सुदीप्ति के माता-पिता ने जब अपनी बेटी की आँखों में आँसू और चेहरे पर मायूसी देखी, तो उनका दिल बैठ गया। उन्होंने विहान और उसके परिवार से बात करने की कोशिश की, ताकि रिश्ते को बचाया जा सके। लेकिन विहान के परिवार का रवैया बेहद अड़ियल था। दोनों परिवारों के बीच की बातचीत जल्द ही बहस में बदल गई। कोई भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था। विहान ने भी साफ कह दिया कि अगर सुदीप्ति को इसी तरह रहना है तो रहे, वह अपने परिवार के खिलाफ जाकर कोई बदलाव नहीं करेगा। अंततः भारी मन से यह निर्णय लिया गया कि जब दोनों साथ खुश नहीं हैं, तो बेहतर है कि वे अलग हो जाएँ। सुदीप्ति ने अपने कपड़े पैक किए और अपने मायके लौट आई। तलाक़ की कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की बात तय हो गई।
सुदीप्ति और विहान का विवाह शहर के सबसे प्रतिष्ठित समारोहों में से एक था। सुदीप्ति के पिता, श्रीकांत जी ने अपनी इकलौती बेटी की शादी में अपनी जीवन भर की जमापूंजी लगा दी थी। विहान एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊँचे पद पर कार्यरत था और उसका परिवार समाज में काफी रसूखदार माना जाता था। विहान के माता-पिता ने शादी से पहले बड़ी शालीनता से कहा था, “हमें तो बस आपकी बेटी चाहिए, हमारे घर में किसी चीज़ की कमी नहीं है। हम तो बिना दहेज की शादी के पक्षधर हैं।” यह सुनकर श्रीकांत जी की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी कि उनकी बेटी को कितना समझदार और नेक परिवार मिला है। लेकिन समाज की एक अलिखित रीत होती है, जहाँ बिना माँगे भी अपनी ‘हैसियत’ दिखानी पड़ती है। बेटी को ससुराल में कोई ताना न सुनना पड़े, इसलिए श्रीकांत जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। शानदार कार, आधुनिक सुख-सुविधाओं का सारा सामान, महंगे आभूषण और न जाने कितने उपहार विहान के परिवार को ‘सप्रेम भेंट’ किए गए। शादी बहुत धूमधाम से हुई और सुदीप्ति ढेरों सपनों के साथ अपने नए घर विदा हुई।
शुरुआती कुछ हफ्ते किसी खुशनुमा सपने की तरह बीते, लेकिन जल्द ही हकीकत की दरारें उस चमकते हुए रिश्ते पर नज़र आने लगीं। विहान और सुदीप्ति, दोनों की परवरिश और जीवन को देखने का नज़रिया बिल्कुल अलग था। सुदीप्ति जहाँ एक खुले विचारों वाली, स्वतंत्र और अपनी बातों को स्पष्ट रूप से रखने वाली लड़की थी, वहीं विहान एक रूढ़िवादी सोच का व्यक्ति था, जो चाहता था कि उसकी पत्नी केवल उसके और उसके परिवार के इशारों पर चले। बात-बात पर दोनों के बीच वैचारिक मतभेद होने लगे। इन छोटी-छोटी असहमतियों को सुलझाने के बजाय, विहान की माँ, कांता जी, उन्हें और उलझा देती थीं। कांता जी का स्वभाव हमेशा कमियाँ निकालने वाला था। सुदीप्ति चाहे घर का कितना ही काम कर ले या कितने ही जतन से रिश्ते निभाने की कोशिश करे, कांता जी को उसमें हमेशा खोट ही नज़र आता। “इतना भी क्या गुरूर है अपने मायके का, जो दिया है वो कोई अहसान थोड़ी किया है, हर बाप अपनी बेटी को देता है,” कांता जी के ये शब्द सुदीप्ति के कानों में अक्सर गूंजते थे। विहान से जब सुदीप्ति इन बातों की शिकायत करती, तो वह अपनी माँ का ही पक्ष लेता और सुदीप्ति को ही समझौता करने की नसीहत देता।
