“पापा, जिंदगी बहुत छोटी है। हम साल में एकाध बार तो घर आते हैं, उसमें भी अगर आप लोग इन्हीं पुरानी बातों और जायदाद के झगड़ों को लेकर बैठे रहेंगे, तो हम यहां वापस आना ही छोड़ देंगे। हम बड़े शहरों में अकेले रहते हैं, हमें परिवार की अहमियत पता है। आप लोग साथ रहते हुए भी परिवार की कद्र नहीं कर रहे।”
कबीर ने भी अपनी मां और ताई जी से कहा था, “मम्मी, क्या रखा है इन छोटी-छोटी बातों में? हम बाहर वालों से तो मुस्कुरा कर मिलते हैं और अपने ही घर में मुंह फुलाए रहते हैं। बात को वहीं के वहीं खत्म कीजिए और आगे बढ़िए।”
रात के खाने का वक्त था और डाइनिंग टेबल पर आज जो नजारा था, वह पिछले पांच सालों में कभी नहीं देखा गया था। एक ही मेज पर सजे तरह-तरह के पकवान और उनके चारों ओर बैठे परिवार के सभी सदस्य। हंसी, ठहाके, एक-दूसरे की प्लेट में जबरदस्ती खाना परोसने की होड़ और पुरानी यादों के किस्से।
इस खुशनुमा शोर के बीच, कोने की कुर्सी पर बैठीं साठ वर्षीय सुमित्रा देवी की आंखें अचानक डबडबा गईं। उनकी पलकों की कोर पर ठहरा वह खुशी का आंसू शायद वहीं छलक जाता, अगर सामने बैठे उनके पति, दीनानाथ जी ने उन्हें अपनी शांत लेकिन अर्थपूर्ण नजरों से न देखा होता।
दीनानाथ जी की उन आंखों में एक मौन सवाल था और एक दिलासा भी। सुमित्रा जी ने जल्दी से अपने पल्लू के छोर से आंखें पोंछीं और फिर से बच्चों की बातों में मुस्कुराने का नाटक करने लगीं। दीनानाथ जी सब समझ रहे थे, पर वे चुप रहे। यह वक्त किसी भी तरह की भावुकता दिखाकर माहौल को भारी करने का नहीं था,
और वैसे भी यह बात सिर्फ उन दोनों पति-पत्नी के बीच की थी। इसलिए, दीनानाथ जी ने तय किया कि वे इस विषय पर तब बात करेंगे जब सब सोने चले जाएंगे और वे दोनों अपने कमरे की एकांतता में होंगे।
रात गहरी हो चुकी थी। घर के विशाल दालान में अब खामोशी पसर गई थी, लेकिन यह खामोशी उस चुभने वाले सन्नाटे से बहुत अलग थी जो पिछले कई सालों से इस घर की दीवारों में गूंजता था। आज की खामोशी में एक सुकून था। दीनानाथ जी अपने कमरे में आकर बिस्तर पर लेट गए और अपनी पत्नी के आने का इंतजार करने लगे। कुछ ही देर में सुमित्रा जी कमरे में आईं और रोजमर्रा के काम निपटा कर बिस्तर के एक किनारे बैठ गईं।
दीनानाथ जी ने अपनी चश्मा उतारकर साइड टेबल पर रखा और सुमित्रा जी की ओर एक गहरी नजर डाली। उनके चेहरे पर वही सौम्य भाव था, मानो बिना कुछ कहे ही पूछ रहे हों— ‘क्यों रो रही थी तुम वहां?’
