खामोश चीखें और एक माँ की दहाड़

 एक माँ का दिल सब समझता है। कल्याणी को यह समझते देर नहीं लगी कि वह जिस भेड़िये से अपनी बच्चियों को बचाने के लिए भागी थी, वह भेड़िया तो रक्षक का रूप धरकर उसके घर में ही बैठा है। उस रात कल्याणी सो नहीं पाई। उसने काव्या और दिशा से बात की, तो बच्चियों ने रो-रोकर बताया कि विकास पिछले कई दिनों से उनके साथ कैसी घिनौनी हरकतें कर रहा है और किसी को बताने पर उन्हें जान से मारने की धमकी देता है। कल्याणी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह खून के आंसू रोने लगी। जिस इंसान को उसने भगवान समझकर अपनी बेटियों की सुरक्षा सौंपी थी, वही उनकी आबरू का दुश्मन बन बैठा था।

कल्याणी की दुनिया उस दिन पूरी तरह से उजड़ गई थी, जिस दिन उसके पति माधव का एक सड़क दुर्घटना में आकस्मिक निधन हो गया। पैंतीस वर्ष की कच्ची उम्र और साथ में तीन मासूम बेटियाँ—पंद्रह साल की काव्या, तेरह साल की दिशा और दस साल की नन्ही पीहू। माधव के जाने के बाद कल्याणी के जीवन में जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। वह केवल एक गृहिणी थी, जिसने घर की चारदीवारी और अपने परिवार के अलावा बाहरी दुनिया का ज्यादा सामना नहीं किया था। माधव के अंतिम संस्कार की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि समाज के लोगों के असली चेहरे सामने आने लगे। जो रिश्तेदार कल तक कल्याणी को अपनी बेटी मानते थे, वे अब उससे कतराने लगे। लेकिन सबसे डरावना था वह समाज, जो एक बेसहारा और युवा विधवा को एक कमज़ोर शिकार की तरह देखता था।

कल्याणी जब भी बेटियों को स्कूल छोड़ने जाती या राशन का सामान लेने बाज़ार निकलती, तो उसे आस-पास के मर्दों की गिद्ध जैसी नज़रें अपने और अपनी बड़ी बेटी काव्या के शरीर पर चुभती हुई महसूस होतीं। गली के नुक्कड़ पर खड़े लोग फब्तियां कसते, और कुछ तो मदद के बहाने घर में घुसने की कोशिश भी करते। कल्याणी रातों को जागकर दरवाज़े की कुंडी बार-बार चेक करती। वह अपनी बेटियों को अपने आंचल में ऐसे छिपा कर रखती, जैसे कोई मुर्गी अपने चूज़ों को बाज़ से बचा रही हो। लेकिन यह डर का साया दिन-ब-दिन गहराता जा रहा था। आर्थिक तंगी ने भी अब अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर दिया था। माधव की बची-खुची जमा-पूंजी खत्म हो रही थी, और बच्चियों के स्कूल की फीस भरने के भी लाले पड़ गए थे।

ऐसे घुटन भरे और अंधकारमय समय में विकास का प्रवेश हुआ। विकास, माधव का एक पुराना परिचित था, जिसका शहर में एक अच्छा-खासा कपड़े का व्यापार था। वह समाज में एक शरीफ और इज्ज़तदार इंसान के रूप में जाना जाता था। विकास ने शुरुआत में कल्याणी की बहुत मदद की। कभी वह बच्चों के लिए किताबें ले आता, तो कभी बिना बताए स्कूल की फीस जमा कर देता। कल्याणी ने कई बार उसे रोकना चाहा, लेकिन विकास हमेशा यही कहता, “भाभी जी, माधव मेरा भाई जैसा था, क्या मैं उसकी बच्चियों के लिए इतना भी नहीं कर सकता? आप मुझे गैरों में मत गिनिए।” विकास का यह अपनापन कल्याणी के सूखे हुए जीवन में बारिश की पहली बूंद जैसा था। समाज के तानों और बुरी नज़रों के बीच विकास एक रक्षक की तरह खड़ा नज़र आता था।

