बुढ़ापे में माता-पिता लाचार हो जाते हैं

“पापा, मम्मी, आप दोनों जल्दी से अपना सामान समेट लीजिए। तीन बजे तक निकलना सही रहेगा। अगर और देर हुई तो एक्सप्रेसवे के ट्रैफिक में बुरी तरह फंस जाएंगे और रात हो जाएगी,” विकास ने अपनी कलाई घड़ी देखते हुए एक व्यापारिक लहजे में कहा। विकास की इस बात को सुनकर दीनानाथ जी का चेहरा … Read more

घर-घर की कहानी

सुनीता देवी अपनी इकलौती बेटी काव्या को लेकर पारिवारिक न्यायालय के बाहर बने काउंसलिंग सेंटर में बैठी थीं। उनके चेहरे पर गुस्सा, चिंता और एक अजीब सी जिद साफ झलक रही थी। उनके ठीक सामने वाली कुर्सी पर उनका दामाद रोहन और उसके माता-पिता खामोश बैठे थे। काव्या की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह … Read more

सौतन

मान्या  पिछले कई दिनों से एक अजीब सी बेचैनी से गुजर रही थी। आठ साल की शादीशुदा जिंदगी में उसने कभी रोहन पर शक करने का कोई कारण नहीं पाया था। रोहन एक जिम्मेदार पति और उनके पांच साल के बेटे, आरव का बहुत प्यारा पिता था। दोनों की जिंदगी एक शांत नदी की तरह … Read more

भाई का निस्वार्थ प्रेम

“तू बहुत बड़ा मूर्ख है, केदार! तुझे क्या लगा, मुझे तेरी चोरी का पता नहीं चलेगा?” सोमनाथ रुंधे गले से बोला। केदार भी रोते हुए मुस्कुराया, “और आप? आप कब से इतने चालाक हो गए भैया कि मेरे ही बक्से में सेंध मार दी?” दोनों भाई एक-दूसरे के गले लगकर बच्चों की तरह रो रहे … Read more

मां – खुशी

सविता की  शादी एक भरे पूरे परिवार में हुई।दो ननद राधा और मीरा  एक देवर मोहन सविता के पति केशव  ससुर दीनानाथ ऐसा परिवार था।जिसमें चलती सिर्फ सविता की सास रूक्मिणी की थी बाकी सब तो प्यादे थे।रुक्मिणी एक तेज गुस्से वाली महिला थी जिन्हें हर चीज समय पर चाहिए होती थी देर हो गई … Read more

सिल्क की साड़ी पहनने की हसरत ही रह गई – मंजू ओमर

सपना आज बहुत खुश थी। आज उसे मुहल्ले मे उसके दो मकान छोड़ कर रहने वाली शांति जी के पोती का महिलाओं का संगीत कार्यक्रम था। शादी थी उसकी,,जो दूसरे शहर से हो रही थी। उसी के उपलक्ष्य मे ये प्रोग्राम रखा था। गाने बजाने के साथ खाने पीने का भी कार्यक्रम था। सपना ने … Read more

“अपनों का साथ ” – कमलेश आहूजा

संडे का दिन था,बेटों के ऑफ़िस की छुट्टी थी रमा ने सोचा था आज थोड़ा आराम से ऊठूँगी…किंतु सुबह से ही किसी कौवे की लगातार काँव-काँव की आवाज आ रही थी..जिससे उसकी नींद जल्दी ही खुल गई।आवाज बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी…उसने खिड़की का पर्दा हटाकर बाहर देखा,तो..सामने के पेड़ पर … Read more

*अपनों का साथ* – तोषिका

“जीवन में कभी कोई भी कठिनाई आए तो याद रखना हम तुम्हारे साथ है ऐसा हमेशा मेरे दादा जी कहते है” कमलेश ने अपने पोते अनंत को बोला। अनंत जो अभी मात्र ९ वर्ष का था, अपनी मासूम भरी आंखों से अपने दादाजी की बात ऐसे सुन रहा था जैसे ये सुनहरे अक्षर उसने पहली … Read more

वो मुझसे ज़्यादा मेरी भाभी की माँ है – डॉ आभा माहेश्वरी

जब भी मैं अपनी माँ के बारे में सोचता हूँ, मन में एक अजीब-सी टीस उठती है। बचपन में मैं अक्सर शिकायत किया करता था कि माँ का सारा ध्यान मुझ पर नहीं, बल्कि मेरी भाभी पर रहता है। मुझे लगता था कि शादी के बाद जैसे उन्हें एक बेटी मिल गई हो और मैं … Read more

अपनों का साथ – संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी दौलत – सुदर्शन सचदेवा

कहते हैं, बड़ा घर ईंटों और सीमेंट से नहीं बनता, बल्कि उसमें रहने वाले अपनों के प्रेम, विश्वास और अपनापन से बनता है। संयुक्त परिवार भी ऐसा ही एक आँगन है, जहाँ हर रिश्ता अपने रंग से जीवन को सुंदर बना देता है। यहाँ किसी एक की खुशी, सबकी खुशी बन जाती है और किसी … Read more

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