स्मृतियों का आँगन: एक बेटी का भ्रम

 निशा जब महज़ आठ वर्ष की थी, तब एक भीषण सड़क दुर्घटना ने उससे उसके माता-पिता का साया हमेशा के लिए छीन लिया था। नियति का यह आघात इतना गहरा था कि उस नन्ही सी जान को समझ ही नहीं आया कि उसकी दुनिया अब हमेशा के लिए वीरान हो चुकी है। ऐसे अंधकारमय समय में, उसके नाना श्री दीनानाथ जी और नानी श्रीमती कौशल्या देवी ने उसे अपने आँचल में छुपा लिया। उन्होंने अपनी वृद्धावस्था और कमज़ोर होते शरीर की परवाह किए बिना निशा को माता और पिता, दोनों का प्रेम दिया। लेकिन यह बात निशा के सगे मामा पुनीत और मामी सुलोचना को ज़रा भी रास नहीं आती थी।

मामा-मामी का मानना था कि एक ‘पराई’ बेटी पर पैसे और समय बर्बाद करना मूर्खता है। सुलोचना मामी तो आए दिन घर में क्लेश करतीं। उनका कहना था कि निशा के आने से उनके अपने बच्चों के हक़ का प्यार और सुविधाएँ छिन रही हैं। घर का माहौल इस कदर बिगड़ने लगा कि नाना जी को अपने ही बनाए उस विशाल पुश्तैनी घर में घुटन महसूस होने लगी। रोज़-रोज़ के तानों और निशा के मासूम चेहरे पर पड़ने वाली गालियों की छाया से उसे बचाने के लिए, नाना जी ने एक अत्यंत कठोर निर्णय लिया। उन्होंने अपना घर, अपनी ज़मीन का बड़ा हिस्सा बेटे-बहू को सौंप दिया और अपनी पेंशन के सहारे निशा को लेकर घर के पिछले हिस्से में बने एक छोटे से सर्वेंट क्वार्टर को ठीक करवाकर वहीं रहने लगे।

यह एक प्रकार का वनवास था, लेकिन उस छोटे से हिस्से में भी प्रेम की कोई कमी नहीं थी। नाना जी ने निशा को पढ़ाया-लिखाया और नानी ने उसे दुनियादारी के सारे संस्कार दिए। निशा जानती थी कि उसके नाना-नानी ने उसके लिए क्या कुछ नहीं सहा है। इसलिए वह भी उनके हर छोटे-बड़े काम को अपनी ज़िम्मेदारी समझती थी। समय पंख लगाकर उड़ा और निशा एक समझदार, शिक्षित और सुघड़ युवती बन गई। नाना जी ने अपनी बची-खुची जीवन भर की जमापूंजी लगाकर निशा का विवाह एक बहुत ही योग्य लड़के, सुमित से कर दिया। सुमित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था और बहुत ही सुलझा हुआ इंसान था।

विवाह के बाद निशा अपनी ससुराल चली गई, लेकिन उसका मन हमेशा उस छोटे से घर और अपने बूढ़े नाना-नानी में अटका रहता था। निशा के जाने के बाद नाना-नानी पूरी तरह से अकेले पड़ गए। उम्र के इस पड़ाव पर बीमारियाँ शरीर को घेरने लगीं। नानी को गठिया की शिकायत रहने लगी और नाना जी की आँखों की रौशनी कम होने लगी। जब उनका अकेले रहना असंभव हो गया, तो लोकलाज और समाज के डर से मामा पुनीत उन्हें वापस मुख्य घर में ले तो गए, लेकिन उनका व्यवहार कभी नहीं बदला।

ससुराल में अपनी नई गृहस्थी और तमाम ज़िम्मेदारियों के बावजूद, निशा हर दूसरे सप्ताह अपने शहर से नाना-नानी को देखने पहुँच जाती थी। वह आते ही घर के सारे काम समेटती, नानी के पैरों की मालिश करती, नाना जी को अस्पताल ले जाती और उनकी दवाइयों का डिब्बा महीनों के हिसाब से भरकर रख जाती। सुलोचना मामी इस पर भी ताने कसने से बाज़ नहीं आती थीं। “आ गई महारानी अपना राज चलाने, शादी हो गई है फिर भी इस घर से मोह नहीं छूटता,” ऐसे तीखे बाण निशा के हृदय को छलनी कर देते थे, लेकिन अपने नाना-नानी के मलीन चेहरों को देखकर वह हर अपमान का घूँट पी जाती थी। उसे लगता था कि कम से कम इसी बहाने उसे अपने उन देवताओं के दर्शन तो हो जाते हैं जिन्होंने उसे जीवन दान दिया था।

