रेत की दीवारें

 “आठ लाख रुपये? क्या पागलपन है! माँ, आपको समझ भी आता है कि आठ लाख होते क्या हैं? इस उम्र में इतनी बड़ी सर्जरी का कोई तुक है? अगर ऑपरेशन के बाद भी आप चलने लायक नहीं हुईं तो? सारा पैसा पानी में बह जाएगा। आजकल डॉक्टर सिर्फ बिल बनाने के लिए सर्जरी की सलाह … Read more

कांच के महल की दरारें

  “यह आपने क्या किया सिद्धार्थ? बिना किसी दूसरी नौकरी के आपने इस्तीफा दे दिया? बच्ची का स्कूल, मकान का किराया, घर का राशन… ये सब कैसे चलेगा?” सिद्धार्थ ने बड़ी बेपरवाही और बेशर्मी से अवनि की तरफ देखा और अपने कंधे उचकाते हुए बोला, “तुम किसलिए हो? तुम्हारी नौकरी तो चल ही रही है ना! … Read more

स्वाभिमान की उड़ान

 अंकिता का एक-एक शब्द सुमित के अंतर्मन पर हथौड़े की तरह लगा। एक पर्दा सा उसकी आंखों से हट गया। उसने महसूस किया कि वह अपने खोखले पौरुष के गुरूर में कितना अंधा हो चुका था। जिस औरत ने इस घर को मंदिर बनाया, उसी के सपनों की बलि चढ़ाकर वह खुद को बड़ा साबित … Read more

उजालों का सफर

शशिकांत जी ने आगे बढ़कर अपने बेटे की पीठ थपथपाई। उनका सीना आज गर्व से चौड़ा हो गया था। “बेटा, आज तूने साबित कर दिया कि आधुनिकता और बड़ी नौकरियाँ हमारे संस्कारों को तब तक नहीं छीन सकतीं, जब तक हमारे भीतर अपनों के लिए सच्चा प्रेम ज़िंदा है।” कुछ ही देर में सदाशिव सदन … Read more

अनदेखी तपस्या

 सुहानी की आंखें तुरंत खुल जाती हैं। वह इंसान है आलोक, कोई मशीन नहीं। उसे भी थकान होती है, उसे भी दर्द होता है। पर बदले में वह क्या मांगती है? बस तुम्हारे दो मीठे बोल और थोड़ा सा सम्मान। और तुम उसे क्या देते हो? ताने और तिरस्कार?” आलोक फूट-फूट कर रो पड़ा। “दीदी, … Read more

धूप की पहली किरण

 आरव की एक-एक बात अवनि के सीने में तीर की तरह उतर रही थी। वह पच्चीस साल की पढ़ी-लिखी, समझदार युवती थी, जिसके सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी। डॉक्टर बार-बार कह रहे थे कि वह न केवल जीवित रहेगी बल्कि पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने पैरों पर चलेगी। उसका रोग कट चुका था, उसकी सांसें … Read more

ममता का तराज़ू

  दरवाज़े के बाहर, सुमित्रा देवी का पूरा अस्तित्व जैसे काँप उठा था। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी। उनके सीने में एक ऐसा दर्द उठा, जिसने उनके भीतर जमे अविश्वास, स्वार्थ और संकीर्णता के सारे पहाड़ों को एक पल में ढहा दिया। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू गंगा-जमुना की तरह बह निकले। वे … Read more

प्रायश्चित की छांव

 आज जब मैं अपने बेटे आरव को देखता हूं, तो सोचता हूं कि जमाना कितना बदल गया है। आज भौतिक चीजों की कोई कद्र नहीं बची। बच्चे गलतियां करते हैं, चीजें गंवाते हैं और हम माता-पिता अपनी आधुनिकता और लाड़-प्यार के नाम पर उन्हें तुरंत नई चीजें दिलाकर उनकी गलतियों पर पर्दा डाल देते हैं। … Read more

पंखों को मिला आकाश

तान्या को अपने पास बुलाया और उसका हाथ पकड़कर भरे गले से कहा, “तान्या, देख अपनी बहन को। मैं सोचती थी कि तुझे काम न करने देकर मैं तुझे महारानी बना रही हूँ, लेकिन सच तो यह है कि मैंने तुझे अपाहिज बना दिया। ज़िंदगी में किताबें पढ़कर डिग्रियां हासिल कर लेना बहुत आसान है, … Read more

समर्पण का दूसरा नाम

अगर यह व्रत प्रेम का प्रतीक है, अगर यह दो आत्माओं के एक होने का उत्सव है, तो फिर तपस्या सिर्फ एक तरफ से क्यों? अगर अनन्या उसके स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए प्यासी रह सकती है, तो क्या उसका यह कर्तव्य नहीं बनता कि वह भी उस पीड़ा और उस भाव का भागीदार बने? … Read more

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