रिश्तों की असली वसीयत

 रामदीन जी मुस्कुराए और मुझे अपने पास बैठाते हुए बोले, “मैंने यह मकान एक ट्रस्ट को दान कर दिया है, मित्र। मेरे जाने के बाद यह पूरी तरह से अनाथ बच्चों का आश्रय स्थल बन जाएगा। और हां, जो पीछे वाला हिस्सा था, जिसे मैंने राघव को किराये पर दिया था, वो मैंने उसके नाम कर दिया है। शहर के बाहर जो मेरी एक छोटी सी जमीन थी, उसे बेचकर जो पैसा मिला, उसका आधा हिस्सा मैंने राघव के नाम फिक्स डिपॉजिट कर दिया है ताकि वो अपना भविष्य सुधार सके और बाकी आधा हिस्सा इस ट्रस्ट को दे दिया है।”

मैं उनकी बातें सुनकर सन्न रह गया। एक झटके में उन्होंने अपनी जिंदगी भर की कमाई, अपनी पुश्तैनी जायदाद सब कुछ दूसरों के नाम कर दी थी। एक आम भारतीय पिता ऐसा कदम आसानी से नहीं उठाता, जहाँ जायदाद पर पहला और आखिरी हक़ बेटों का माना जाता है।

गोमती नदी के किनारे बसे लखनऊ शहर की एक पुरानी और शांत कॉलोनी में ‘स्मृति भवन’ नाम का एक बड़ा सा मकान हुआ करता था। इस मकान में मेरे बहुत पुराने मित्र पंडित रामदीन अपने अकेलेपन के साथ रहते थे। रामदीन जी और मेरी दोस्ती कॉलेज के दिनों की थी। समय के साथ हम दोनों अपनी-अपनी गृहस्थी में उलझ गए, लेकिन हमारी मित्रता कभी कमजोर नहीं पड़ी। रिटायरमेंट के बाद हम अक्सर शाम को पार्क में मिलते और जिंदगी के गुजर चुके पन्नों को पलटते। रामदीन जी का जीवन बाहर से देखने में बहुत ही आदर्श और सफल लगता था। उन्होंने अपना पूरा जीवन एक आदर्श पिता की तरह जिया। अपनी सभी इच्छाओं को मारकर उन्होंने अपने दोनों बेटों, सुमित और अमित को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजा। दोनों बेटे अपनी-अपनी जिंदगी में बहुत सफल हुए, दोनों ही कनाडा में एक अच्छी नौकरी के साथ वहीं बस गए और वहीं शादी करके अपना घर भी बसा लिया।

शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा लगता था। रामदीन जी और उनकी पत्नी सुशीला जी पूरे मोहल्ले में गर्व से बताते थे कि उनके दोनों बेटे विदेश में हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उस बड़े से ‘स्मृति भवन’ में सन्नाटा पसरने लगा। विदेशी चमक-दमक और व्यस्त जीवनशैली ने सुमित और अमित को इतना उलझा लिया कि उनके पास अपने माता-पिता के लिए समय ही नहीं बचा। पहले जो फोन रोज आते थे, वो हफ्ते में एक बार आने लगे, फिर महीने में और धीरे-धीरे सिर्फ त्योहारों या जन्मदिन तक सीमित रह गए। रामदीन जी और सुशीला जी उस विशाल घर में अकेले किसी आहट का इंतजार करते रहते।

कुछ साल पहले जब सुशीला जी बीमार पड़ीं, तो रामदीन जी ने दोनों बेटों को खबर की। दोनों ने अपनी-अपनी मजबूरियां गिना दीं। किसी का जरूरी प्रोजेक्ट चल रहा था तो किसी को छुट्टी नहीं मिल रही थी। उन्होंने पैसे भेज दिए और कहा कि किसी अच्छे अस्पताल में इलाज करवा लें। लेकिन सुशीला जी को पैसों की नहीं, अपनों के साथ की जरूरत थी। अंततः सुशीला जी अपने बेटों का रास्ता देखते-देखते इस दुनिया से विदा हो गईं। दोनों बेटे अंतिम संस्कार में तो नहीं आ पाए, लेकिन शांति पाठ के दिन जरूर आए। दस दिन रुके, घर के कागजात देखे, पिता को साथ चलने की औपचारिकता निभाई (यह जानते हुए कि रामदीन जी अपनी मिट्टी नहीं छोड़ेंगे) और फिर वापस उड़ गए।