एक दिन विकास ने कल्याणी के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। उसने बड़ी ही शालीनता से कहा, “कल्याणी जी, समाज बहुत ज़ालिम है। एक अकेली औरत का तीन बच्चियों के साथ रहना सुरक्षित नहीं है। मैं आपको और बच्चियों को अपना नाम देना चाहता हूँ, ताकि कोई आप लोगों की तरफ आँख उठाकर भी न देख सके।” कल्याणी के लिए यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन जब उसने अपनी बेटियों के भविष्य और समाज की भूखी नज़रों के बारे में सोचा, तो उसे विकास का प्रस्ताव एक सुरक्षित पनाहगाह लगा। रिश्तेदारों ने भी समझाया कि ऐसा नेक इंसान किस्मत वालों को मिलता है। अंततः, कल्याणी ने अपनी बेटियों की खातिर अपने मन को मारा और एक सादे समारोह में मंदिर में विकास के साथ सात फेरे ले लिए। वह अपनी पुरानी यादों और घर को छोड़कर बेटियों के साथ विकास के बड़े से घर में रहने आ गई।

शुरुआत के कुछ दिन सब कुछ किसी सपने जैसा लगा। बच्चियों को अच्छा खाना, पहनने को नए कपड़े और एक पिता का प्यार मिल रहा था। कल्याणी ने भी राहत की सांस ली थी कि अब उसे समाज की उन गंदी नज़रों से डरने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन यह भ्रम बहुत जल्दी टूटने वाला था। विकास के चेहरे पर पड़ा शराफत का मुखौटा धीरे-धीरे दरकने लगा था। कल्याणी ने महसूस किया कि विकास का बच्चियों के प्रति व्यवहार कुछ अजीब होता जा रहा है। वह जरूरत से ज्यादा काव्या और दिशा के करीब जाने की कोशिश करता। कभी ‘पिता’ के लाड़-प्यार के नाम पर उन्हें गोद में बिठाने की कोशिश करता, तो कभी उनके कपड़ों को लेकर अजीब सी बातें करता।

काव्या जो अब समझदार हो रही थी, विकास की इन हरकतों से सहमने लगी थी। वह विकास के घर में होने पर अपने कमरे से बाहर नहीं निकलती थी। एक दोपहर, जब कल्याणी रसोई में काम कर रही थी, उसने देखा कि विकास दिशा को कमरे में अकेला पाकर उसे गलत तरीके से छूने की कोशिश कर रहा था। दिशा डर के मारे काँप रही थी। कल्याणी के हाथ से चाय का कप छूटकर ज़मीन पर गिर गया और टुकड़े-टुकड़े हो गया। वह दौड़कर कमरे में गई और दिशा को अपने सीने से लगा लिया। जब उसने विकास से इस बारे में पूछा, तो उसने बड़ी ही बेशर्मी से हंसते हुए कहा, “अरे कल्याणी, तुम भी ना! मैं तो अपनी बेटी को प्यार कर रहा था। तुम्हारी सोच ही गंदी है।”

लेकिन एक माँ का दिल सब समझता है। कल्याणी को यह समझते देर नहीं लगी कि वह जिस भेड़िये से अपनी बच्चियों को बचाने के लिए भागी थी, वह भेड़िया तो रक्षक का रूप धरकर उसके घर में ही बैठा है। उस रात कल्याणी सो नहीं पाई। उसने काव्या और दिशा से बात की, तो बच्चियों ने रो-रोकर बताया कि विकास पिछले कई दिनों से उनके साथ कैसी घिनौनी हरकतें कर रहा है और किसी को बताने पर उन्हें जान से मारने की धमकी देता है। कल्याणी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह खून के आंसू रोने लगी। जिस इंसान को उसने भगवान समझकर अपनी बेटियों की सुरक्षा सौंपी थी, वही उनकी आबरू का दुश्मन बन बैठा था।

कल्याणी ने जब विकास का विरोध किया और घर छोड़कर जाने की बात कही, तो विकास अपने असली शैतानी रूप में आ गया। उसने कल्याणी को बुरी तरह पीटा और उसके बालों को पकड़कर घसीटते हुए कहा, “कहाँ जाएगी तू इन तीन बोझों को लेकर? मेरे पैसों पर पल रही हो और मुझे ही आंखें दिखाती हो? अगर घर से बाहर कदम भी रखा, तो समाज को बता दूँगा कि तेरी बच्चियों का ही चरित्र खराब है, जो मुझे फंसाने की कोशिश कर रही हैं। कौन करेगा एक विधवा पर यकीन? चुपचाप यहाँ पड़ी रह।”