सुमित्रा जी उस नजर का अर्थ बखूबी समझ गईं। आखिर चालीस वर्षों का साथ था दोनों का। इतने लंबे सफर में बिना शब्दों के एक-दूसरे के मन की थाह लेना दोनों ने बखूबी सीख लिया था। वो बात अलग है कि कभी-कभी जीवन की आपाधापी या पारिवारिक तनाव में वे एक-दूसरे की भावनाओं को नजरअंदाज कर देते थे, लेकिन आज ऐसा नहीं था। आज दिल हल्का करने की जरूरत थी।
सुमित्रा जी ने एक गहरी सांस ली और धीमी आवाज में बोलीं, “कुछ नहीं… बस बैठे-बैठे याद आ गया कि कल तक इस घर का माहौल कैसा था। एकदम तनातनी वाला। कोई किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता था। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी जैसे कोसों दूर थे सब। ना कोई किसी से मिलता-जुलता, ना किसी की तबीयत का हाल पूछता। यहां तक कि सुख-दुख में भी किसी को किसी से कोई मतलब नहीं रह गया था।”
दीनानाथ जी चुपचाप सुनते रहे, क्योंकि वे जानते थे कि सुमित्रा जी के सीने में सालों का जो गुबार दबा है, उसे आज बाहर आना ही चाहिए।
सुमित्रा जी की आवाज भर्रा गई, “एक ही घर में रहते हुए इतनी वैमनस्यता, इतनी कड़वाहट आ गई थी कि यह घर, घर नहीं बल्कि ईंट-पत्थरों का एक मकान बन गया था। हमारे ही दोनों बेटे, रवि और अनुज, जो बचपन में एक-दूसरे के बिना खाना नहीं खाते थे, वो संपत्ति और व्यापार के एक छोटे से विवाद को लेकर ऐसे बंटे कि दोनों की रसोइयां अलग हो गईं। बहुओं ने भी जैसे एक-दूसरे की शक्ल ना देखने की कसम खा ली थी। कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि इस दमघोंटू माहौल से कहीं दूर भाग जाऊं। यह मकान मुझे काट खाने को दौड़ता था।”
दीनानाथ जी ने अपना हाथ बढ़ाकर अपनी पत्नी के कांपते हाथों को थाम लिया। वे जानते थे कि जो दर्द सुमित्रा जी बयान कर रही हैं, वह उनका भी था। उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने भरे-पूरे घोंसले को तिनका-तिनका बिखरते देखा था। अदृश्य दीवारों ने उस बड़े से घर को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया था।
सुमित्रा जी थोड़ा संभलते हुए आगे बोलीं, “पर आज… आज जो हुआ, वह किसी सपने से कम नहीं था। और यह सब मुमकिन हुआ हमारी पोती सान्या और पोते कबीर की वजह से। उन दोनों बच्चों ने मुझे अहसास कराया कि नई पीढ़ी सच में खुले विचारों की और स्वछंद है। उनके जीने का तरीका हमसे बहुत अलग, पर बहुत बिंदास और सुलझा हुआ है।”
दीनानाथ जी के चेहरे पर भी एक हल्की सी मुस्कान तैर गई। उन्होंने सुमित्रा जी की बात का समर्थन करते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रही हो तुम। आज जब वे सब डाइनिंग टेबल पर बैठकर आपस में बातें कर रहे थे, तो उनकी बातों और उनके व्यवहार से मुझे भी बहुत कुछ महसूस हुआ। आज की यह युवा पीढ़ी हमारी तरह रिश्तों में गांठ बांधकर नहीं रखती।”
सुमित्रा जी ध्यान से अपने पति की बात सुनने लगीं।
दीनानाथ जी ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा, “हम पुरानी पीढ़ी के लोग उसूलों और सम्मान के नाम पर अपने ही अहंकार को पालते हैं। कोई बात चुभ जाए, तो उसे जिंदगी भर सीने से लगाकर बैठ जाते हैं। लेकिन ये बच्चे ऐसा नहीं करते। सान्या और कबीर दोनों अपने-अपने शहरों से पढ़ाई और नौकरी से छुट्टी लेकर आए थे। उन्होंने जब घर का ये बिखरा हुआ और तनावपूर्ण माहौल देखा, तो वे चुप नहीं बैठे। उन्होंने आपसी वैमनस्य को तूल नहीं पकड़ने दिया। आज दोपहर की ही तो बात है, जब दोनों ने मिलकर अपने-अपने माता-पिता को एक ही कमरे में बैठाया और साफ-साफ कह दिया कि वे इस ‘ईगो क्लैश’ का हिस्सा नहीं बनेंगे।”
सुमित्रा जी को याद आया कि कैसे दोपहर में सान्या ने अपने पिता रवि और चाचा अनुज को झकझोर कर रख दिया था। उसने कहा था, “पापा, जिंदगी बहुत छोटी है। हम साल में एकाध बार तो घर आते हैं, उसमें भी अगर आप लोग इन्हीं पुरानी बातों और जायदाद के झगड़ों को लेकर बैठे रहेंगे, तो हम यहां वापस आना ही छोड़ देंगे। हम बड़े शहरों में अकेले रहते हैं, हमें परिवार की अहमियत पता है। आप लोग साथ रहते हुए भी परिवार की कद्र नहीं कर रहे।”
