अपनों का साथ ही सबसे बड़ी दौलत है – हिमानी बंसल

“रिश्ते अपने आप नहीं टूटते। वे तब टूटते हैं जब बात करना बंद हो जाता है, एक-दूसरे को समझना बंद हो जाता है और ‘मैं’ की जगह ‘हम’ खो जाता है।” नैना बचपन से ही मेधावी, आत्मविश्वासी और स्पष्टवादी थी। वह हर बात साफ़-साफ़ कहती थी। उसका उद्देश्य कभी किसी का दिल दुखाना नहीं होता … Read more

कब तक आत्मसम्मान खोकर जीऊँ – मंजू ओमर

विवेक मुझे ₹200 दे देना ऑफिस जाने से पहले इतना कह के काजल विवेक का खाना पैक करने लगी । और जब विवेक का ऑफिस जाने के लिए कमरे से बाहर आया तो काजल ने उसका टिफिन देते हुए बोली विवेक वह ₹200 दे दो मुझे जाने से पहले। अरे क्या है यह रोज तुम … Read more

*भगवान के घर देर है पर अंधेर नही* – तोषिका

“क्या हुआ बेटा, ऐसे रो क्यों रहा है?” सुनीता ने अपने बेटे अंश से पूछा। अंश ने बोला “कुछ नहीं मा, बस ऐसा लग रहा है कि जिंदगी साथ नहीं दे रही है।” “ऑफिस में कुछ ठीक नहीं चल रहा है क्या?” उसकी मां ने अंश के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला। नहीं मा … Read more

 सच्चे धागे

विशाखा जब से अनुराग के घर ब्याह कर आई थी, पूरे घर में अक्सर उसी के स्वभाव की चर्चा दबी जुबान में होती रहती थी। विशाखा एक बहुत ही शांत, गंभीर और कम बोलने वाली लड़की थी। वह पेशे से एक बैंक अधिकारी थी और उसे फालतू की गपशप, मोहल्ले की औरतों के साथ बैठकर … Read more

 बहू कम और बेटी ज्यादा

“रोहन, तुम किसी भी गलतफहमी में मत रहना। मैं तुम्हारी माँ की तीमारदारी करने के लिए वहाँ बिल्कुल नहीं जा रही हूँ।” श्रुति ने अपने बैग में लैपटॉप रखते हुए बहुत ही सपाट और कठोर स्वर में कहा। रोहन ने अभी-अभी फोन रखा था और वह गहरी चिंता में था। फोन उसके गृहनगर से था। … Read more

दुख का भारी पत्थर

आज माधवी और राघव की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह—सिल्वर जुबली—थी। पिछले एक हफ्ते से दोनों के बच्चे, आर्यन और शिखा, इस पार्टी की तैयारियों में दिन-रात एक किए हुए थे। शहर के सबसे बड़े बैंक्वेट हॉल से लेकर मेहमानों की लिस्ट तक, सब कुछ तय हो चुका था। माधवी अपने कमरे में आईने के सामने … Read more

अपराधबोध

आनंद और सुधा की कहानी भी उन हजारों प्रेम कहानियों जैसी ही थी, जिन्हें समाज और परिवार आसानी से स्वीकार नहीं करते। आज से पैंतीस साल पहले जब उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामा था, तो उनके परिवारों ने हमेशा के लिए उनसे अपने दरवाजे बंद कर लिए थे। बिना किसी सहारे के, एक अजनबी शहर … Read more

आशीर्वाद

अंजलि अपना सूटकेस पैक कर रही थी। शादी के बाद यह उसका पहला सावन था और मायके जाने की खुशी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। पूरे एक महीने के लिए वह अपने बचपन की सखियों, माँ के हाथ के खाने और उस पुराने झूले के पास जाने वाली थी, जहाँ उसने अपनी ज़िंदगी … Read more

सच्चा प्यार और साथ

दीपावली के दीयों की तरह ही उस दिन घर का कोना-कोना जगमगा रहा था, जब विशाखा पहली बार नई नवेली दुल्हन बनकर इस घर की दहलीज पार कर रही थी। विशाखा और सुशांत का विवाह दो परिवारों का ही नहीं, बल्कि दो जिम्मेदार और परिपक्व इंसानों का मिलन था। सुशांत का परिवार काफी बड़ा था। … Read more

सच्ची मां

“अंजलि बेटा, जरा बाहर आना।” सुमित्रा जी ने अपनी अलमारी को ताला लगाते हुए अपनी नई नवेली बहू अंजलि को आवाज दी। अगले ही पल अंजलि रसोई से अपने हाथ पोंछती हुई बाहर आ गई। उसकी आंखें थोड़ी सूजी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ था। सुमित्रा जी ने अंजलि को हिदायत देते हुए कहा, … Read more

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