महीने बीतते गए और सुदीप्ति का घुटन भरा जीवन एक खामोश संघर्ष में बदल गया। जिस घर में वह एक पत्नी और बहू बनकर आई थी, वहाँ उसे अहसास कराया जाने लगा कि वह केवल एक ‘पैकेज’ है, जिसके साथ आए सामान की तो कद्र है, लेकिन उसकी भावनाओं की कोई कीमत नहीं। बात-बात पर मायके से लाए गए सामान की गुणवत्ता पर ताने मारे जाते। “कार का मॉडल तो पुराना दे दिया तुम्हारे पिता ने,” या “सोने की चेन में तो वज़न ही नहीं है, दिखावे का बड़ा डब्बा दे दिया।” ऐसे ताने सुदीप्ति के स्वाभिमान को रोज़ छलनी करते थे। सुदीप्ति ने कई बार विहान को समझाने की कोशिश की कि वह एक जीवनसाथी चाहती है, कोई ऐसा जो उसका सम्मान करे, लेकिन विहान का अहंकार उसके प्यार पर भारी पड़ गया। वह अक्सर कहता, “तुम इस घर के तौर-तरीकों में ढल नहीं पा रही हो।” रोज़-रोज़ की मानसिक प्रताड़ना, कलह और विहान के उदासीन रवैये ने सुदीप्ति को भीतर से तोड़ दिया था।
एक रात बात इतनी बिगड़ गई कि सुदीप्ति के मायके वालों और विहान के परिवार के बीच हुई एक छोटी सी ग़लतफ़हमी ने बड़े झगड़े का रूप ले लिया। कांता जी ने सुदीप्ति के चरित्र और उसके परिवार की परवरिश पर सीधे सवाल उठा दिए। वह रात सुदीप्ति के धैर्य की अंतिम परीक्षा थी। उसने तय कर लिया कि जिस रिश्ते में सम्मान न हो, उसे ढोते रहने का कोई अर्थ नहीं है। अगले ही दिन उसने अपने पिता को फोन किया और सब कुछ सच-सच बता दिया। श्रीकांत जी अपनी पत्नी के साथ तुरंत बेटी के ससुराल पहुँच गए।
सुदीप्ति के माता-पिता ने जब अपनी बेटी की आँखों में आँसू और चेहरे पर मायूसी देखी, तो उनका दिल बैठ गया। उन्होंने विहान और उसके परिवार से बात करने की कोशिश की, ताकि रिश्ते को बचाया जा सके। लेकिन विहान के परिवार का रवैया बेहद अड़ियल था। दोनों परिवारों के बीच की बातचीत जल्द ही बहस में बदल गई। कोई भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था। विहान ने भी साफ कह दिया कि अगर सुदीप्ति को इसी तरह रहना है तो रहे, वह अपने परिवार के खिलाफ जाकर कोई बदलाव नहीं करेगा। अंततः भारी मन से यह निर्णय लिया गया कि जब दोनों साथ खुश नहीं हैं, तो बेहतर है कि वे अलग हो जाएँ। सुदीप्ति ने अपने कपड़े पैक किए और अपने मायके लौट आई। तलाक़ की कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की बात तय हो गई।
कुछ दिनों बाद, दोनों परिवारों और कुछ रिश्तेदारों की एक बैठक श्रीकांत जी के घर पर रखी गई, ताकि रिश्ते के औपचारिक अंत और लेन-देन का हिसाब किया जा सके। बैठक के लिए विहान, उसके माता-पिता और कुछ करीबी रिश्तेदार आए थे। ड्राइंग रूम में एक अजीब सा सन्नाटा था, जो जल्द ही एक कड़वी सौदेबाजी के शोर में बदलने वाला था। श्रीकांत जी का परिवार इस बात से आहत था कि उनकी बेटी का घर उजड़ गया, लेकिन विहान का परिवार ऐसा बर्ताव कर रहा था जैसे वे कोई बिज़नेस डील कैंसिल करने आए हों।
