लेकिन समय का पहिया हमेशा एक सी गति से नहीं चलता। जिंदगी ने अपनी करवट बदली। विक्रम को अचानक दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल पहुँचने से पहले ही उनका देहांत हो गया। विक्रम के जाने के बाद, नंदिनी का साम्राज्य जैसे ढह गया। वह घर, जिसे उन्होंने दुनिया के सबसे महंगे मार्बल और झूमरों से सजाया था, अब उन्हें काटने को दौड़ता। चारों तरफ पसरा सन्नाटा उनकी रातों की नींद उड़ा देता। उम्र के साथ उनके शरीर ने भी जवाब देना शुरू कर दिया था। घुटनों के दर्द और बढ़ते अकेलेपन ने उस कड़क और महत्वाकांक्षी नंदिनी को एक कमज़ोर, बेबस और डरी हुई बुजुर्ग महिला में बदल दिया।
उन्होंने कबीर को कई बार फोन किया। कबीर पिता के अंतिम संस्कार में आया ज़रूर था, लेकिन उसने अपने आंसू नहीं बहाए। उसने सारे काम एक इवेंट मैनेजर की तरह निपटाए और वापस लौट गया। महीनों बीत गए। एक रात जब अकेलेपन का घुटन बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो नंदिनी ने रोते हुए कबीर को फोन लगाया।
नंदिनी और उनके पति विक्रम के पास दुनिया की हर सुख-सुविधा मौजूद थी, सिवाय एक चीज़ के—वक्त। और इसी वक्त की सबसे ज्यादा कीमत चुकाई उनके इकलौते बेटे, कबीर ने।
जब कबीर का जन्म हुआ था, तब नंदिनी अपने करियर के उस मुकाम पर थीं जहाँ से पीछे मुड़कर देखना उन्हें गंवारा नहीं था। विक्रम के लिए उनका व्यापार ही उनका पहला प्यार था। कबीर की देखभाल के लिए एक के बाद एक प्रशिक्षित नैनी, और ट्यूटर रखे गए। घर में नौकरों की एक पूरी फौज थी, जिसका काम सिर्फ यह सुनिश्चित करना था कि कबीर को कोई शारीरिक कष्ट न हो। उसे अनुशासित रखा जाता था। रोना, ज़िद करना या बच्चों जैसी चंचलता दिखाना उस घर के अलिखित नियमों के सख्त खिलाफ था।
बचपन में जब कबीर रात को डर कर उठता, तो उसे थपकियां देकर सुलाने के लिए नंदिनी के हाथ नहीं होते थे, बल्कि एक आया की पेशेवर आवाज़ होती थी जो उसे चुप कराती थी। उसके हर जन्मदिन पर घर में एक शानदार पार्टी होती थी, जिसमें शहर के सारे रसूखदार लोग आते थे। विक्रम और नंदिनी उस पार्टी में अपने नए प्रोजेक्ट्स की चर्चा करते और कबीर को महंगे विदेशी खिलौने, गैजेट्स और कपड़े पकड़ा दिए जाते। लेकिन जिस चीज़ के लिए कबीर की आँखें तरसती थीं—अपने पिता के साथ बगीचे में दौड़ना, या माँ के हाथ का बना एक साधारण सा निवाला खाना—वह उसे कभी नसीब नहीं हुआ।
एक बार स्कूल में ‘फादर्स डे’ के अवसर पर कबीर ने एक नाटक में हिस्सा लिया था। उसने एक हफ्ते तक अपने संवाद याद किए थे। विक्रम ने वादा किया था कि वे अपनी मीटिंग रद्द करके आएँगे। कबीर मंच के पीछे से बार-बार खाली कुर्सी को देखता रहा, लेकिन विक्रम नहीं आए। नंदिनी भी उस दिन दुबई में एक कॉन्फ्रेंस में थीं। उस दिन कबीर रोया नहीं था। शायद वह समझ गया था कि उसके आंसू पोंछने वाला कोई नहीं है। धीरे-धीरे, उसने अपने माता-पिता से कोई भी उम्मीद लगानी छोड़ दी।
