बाबूजी के ये शब्द याद आते ही सिद्धार्थ के सब्र का बाँध पूरी तरह टूट गया। वह घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया और किसी छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। उस बंद कमरे में उसकी सिसकियाँ गूँज रही थीं, लेकिन आज उसने अपने आँसुओं को रोका नहीं। वह रोता रहा, तब तक रोता रहा जब तक कि उसके भीतर जमा सारा गुबार, सारा अकेलापन और सारी घुटन आँसुओं के रास्ते बाहर नहीं निकल गई। रो लेने के बाद उसे ऐसा लगा जैसे उसके सीने पर रखा वो भारी पत्थर अचानक किसी ने हटा दिया हो। उसका मन एकदम हल्का और विचार काँच की तरह साफ हो चुके थे।
काँच की विशाल खिड़की के उस पार मेलबर्न शहर की जगमगाती रोशनियाँ किसी सजी हुई दुल्हन की तरह दमक रही थीं, लेकिन अठारहवीं मंज़िल के उस वातानुकूलित कमरे में लेटे सिद्धार्थ के भीतर घोर अंधेरा छाया हुआ था। बिस्तर की मखमली चादर पर करवटें बदलते हुए न जाने कब उसकी आँखों के कोरों से गर्म मोती ढलक कर तकिए में जज़्ब हो गए, उसे पता ही नहीं चला। कहने को तो वह ऑस्ट्रेलिया के एक बेहद आधुनिक और संपन्न शहर में था, जहाँ आने का सपना उसके जैसे हज़ारों मध्यमवर्गीय युवा अपनी आँखों में पाले रहते हैं, मगर आज वही सपना उसके सीने पर एक भारी पत्थर की तरह रखा हुआ महसूस हो रहा था।
शुरुआती चार-पाँच महीने तो नई जगह के आकर्षण, ऊँची इमारतों की चकाचौंध, वीकेंड की पार्टियों और डॉलर को भारतीय रुपयों में बदलकर देखने के रोमांच में कब पंख लगाकर उड़ गए, पता ही नहीं चला। जब पहली बार खाते में मोटी तनख्वाह आई थी, तो सिद्धार्थ को लगा था कि उसने ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग जीत ली है। लेकिन जैसे-जैसे नयापन छँटने लगा, वैसे-वैसे उस विदेशी धरती का ठंडापन उसकी रूह में उतरने लगा। अब तो आलम यह था कि दफ़्तर से लौटने के बाद अपने ही फ्लैट की चाबी घुमाते हुए उसके हाथ काँपते थे, क्योंकि दरवाज़े के उस पार स्वागत करने के लिए केवल एक भयानक सन्नाटा और माइक्रोवेव में रखा ठंडा खाना होता था।
अभी कुछ देर पहले ही तो उसने अपनी माँ, शारदा जी से वीडियो कॉल पर बात की थी। स्क्रीन पर माँ का चेहरा दिखते ही सिद्धार्थ के भीतर का बाँध टूटने को हो आया था, मगर उसने होंठों पर एक बनावटी मुस्कान चिपका ली थी। माँ ने अपने पल्लू से आँखें पोंछते हुए पूछा था, “सिद्धू बेटा, तू बहुत कमज़ोर लग रहा है, टाइम से रोटी तो खाता है न? तेरे बाबूजी कल तुम्हारी पसंद के सिंघाड़े लाए थे, तुझे याद करके उनकी आँखें भर आईं, बोले कि मेरा सिद्धू होता तो छील-छील कर सारा खा जाता।” माँ की बस इसी एक बात ने सिद्धार्थ के सीने में जैसे कोई नश्तर चुभो दिया था। उसने किसी तरह “हाँ माँ, यहाँ सब बहुत बढ़िया है, मैं अभी डिनर ही करने जा रहा हूँ” कहकर फोन तो काट दिया, लेकिन उसके बाद से ही उसका मन अतीत के उस गहरे महासागर में गोते लगा रहा था, जहाँ केवल अपनों का निस्वार्थ प्रेम और परवाह की लहरें थीं।
सिद्धार्थ ने छत की ओर देखते हुए सोचा कि इंसान पैसे के पीछे कितना अंधा हो जाता है। पूना की कंपनी में काम करते हुए जब उसे तीन गुने पैकेज पर ऑस्ट्रेलिया जाने का प्रस्ताव मिला था, तो उसे लगा था कि बस यही तो असली तरक्की है। उस वक्त उसे अपने घर, अपने शहर प्रयागराज की गलियाँ और रिश्तों की गर्माहट, सब कुछ उस चमकदार ऑफर लेटर के आगे फीका लगा था। आज की पीढ़ी का यही तो सबसे बड़ा दर्द है—थोड़े से ज़्यादा पैसों और ऊँचे लाइफस्टाइल के लालच में मध्यमवर्गीय परिवारों के होनहार लड़के-लड़कियाँ अपने ही जड़ों से कटकर सात समंदर पार चले जाते हैं, और फिर वहाँ की मशीनी ज़िंदगी में खुद को एक पुर्ज़े की तरह घिसते हुए पाते हैं।