“देखिए श्रीकांत जी, जो हुआ सो हुआ। अब जब बच्चे साथ रहना ही नहीं चाहते, तो बात को खींचने का कोई फायदा नहीं। लेकिन जो सामान सुदीप्ति अपने साथ लाई थी, वो आप वापस ले जाइए। हमारे घर में उस सामान की कोई ज़रूरत नहीं है,” कांता जी ने बड़ी बेरुखी से कहा।
यह सुनकर सुदीप्ति की माँ, मीनाक्षी जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। अपनी बेटी के उजड़ते सुहाग के दर्द और ससुराल वालों की इस बेशर्मी को देखकर वह खुद को रोक नहीं पाईं। उन्होंने कड़कती आवाज़ में कहा, “हाँ, बिल्कुल ले जाएँगे अपना सारा सामान! लेकिन क्या-क्या लौटाएंगे आप? हमने जो 25 तोला सोना दिया था, जो 15 लाख की गाड़ी विहान के शौक पूरे करने के लिए दी थी, जो घर का कोना-कोना हमने अपने पैसों से सजाया था, उसका क्या? एक-एक पाई का हिसाब होगा आज। आपने हमारी बेटी की ज़िंदगी बर्बाद कर दी और आपको सामान की पड़ी है? शादी में जो 10 लाख रुपये नकद दिए थे, वो भी वापस चाहिए हमें।”
मीनाक्षी जी के इतना कहते ही विहान के पिता भी भड़क गए। “कैसा नकद? वो तो आपने अपनी खुशी से विवाह के आयोजन में खर्च किया था। हमने कोई माँग नहीं की थी। और रही बात गाड़ी और गहनों की, तो वो आपकी बेटी के ही इस्तेमाल में आए हैं। हम तो एक-एक सुई लौटाने को तैयार हैं, लेकिन आप हम पर झूठे इल्ज़ाम मत लगाइए।”
ड्राइंग रूम का माहौल पूरी तरह से बाज़ार में तब्दील हो चुका था। दो परिवार, जो कभी एक-दूसरे के समधी बनकर गले मिले थे, आज एक-दूसरे के सामने बही-खाता खोलकर बैठे थे। बेटी की भावनाओं, उसके टूटते दिल और विहान के खोखले वादों की कोई बात नहीं कर रहा था। चर्चा सिर्फ इस बात पर हो रही थी कि गाड़ी की चाबी कौन रखेगा, सोने की अंगूठी किसके हिस्से जाएगी और टीवी-फ्रिज का बिल किसके नाम पर है। सुदीप्ति एक कोने में बैठी यह सब देख रही थी। उसे लग रहा था जैसे उसकी कोई अहमियत ही नहीं है, वह बस एक वस्तु थी जिसके साथ कुछ और वस्तुएं इस घर से उस घर भेजी गई थीं।
तभी कमरे में सुदीप्ति के बड़े भाई का आठ साल का बेटा, आरव, अपनी छोटी सी साइकिल चलाते हुए आया। वह काफी देर से बड़ों की इस चीख-पुकार को सुन रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी बुआ रो क्यों रही हैं और सब लोग इतने गुस्से में क्यों हैं। वह साइकिल रोककर अपनी दादी (मीनाक्षी जी) के पास गया और उनके आँसू पोंछते हुए बोला, “दादी, आप रो क्यों रही हो? और आप लोग ऐसे क्यों लड़ रहे हो जैसे मेरी क्लास के बच्चे लड़ते हैं?”
कमरे में पल भर के लिए शांति छा गई। मीनाक्षी जी ने आरव को अपने पास खींचते हुए कहा, “बेटा, तुम अंदर जाओ, यहाँ बड़ों की बातें हो रही हैं।”
लेकिन आरव अपनी जगह से नहीं हिला। उसने मासूमियत से विहान की तरफ देखा और बोला, “फूफा जी, आप बुआ को वापस क्यों छोड़ गए? क्या बुआ कोई खिलौना हैं कि जब आपका मन भर गया तो आपने उन्हें वापस कर दिया?”
