ममता की कोई कीमत नहीं

“सुनीता भाभी, कुछ तो मर्यादा रखिए अपनी जुबान की। मैं इस घर की बेटी हूँ, कोई बाहर से आई लालची औरत नहीं,” अंजलि ने अपने आंसुओं को पलकों पर ही रोकते हुए भारी गले से कहा। वह अभी-अभी अपनी बीमार माँ के कमरे से बाहर निकली थी और वापस अपने घर जाने के लिए अपना … Read more

संस्कारों की धरोहर (एक अनोखा जन्मदिन)

हल्की गुलाबी धूप ड्रॉइंग रूम की खिड़कियों से छनकर कांच की मेज पर बिछी सफेद चादर को रोशन कर रही थी। रविवार की सुबह का माहौल हमेशा की तरह खुशनुमा और सुकून भरा था। रेडियो पर धीमे सुरों में पुराना हिंदी गीत बज रहा था और रसोई से गर्म-गर्म कचौड़ियों और अदरक वाली चाय की … Read more

राख से उठी उड़ान

सावन का महीना अपने पूरे शबाब पर था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और मिट्टी की सौंधी महक से पूरा वातावरण महक रहा था। आज हरियाली तीज का त्योहार था। महिलाओं के लिए यह दिन सुहाग और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। शहर की हर सड़क, हर मोहल्ले में सुहागिनें हरे रंग … Read more

अपना आसमान

कौशल्या देवी की आँखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उन्होंने झुककर अपने घर की उस पावन चौखट को चूमा। दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से उस नेमप्लेट को छुआ। अपनी खुरदुरी उंगलियों से उन्होंने अपने नाम के एक-एक अक्षर को ऐसे महसूस किया जैसे कोई अंधा व्यक्ति वर्षों बाद अचानक रोशनी … Read more

ढीठ – संध्या त्रिपाठी 

बड़ी ढीठ हो यार तुम… एक बार मना कर दिया फिर भी मानती नहीं हो…जिद पकड़ कर बैठी हो …आखिर चाहती क्या हो तुम…?  तुम्हारे अंदर थोड़ा भी आत्मसम्मान है या नहीं ….बिल्कुल चिल्लाने वाले अंदाज में प्रत्यूष ने कहा… आपने मेरी ढिठाई अभी देखी कहां है प्रत्युष…?  बचपन से ये ढीठ शब्द सुनते आई … Read more

ऐसी भाभियों सबको मिले –  आराधना श्रीवास्तव

एक बार फिर नंदनी गर्मी की छुट्टियां मनाने अपने मायके जा रही थी । वैसे तो वह हमेशा जब बच्चों की स्कूल की गर्मी की छुट्टी होती थी तो मायके जाने की योजना बना लेती थी । बच्चे भी नानी के घर जाने का जैसे इंतजार करते थे।  नंदनी के पति दिवाकर उन सबको रेलवे … Read more

वो बरगद की छांव और बाबूजी की निशानी

 मालती देवी के कांपते होंठों पर कई दिनों बाद एक हल्की, सुकून भरी मुस्कान खिल उठी। उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ उठाकर अंकित के सिर पर रख दिया। उनके स्पर्श में वही पुरानी ममता, वही आशीष लौट आया था। मालती ने कमजोर आवाज में कहा, “जीते रहो मेरे बच्चे… तुमने आज अपने दादाजी की … Read more

स्वाभिमान की नई सुबह

“फिर मेरे अंदर की ममता और मेरा डर, दोनों खत्म हो गए दीदी। मैंने उस दिन रोना छोड़ दिया। मैंने घर में रखी कपड़े धोने वाली मूसली उठाई और उसे बता दिया कि अब और नहीं। मैंने उसे घर से धक्के मारकर निकाल दिया है। कह दिया है कि अगर मुड़कर इस गली में आया, … Read more

महकते जज़्बात

 नीरजा ने बड़ी शांति से आनंद के हाथ अपने हाथों में ले लिए और हल्की सी मुस्कुराहट के साथ बोली, “शिकायत किससे करती? आपसे? मैंने आपसे प्यार किया था आनंद। प्यार में कोई शर्त नहीं होती, कोई व्यापार नहीं होता कि मैंने आपको अपना पूरा दिल दिया तो बदले में मुझे भी आपका पूरा दिल … Read more

जड़ों की पुकार

दीनानाथ जी की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। आकाश और विकास ने आगे बढ़कर अपने पिता के पैर छुए। आकाश ने रुंधे हुए गले से कहा, “हमें माफ कर दीजिए बाबूजी। हम भूल गए थे कि पेड़ चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, अगर उसकी जड़ें कट जाएं, तो वह हरा-भरा नहीं रह … Read more

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