अचानक सिद्धार्थ की नज़र अपनी अलमारी में टँगे उन दर्जनों महँगे ब्रांडेड कोट और शर्ट्स पर पड़ी, जिनकी कीमत हज़ारों में थी, लेकिन उन्हें पहनकर भी उसे कभी वह खुशी नहीं मिली जो बचपन की उस एक पीली स्वेटर ने दी थी। उसे आज भी वह सर्दियों की सुबह साफ याद है, जब उसके पिता केशव प्रसाद जी कानपुर के किसी काम से लौटते वक्त उसके लिए एक चटक पीले रंग का ऊनी स्वेटर लाए थे। जब सिद्धार्थ वह स्वेटर पहनकर अपने प्रयागराज वाले घर के बाहर निकला था, तो पूरे मोहल्ले में जैसे रौनक आ गई थी।
सामने रहने वाली वर्मा आंटी ने अपने छज्जे से ही आवाज़ लगाई थी, “अरे वाह सिद्धू! आज तो बिल्कुल सूरजमुखी का फूल लग रहा है मेरा बच्चा!” आगे की दुकान वाले तिवारी अंकल ने तो उसे रोककर जेब में दो टॉफियाँ डाल दी थीं और कहा था, “केशव भाई की पसंद का जवाब नहीं, लड़के पर पीला रंग खूब खिल रहा है।” और जब उसके छोटे ताऊजी, हरिशंकर जी ने उसे देखा था, तो उन्होंने उसे गोद में उठाकर अपनी मूँछें उसके गालों में चुभाते हुए कहा था, “अरे शारदा भाभी, नज़र का टीका लगा दो हमारे राजकुमार को, वरना मोहल्ले भर की नज़र लग जाएगी!” उस छोटी सी उम्र में सिद्धार्थ का मन कितने गर्व और खुशी से फूल कर कुप्पा हो गया था। उसके अगले ही महीने जब सिद्धार्थ का जन्मदिन आया, तो हरिशंकर ताऊजी अपनी मामूली सी आमदनी में से पैसे बचाकर ठीक उसी पीले रंग के जूते उसके लिए खरीद लाए थे, ताकि उनके भतीजे का सेट पूरा हो जाए।
वही हरिशंकर ताऊजी, जब सिद्धार्थ के विदेश जाने की बात चली थी, तो घर में सबसे ज़्यादा नाराज़ हुए थे। उन्होंने शारदा जी और केशव जी से लगभग झगड़ा ही कर लिया था, “भैया, क्या अपने देश में आटे-दाल का अकाल पड़ गया है जो तुम लोग इकलौते बेटे को इतनी दूर भेज रहे हो? अरे, यहाँ थोड़ा कम कमा लेगा, पर हमारी आँखों के सामने तो रहेगा! बुढ़ापे में क्या इसके भेजे हुए डॉलर तुम्हारे सिर में तेल मालिश करेंगे या बीमारी में पानी का गिलास पकड़ाएंगे?” तब सिद्धार्थ को ताऊजी की बातें दकियानूसी और पिछड़ी हुई लगी थीं, लेकिन आज उस विदेशी अपार्टमेंट की चारदीवारी में घुटते हुए उसे समझ आ रहा था कि ताऊजी के उन कड़वे शब्दों के पीछे कितना गहरा अनुभव और कितना सच्चा प्रेम छिपा हुआ था।
“यहाँ क्या है मेरे पास?” सिद्धार्थ ने खुद से फुसफुसाते हुए सवाल किया। यहाँ वह रोज़ नए कपड़े पहने, दस दिन तक एक ही टी-शर्ट में घूमे, खाए या भूखा सो जाए—कोई एक इंसान यह पूछने वाला नहीं है कि “सिद्धार्थ, आज तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ क्यों है?” यहाँ बस एक ही मंत्र है—काम करो, डॉलर कमाओ, टैक्स भरो, वीकेंड पर किसी क्लब में जाकर नशे में झूमो और फिर सोमवार से उसी कोल्हू के बैल की तरह जुट जाओ।
उसे अपनी छोटी बहन मानसी की वो नोकझोंक याद आने लगी, जो उसके ऑफिस से लौटते ही उसके बैग की तलाशी लेती थी कि भाई आज मेरे लिए क्या लाया है। अगर कभी वह खाली हाथ चला जाए, तो मानसी मुँह फुलाकर बैठ जाती थी और फिर सिद्धार्थ को उसे मनाने के लिए आधी रात को स्कूटी निकालकर कुल्फी खिलानी पड़ती थी। कहाँ गई वो मानसी की ज़िद? कहाँ गई माँ की वो मीठी झिड़की जब वह गीला तौलिया बिस्तर पर छोड़ देता था? कहाँ गए बाबूजी के वो नियम, जो रात को नौ बजे के बाद घर का मुख्य दरवाज़ा बंद कर देते थे और देर होने पर दस सवाल पूछते थे? और कहाँ गए वो बुआ, फूफा, मामा, मौसी और पड़ोस के शर्मा जी, जो शाम की चाय पर बिना बुलाए ही आ धमकते थे और आँगन में ठहाकों की महफ़िल सज जाती थी?