विहान झेंप गया। उसे समझ नहीं आया कि वह एक छोटे बच्चे को क्या जवाब दे। आरव फिर अपनी दादी की तरफ घूमा और बोला, “दादी, जब मैं अपने दोस्त कबीर को अपना बैट खेलने के लिए देता हूँ और हमारी लड़ाई हो जाती है, तो मैं अपना बैट वापस ले लेता हूँ। क्या आप भी कबीर जैसी हो? जब आपने फूफा जी को गाड़ी और गिफ्ट्स दिए थे, तो क्या वो खेलने के लिए दिए थे कि लड़ाई होने पर वापस मांग रही हो? अगर वापस ही लेना था, तो दिया ही क्यों था?”
आरव के इन सवालों ने कमरे में मौजूद हर एक व्यक्ति को भीतर तक झकझोर दिया। वह अपनी बात पूरी करके रुका नहीं, उसने फिर विहान के पिता से कहा, “अंकल, जब आपके पास अपना टीवी और अपनी गाड़ी थी, तो आपने मेरे दादू से वो सब क्यों लिया? मेरी मम्मी कहती हैं कि जो चीज़ अपनी न हो, उसे नहीं लेना चाहिए। फिर आप लोगों ने क्यों लिया? और अब लड़ाई हो गई है तो सब कुछ वापस कर रहे हो। तो क्या आप लोग बुआ का प्यार और उनका जो टाइम आपके घर में बीता, वो भी वापस कर दोगे?”
एक आठ साल के बच्चे की मासूम लेकिन तीखी बातों ने पूरे कमरे में एक गहरा और भारी सन्नाटा ला दिया। मीनाक्षी जी जो कुछ देर पहले तक एक-एक चीज़ का हिसाब मांग रही थीं, उनकी आँखें शर्म से झुक गईं। विहान और उसके माता-पिता के चेहरों पर भी हवाइयां उड़ने लगीं। जिस सच्चाई को वे सब अपने अहंकार और गुस्से के पीछे छिपाने की कोशिश कर रहे थे, उस सच्चाई का आइना एक बच्चे ने उनके सामने रख दिया था।
बड़ों की इस दुनिया में जहाँ शादी को दो दिलों का मिलन कहा जाता है, वहाँ असल में यह महज़ एक लेन-देन का सौदा बन चुका था। सुदीप्ति समझ गई थी कि समाज के इस खोखले ताने-बाने में रिश्तों की बुनियाद भावनाओं पर नहीं, बल्कि भौतिक चीज़ों के लेन-देन पर टिकी है। आरव को वहाँ से कमरे के अंदर भेज दिया गया, लेकिन उसके कहे गए शब्द वहाँ मौजूद हर शख्स के ज़मीर पर चोट कर रहे थे। उस दिन के बाद हिसाब-किताब तो हुआ, सामान भी लौटाया गया और रिश्ते भी हमेशा के लिए टूट गए। लेकिन आरव की बातों ने यह साबित कर दिया कि हम चाहे कितने भी आधुनिक होने का दिखावा कर लें, दहेज और दिखावे की यह प्रथा आज भी हमारे समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए है। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम इस प्रथा को ‘प्रेम’ और ‘उपहार’ का नाम देकर खुद को धोखा देते हैं। सुदीप्ति ने उस दिन तय किया कि वह अब कभी अपने जीवन को किसी तराज़ू में तुलने नहीं देगी, जहाँ उसकी कीमत उसके साथ आए सामान से तय हो। उसने एक नई शुरुआत की, जहाँ वह खुद अपने पैरों पर खड़ी थी, बिना किसी के अहसान के।
क्या आपने भी कभी अपने आस-पास ऐसे किसी रिश्ते को टूटते देखा है जहाँ प्यार से ज्यादा अहमियत दिखावे और सामान को दी गई हो? सुदीप्ति के इस फैसले पर आपकी क्या राय है?
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#रिश्तों का तराज़ू