सुशीला जी के जाने के बाद रामदीन जी बिल्कुल टूट गए थे। उस समय मैंने देखा कि उनके घर के पिछले हिस्से में, जिसे उन्होंने किराये पर दे रखा था, वहां रहने वाला एक नौजवान लड़का उनका बहुत ख्याल रखने लगा था। उस लड़के का नाम राघव था। राघव पास ही के एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क था और एक बहुत ही साधारण परिवार से ताल्लुक रखता था। वह एक अनाथ था और शहर में अकेला ही रहता था। राघव ने बिना किसी लालच या स्वार्थ के रामदीन जी को एक पिता का दर्जा दे दिया था। सुबह उनके लिए चाय बनाने से लेकर, रात को उनके साथ बैठकर बातें करने तक, राघव ने उनके जीवन के उस खालीपन को भर दिया जो उनके सगे बेटों ने छोड़ दिया था। रामदीन जी भी अब राघव के बिना नहीं रह पाते थे। वह अक्सर मुझसे कहते, “दोस्त, खून के रिश्ते तो सिर्फ नाम के रह गए हैं, असल रिश्ता तो अहसास का होता है जो इस लड़के ने मुझे दिया है।”

मैं कुछ महीनों के लिए अपने बेटे के पास मुंबई चला गया था। जब मैं वापस लखनऊ लौटा, तो सबसे पहले रामदीन जी से मिलने उनके घर गया। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि घर के बाहर ‘स्मृति भवन’ के साथ-साथ एक अनाथालय का बोर्ड भी लगा हुआ था। अंदर गया तो देखा कि रामदीन जी बहुत ही शांत और प्रसन्न मुद्रा में अपनी आरामकुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। और वहां आंगन में कुछ छोटे-छोटे अनाथ बच्चे खेल रहे थे।

मैंने उत्सुकतावश पूछा, “रामदीन, यह सब क्या है? यह अनाथालय का बोर्ड क्यों लगा है?”

रामदीन जी मुस्कुराए और मुझे अपने पास बैठाते हुए बोले, “मैंने यह मकान एक ट्रस्ट को दान कर दिया है, मित्र। मेरे जाने के बाद यह पूरी तरह से अनाथ बच्चों का आश्रय स्थल बन जाएगा। और हां, जो पीछे वाला हिस्सा था, जिसे मैंने राघव को किराये पर दिया था, वो मैंने उसके नाम कर दिया है। शहर के बाहर जो मेरी एक छोटी सी जमीन थी, उसे बेचकर जो पैसा मिला, उसका आधा हिस्सा मैंने राघव के नाम फिक्स डिपॉजिट कर दिया है ताकि वो अपना भविष्य सुधार सके और बाकी आधा हिस्सा इस ट्रस्ट को दे दिया है।”

मैं उनकी बातें सुनकर सन्न रह गया। एक झटके में उन्होंने अपनी जिंदगी भर की कमाई, अपनी पुश्तैनी जायदाद सब कुछ दूसरों के नाम कर दी थी। एक आम भारतीय पिता ऐसा कदम आसानी से नहीं उठाता, जहाँ जायदाद पर पहला और आखिरी हक़ बेटों का माना जाता है।

मुझसे रहा नहीं गया, मैंने कुछ हैरानी और कुछ नाराजगी से पूछा, “अरे रामदीन! यह तुमने क्या किया? राघव ने तुम्हारी सेवा की, उसे तुमने कुछ दिया, यहाँ तक तो ठीक है। लेकिन अपना पूरा घर, अपनी सारी जमापूंजी दान कर दी? और सुमित-अमित का क्या? क्या तुम अपने सगे बेटों को कुछ नहीं दोगे? जब उन्हें यह पता चलेगा तो वो क्या सोचेंगे?”

