वो मुझसे ज्यादा मेरी भाभी की मां है – सुदर्शन सचदेवा

 मुझसे ज़्यादा मेरी भाभी की माँ है… यह कहते हुए कभी-कभी मेरे अपने होंठ मुस्कुरा उठते हैं और आँखें भीग जाती हैं। क्योंकि मैं जानती हूँ… माँ का प्यार कभी कम नहीं होता, बस उसकी दिशा बदल जाती है। एक समय था, जब माँ की हर आवाज़ मेरे लिए होती थी—”बेटा, खाना खा लिया?”, “थक … Read more

अपनों का साथ – मधु वशिष्ठ

मां की मृत्यु का समाचार सुनकर जब उसके दोनों बेटे विदेश से आए तो वह यह देखकर हैरान थे उनकी अकेली रहने वाली माता जी के पास कितने लोग थे।  पूरा कमरा औरतों से भरा हुआ था आने जाने वाले कम ही नहीं हो रहे थे। लोग आकर ऐसे रो रहे थे कि मानो उन्होंने … Read more

अपनों का साथ – खुशी

गायत्री जी एक सुलझी महिला थी।उनके पति किशन जी की दुकान थी बड़े बाजार में किराने की दुकान थी जो बहुत बढ़िया चलती थी।उनके दो बेटे थे रितेश और राहुल दोनों भाइयों की एक दूसरे में जान बसती थी।पूरा परिवार एक दूसरे को समर्पित था।बच्चों ने भी अपनी शिक्षा पूरी कर कर पिता के कारोबार … Read more

अपनों का साथ

संडे का दिन था,बेटों के ऑफ़िस की छुट्टी थी रमा ने सोचा था आज थोड़ा आराम से ऊठूँगी…किंतु सुबह से ही किसी कौवे की लगातार काँव-काँव की आवाज आ रही थी..जिससे उसकी नींद जल्दी ही खुल गई।आवाज बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी…उसने खिड़की का पर्दा हटाकर बाहर देखा,तो..सामने के पेड़ पर … Read more

सोने का हार

मीरा ने महीने भर के राशन का हिसाब डायरी में लिखकर जैसे ही मेज़ पर रखा, सामने बैठे उसके पति सुधीर ने तुरंत डायरी उठा ली। सुधीर की आदत थी कि वह घर खर्च के लिए दिए गए पैसों का एक-एक रुपये का हिसाब मांगता था। पंद्रह रुपये का हिसाब डायरी में नहीं था, और … Read more

पहली रसोई

विवाह वाले घर की रौनक देखते ही बनती थी। पिछले एक हफ्ते से चल रही शहनाइयों की गूंज, ढोलक की थाप और महिलाओं के लोकगीतों ने पूरे घर को एक उत्सव में बदल दिया था। अब शादी संपन्न हो चुकी थी, लेकिन विदाई के बाद भी रिश्तेदारों और मेहमानों का जमावड़ा कम नहीं हुआ था। … Read more

असली घर

शहनाई की गूंज अब मद्धम पड़ चुकी थी और विदाई की बेला ने हर आँख को नम कर दिया था। मंडप के एक कोने में खड़ी अनुराधा अपनी बेटी नव्या को निहार रही थी। नव्या, जो अब अपने बचपन के आँगन को छोड़कर एक नए संसार में कदम रखने जा रही थी, उसकी आँखों में … Read more

पिता का न्याय

रमाकांत जी के पचहत्तरवें जन्मदिन का जश्न पूरे शबाब पर था। घर के बड़े से लॉन में रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों की भीड़ जमा थी। चारों तरफ रोशनी, फूलों की सजावट और हंसी-मज़ाक का माहौल था। केक काटने की रस्म के बाद रमाकांत जी ने अपने दोनों बेटों और बहुओं को मंच पर बुलाया। यह … Read more

बहू को बेटी बनने समय तो लगता है

अलार्म की तीखी आवाज़ ने काव्या की नींद तोड़ दी। उसने फोन की स्क्रीन पर समय देखा—सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड में रजाई से बाहर निकलने का बिल्कुल मन नहीं था, लेकिन रसोई की जिम्मेदारियां उसे पुकार रही थीं। काव्या की शादी को अभी महज़ आठ महीने ही हुए … Read more

संस्कारों की कद्र

“सुषमा जी, देखिए हमारे पंडित जी ने कहा है कि अगले महीने की पंद्रह तारीख का मुहूर्त सबसे उत्तम है। इसके बाद तो सीधा छह महीने तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं है। हम चाहते हैं कि शादी इसी मुहूर्त में हो जाए। आखिर हमें भी तो अपने रिश्तेदारों को जवाब देना होता है।” फोन के … Read more

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