यहाँ मेलबर्न में तो पड़ोस के फ्लैट में कौन रहता है, यह भी छह महीने में पता नहीं चल पाया। लिफ्ट में अगर कोई मिल भी जाए, तो बस एक औपचारिक और ठंडी सी ‘हाय’ या ‘मॉर्निंग’ होती है, जिसमें न कोई अपनापन होता है और न ही किसी के सुख-दुख से कोई सरोकार। सब अपनी-अपनी दुनिया में, अपने-अपने ईयरफोन लगाए, अपनी ही रफ़्तार में भागे जा रहे हैं। न यहाँ की हवा में अपनेपन की खुशबू है, न यहाँ के खाने में माँ के हाथों के मसालों का स्वाद, और न ही यहाँ की भाषा में वो मिठास जो प्रयागराज की बोली में कानों में रस घोल देती थी।
“आखिर मैं किसके लिए यह बनवास काट रहा हूँ?” सिद्धार्थ ने उठकर कमरे की बत्ती जलाई और आइने के सामने जा खड़ा हुआ। आइने में खड़ा शख्स उसे खुद अपना अजनबी लगा। आँखों के नीचे काले घेरे, चेहरे पर थकान और एक अजीब सी उदासी। उसने सोचा कि अगर कल को मुझे यहाँ तेज़ बुखार आ जाए, तो कौन मेरे माथे पर ठंडी पट्टी रखेगा? यहाँ के लोग तो अपने माता-पिता को भी ओल्ड-एज होम में छोड़ आते हैं, फिर मुझ जैसे परदेसी से भला किसे हमदर्दी होगी?
घड़ी की सुइयाँ रात के तीन बजा रही थीं, लेकिन नींद तो जैसे उसकी आँखों से रूठ कर प्रयागराज की उसी पुरानी छत पर चली गई थी, जहाँ गर्मियों की रात में पानी का छिड़काव करके पूरा परिवार साथ में चारपाई बिछाकर सोता था और तारों को गिनते हुए दादी की कहानियाँ सुनता था। अचानक सिद्धार्थ के कानों में अपने बाबूजी, केशव प्रसाद जी की कही एक पुरानी कहावत गूँजने लगी, जो वह अक्सर तब सुनाते थे जब परिवार में किसी बात पर मनमुटाव होता था—
“रूखी-सूखी खाय के, ठंडा पानी पीव,
अपनों के संग बैठ के, सदा सुखी रहे जीव।”
बाबूजी हमेशा कहते थे, “बेटा, सोने की थाली में अकेले बैठकर छप्पन भोग खाने से कहीं बेहतर है कि मिट्टी के सकोरे में अपने परिवार के साथ बैठकर नमक-रोटी खा ली जाए, क्योंकि स्वाद भोजन में नहीं, साथ बैठने वालों के प्रेम में होता है।”
बाबूजी के ये शब्द याद आते ही सिद्धार्थ के सब्र का बाँध पूरी तरह टूट गया। वह घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया और किसी छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। उस बंद कमरे में उसकी सिसकियाँ गूँज रही थीं, लेकिन आज उसने अपने आँसुओं को रोका नहीं। वह रोता रहा, तब तक रोता रहा जब तक कि उसके भीतर जमा सारा गुबार, सारा अकेलापन और सारी घुटन आँसुओं के रास्ते बाहर नहीं निकल गई। रो लेने के बाद उसे ऐसा लगा जैसे उसके सीने पर रखा वो भारी पत्थर अचानक किसी ने हटा दिया हो। उसका मन एकदम हल्का और विचार काँच की तरह साफ हो चुके थे।
जब उसने अपने आँसू पोंछकर फिर से खिड़की के बाहर देखा, तो पूरब के आसमान में भोर की पहली सुनहरी किरण फूट रही थी। रात का अंधेरा छँट रहा था और उसके साथ ही सिद्धार्थ के मन का भ्रम भी टूट चुका था। उसने महसूस किया कि उसे किसी का गुलाम बनकर अपनी जवानी और अपने माता-पिता के बुढ़ापे के अनमोल पल इस विदेशी मिट्टी में दफ़न करने की कोई ज़रूरत नहीं है। उसके पास हुनर है, शिक्षा है और सबसे बढ़कर काम करने का जज़्बा है।
