दहलीज की धूप

शाम को अनुराग और समर ने बैठकर एक नया फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वे मां को उनकी जड़ों से अलग नहीं करेंगे, बल्कि अपनी जिंदगी में मां के लिए समय की प्राथमिकता तय करेंगे। दोनों भाइयों ने नियम बनाया कि हर दो महीने में एक भाई अपने परिवार के साथ पंद्रह दिन के लिए गांव आकर रहेगा और वर्क-फ्रॉम-होम करेगा। साथ ही, साल के सभी बड़े त्योहार अब शहरों के कंक्रीट के फ्लैटों में नहीं, बल्कि इसी पुश्तैनी हवेली के खुले आंगन में पूरी गरिमा और हंसी-खुशी के साथ मनाए जाएंगे।

  पति के जाने के बाद यह विशाल हवेलीनूमा मकान जानकी देवी के लिए एक बहुत बड़ा पिंजरा बन चुका था। काम निपटाकर नौकर-चाकर शाम ढलते ही अपने घरों को चले जाते और जानकी देवी अपनी परछाईं के साथ उस सन्नाटे में घिर जातीं।

जानकी देवी के दो बेटे थे। बड़ा बेटा अनुराग बेंगलुरु की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में ऊंचे ओहदे पर था और छोटा बेटा समर गुरुग्राम में एक मल्टीनेशनल फर्म में प्रोजेक्ट मैनेजर था। दोनों की गृहस्थी जम चुकी थी, बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे और जिंदगी की रफ्तार इतनी तेज थी कि पीछे छूट चुके रिश्तों को मुड़कर देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं थी। जब भी मां का फोन जाता, बातचीत औपचारिकता पर आकर सिमट जाती— “हां मां, सब ठीक है? दवाई ले ली थी? अभी एक कॉन्फ्रेंस में हूं, रात को फुर्सत मिलते ही बात करता हूं।” पर वो फुर्सत की रात महीनों तक कभी नहीं आती थी।

जानकी देवी की पीड़ा को अगर कोई सबसे करीब से समझता था, तो वह थे उनके छोटे देवर उमाकांत जी, जो पास के ही एक कस्बे में रहते थे। वे हफ्ते-दस दिन में अपनी भाभी का हाल-चाल लेने आ जाया करते थे। एक शाम जब उमाकांत जी हवेली पहुंचे, तो देखा कि जानकी देवी अंधेरे कमरे में बैठी सजल आंखों से दीवार पर टंगी पुरानी पारिवारिक तस्वीर को निहार रही थीं। उस तस्वीर में उनके स्वर्गीय पति, नन्हे अनुराग और समर उनके आंचल से लिपटे मुस्कुरा रहे थे।

“भाभी, इस तरह घुट-घुट कर जीने से तो आपकी बची-खुची जान भी निकल जाएगी। अनुराग और समर को मैंने पिछले महीने भी कहा था कि मां को कुछ दिन अपने साथ ले जाओ या खुद आकर रह लो, पर दोनों के पास अपनी व्यस्तताओं की लंबी फेहरिस्त है,” उमाकांत जी ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा।

जानकी देवी की आंखों से एक बूंद ढुलककर गाल पर आ गिरी। उन्होंने बेहद धीमे स्वर में कहा, “उमाकांत, बच्चों को दोष नहीं देती मैं। पर दिल कभी-कभी बहुत तड़प उठता है। क्या अपनी कोख से जन्मे बच्चों की एक झलक पाने के लिए भी मां को अपनी सांसों की भीख मांगनी पड़ेगी? मन करता है एक बार सबको अपने सामने हंसते-बोलते देख लूं, अपनी गोद में दोनों पोतों को खिला लूं, बहुओं के साथ बैठकर बातें करूं। क्या मेरे जाने के बाद ही वो इस घर की दहलीज पर कदम रखेंगे?”

उमाकांत जी अपनी भाभी का यह विलाप सुनकर भीतर तक हिल गए। कुछ देर वे चुपचाप टहलते रहे, फिर अचानक उनके चेहरे पर एक गंभीर भाव उभरा। उन्होंने कहा, “भाभी, अगर सीधे रास्ते से वे नहीं आ रहे, तो उन्हें झकझोरना पड़ेगा। अब बात मान-मनुहार की नहीं, एक कड़वे सच का आईना दिखाने की है।”

उसी रात उमाकांत जी ने बेंगलुरु और गुरुग्राम दोनों जगह फोन घुमाया। उनकी आवाज में बनावटी घबराहट और कांपते सुर थे। उन्होंने अनुराग से कहा, “बेटा अनुराग, तुरंत सब काम छोड़कर जो पहली फ्लाइट मिले, पकड़कर घर आ जाओ। भाभी की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई है। नब्ज धीमी पड़ रही है और डॉक्टर ने भी कह दिया है कि अब जो कुछ है, बस कुछ ही घंटों का खेल है। शायद वो सुबह का सूरज भी न देख पाएं। अगर अपनी मां का चेहरा आखिरी बार देखना चाहते हो, तो तुरंत निकलो।”

