सुमन के हाथ से चाय का कप छलकते-छलकते बचा। उसने अपनी घबराहट को छुपाते हुए विषय बदल दिया, लेकिन उसके दिमाग में जैसे एक बवंडर उठ खड़ा हुआ था। घर लौटते समय रास्ते भर उसके दिमाग में श्रुति की कही बातें, वो लैपटॉप बैग, राजीव का बार-बार टूर पर जाना, सब कुछ एक फिल्म की तरह घूमने लगा। उसने घर आकर खुद को शांत करने की कोशिश की, लेकिन एक औरत का अंतर्ज्ञान कभी गलत नहीं होता।
राजीव इस समय ‘हैदराबाद’ के एक लंबे प्रोजेक्ट पर गया हुआ था और उसे लौटने में अभी तीन दिन बाकी थे। सुमन ने ठान लिया कि वह किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले सच्चाई का पूरी तरह से पता लगाएगी। वह नहीं चाहती थी कि बिना किसी ठोस सबूत के वह अपने इतने सालों के खूबसूरत रिश्ते पर शक की कोई लकीर खींचे। लेकिन सच जानने की बेचैनी उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
सुमन और राजीव की शादी को बारह साल हो चुके थे। उनका एक प्यारा सा नौ साल का बेटा था, आरव। राजीव एक मल्टीनेशनल कंस्ट्रक्शन कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर था, जिसके कारण उसे महीने के पंद्रह दिन शहर से बाहर रहना पड़ता था। सुमन एक बहुत ही समझदार, सुलझी हुई और समर्पित गृहिणी थी, जिसने अपना पूरा जीवन राजीव और आरव के इर्द-गिर्द बुन लिया था। उनके बीच का रिश्ता समाज और रिश्तेदारों के लिए एक मिसाल था। राजीव जब भी टूर से लौटता, सुमन के लिए महंगे तोहफे और ढेर सारा प्यार लेकर आता। उसकी मीठी बातें और देखभाल करने का तरीका सुमन को यह अहसास दिलाता था कि वह दुनिया की सबसे खुशनसीब पत्नी है।
अकेलेपन को दूर करने के लिए सुमन ने अपनी ही सोसाइटी से कुछ दूरी पर स्थित एक कम्युनिटी सेंटर में पेंटिंग क्लासेस जाना शुरू कर दिया था। बचपन से ही उसे रंगों से प्यार था, लेकिन पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के चलते यह शौक कहीं पीछे छूट गया था। पेंटिंग क्लास में ही उसकी मुलाकात श्रुति से हुई। श्रुति एक बेहद शांत, खूबसूरत और सौम्य स्वभाव की महिला थी। वह भी अपनी तीन साल की बेटी, मायरा के साथ अक्सर क्लास में आती थी। कुछ ही दिनों में दोनों के बीच एक अच्छी दोस्ती हो गई। दोनों की उम्र लगभग समान थी और दोनों के ही पति अक्सर काम के सिलसिले में टूर पर रहते थे, इसलिए दोनों के बीच बातचीत के कई विषय मिल जाते थे।
श्रुति ने एक दिन कॉफी पीते हुए सुमन को बताया था कि उसके पति ‘विकास’ एक बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं और उनका ज़्यादातर समय दुबई और बैंगलोर में बीतता है। श्रुति शहर के एक पॉश इलाके में रहती थी, जो सुमन के घर से महज़ चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर था। दोनों अक्सर एक-दूसरे के सुख-दुख बांटने लगीं। सुमन को श्रुति में एक छोटी बहन नज़र आती थी, जो नई-नई इस शहर में आई थी और अक्सर अकेलेपन से जूझती थी। श्रुति भी सुमन का बहुत सम्मान करती थी और अक्सर अपने पति की बातें सुमन से साझा करती। श्रुति बताती थी कि कैसे ‘विकास’ उसे हर छोटी-बड़ी चीज़ में खुश रखने की कोशिश करते हैं, कैसे उन्हें खाने में कम मसाले वाला खाना पसंद है और कैसे उन्हें रविवार की सुबह पुराने गाने सुनने की आदत है।
सुमन अक्सर मुस्कुरा देती, क्योंकि राजीव की आदतें भी बिल्कुल वैसी ही थीं। उसे भी पुराने गानों का शौक था और वह भी तीखा खाने से परहेज करता था। सुमन इसे महज़ एक इत्तेफाक मानकर टाल देती थी। दुनिया में बहुत से लोगों की आदतें मिल सकती हैं, इसमें सोचने वाली क्या बात थी।