कबीर ने भी अपनी मां और ताई जी से कहा था, “मम्मी, क्या रखा है इन छोटी-छोटी बातों में? हम बाहर वालों से तो मुस्कुरा कर मिलते हैं और अपने ही घर में मुंह फुलाए रहते हैं। बात को वहीं के वहीं खत्म कीजिए और आगे बढ़िए।”
दीनानाथ जी की आवाज ने सुमित्रा जी को वापस वर्तमान में ला दिया। “सुमित्रा, इनके हिसाब से जिंदगी जीने का फंडा बहुत साफ है। इनका मानना है कि जब हम वैसे ही कभी-कभार मिल पाते हैं, उस पर भी अगर पुरानी कड़वाहटों को लेकर बैठ जाएं, तो रिश्तों को निभाएंगे कैसे? इसलिए ये बच्चे पहले तो मनमुटाव को मन में घर नहीं करने देते, और अगर कभी कोई बात बुरी लग भी जाए, तो उसे तूल नहीं पकड़ने देते। वे झगड़ते हैं, बहस करते हैं, लेकिन बात को जहां का तहां खत्म करके फिर से एक-दूसरे के गले लग जाते हैं। वे बीती हुई बात को ‘डिलीट’ करना जानते हैं।”
सुमित्रा जी ने सिर हिलाते हुए हामी भरी। “सच कह रहे हैं आप। उनकी इसी सोच ने तो आज इस घर का नक्शा बदल दिया। सान्या ने बाहर से खाना ऑर्डर किया, कबीर ने सबको जबरदस्ती डाइनिंग टेबल पर खींचा। शुरू में तो रवि और अनुज एक-दूसरे से नजरें चुरा रहे थे, बहुएं भी असहज थीं। लेकिन बच्चों ने ऐसी हंसी-मजाक की, उनके बचपन के ऐसे-ऐसे किस्से छेड़े कि वे अपनी हंसी रोक ही नहीं पाए। और जैसे ही वे हंसे, सालों की जमी हुई बर्फ पिघल गई। आज सब एक साथ बैठकर खा-पी रहे थे, कल सुबह सब मिलकर पिकनिक पर जाने की बात कर रहे थे। यह सब देखकर मन इतना हल्का हो गया कि आंखों से खुशी छलक ही पड़ी।”
दीनानाथ जी ने गहरी सांस ली और छत की ओर देखते हुए बोले, “तो इसका मतलब यह है सुमित्रा, कि जो गांठ हम बड़े होकर भी नहीं खोल पा रहे थे, जिन्हें हम अपने अहम का आभूषण समझ कर गले में लटकाए घूम रहे थे, उस गांठ को इन बच्चों ने एक झटके में खोल दिया। हम जिन्हें नासमझ समझते थे, उन्होंने हमें असल समझदारी का पाठ पढ़ा दिया। उन्होंने हमें सिखा दिया कि रिश्ते अगर कमजोर पड़ें, तो उन्हें तोड़ने के बजाय, उनकी डोर को कसकर पकड़ना चाहिए।”
सुमित्रा जी ने राहत की सांस लेते हुए कहा, “बिल्कुल सही बात है। आज इस घर के कमजोर पड़ते रिश्तों की डोर को संभालने का काम सान्या, कबीर और इस नई युवा पीढ़ी ने बहुत ही बखूबी किया है। आज उन्हें देखकर मुझे विश्वास हो गया कि हमारे संस्कार व्यर्थ नहीं गए हैं। बस हमारे देखने का नजरिया थोड़ा धुंधला हो गया था।”
“तभी तो,” दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए करवट ली और अपनी आंखें बंद करते हुए कहा, “तभी तो आज हम सब, पूरे पांच साल बाद, उस डाइनिंग टेबल पर एक साथ थे। एक परिवार की तरह… एक घर की तरह।”
रात अब और भी शांत और खूबसूरत लगने लगी थी। सुमित्रा जी के मन का सारा बोझ उतर चुका था। घर जो कभी मकान बन गया था, आज फिर से एक आशियाने में तब्दील हो गया था। अदृश्य दीवारें ढह चुकी थीं और रिश्तों की जो डोर उलझ कर टूटने की कगार पर थी, उसे नई पीढ़ी की समझदारी, प्यार और खुलेपन ने फिर से रेशम की तरह मुलायम और मजबूत बना दिया था। दोनों बुजुर्गों ने आज चैन की नींद ली, क्योंकि वे जानते थे कि जब तक ऐसी बिंदास और दिल से सोचने वाली पीढ़ी इस घर में है, इस घर को कभी कोई बांट नहीं सकता।
दोस्तों, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अक्सर छोटी-छोटी बातें हमारे रिश्तों में बड़ी दरारें पैदा कर देती हैं। हम अपने अहंकार को रिश्तों से बड़ा मान लेते हैं, जबकि युवा पीढ़ी हमें सिखाती है कि बीती बातों को भूलकर वर्तमान को खुशी से जीना ही असली जिंदगी है। आपको यह कहानी कैसी लगी? अपने विचार जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : कंचन श्रीवास्तव