यही संदेश उन्होंने समर को भी दिया। फोन कटते ही दोनों बेटों के पैरों तले जमीन खिसक गई। अनुराग का लैपटॉप हाथ से छूट गया और समर अपनी फाइलें वहीं फेंककर बदहवास हो गया। जिन बेटों के पास मां से दस मिनट बात करने का वक्त नहीं था, उन्होंने पलक झपकते ही अगले दिन की फ्लाइट्स और कैब बुक कर लीं। पत्नियों ने घबराकर बैग पैक किए और बच्चों को लेकर दोनों भाई अपने-अपने शहरों से पैतृक कस्बे की ओर दौड़ पड़े।

रास्ते भर अनुराग की आंखों के सामने मां का ममतामई चेहरा घूम रहा था। उसे याद आ रहा था कि कैसे बचपन में जब उसे हल्का सा बुखार भी चढ़ता था, तो मां रात-रात भर उसके सिरहाने बैठी गीली पट्टियां बदलती रहती थी। समर को याद आ रहा था कि कॉलेज की फीस भरने के लिए मां ने अपने सोने के कंगन बिना किसी हिचक के बेच दिए थे। अपराधबोध दोनों भाइयों के सीने पर भारी पत्थर की तरह बैठ गया था। वे मन ही मन ईश्वर से केवल एक प्रार्थना कर रहे थे कि बस एक बार मां से मिलने का मौका मिल जाए, वे अपनी सारी गलतियों की माफी मांग लेंगे।

अगली सुबह करीब ग्यारह बजे, धूल-धूसरित गाड़ियां हवेली के बाहर आकर रुकीं। अनुराग और समर दोनों लगभग एक साथ पहुंचे थे। दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे रो पड़े। बहुएं बच्चों को संभाले हुए सिसक रही थीं। हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था। दोनों भाई जूते उतारे बिना पागलों की तरह अंदर की ओर भागे, यह सोचकर कि शायद मां अब इस दुनिया में नहीं रहीं और सफेद कफन में लिपटी होंगी।

लेकिन जैसे ही उन्होंने बैठक के बड़े हॉल में कदम रखा, उनके कदम वहीं जम गए। आंखों ने जो देखा, उस पर यकीन करना मुश्किल था।

हवेली का कोना-कोना चमक रहा था। बैठक में ताजे गेंदे के फूलों की महक तैर रही थी। और बीचों-बीच रखे बड़े डाइनिंग टेबल पर कोई मातम नहीं, बल्कि दावत सजी हुई थी। टेबल पर गरमा-गरम मूंग दाल का हलवा, खस्ता कचौड़ियां, दम आलू, मट्ठा, पनीर के पकोड़े और मेवे की खीर बड़े-बड़े बर्तनों में भाप छोड़ रहे थे।

और सामने… सामने जानकी देवी एक सुंदर सूती साड़ी पहने, माथे पर लाल बिंदी लगाए, बिल्कुल स्वस्थ और गरिमामयी रूप में खड़ी मुस्कुरा रही थीं। उनके ठीक पीछे उमाकांत जी हाथ बांधे शांत भाव से खड़े थे।

अनुराग और समर हक्के-बक्के रह गए। उनके चेहरे का रंग उड़ गया। चिंता, भय, हैरानी और फिर हल्के से गुस्से का मिला-जुला भाव उनके चेहरों पर तैरने लगा।

“मां… यह सब क्या है?” अनुराग की आवाज कांप गई। “चाचा जी ने तो कहा था कि आप… आपकी सांसें टूट रही हैं? हम सब रास्ते भर मरते-जीते आए हैं। और आप यहां… यह क्या तमाशा है?”

समर ने भी रुंधे गले से उलाहना दिया, “मां, अपनी ही औलाद के साथ ऐसा क्रूर मजाक? आपको अंदाजा भी है कि हम पर क्या बीती है? अगर आपको हमारी जान ही लेनी थी, तो सीधे कह देतीं!”

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। बहुएं भी अवाक खड़ी थीं।

तभी उमाकांत जी आगे आए और बेहद गंभीर आवाज में बोले, “क्रूर मजाक तुम्हारी मां ने नहीं किया बेटा, क्रूर तो वह वक्त था जो तुम दोनों ने अपनी मां को दिया। यह झूठ मैंने बुलवाया था। और अगर यह झूठ न बोलता, तो क्या तुम दोनों आज यहां खड़े होते?”