जैसे-जैसे कबीर बड़ा हुआ, माता-पिता की अपेक्षाओं का बोझ उस पर लाद दिया गया। “तुम्हें हमारे साम्राज्य को और आगे ले जाना है,” विक्रम अक्सर डाइनिंग टेबल पर अपना लैपटॉप देखते हुए कहते। नंदिनी भी उसे हमेशा अव्वल आने और भावनाओं को कमज़ोरी न बनने देने की हिदायत देतीं। कबीर को दुनिया के सबसे बेहतरीन बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया गया। वहाँ से उसने हार्वर्ड तक का सफर तय किया। लेकिन इस पूरी यात्रा में, वह एक मशीन में तब्दील हो चुका था—एक ऐसी मशीन जो सफल थी, तेज़ थी, लेकिन जिसमें संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं थी।
कबीर अब खुद एक बहुत बड़ा इनवेस्टमेंट बैंकर बन चुका था। वह न्यूयॉर्क में बस गया और उसने अपने जीवन को पूरी तरह से व्यावसायिक बना लिया। वह अपने माता-पिता से महीने में एक बार फॉर्मेलिटी के लिए बात करता। कोई शिकायत नहीं, कोई गिले-शिकवे नहीं, बस एक तयशुदा रूटीन। नंदिनी और विक्रम इस बात से बहुत खुश थे कि उनका बेटा उनकी तरह ही ‘प्रैक्टिकल’ और ‘सफल’ है। उन्हें लगता था कि उन्होंने कबीर को बेहतरीन परवरिश दी है।
लेकिन समय का पहिया हमेशा एक सी गति से नहीं चलता। जिंदगी ने अपनी करवट बदली। विक्रम को अचानक दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल पहुँचने से पहले ही उनका देहांत हो गया। विक्रम के जाने के बाद, नंदिनी का साम्राज्य जैसे ढह गया। वह घर, जिसे उन्होंने दुनिया के सबसे महंगे मार्बल और झूमरों से सजाया था, अब उन्हें काटने को दौड़ता। चारों तरफ पसरा सन्नाटा उनकी रातों की नींद उड़ा देता। उम्र के साथ उनके शरीर ने भी जवाब देना शुरू कर दिया था। घुटनों के दर्द और बढ़ते अकेलेपन ने उस कड़क और महत्वाकांक्षी नंदिनी को एक कमज़ोर, बेबस और डरी हुई बुजुर्ग महिला में बदल दिया।
उन्होंने कबीर को कई बार फोन किया। कबीर पिता के अंतिम संस्कार में आया ज़रूर था, लेकिन उसने अपने आंसू नहीं बहाए। उसने सारे काम एक इवेंट मैनेजर की तरह निपटाए और वापस लौट गया। महीनों बीत गए। एक रात जब अकेलेपन का घुटन बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो नंदिनी ने रोते हुए कबीर को फोन लगाया। “कबीर, बेटा… मैं यहाँ बहुत अकेली हूँ। तुम्हारे पापा के जाने के बाद यह घर एक खंडहर जैसा लगता है। मुझे अपने पास बुला लो, या तुम यहाँ आ जाओ। मैं इस सन्नाटे में मर जाऊँगी। मुझे तुम्हारे साथ की ज़रूरत है।”
फोन के उस पार कुछ पल का सन्नाटा रहा। फिर कबीर की ठंडी और सधी हुई आवाज़ गूंजी, “मॉम, आप जानती हैं कि मेरा शेड्यूल कितना टाइट रहता है। मेरे पास न्यूयॉर्क में आपके लिए बिल्कुल भी समय नहीं होगा। मैं सुबह निकलता हूँ और रात को देर से लौटता हूँ। आप यहाँ आकर भी अकेली ही रहेंगी।”
नंदिनी ने बिलखते हुए कहा, “तो मैं क्या करूँ? मुझे अपनों की ज़रूरत है। तुमने मुझे बिल्कुल भुला दिया?”
