रिश्तों की अटूट छाँव – रणजीत सिंह भाटिया

मुझे कभी एक पल के लिए भी यह महसूस नहीं हुआ कि मेरा कोई बेटा नहीं है। जिस दिन आरती का रिश्ता पक्का हुआ, अविनाश और कुणाल ने आकर मुझे सोफे पर बैठा दिया और कहा, “जीजा जी, आरती हमारी भी बेटी है। आप सिर्फ आशीर्वाद दीजिए, बाकी मंडप से लेकर विदाई तक की सारी दौड़-धूप हमारी है।”

लंदन की सर्द और धुंधली शाम अक्सर इंसान को ख्यालों की दुनिया में धकेल देती है। आज खिड़की के पास बैठकर बाहर गिरती हुई बर्फ की सफेद चादर को देखते हुए मेरे हाथों में कॉफी का मग था, लेकिन मन पच्चीस साल पीछे की उन पगडंडियों पर टहल रहा था,

जिन्हें पीछे छोड़कर मैं अपनी पत्नी सुमेधा और दो छोटी बेटियों—आरती और खुशी—के साथ इस अनजान शहर में आया था। वक्त कितनी खामोशी से और कितनी तेज़ी से रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाता है, इसका एहसास तब होता है जब आप आईने में अपने सफेद बालों को देखते हैं। पच्चीस साल! एक पूरी उम्र बीत गई इस शहर में।

मुझे आज भी वह दिन शीशे की तरह साफ याद है जब हम हीथ्रो एयरपोर्ट पर उतरे थे। मन में एक अजीब सी घबराहट थी। भारत में मेरी एक छोटी सी नौकरी थी, जिससे घर का खर्च तो जैसे-तैसे चल जाता था, लेकिन भविष्य के नाम पर हमारे पास सिर्फ चिंताएं थीं। सुमेधा के माता-पिता यानी मेरे सास-ससुर और सुमेधा के दो छोटे भाई—अविनाश और कुणाल—पहले से ही लंदन में बसे हुए थे। सुमेधा अपने घर की सबसे बड़ी बेटी थी।

उसने अपने दोनों भाइयों को सिर्फ एक बड़ी बहन की तरह नहीं, बल्कि एक माँ की तरह पाला था। जब हम आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे थे, तब मेरे सास-ससुर और दोनों सालों ने मिलकर हमारे वीज़ा से लेकर हवाई टिकट तक का सारा खर्च उठाया और हमें हमेशा के लिए अपने पास बुला लिया।

एक नया देश, एक बिल्कुल नई भाषा, अजीबोगरीब मौसम और एक नई संस्कृति। जब मैं यहां आया तो रात-रात भर जागकर यही सोचता था कि क्या मैं इस अजनबी शहर में अपने परिवार को एक सुरक्षित भविष्य दे पाऊंगा? लेकिन मेरे सालों, अविनाश और कुणाल ने मुझे कभी अकेलेपन या असुरक्षा का एहसास नहीं होने दिया। उन्होंने हमारे आने से पहले ही अपनी दिन-रात की मेहनत की कमाई से हमारे लिए एक छोटा सा ग्रोसरी और बेकरी का स्टोर खरीद कर रखा था।

जब उन्होंने उस स्टोर की चाबियां मेरे हाथ में रखीं, तो मेरी आंखें छलक आई थीं। कुछ हफ्तों तक उन्होंने मुझे यहां के तौर-तरीके सिखाए और फिर मैं और सुमेधा पूरी लगन से उस स्टोर को चलाने लगे।

दिन बीतते गए, स्टोर चल पड़ा और हमारी बच्चियां लंदन के अच्छे स्कूलों में पढ़ने लगीं। जब लड़कियां बड़ी होने लगती हैं, तो एक पिता के कंधों पर अदृश्य बोझ सा आ जाता है। उन्हें अच्छे संस्कार देना और फिर उनके लिए एक योग्य वर खोजना, यह चिंता मुझे भी सताने लगी थी। लेकिन सुमेधा का मायका हमारे लिए एक मजबूत ढाल की तरह खड़ा था। सब कुछ कितना खूबसूरत चल रहा था, हर सप्ताहांत हम सब साथ मिलते, सुमेधा के हाथों का बना खाना खाते और एक भरे-पूरे परिवार का सुख भोगते।

