गरीबी का रंग – शुभ्रा बैनर्जी 

“अरे रहने दे बेटा,तेरी छोटी बुआ को बुलाने से कोई फायदा नहीं।नहीं आएगी इस बार भी।मुंह फुलाए बैठी रहेगी अपने घर,और यही सोचती रहेगी कि मैं क्यों नहीं गया उसे बुलाने। कितने साल हो गए उसे,यहां आए।बाकी तीनों जिज्जी हर त्योहार में सपरिवार आ जाती हैं एक बार बुलाने से।बस तेरी छोटी बुआ ही नहीं … Read more

बहू को आराम क्यों नहीं…..!! – अमिता कुचया

बहू, 20 लोगों के लिए पूरियां तुम्हें ही तलनी होंगी… और हाँ, जल्दी करना! मेहमान आते ही होंगे।” मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई। वो अभी तीन दिन पहले ही ट्रेन से आई थी। रास्ते भर लेटी-लेटी आई थी, क्योंकि उसका अभी-अभी ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टर ने साफ कहा था – “कम से कम एक महीना … Read more

रिश्तों के भी रंग – बिमला रावत जड़धारी

राहुल अपनी मम्मी का अंतिम संस्कार करके घर पहुंचा साथ में उसके पापा, जीजा जी, रिश्तेदार और पड़ोसी थे सब अपने अपने घर जा रहे थे। थोड़ी देर में उसके दोनों जीजा जी भी अपने घर चले गए । घर में दोनों बहनें ,पापा और राहुल थे। पंडित जी भी कल आने का बोल कर … Read more

*रिश्तों के भी रंग* – तोषिका

रंग हमारी पहचान बन गए है, आजकल रंग के बिना कुछ भी नहीं है। ऐसा मिष्टी अपने आप से ही बोल रही थी कि तभी पीछे से उसकी नानी आई और बोली *रिश्तों के भी रंग होते है* और आज तक उन रंगों को कोई भी रंग पीछे नहीं छोड़ पाया है। अरे नानी मैं … Read more

रिश्तों के भी रंग – डोली पाठक

तुमसे जो वस्तु मंगाई थी वो ले आई तुम??? बड़ी-बड़ी दाढ़ी और चेहरे से काईंया दिखने वाले उस तांत्रिक ने जब ये प्रश्न किया तो उसकी बड़ी बहू नंदिता हड़बड़ा गई और कांपते स्वर में बोली – जी जी हां लाई हूं…  अपने आंचल के कोने से किसी स्त्री के अंतःवस्त्र निकाल कर उस तांत्रिक … Read more

रिश्तो के रंग बदलते हैं – गीता वाधवानी

 दो पक्की सहेलियां ममता और नम्रता। बचपन से साथ-साथ। स्कूल में साथ-साथ और उसके बाद कॉलेज में साथ-साथ फिर उसके बाद नौकरी  भी साथ-साथ। दोनों के घर भी साथ-साथ ही थे।       फिर एक दिन अचानक नम्रता के लिए राज का रिश्ता आया। लंबा, गेहुआ रंग हैंडसम राज। ममता बहुत खुश थी लेकिन राज को देखने … Read more

नियति का रंग – बालेश्वर गुप्ता

“देखो मनीष, कुसुम मेरी बहू है, पर जब वह वंश बढ़ाने में सक्षम नही है, मुझे पोता नही दे सकती, मां ही नही बन सकती तो कुछ तो सोचना पड़ेगा ना। वह घर मे रहे मुझे आपत्ति नही, पर तुझे दूसरा ब्याह करना ही पड़ेगा। समझ रहा है ना तू?” मनीष की आँखों में दर्द … Read more

“कर्म का हिसाब” – प्रतिभा भारद्वाज ’प्रभा’

“अब क्या हुआ, अब क्यों रो रहे हो आप… निकाल लीजिए अपने बेटे के सभी अंग और बेच दीजिए अच्छी कीमतों पर…आप तो बहुत होशियार सर्जन हैं… कोई तकलीफ भी नहीं होगी आपको…” अपने 10 वर्षीय बेटे के शव पर विलाप करती मधु चीख-चीखकर अपने पति डॉ. मयंक से कह रही थी। वह शब्द नहीं … Read more

मुझे माफ़ कर दो – करुणा मलिक

“दीदी, चल पड़ी हो क्या?”“हाँ भाभी, ट्रेन चल पड़ी है।”“सीट तो ठीक मिल गई? बच्चों के साथ कोई परेशानी तो नहीं होगी? जीजाजी भी आ जाते तो अच्छा रहता।” “नहीं-नहीं भाभी, कोई दिक्कत नहीं। आराम से पहुँच जाएँगे… चलिए रखती हूँ। मिलने पर बात करेंगे।” “ठीक है। जल्दी से आ जाइए।” फोन रखते ही विभा … Read more

 आत्मसम्मान सर्वोपरि  –  कविता भड़ाना

सुबह से चाय के इंतजार में बैठे “रामदयाल जी” आज खुद को बेहद लाचार सा महसूस कर रहे हैं। बरामदे की वही कुर्सी, वही मेज, वही चाय का प्याला—जो कभी बिना बोले उनके सामने आ जाया करता था—आज जैसे उनसे रूठ गया हो। घड़ी की टिक-टिक तेज़ लग रही थी और समय का हर पल … Read more

error: Content is protected !!