“बाबूजी, जरा शांत होकर सोचिए! मैं आपसे बहस नहीं कर रही, बस इतना कह रही हूं कि आप जो फैसला सुना रहे हैं, वह अन्याय है। उस मासूम की आखिर खता क्या है? अभी तो उसकी उम्र ही क्या है… महज बाईस साल! और शादी के बाद उसने सुख के दिन ही कितने देखे हैं?” बड़ी बहू अनुराधा की सधी हुई पर कांपती आवाज हवेली के विशाल आंगन में गूंजी, तो तख्त पर बैठे प्रताप नारायण सिंह का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया।
उनकी रौबदार मूंछें गुस्से से फड़कने लगीं और वे हाथ की छड़ी जमीन पर पटकते हुए गरजे, “बच्ची है वो? अगर इतनी ही नादान और बच्ची थी, तो उसके बाप ने ब्याह क्यों रचाया? अपने ही आंगन में बिठाकर रखते! हमारे सिर पर यह कलंक का टीका क्यों मढ़ दिया?”
“बाबूजी, बेटियों के ब्याह तो माता-पिता समाज की रस्मों को देखकर कर ही देते हैं,” अनुराधा ने अपने पल्लू को संभालते हुए बेहद विनम्रता पर दृढ़ता से कहा, “और हमारा विक्रम देश की रक्षा करते हुए सीमा पर शहीद हो गया, तो इसमें वैदेही का क्या दोष? नियति ने उसके साथ जो क्रूर मजाक किया है, क्या वह दुख कम है जो हम उस पर तोहमतों का बोझ लाद रहे हैं?”
प्रताप नारायण सिंह की आंखों में खून उतर आया था। वे खड़े हो गए और अपनी कड़कदार आवाज में बोले, “नियति का दोष कहकर उसके पापों पर पर्दा मत डालो बड़ी बहू! हमारे घर की विधवा बहू सफेद साड़ी पहनकर बाजार के रेस्तरां में किसी पराये मर्द के साथ कॉफी पीती दिखे, क्या यह भी उसका बचपना है? उसके घरवालों ने क्या उसे यही संस्कार दिए हैं कि वह उदयपुर के सबसे प्रतिष्ठित ठाकुर खानदान की पगड़ी चौराहे पर उछाल दे? मुझे तो डर है कि कहीं वह कल को उस आशिक का हाथ पकड़कर इस हवेली की दहलीज न लांघ जाए!”
“बाबूजी, संभालकर बोलिए!” अनुराधा के स्वर में अब एक बड़ी बहन की पीड़ा और अधिकार दोनों झलक रहे थे। “वैदेही को अगर भागना होता या कोई गलत कदम उठाना होता, तो वह कब का उठा चुकी होती। वह किसी से छुपकर नहीं, बल्कि मुझसे पूछकर गई थी। वह लड़का क्षितिज है, उसके कॉलेज के दिनों का सहपाठी। और अगर आज उसे अपने एक पुराने दोस्त से मिलने के लिए घर के बाहर किसी रेस्तरां का सहारा लेना पड़ा, तो कहीं न कहीं खोट हमारी अपनी सोच में है। हमने इस घर का माहौल ही ऐसा बना रखा है कि कोई अपनी साफ नीयत भी जाहिर करने से कांपता है।”
अनुराधा रिश्ते में तो वैदेही की जेठानी थी, मगर जिस दिन से वैदेही दुल्हन बनकर इस घर में आई थी, अनुराधा ने उसे अपनी छोटी बहन और बेटी की तरह संभाला था।
बड़ी बहू के मुंह से ऐसी खरी-खरी सुनकर प्रताप नारायण सिंह सन्न रह गए। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जो बहू आज तक उनकी परछाईं से भी पर्दा करती थी, आज वह उनके सामने खड़ी होकर दलीलें दे रही है।
“बस करो बड़ी बहू! तुमसे मुझे इस बगावत की उम्मीद नहीं थी,” प्रताप बाबू ने अपना हाथ हवा में लहराते हुए कहा। “तुम्हें तो इस हवेली की मर्यादा और परंपराओं की दुहाई देनी चाहिए थी, और तुम उल्टा उस कुलच्छनी की वकालत कर रही हो? आज मेरे जवान बेटे की चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई है, और उसकी विधवा गैर मर्दों के साथ बैठकर ठहाके लगा रही है! अभी के अभी उसके पिता कैलाशनाथ को फोन लगाओ। मैं आज ही इस रिश्ते का और इस तमाशे का हिसाब करूंगा!”