कुछ वर्ष इसी तरह खींचतान कर बीते। फिर अचानक सुमित का तबादला एक दूसरे राज्य में हो गया, जो वहाँ से हज़ारों किलोमीटर दूर था। यह निशा के लिए एक वज्रपात के समान था। अब हर हफ़्ते या महीने आना संभव नहीं था। वह फूट-फूट कर रोई थी, जब वह नाना-नानी से विदा ले रही थी। नानी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, “तू अपनी गृहस्थी बसा मेरी बच्ची, हम तो अब जाने वाले मेहमान हैं। तू खुश रहेगी तो हमारी आत्मा को शांति मिलेगी।”

निशा के जाने के कुछ महीने बाद ही वो मनहूस ख़बर आ गई। नानी जी को रात में दिल का दौरा पड़ा और वो नींद में ही इस दुनिया को छोड़ गईं। ख़बर मिलते ही निशा पागलों की तरह भागती हुई आई। सुमित ने भी हर तरह से उसे सँभाला। नानी के अंतिम दर्शन करके निशा बेसुध हो गई थी। नानी के जाने के बाद नाना जी तो जैसे पत्थर के हो गए थे। उन्होंने बोलना ही बंद कर दिया था। निशा उन्हें अपने साथ ले जाना चाहती थी, लेकिन मामा ने समाज का हवाला देते हुए साफ़ मना कर दिया कि ‘बेटी के घर बाप कैसे रहेगा, लोग क्या कहेंगे।’ मज़बूरन निशा को भारी मन से वापस लौटना पड़ा।

दूर शहर में बैठी निशा रोज़ नाना जी को फ़ोन करती, लेकिन वो केवल ‘हूँ-हाँ’ में जवाब देते। निशा का मन हमेशा एक अजीब सी घबराहट से भरा रहता था। और एक दिन उसका वह डर सच साबित हुआ। एक सुबह जब सुमित ने अख़बार उठाया, तो उसके चेहरे की रंगत उड़ गई। उसने निशा को पास बिठाया और कांपते हाथों से अख़बार का एक कोना दिखाया जहाँ शोक संदेश छपा था। नाना जी का देहांत हो चुका था।

निशा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने तुरंत मामा को फ़ोन लगाया। उधर से पुनीत मामा की ठंडी और रूखी आवाज़ आई, “हाँ, कल रात ही गुज़र गए। बहुत दूर हो तुम लोग, और गर्मी का मौसम था, शरीर ख़राब हो रहा था इसलिए सुबह ही अंतिम संस्कार कर दिया। तुम व्यर्थ में इतनी दूर से परेशान होकर मत आना, जब तेरहवीं होगी तब आ जाना।”

यह सुनकर निशा के हाथ से फ़ोन छूट गया। जिस इंसान ने उसे पिता बनकर पाला, उसे सीने से लगाकर दुनिया के हर तूफ़ान से बचाया, उसके अंतिम दर्शन करने का हक़ भी उससे छीन लिया गया। उसे जानबूझकर ख़बर नहीं दी गई ताकि मामा-मामी को उसकी आवभगत या उसके रोने-धोने का ड्रामा न झेलना पड़े। सुमित के साथ निशा तुरंत पहली उड़ान से अपने शहर पहुँची।

घर में प्रवेश करते ही एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। कोई रोने वाला नहीं था, कोई विलाप नहीं था। मामा आराम से सोफे पर बैठकर चाय पी रहे थे और मामी रसोई में कुछ पका रही थीं। निशा भागती हुई उस कमरे में गई जहाँ नाना जी रहा करते थे। कमरा खाली था। बस एक कोने में उनकी छड़ी और चश्मा रखा था। निशा उस छड़ी को सीने से लगाकर इस कदर चीख-चीख कर रोई कि पत्थर का दिल भी पसीज जाए, लेकिन उस घर की दीवारों ने तो जैसे संवेदनाओं के दरवाज़े बहुत पहले ही बंद कर दिए थे। किसी ने आकर उसके आँसू नहीं पोंछे, किसी ने उसे पानी का एक घूँट नहीं पूछा।

तेरहवीं का काम निपट गया। सारे रिश्तेदार अपने-अपने घर लौट गए। निशा का मन अब उस घर से पूरी तरह खट्टा हो चुका था। उसके लिए अब इस घर में कुछ नहीं बचा था। एक बेटी के लिए उसका मायका तब तक ही होता है, जब तक वहाँ उसके माता-पिता साँस ले रहे होते हैं। निशा के लिए तो उसके माता-पिता, उसका गुरूर, उसका रक्षा-कवच सब कुछ उसके नाना-नानी ही थे। अब जब वे ही नहीं रहे, तो इस घर से उसका रिश्ता हमेशा के लिए टूट चुका था। वह उदास, निढाल और पूरी तरह से टूट चुकी थी। कमरे में अपना सामान बांधते हुए वह सोच रही थी कि इस चौखट पर यह उसका आख़िरी कदम है। अब वह कभी लौटकर यहाँ नहीं आएगी। यह खयाल आते ही उसकी आँखों से आँसुओं की एक और धार बह निकली कि अब इस दुनिया में उसका कोई ‘मायका’ नहीं रहा।