रामदीन जी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उनकी आंखों में एक अजीब सी शांति थी जो इंसान को सब कुछ त्यागने के बाद ही मिलती है। उन्होंने बहुत ही ठहरे हुए स्वर में कहा, “दोस्त, मेरे बेटों को अब मेरी या मेरी जायदाद की कोई जरूरत नहीं है। मैंने अपनी पूरी उम्र, अपनी सारी कमाई उन्हें एक अच्छी शिक्षा देने और विदेश भेजने में लगा दी। आज वो करोड़ों में खेल रहे हैं। उनके पास बड़े-बड़े घर हैं, महंगी गाड़ियां हैं। मेरी इस पुरानी ईंट-गारे की हवेली का वो क्या करेंगे? ज्यादा से ज्यादा इसे किसी बिल्डर को बेच देंगे और पैसा आपस में बांट लेंगे।”

वे थोड़ा रुके, एक लंबी सांस ली और आगे बोले, “जब सुशीला बिस्तर पर मौत से लड़ रही थी, तब उनके पास आने का वक्त नहीं था। जब मैं रातों को दर्द से कराहता था, तब वो मेरे पास नहीं थे। उन पैसों का क्या मोल जो जरूरत पर अपनों का साथ न खरीद सके? जब मेरे जीवित रहते हुए मेरी भावनाओं की, मेरे समय की और मेरे प्यार की उनके जीवन में कोई कीमत नहीं है, तो मेरे मरने के बाद इन निर्जीव दीवारों की उनके लिए क्या अहमियत होगी? राघव ने मेरी उस वक्त सेवा की, जब मुझे एक बेटे की सबसे ज्यादा जरूरत थी। उसने मुझे वो दिया जिसे करोड़ों रुपये देकर भी नहीं खरीदा जा सकता- ‘अपनापन’। और ये जो अनाथ बच्चे बाहर खेल रहे हैं ना, इन्हें इस छत की जरूरत है, सुमित और अमित को नहीं।”

मैं अवाक होकर उनकी बातें सुन रहा था। उनकी एक-एक बात मेरे दिल में तीर की तरह उतर रही थी।

उन्होंने मेरी तरफ देखा और एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “रही बात मेरे बेटों की वसीयत की… तो जो पिता अपने बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा कर दे, वही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति होती है। मेरी तरफ से उन्हें अब किसी भौतिक सुख की जरूरत नहीं है। मेरा आशीर्वाद ही उनकी असली वसीयत है। बस, ईश्वर उन्हें खुश रखे, यही मेरी उनके लिए अंतिम पूंजी है।”

रामदीन जी की ये बातें सुनकर मेरी आंखें भर आईं। मुझे समझ आ गया था कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और समय देने से बनते हैं। एक पिता ने अपने कर्त्तव्य का पालन पूरी ईमानदारी से किया था, लेकिन जब उसे प्रेम और सहारे की जरूरत पड़ी, तो उसे वो एक पराए में मिला। रामदीन जी ने साबित कर दिया था कि सच्चा वारिस वो नहीं होता जो जन्म लेता है, बल्कि वो होता है जो बुढ़ापे में हाथ थामता है। उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया था, जिसने रिश्तों की एक नई और सच्ची परिभाषा गढ़ दी थी।

आज ‘स्मृति भवन’ में बच्चों की किलकारियां गूंजती हैं। रामदीन जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन बच्चों की हंसी में, राघव की तरक्की में और इस समाज के दिल में वो हमेशा के लिए अमर हो गए हैं। उनके बेटों को शायद यह हवेली न मिलने का मलाल रहा हो, लेकिन उन्हें यह कभी समझ नहीं आएगा कि उन्होंने हवेली से बहुत पहले अपना वो पिता खो दिया था, जिसकी दुआएं ही दुनिया की सबसे बड़ी दौलत थीं।

क्या रामदीन जी का यह फैसला आपके नजरिए से सही था? अगर आप उनकी जगह होते, या आप सुमित-अमित की जगह होते, तो आप क्या करते? क्या बुढ़ापे में माता-पिता को सिर्फ पैसों की जरूरत होती है या समय और अपनेपन की? अपने विचार कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें।

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# रिश्तों की असली वसीयत

लेखिका : मीना सहाय 

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