जानकी देवी धीरे-धीरे चलकर अपने दोनों बेटों के पास आईं। उन्होंने कांपते हाथों से अनुराग और समर के गालों को छुआ। उनके आंसुओं की धार अब रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

“मुझे माफ कर देना मेरे बच्चों,” जानकी देवी ने रुंधे हुए कंठ से कहा। “तुम्हें तड़पाना मेरा मकसद नहीं था। पर पिछले दो सालों से मैं इस सूने घर में तिल-तिल कर मर रही थी। जब भी मैंने तुम्हें बुलाया, तुम्हारे पास काम का बहाना था। मुझे लगने लगा था कि जीते-जी तो तुम कभी नहीं आओगे, हां, मेरे मरने की खबर सुनकर शायद दुनिया को दिखाने ही सही, दो दिन के लिए जरूर आ जाओगे। तब मेरी यह देह निस्पंद होगी, न मैं तुम्हें देख पाऊंगी, न अपने हाथों से तुम्हें तुम्हारा पसंदीदा खाना खिला पाऊंगी। मेरा मन बहुत भूखा था रे… तुम्हारे इस प्यार के लिए, इस फिक्र के लिए, जो आज तुम्हारी आंखों में मेरे लिए आंसू बनकर बह रही है। मैंने तो बस मरने से पहले एक दिन अपने बच्चों के साथ जीने की खातिर यह ढोंग रचाया था।”

मां के एक-एक शब्द ने दोनों बेटों के कलेजे को छलनी कर दिया। अनुराग और समर वहीं घुटनों के बल बैठ गए और मां के पैरों से लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगे। बहुओं की आंखें भी आंसुओं से भीग चुकी थीं।

“हमें माफ कर दीजिए मां… हम अंधे हो गए थे,” अनुराग रोते हुए बोला। “पैसों और तरक्की की अंधी दौड़ में हम यह भूल ही गए कि हमें इस मुकाम तक पहुंचाने वाली सीढ़ी आप ही थीं। हमने आपको अकेला छोड़ दिया, हम बहुत बड़े गुनहगार हैं।”

समर ने मां के आंचल में अपना मुंह छिपाते हुए कहा, “मां, अब कोई बहाना नहीं। अब आप हमारे साथ शहर चलेंगी। हम आपको इस सूने घर में एक पल भी अकेला नहीं छोड़ेंगे।”

जानकी देवी ने अपने दोनों बेटों को उठाकर सीने से लगा लिया। उन्होंने दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए बेहद ममता भरे स्वर में कहा, “नहीं मेरे बच्चों, शहर की उन बंद दीवारों और फ्लैटों में मेरा मन नहीं लगेगा। इसी घर में मेरी डोली आई थी, तुम्हारे बाबूजी की यादें इस चौखट के जर्रे-जर्रे में बसी हैं। मैं अपनी जड़ें छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहती। मुझे तुम्हारी जायदाद या शहर की चकाचौंध नहीं चाहिए, मुझे सिर्फ तुम्हारा थोड़ा सा वक्त और थोड़ा सा अहसास चाहिए कि मेरी औलाद के दिल में मेरी जगह अब भी जिंदा है।”

उस दिन हवेली में कोई गुस्सा या गिला-शिकवा नहीं बचा था। सबने मिलकर वह खाना खाया जो जानकी देवी ने पूरे जतन से बनाया था। बच्चों की हंसी से वर्षों बाद वह हवेली फिर से जी उठी।

शाम को अनुराग और समर ने बैठकर एक नया फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वे मां को उनकी जड़ों से अलग नहीं करेंगे, बल्कि अपनी जिंदगी में मां के लिए समय की प्राथमिकता तय करेंगे। दोनों भाइयों ने नियम बनाया कि हर दो महीने में एक भाई अपने परिवार के साथ पंद्रह दिन के लिए गांव आकर रहेगा और वर्क-फ्रॉम-होम करेगा। साथ ही, साल के सभी बड़े त्योहार अब शहरों के कंक्रीट के फ्लैटों में नहीं, बल्कि इसी पुश्तैनी हवेली के खुले आंगन में पूरी गरिमा और हंसी-खुशी के साथ मनाए जाएंगे।

जानकी देवी दलान में बैठी अपने पोते-पोतियों को आंगन में दौड़ते देख रही थीं। डूबते सूरज की सुनहरी किरणें उनके चेहरे पर पड़ रही थीं, जहां अब अकेलेपन का अंधेरा नहीं, बल्कि रिश्तों के पुनर्जन्म का एक अलौकिक संतोष चमक रहा था।

माता-पिता को आपकी दौलत या बड़े मकानों की नहीं, बस आपके थोड़े से वक्त और सम्मान की जरूरत होती है। क्या आज की व्यस्त पीढ़ी अपने बुजुर्गों के इस अकेलेपन को समय रहते समझ पा रही है? इस बारे में आपकी क्या राय है, हमें अपनी बात जरूर बताएं।

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