मगर सिद्धार्थ ने केवल भावुक होकर भागने का फैसला नहीं किया, बल्कि भोर की उस उजली किरण के साथ उसने एक बेहद ठोस और सकारात्मक संकल्प लिया। उसने तुरंत अपना लैपटॉप खोला। वह जानता था कि अगर वह बिना किसी योजना के लौटेगा, तो शायद लोग कहेंगे कि सिद्धार्थ हार मानकर वापस आ गया। उसने तय किया कि वह हार कर नहीं, बल्कि जीत कर अपने वतन लौटेगा। उसने अपने पिछले छह महीनों की सारी बचत का हिसाब लगाया, जो भारतीय रुपयों में एक अच्छी-खासी रकम बन चुकी थी।
सुबह के ठीक नौ बजे जब सिद्धार्थ अपने मैनेजर डेविड के केबिन में दाखिल हुआ, तो उसके चेहरे पर कोई उदासी या झिझक नहीं थी, बल्कि एक अद्भुत आत्मविश्वास चमक रहा था। उसने बहुत ही विनम्रता लेकिन दृढ़ता के साथ अपना इस्तीफा डेविड की मेज पर रख दिया।
डेविड ने हैरानी से उसे देखते हुए कहा, “सिद्धार्थ, तुम हमारी टीम के सबसे बेहतरीन सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट हो! क्या तुम्हें किसी दूसरी कंपनी से इससे बड़ा ऑफर मिला है? अगर पैसों की बात है, तो हम तुम्हारी सैलरी बीस प्रतिशत और बढ़ाने को तैयार हैं।”
सिद्धार्थ ने एक शांत मुस्कान के साथ जवाब दिया, “थैंक यू डेविड, लेकिन दुनिया की कोई भी करेंसी मुझे वो चीज़ नहीं खरीद कर दे सकती जिसकी मुझे तलाश है। मुझे किसी दूसरी कंपनी से नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और अपने परिवार से बुलावा आया है। मैं अपने देश लौट रहा हूँ और इस फैसले को कोई भी रकम नहीं बदल सकती।”
नोटिस पीरियड के एक महीने के दौरान सिद्धार्थ ने दिन-रात एक कर दिया। उसने प्रयागराज और आसपास के शहरों की स्थानीय समस्याओं का अध्ययन किया और तय किया कि वह अपने शहर में ही रहकर एक ऐसी आईटी कंसल्टेंसी और डिजिटल सेवा केंद्र की शुरुआत करेगा, जो न केवल विदेशी क्लाइंट्स के लिए भारत से ही काम करेगा, बल्कि उसके अपने शहर के उन युवाओं को भी रोज़गार देगा जो मजबूरी में अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर बाहर जाने को विवश होते हैं।
ठीक तीसवें दिन, जब सिद्धार्थ प्रयागराज के बमरौली एयरपोर्ट से बाहर निकला और उसने अपनी मिट्टी की सोंधी खुशबू को अपनी साँसों में भरा, तो उसे लगा जैसे किसी मुरझाए हुए पौधे को फिर से जीवनदान मिल गया हो। उसने घर में किसी को नहीं बताया था कि वह हमेशा के लिए लौट रहा है।
शाम का वक्त था। आँगन में केशव जी अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे, शारदा जी तुलसी के चौरे के पास दीपक जला रही थीं और मानसी रसोई से चाय के कप लेकर बाहर आ रही थी। तभी मुख्य द्वार का लोहे का गेट चरमराया और दो बड़े सूटकेस लिए सिद्धार्थ ने आँगन में कदम रखा।
मानसी के हाथ से चाय की ट्रे छूटते-छूटते बची, “भैया!” की एक तेज़ चीख पूरे घर में गूँज उठी। शारदा जी की आँखों से तो जैसे सावन-भादो बह निकले, उन्होंने दौड़कर अपने कलेजे के टुकड़े को सीने से लगा लिया। केशव जी का चश्मा नाक से फिसल गया और वे काँपते हाथों से बेटे का सिर सहलाने लगे। शोर सुनकर बगल के घर से हरिशंकर ताऊजी और वर्मा आंटी भी दौड़े चले आए।
ताऊजी ने सिद्धार्थ का कंधा थपथपाते हुए पूछा, “अरे सिद्धू, बिना बताए अचानक कैसे छुट्टी मिल गई रे? कितने दिन के लिए आया है?”