तभी अचानक कमरे के दरवाज़े पर सुलोचना मामी आकर खड़ी हो गईं। निशा ने जल्दी से अपने आँसू पोंछे और सूटकेस की ज़िप बंद करने लगी। लेकिन तभी जो हुआ, उसकी कल्पना निशा ने सपने में भी नहीं की थी। मामी अचानक आगे बढ़ीं और उन्होंने निशा को ज़ोर से अपने गले से लगा लिया। मामी की आँखों से भी मगरमच्छ के आँसू बह रहे थे।

मामी रुंधे हुए गले से बोलीं, “रो मत मेरी बच्ची… क्या हुआ जो बाबूजी और अम्मा नहीं रहे? क्या अब से यह तेरा मायका नहीं है? बाबूजी जाते-जाते मुझे तेरी ज़िम्मेदारी सौंप गए हैं। कह गए थे कि ‘मेरी निशा को कभी यह महसूस मत होने देना कि उसका मायका छिन गया’। आँसू पोंछ ले बिटिया, अब से मैं अपनी इस बेटी की आँख में एक आँसू नहीं आने दूँगी। यह बात तेरे नाना जी के जीते जी मैं कभी समझ नहीं पाई कि तू इस घर की लक्ष्मी है। मुझे माफ़ कर दे।”

निशा स्तब्ध थी। वह पत्थर की मूरत बनी खड़ी थी। पीछे मुड़कर देखा तो दरवाज़े पर पुनीत मामा खड़े थे, और उनकी आँखों में भी अचानक से ‘ममता’ का सागर हिलोरे मार रहा था। मामा ने भी आगे बढ़कर निशा के सिर पर हाथ रखा।

निशा कोई नासमझ बच्ची नहीं थी। वह दुनिया देख चुकी थी। उसे सुलोचना मामी और पुनीत मामा के व्यवहार में आए इस रातों-रात चमत्कारी परिवर्तन का कारण समझने में देर नहीं लगी। उसे याद आया कि कैसे वकील साहब कल नाना जी की वसीयत पढ़कर गए थे, जिसमें नाना जी ने अपने हिस्से की एक बहुत बड़ी एफडी (Fixed Deposit) और गाँव की कुछ ज़मीन निशा के नाम कर दी थी, लेकिन उसमें एक शर्त थी कि वह पैसा निशा को तभी मिलेगा जब वह खुद उस पर हस्ताक्षर करेगी और वो भी मामा की मौज़ूदगी में। इसके अलावा, समाज में मामा की छवि बहुत ख़राब हो रही थी कि उन्होंने एक अनाथ भांजी को अंतिम संस्कार में भी नहीं बुलाया। यह सब उसी छवि को सुधारने और उस पैसे तक अपनी पहुँच बनाने का एक बहुत ही भद्दा और स्पष्ट नाटक था।

क्या राज़ है, यह निशा जानती थी। वह जानती थी कि यह स्नेह झूठा है, ये आँसू ग्लिसरीन के हैं, और ये ‘मायका’ शब्दों का एक खोखला ढांचा है जिसकी नींव में केवल स्वार्थ की ईंटें लगी हैं। लेकिन फिर भी… निशा ने खुद को मामी से अलग नहीं किया। उसने मामी के कंधे पर सिर रख दिया और अपनी आँखें मूंद लीं।

वह जानती थी कि यह एक छलावा है, लेकिन एक अनाथ लड़की, जिसने अभी-अभी अपने जीवन के आख़िरी दो सहारे खो दिए हों, उसे यह छलावा भी कुछ पल के लिए सुकून दे रहा था। इंसान की फितरत भी कितनी अजीब होती है, वह एक भ्रम में भी अपना घर ढूँढ लेता है। झूठी सांत्वना ही सही, पर अब उसे यह कहने को तो होगा कि उसका भी एक ‘मायका’ है, जहाँ तीज-त्यौहार पर वह जा सकती है, जहाँ से उसके लिए शगुन के दो कपड़े आ सकते हैं। कहते हैं न कि बेटी मायके से कभी खाली हाथ नहीं जाती, निशा भी उस घर से रिश्तों का एक ऐसा झूठा आवरण अपने साथ ले जा रही थी, जिसे वह ताउम्र एक सच की तरह ओढ़कर रखना चाहती थी।

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