एक दिन क्लास के बाद अचानक ज़ोरदार बारिश होने लगी। श्रुति अपनी गाड़ी नहीं लाई थी, इसलिए सुमन ने ज़ोर देकर कहा कि वह उसे उसके घर तक छोड़ देगी। श्रुति के घर का दरवाज़ा खुला और सुमन पहली बार उसके घर के अंदर दाखिल हुई। घर बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया था। श्रुति सुमन को ड्राइंग रूम में बैठाकर उसके लिए चाय बनाने किचन में चली गई। सुमन खाली बैठी कमरे की सजावट देख रही थी कि तभी उसकी नज़र सोफे के किनारे रखे एक कस्टमाइज़्ड लेदर के लैपटॉप बैग पर पड़ी। सुमन की आँखें उस बैग पर टिक कर रह गईं। वह कोई आम बैग नहीं था। उस बैग पर ‘R’ अक्षर की एक बहुत ही खास डिज़ाइन वाली एम्ब्रॉयडरी की गई थी, जिसे सुमन ने खुद एक कारीगर से विशेष रूप से डिज़ाइन करवाकर राजीव को उनकी पिछली सालगिरह पर गिफ्ट किया था।
सुमन के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने खुद को संभाला और सोचा कि शायद वैसी ही डिज़ाइन किसी और ने भी बना ली हो। जब श्रुति चाय लेकर आई, तो सुमन ने बातों-बातों में उस बैग के बारे में पूछा। श्रुति ने हंसते हुए कहा, “अरे, यह विकास का पुराना बैग है। उन्हें किसी ने गिफ्ट किया था, लेकिन अब वो इसे कम ही इस्तेमाल करते हैं। आज शायद वो अपना नया बैग ले जाना भूल गए और इसे यहीं छोड़ गए।”
सुमन के हाथ से चाय का कप छलकते-छलकते बचा। उसने अपनी घबराहट को छुपाते हुए विषय बदल दिया, लेकिन उसके दिमाग में जैसे एक बवंडर उठ खड़ा हुआ था। घर लौटते समय रास्ते भर उसके दिमाग में श्रुति की कही बातें, वो लैपटॉप बैग, राजीव का बार-बार टूर पर जाना, सब कुछ एक फिल्म की तरह घूमने लगा। उसने घर आकर खुद को शांत करने की कोशिश की, लेकिन एक औरत का अंतर्ज्ञान कभी गलत नहीं होता।
राजीव इस समय ‘हैदराबाद’ के एक लंबे प्रोजेक्ट पर गया हुआ था और उसे लौटने में अभी तीन दिन बाकी थे। सुमन ने ठान लिया कि वह किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले सच्चाई का पूरी तरह से पता लगाएगी। वह नहीं चाहती थी कि बिना किसी ठोस सबूत के वह अपने इतने सालों के खूबसूरत रिश्ते पर शक की कोई लकीर खींचे। लेकिन सच जानने की बेचैनी उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
सुमन ने एक योजना बनाई। उसने अगले दिन श्रुति को फोन किया और कहा कि इस रविवार को आरव का दसवां जन्मदिन है और उसने घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी है। उसने श्रुति और छोटी मायरा को खास तौर पर आमंत्रित किया। श्रुति ने खुशी-खुशी आने के लिए हामी भर दी। रविवार का ही वह दिन था, जब राजीव को अपनी ‘हैदराबाद’ ट्रिप से वापस आना था। सुमन ने राजीव को फोन पर बस इतना बताया कि उसने रविवार की दोपहर को एक बहुत ही खास सरप्राइज़ लंच रखा है और उसे ठीक एक बजे तक घर पहुंचना है। राजीव ने अपने चिर-परिचित प्यार भरे अंदाज़ में कहा कि वह अपनी जान के लिए समय पर ज़रूर पहुंच जाएगा।
रविवार की सुबह सुमन ने घर को बहुत खूबसूरती से सजाया। उसने राजीव का पसंदीदा खाना बनाया, लेकिन उसके चेहरे पर आज वो चमक नहीं थी, जो अक्सर राजीव के लौटने के दिन हुआ करती थी। अंदर एक अजीब सी कशमकश और डर का माहौल था। ठीक बारह बजे श्रुति अपनी प्यारी सी बेटी मायरा के साथ सुमन के घर पहुंची। दोनों बहुत खुश नज़र आ रही थीं। सुमन ने उन्हें ड्राइंग रूम में बैठाया और मेहमान नवाज़ी में लग गई। मायरा पूरे घर में खेलते हुए इधर-उधर भाग रही थी।