कबीर की आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक ऐसा खोखलापन था जो किसी भी हथियार से ज्यादा गहरा घाव दे सकता था। उसने कहा, “मॉम, जब मैं बच्चा था, मुझे भी अपनों की ज़रूरत थी। जब मैं रात को डरता था, तो मुझे आपके आंचल की ज़रूरत थी। जब मैं मंच पर खड़ा होता था, तो मुझे तालियाँ बजाने वाले पापा की ज़रूरत थी। लेकिन आपने मुझे क्या दिया? आपने मुझे दुनिया की सबसे अच्छी आया दी, सबसे महंगे खिलौने दिए, और बेहतरीन स्कूल दिए। क्योंकि आपके पास समय नहीं था। आपने मेरी हर ज़रूरत को पैसे और सुविधाओं से पूरा किया।”
नंदिनी स्तब्ध रह गईं। उनके गले में जैसे कोई कांटा चुभ गया हो।
कबीर ने अपनी बात जारी रखी, “मैं आपसे कोई शिकायत नहीं कर रहा हूँ मॉम। आपने मुझे जो सिखाया, मैं वही कर रहा हूँ। मैं प्रैक्टिकल हो रहा हूँ। मेरे पास भी आपके लिए समय नहीं है, लेकिन मैं आपकी सुविधाओं में कोई कमी नहीं आने दूँगा। मैंने मुंबई के सबसे महंगे और लग्ज़री ‘वरिष्ठ नागरिक निवास’ (असिस्टेड लिविंग) में आपके लिए एक प्रीमियम सुइट बुक कर दिया है। वहाँ चौबीसों घंटे डॉक्टर, नर्स और नौकर आपकी देखभाल के लिए रहेंगे। वहाँ आपके ही स्तर के कई और लोग भी हैं, आपकी अच्छी दोस्ती हो जाएगी।”
“कबीर… तुम अपनी माँ को वृद्धाश्रम भेज रहे हो?” नंदिनी की आवाज़ कांप रही थी।
“वह वृद्धाश्रम नहीं है मॉम, वह एक फाइव-स्टार रिटायरमेंट कम्युनिटी है। और हाँ, मैंने वहाँ के मैनेजमेंट से बात की है। वो लोग अपने गार्डन एरिया का नया डिज़ाइन बनवाने वाले हैं। मैंने उन्हें आपका नाम सुझाया है। आप तो वैसे भी खाली नहीं बैठ सकतीं। आप वहाँ का डिज़ाइन तैयार कीजिए, इससे आपका समय भी कट जाएगा और आपको अपनी अहमियत का एहसास भी रहेगा। ठीक वैसे ही, जैसे आपने और पापा ने हमेशा अपने काम को चुना। मैंने सारी पेपर्स आपके वकील को भेज दिए हैं। आप बस साइन कर दीजिएगा। टेक केयर, मॉम।”
फोन कट चुका था।
कमरे में फिर से वही भयानक सन्नाटा पसर गया। नंदिनी के हाथ से फोन छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उनकी आँखों से बहते आंसुओं ने उनके महंगे डिज़ाइनर कालीन को भिगो दिया। आज उन्हें अहसास हो रहा था कि उन्होंने पूरी उम्र दूसरों के लिए आलीशान घर बनाए, लेकिन अपना घर बनाना भूल गईं। उन्होंने दौलत के बीज बोए थे, और आज फसल के रूप में उन्हें वही दौलत वापस मिल रही थी, लेकिन उसमें प्यार और अपनेपन की कोई महक नहीं थी। कबीर ने उन्हें कोई सज़ा नहीं दी थी, उसने बस वही लौटाया था जो उसे विरासत में मिला था—एक आलीशान, पर भावनाओं से रहित जीवन। नंदिनी ने कांपते हाथों से रिटायरमेंट होम के कागज़ात उठाए और बिना कुछ सोचे उस पर हस्ताक्षर कर दिए, क्योंकि अब उस घर में उनके लिए वैसे भी कुछ नहीं बचा था।
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# वक्त का आइना
लेखिका : शारदा सक्सेना