लेकिन फिर हमारी इस छोटी सी दुनिया को नज़र लग गई। कुछ ही सालों के अंतराल में सुमेधा के माता-पिता, यानी मेरे सास-ससुर, एक-एक करके इस दुनिया से विदा हो गए। उनका साया उठते ही सुमेधा टूट सी गई थी। जब भी घर में कोई गमी होती है, तो रिश्तेदार और समाज के लोग अक्सर कई तरह की बातें बनाने लगते हैं। सुमेधा की कुछ दूर की मौसियों और परिचितों ने दबे स्वर में कहना शुरू कर दिया था, “अब सुमेधा का मायका खत्म हो गया। मां-बाप थे तब तक भाइयों का प्यार था। अब दोनों भाइयों की अपनी-अपनी पत्नियां हैं, अपना परिवार है। भला भाभियां क्यों एक शादीशुदा ननद का बोझ उठाएंगी? अब इस घर में सुमेधा की वह पहले जैसी पूछ-परख नहीं रहेगी।”

मैं भी अंदर ही अंदर डरने लगा था कि कहीं सच में सुमेधा अपने ही भाइयों के घर में बेगानी न हो जाए। क्योंकि दुनिया का दस्तूर यही है कि माता-पिता के जाने के बाद मायके की दहलीज बेटियों के लिए थोड़ी ऊंची हो जाती है। लेकिन मेरे साले, अविनाश और कुणाल, और उनकी पत्नियां—मेरी सलहजें—शालिनी और रितु ने समाज के इस कड़वे सच को पूरी तरह से झुठला दिया।

ससुर जी की तेरहवीं के बाद जब सुमेधा फूट-फूट कर रो रही थी कि अब उसका मायका सूना हो गया, तब अविनाश की पत्नी शालिनी ने सुमेधा को गले लगाकर जो कहा था, वह आज भी मेरे कानों में गूंजता है। शालिनी ने कहा था, “दीदी, घर दीवारों से नहीं, लोगों से बनता है। जब तक हम हैं, आपका मायका जिंदा है। आपने इन दोनों भाइयों को मां बनकर पाला है, तो क्या हम आपका अपनी मां की तरह सम्मान नहीं कर सकते? आज से इस घर की बड़ी आप हैं। हर त्योहार, हर खुशी आपके बिना अधूरी रहेगी।”

और उन्होंने अपने इन शब्दों को सिर्फ कहा नहीं, बल्कि सालों-साल जिया। सुमेधा के माता-पिता के जाने के बाद भी उस घर में सुमेधा का वही रुतबा, वही प्यार और वही अधिकार कायम रहा। हर रक्षाबंधन पर अविनाश और कुणाल उसी उत्साह से आते, हर दीवाली पर शालिनी और रितु सुमेधा के लिए बिल्कुल वैसे ही कपड़े और शगुन लेकर आतीं जैसे एक मां अपनी बेटी के लिए लाती है। जब भी मैं सुमेधा और बच्चों के साथ उनके घर जाता, मेरा जो आदर-सत्कार होता, उसे देखकर कभी-कभी मुझे खुद पर शर्मिंदगी महसूस होती कि मैं इनका ऋण कैसे चुकाऊंगा।

वक्त और तेज़ी से भागा। हमारी दोनों बेटियां, आरती और खुशी, विवाह के योग्य हो गईं। मेरे पास कोई बेटा नहीं था और अक्सर हमारे समाज में लोग ताना मारते हैं कि बिना बेटे के बाप को बेटियों की शादी में कितनी दौड़-धूप करनी पड़ती है। लेकिन मुझे कभी एक पल के लिए भी यह महसूस नहीं हुआ कि मेरा कोई बेटा नहीं है। जिस दिन आरती का रिश्ता पक्का हुआ, अविनाश और कुणाल ने आकर मुझे सोफे पर बैठा दिया और कहा, “जीजा जी, आरती हमारी भी बेटी है। आप सिर्फ आशीर्वाद दीजिए, बाकी मंडप से लेकर विदाई तक की सारी दौड़-धूप हमारी है।”