सिद्धार्थ ने आगे बढ़कर पहले अपने माता-पिता और फिर ताऊजी के चरण स्पर्श किए। फिर उसने सबके बीच खड़े होकर, अपनी माँ का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, “ताऊजी, अब मैं किसी छुट्टी पर नहीं आया हूँ। मैं अपनी वो टिकट फाड़ कर आ गया हूँ जो मुझे अपनों से दूर ले जाती थी। अब आपका ये सिद्धू आपको, माँ-बाबूजी को और इस आँगन को छोड़कर कहीं नहीं जाएगा।”
शारदा जी ने घबराकर पूछा, “पर बेटा, तेरी वो इतनी बड़ी नौकरी? तेरा करियर?”
सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए अपने बैग से एक फाइल निकाली और बाबूजी के हाथों में थमा दी। “माँ, हुनर इंसान के दिमाग में होता है, किसी देश की सरहदों में नहीं। मैंने वहाँ से बचाए पैसों और अपने अनुभव से यहीं प्रयागराज में अपनी खुद की छोटी सी कंपनी रजिस्टर कर ली है। अब मैं यहीं अपने घर की छत के नीचे बैठकर काम करूँगा और अपने शहर के दस और लड़कों को नौकरी दूँगा, ताकि किसी और शारदा माँ को वीडियो कॉल पर अपने बेटे का चेहरा देखकर आँसू न बहाने पड़ें।”
यह सुनते ही केशव जी की छाती गर्व से चौड़ी हो गई और हरिशंकर ताऊजी ने तो सिद्धार्थ को कसकर गले से लगा लिया, “वाह मेरे शेर! आज तूने साबित कर दिया कि तू वाकई इस मिट्टी का लाल है!”
आज उस बात को दो साल बीत चुके हैं। सिद्धार्थ की कंपनी ‘संगम टेक सॉल्यूशंस’ में आज प्रयागराज के पच्चीस युवा काम करते हैं, जो शाम को पाँच बजते ही हँसते-खिलखिलाते अपने-अपने माता-पिता के पास घर लौट जाते हैं। हो सकता है कि सिद्धार्थ आज मेलबर्न जितना पैसा न कमा रहा हो, लेकिन जब वह दोपहर को दफ़्तर से घर आकर माँ के हाथ की बनी गरमा-गरम अरहर की दाल और चावल खाता है, जब शाम को बाबूजी और ताऊजी के साथ बैठकर देश-दुनिया की चर्चा करता है, और जब रात को बेफ़िक्र होकर अपनेपन की चादर ओढ़कर सोता है, तो उसे लगता है कि वह दुनिया का सबसे अमीर इंसान है। उसने यह साबित कर दिया था कि अपने घर और अपनों के साथ रहकर भी आसमान की बुलंदियों को छुआ जा सकता है, क्योंकि असली सुख किसी डॉलर या पाउंड में नहीं, बल्कि अपनों की मुस्कान और उनके आशीर्वाद की छाँव में ही बसता है।
आप सभी पाठकों से एक सवाल: क्या आपको भी लगता है कि आज की भागदौड़ में हम पैसों के पीछे भागते हुए अपने परिवार और माता-पिता के साथ बिताने वाले अनमोल पलों को खोते जा रहे हैं? सिद्धार्थ के इस फैसले के बारे में आपकी क्या राय है? अपने दिल की बात नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें, आपके विचारों का हमें बेसब्री से इंतज़ार रहेगा!
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