विकास की धमकियों और ताकत के आगे कल्याणी कुछ दिन के लिए बेबस हो गई। घर का माहौल एक जेल जैसा हो गया था। विकास ने घर के बाहर ताला लगाना शुरू कर दिया था। बच्चियों का स्कूल जाना बंद हो गया। हर दिन कल्याणी और उसकी बेटियों के लिए एक मानसिक और शारीरिक यातना बन गया था। विकास शराब पीकर आता और कल्याणी के साथ मारपीट करता, और बच्चियों को गंदी नज़रों से घूरता। कल्याणी रात-रात भर दरवाज़े के आगे कुर्सी डालकर बैठी रहती, ताकि विकास बच्चियों के कमरे में न जा सके। उसका रोम-रोम अपनी बेटियों की रक्षा के लिए जल रहा था। वह जानती थी कि अगर उसने अब कोई कदम नहीं उठाया, तो उसकी बेटियों का जीवन नर्क बन जाएगा।

बर्दाश्त की हद तब पार हो गई जब एक रात विकास नशे में धुत होकर काव्या के कमरे का दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश करने लगा। कल्याणी ने उसे रोकने की कोशिश की, तो उसने कल्याणी को धक्का देकर ज़मीन पर गिरा दिया। उस क्षण कल्याणी के अंदर की डरी-सहमी औरत मर गई और एक खूंखार माँ ने जन्म लिया। उसने पास ही रखी लोहे की भारी रॉड उठाई और विकास के सिर पर पूरी ताकत से दे मारी। विकास लहूलुहान होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। कल्याणी ने एक पल भी नहीं गँवाया। उसने अपनी बच्चियों को साथ लिया, दरवाज़े का ताला तोड़ा और आधी रात को सीधे महिला पुलिस थाने की तरफ भाग पड़ी।

थाने पहुँचकर कल्याणी ने जब अपने और अपनी बेटियों के शरीर पर चोट के निशान दिखाए और विकास की दरिंदगी की दास्तान सुनाई, तो पुलिस वालों का भी खून खौल उठा। कल्याणी ने साफ कह दिया था कि उसे अब समाज की परवाह नहीं है, उसे अपनी बेटियों के लिए न्याय चाहिए। महिला पुलिस अधिकारी ने तुरंत कार्रवाई की। विकास को उसी रात गिरफ्तार कर लिया गया।

अगले कुछ महीने कल्याणी के लिए एक अग्निपरीक्षा की तरह थे। समाज के लोग, विकास के रसूखदार दोस्त और रिश्तेदार, सबने कल्याणी पर दबाव डाला। उसे चरित्रहीन कहा गया, पैसे का लालची बताया गया। कोर्ट में विकास के वकीलों ने कल्याणी और उसकी बेटियों पर अनगिनत कीचड़ उछाले। लेकिन कल्याणी एक चट्टान की तरह डटी रही। उसने अपनी बच्चियों को भी हौसला दिया कि सच बोलने से कभी नहीं डरना चाहिए। काव्या और दिशा ने जज के सामने बिना डरे विकास की सारी करतूतों को बयान किया।

कल्याणी द्वारा जुटाए गए सुबूतों, बच्चियों की गवाही और पुलिस की मजबूत चार्जशीट के आगे विकास का पैसा और रसूख काम नहीं आया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए कल्याणी के पक्ष में फैसला सुनाया। पॉक्सो (POCSO) एक्ट और घरेलू हिंसा कानून के तहत विकास को कड़ी से कड़ी सज़ा सुनाई गई और उसे सालों के लिए सलाखों के पीछे भेज दिया गया।

जिस दिन कोर्ट का फैसला आया, कल्याणी जब अदालत से बाहर निकली, तो उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन वे बेबसी के नहीं, बल्कि जीत के आंसू थे। समाज के वे लोग जो कल तक उस पर उंगलियां उठा रहे थे, आज उसकी हिम्मत के आगे नतमस्तक थे। कल्याणी ने साबित कर दिया था कि एक माँ अपनी संतानों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

आज कल्याणी ने सिलाई-कढ़ाई का अपना एक छोटा सा काम शुरू कर दिया है। उसकी तीनों बेटियाँ फिर से स्कूल जाने लगी हैं और खुले आसमान के नीचे बिना किसी डर के सांस ले रही हैं। कल्याणी ने समाज को एक कड़ा संदेश दिया है कि इंसान के रूप में छिपे इन जानवरों से छिपकर या डरकर जीने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि उन्हें बेनकाब करके सलाखों के पीछे पहुँचाने और उन्हें खून के आंसू रुलाने की ज़रूरत है। बुराई कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, एक माँ की ममता और उसके साहस के आगे उसे घुटने टेकने ही पड़ते हैं।

क्या आपको लगता है कि समाज में आज भी अकेली महिलाओं को सुरक्षा देने की बजाय उन्हें कमज़ोर समझा जाता है? कल्याणी के इस कदम पर आपके क्या विचार हैं? कृपया कमेंट करके अपनी राय ज़रूर साझा करें।

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