दोनों भाइयों ने अपनी भांजियों की शादियों में पैसों को पानी की तरह बहाया। शालिनी और रितु ने अपनी बेटियों की तरह आरती और खुशी के लिए जेवर और कपड़े खरीदे। शादी के कार्ड बांटने से लेकर बारात के स्वागत तक, मेरे दोनों साले मेरे बेटों की तरह मेरे आगे-आगे रहे। आज मेरी दोनों बेटियां अपने-अपने घरों में बेहद खुश हैं। बड़ी बेटी का पति एक नामी डॉक्टर है और छोटी का पति आईटी कंपनी में डायरेक्टर है। यह सब मुमकिन हो पाया क्योंकि मेरे कंधों पर सुमेधा के मायके वालों का हाथ था।

कई साल बीत चुके हैं। अविनाश और कुणाल के परिवार भी अब बड़े हो गए हैं। उनके बच्चे भी अब कॉलेजों में हैं। परिवार बढ़ने की वजह से अब दोनों भाई अलग-अलग घरों में रहते हैं, लेकिन आज भी उन दोनों परिवारों के बीच प्यार की डोर पहले जैसी ही मजबूत है। हर रविवार की शाम हम सब एक जगह इकट्ठा होते हैं। आज भी जब सुमेधा बीमार पड़ती है, तो शालिनी और रितु अपने हाथों से सूप बनाकर लाती हैं और घंटों उसके पास बैठकर उसके पैर दबाती हैं। आज भी अविनाश और कुणाल कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले अपनी ‘दीदी’ और ‘जीजा जी’ से सलाह लेना नहीं भूलते।

आज के इस भागदौड़ भरे आधुनिक युग में, जहां लोग अपने सगे भाई-बहनों को संपत्ति और पैसों के लालच में अदालत के कटघरे में खड़ा कर देते हैं, जहां भाभियां ननदों को ताने मारने का कोई मौका नहीं छोड़तीं, वहां मेरे सालों और उनकी पत्नियों ने जो मिसाल पेश की है, वह विरले ही देखने को मिलती है। सुमेधा ने बचपन में अपनी मां की बीमारी के समय अपने भाइयों को जो निस्वार्थ प्यार दिया था, उन भाइयों ने बड़े होकर अपनी बहन के हर सुख-दुख में ढाल बनकर उसे सौ गुना वापस लौटाया।

कॉफी का मग अब खाली हो चुका था और बाहर बर्फ और तेज़ हो गई थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो सामने अविनाश, कुणाल, शालिनी और रितु अपने हाथों में खाने के डिब्बे और एक बड़ा सा केक लिए खड़े थे।

“अरे जीजा जी, ऐसे क्या देख रहे हैं? आज दीदी की शादी की सालगिरह है, आप भूल गए क्या?” कुणाल ने हंसते हुए मुझे गले लगा लिया। पीछे से सुमेधा भी बाहर आ गई और अपने भाइयों को देखकर उसकी आंखों में वही पुरानी चमक लौट आई।

घर का सन्नाटा अचानक हंसी-ठहाकों और अपनेपन की गर्मी से भर गया। शालिनी और रितु ने सीधे रसोई की ओर रुख किया और अविनाश ने मेरे हाथ से खाली मग लेकर मेज पर रख दिया। मैं उन्हें देखते हुए मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था। लोग कहते हैं कि इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है, लेकिन मैं मानता हूं कि जो इंसान ऐसे सच्चे और निस्वार्थ रिश्ते कमा लेता है, वह दुनिया का सबसे अमीर इंसान होता है। एक ऐसा मायका, जो सिर्फ माता-पिता के रहने तक सीमित न हो, बल्कि जहां भाई और भाभियां भी उस आंगन की पवित्रता को बनाए रखें, सच में किसी मंदिर से कम नहीं होता। जब मैं उन्हें एक साथ हंसते-मुस्कुराते देखता हूं, तो मेरे दिल के सबसे गहरे कोने से उनके लिए अनगिनत दुआएं और आशीर्वाद ही निकलते हैं। भगवान करे, हर बेटी को सुमेधा जैसा मायका और हर इंसान को मेरे सालों जैसा सच्चा परिवार मिले।

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 मूल लेखक : रणजीत सिंह भाटिया

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