम्हारी पत्नी कोई मशीन नहीं है जो घर का काम करे और तुम्हारे आने पर चुपचाप खड़ी रहे। ज़रा सोचो, बाईस साल की लड़की… जब वो टीवी पर या आस-पास दूसरी लड़कियों को सजते-संवरते, घूमते देखती होगी, तो क्या उसका मन नहीं करता होगा? वो दिन भर घर की चारदीवारी में बच्ची को संभालती है, बर्तन धोती है, कपड़े धोती है। उसकी भी एक दुनिया है, जो सिर्फ तुम तक सीमित है। और जब तुम शाम को घर आकर उसे वक्त देने के बजाय उसकी कमियां निकालते हो, या उस पर हाथ उठाते हो, तो उसका दिल कितना टूटता होगा?”

सुमित अब शांत था और मेरी बातों को बहुत गहराई से सुन रहा था।

“मर्द होने का मतलब पत्नी पर हाथ उठाना नहीं होता, सुमित। जिस दिन तुम उस पर हाथ उठाते हो, तुम अपना सम्मान उसकी नज़रों में खो देते हो। तुम कहते हो ना कि तुम उसके बिना नहीं रह सकते? तो फिर अपनी अकड़ को छोड़ो। अपना फोन निकालो, स्पीकर पर डालो और उसे अभी कॉल करो। और सुनो, सिर्फ कॉल नहीं करना है, तुम्हें उससे माफी मांगनी है।”

सुमित झिझका। “पर मैडम जी, मैं…”

“कोई ‘पर’ नहीं। अगर घर बचाना है, तो मेरी बात मानो।”

सुमित ने कांपते हाथों से अपनी पत्नी, रिया को कॉल किया और फोन को स्पीकर पर डाल दिया। दो-तीन घंटी बजने के बाद फोन उठा। उधर से किसी के सिसकने की आवाज़ आ रही थी।

“रिया…” सुमित की आवाज़ कांप रही थी।

“क्या है? अब क्या बाकी रह गया है बोलने को?” रिया की आवाज़ में दर्द और शिकायत दोनों थे।

“मुझे माफ़ कर दे रिया। मैं सच में बहुत बुरा हूँ। मैं भूल गया था कि तू भी दिन भर थक जाती है। मैं तुझ पर हाथ उठाकर बहुत बड़ी गलती कर बैठा। तू लौट आ यार… मेरे से नहीं रहा जा रहा तेरे और रियान्शी के बिना। मैं कसम खाता हूँ, आज के बाद कभी तुझ पर हाथ नहीं उठाऊंगा।” सुमित बोलते-बोलते रो पड़ा था।

रिया भी फोन पर फूट-फूट कर रोने लगी। “तुम कभी मुझसे ठीक से बात नहीं करते। बस हुक्म चलाते हो। मुझे कुछ नहीं चाहिए तुमसे, बस थोड़ा सा वक्त चाहिए। बच्ची भी सारा दिन पापा-पापा करती है, पर तुम्हारे पास हमारे लिए टाइम ही नहीं है।”

“मैं कल ही बॉस से बात करके हर रविवार की छुट्टी तय करूंगा। हम बाहर जाएंगे। तू बस घर आ जा।”

दोनों की ये बातचीत सुनकर मेरी भी आँखें नम हो गई थीं। उनके रिश्ते में प्यार बहुत था, बस वो अहंकार और नासमझी की धूल के नीचे दब गया था।

जब फोन कटा, तो सुमित के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था। वह चैन की सांस ले रहा था।

ट्रेन का अगला स्टेशन आने वाला था। मैंने सुमित से कहा, “स्टेशन पर ट्रेन दस मिनट रुकेगी। नीचे जाना और अपनी पत्नी के लिए कोई अच्छा सा गजरा या मिठाई का डब्बा ले लेना। कल सुबह जब वो वापस आए, तो उसे देना। और याद रखना सुमित, रिश्ते पौधे की तरह होते हैं, उन्हें प्यार और वक्त का पानी नहीं दोगे, तो वो मुरझा जाएंगे।”

सुमित ने मुस्कुराते हुए अपना सिर हिलाया। उसने मेरा नंबर लिया और मुझे बार-बार धन्यवाद कहकर अपनी सीट पर चला गया।

मैं अपनी मंज़िल पर पहुँच कर अपने कामों में व्यस्त हो गई। दो दिन बाद मेरे फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

“मैडम जी, मैं सुमित। रिया घर वापस आ गई है। मैंने उसे एक नई साड़ी और मिठाई दी। वो बहुत खुश है। अब हम झगड़ा नहीं करेंगे। मेरी ज़िंदगी और मेरा घर बचाने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।”

मैंने मुस्कुराकर फोन रख दिया। हमारे समाज में आज भी कम उम्र की शादियों का चलन है, जहाँ बच्चे मानसिक रूप से परिपक्व होने से पहले ही बड़े रिश्तों में बांध दिए जाते हैं। कई बार रिश्ते टूटने की कगार पर पहुँच जाते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि दोनों में से कोई भी एक-दूसरे को समझने या सुनने को तैयार नहीं होता। कभी-कभी बस किसी के मन की भड़ास सुन लेने से और सही वक्त पर सही दिशा दिखा देने से, एक बहुत बड़ा अहित होने से बच सकता है।

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