घड़ी की सुइयां जैसे सुमन के दिल की धड़कन के साथ चल रही थीं। ठीक एक बजे बाहर गाड़ी रुकने की आवाज़ आई। सुमन के कदम वहीं ठिठक गए। श्रुति सोफे पर बैठकर आरव से बातें कर रही थी। दरवाज़े की घंटी बजी। सुमन ने कांपते हाथों से दरवाज़ा खोला। सामने राजीव खड़ा था, हाथ में एक बड़ा सा गिफ्ट बॉक्स लिए और चेहरे पर वही पुरानी, आकर्षक मुस्कान।
“सरप्राइज़ मेरी जान!” राजीव ने अंदर कदम रखते हुए कहा।
सुमन एक शब्द नहीं बोल पाई। वह बस एक कदम पीछे हट गई। राजीव मुस्कुराता हुआ ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने ड्राइंग रूम में कदम रखा, सामने सोफे पर बैठी श्रुति को देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके हाथ से गिफ्ट बॉक्स छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
आवाज़ सुनकर मायरा पलटी और दरवाज़े पर खड़े शख्स को देखते ही उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं।
“पापा! पापा आ गए!” मायरा तुतलाती हुई आवाज़ में चीखी और दौड़कर राजीव के पैरों से लिपट गई।
कमरे में एक ऐसा सन्नाटा छा गया, जिसे केवल उस बच्ची की मासूम आवाज़ ही चीर रही थी। श्रुति अपनी जगह पर बुत बनकर खड़ी हो गई थी। उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था। वह कभी राजीव को देखती, जिसे वह ‘विकास’ के नाम से जानती थी, और कभी सुमन को, जिसे वह अपनी एक अच्छी दोस्त मान चुकी थी।
राजीव की हालत ऐसी थी मानो किसी ने उसकी रगों से खून खींच लिया हो। उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें साफ़ झलक रही थीं। वह कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसके गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी। उसने इतने सालों से जिस धोखे का ताना-बाना इतनी सफाई से बुना था, वह आज एक ही झटके में तार-तार हो गया था।
सुमन की आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी खामोशी थी जो किसी भी तूफान से ज़्यादा भयानक थी। उसने अपनी ज़िन्दगी के बारह साल जिस इंसान को भगवान मानकर सौंप दिए थे, वह एक ही शहर में, उससे महज़ कुछ किलोमीटर दूर एक दूसरी दुनिया बसाए हुए था।
श्रुति की आँखों से आंसू बहने लगे। वह लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ी और मायरा को राजीव से दूर खींच लिया। उसे यह समझने में देर नहीं लगी कि वह भी एक बहुत बड़े धोखे का शिकार हुई है। जिस इंसान ने उसे एक नई ज़िन्दगी का सपना दिखाया था, वह पहले से ही किसी और का घर उजाड़ रहा था। दोनों औरतें, जो एक-दूसरे को सहेली मानती थीं, आज एक ही धोखेबाज़ इंसान के बिछाए जाल में फंसकर एक-दूसरे के सामने एक अजीब सी नियति का शिकार बनकर खड़ी थीं।
सुमन ने गहरी सांस ली, राजीव की तरफ एक आखिरी नज़र देखी, जिसमें अब न तो कोई प्यार था और न ही कोई शिकायत। सिर्फ एक गहरा तिरस्कार था। उसने श्रुति का हाथ पकड़ा और उसे सोफे पर बैठाते हुए पानी का गिलास थमा दिया। आज दो औरतों ने एक इंसान के झूठे चेहरे को बेनकाब कर दिया था, और राजीव अपने ही बुने हुए झूठ के मलबे के नीचे दब चुका था।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या सुमन को इस सच के बाद राजीव को अपनी बात रखने का एक मौका देना चाहिए था, या फिर ऐसे धोखे की कोई माफ़ी नहीं होती? अपने विचार और सुमन के लिए आपकी क्या सलाह है, कमेंट में ज़रूर बताएं।
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#छलावा: एक खूबसूरत धोखे की दास्तान
लेखिका : कविया गोयल