“बाबूजी, फैसला सुनाने से पहले एक बार वैदेही के मन की बात तो जान लीजिए…” अनुराधा ने भर्राई आवाज में कहा, लेकिन प्रताप बाबू ने मुंह फेर लिया। अनुराधा भारी कदमों से वहां से हट गई।
प्रताप नारायण सिंह उदयपुर के जाने-माने जमींदार और सेवानिवृत्त जज थे। कानून की किताबें तो उन्होंने सालों पहले बंद कर दी थीं, लेकिन घर और समाज में आज भी उनका ही कानून चलता था। पूरे इलाके में उनकी प्रतिष्ठा और रौब के चर्चे थे। लोग उनके सामने ऊंची आवाज में बात करने से भी कतराते थे। यही सम्मान धीरे-धीरे उनके भीतर एक कठोर अहंकार का रूप ले चुका था। उनके लिए इंसान की भावनाओं से कहीं ज्यादा बड़ी समाज की नजरों में बनी हुई उनकी ‘इज्जत’ थी।
पत्नी देवांशी देवी का देहांत दस वर्ष पूर्व ही हो गया था। परिवार में तीन बेटे और एक बेटी थी। बेटी ससुराल में सुखी थी। बड़े दोनों बेटे शहर के ही प्रतिष्ठित महाविद्यालय में प्राध्यापक थे, जिनका स्वभाव अपने पिता के विपरीत शांत और सौम्य था, मगर पिता के आगे बोलने की हिम्मत उनमें भी नहीं थी। सबसे छोटा बेटा विक्रम, जो पूरे घर की जान था, भारतीय सेना में कैप्टन था।
महज नौ महीने पहले ही की तो बात है, जब पूरी हवेली शहनाइयों की गूंज और रोशनी से नहाई हुई थी। विक्रम के सिर पर सेहरा सजा था और वैदेही लाल जोड़े में सजी इस आंगन में लक्ष्मी बनकर आई थी। वैदेही की हथेलियों से शादी की मेहंदी का रंग अभी पूरी तरह छूटा भी नहीं था और न ही वह अपने पति को ठीक से जान पाई थी कि शादी के पांचवें महीने ही सीमा पर हुए एक घुसपैठ रोधी अभियान में विक्रम वीरगति को प्राप्त हो गया।
तिरंगे में लिपटा विक्रम का पार्थिव शरीर जब हवेली के आंगन में आया, तो उसके साथ ही वैदेही के सारे सपने, उसकी हंसी और उसके जीवन के सारे रंग भी हमेशा के लिए दफन हो गए। इक्कीस-बाईस साल की वह चंचल लड़की अचानक एक सफेद पत्थर की मूरत बन गई। हवेली के कोने वाले कमरे में बंद होकर सिसकना ही अब उसकी दिनचर्या बन चुकी थी।
“वैदेही… ओ वैदेही! दरवाजा खोलो गुड़िया,” अनुराधा ने उसके कमरे के बाहर खड़े होकर धीरे से दस्तक दी।
अंदर से कोई आवाज नहीं आई, बस दबी हुई सिसकियों की आहट सुनाई दी। अनुराधा ने दरवाजा धकेला तो देखा वैदेही फर्श पर घुटनों में सिर छिपाए बैठी कांप रही थी। आंगन में प्रताप बाबू की गरजती हुई आवाज उसके कानों तक भी पहुंच चुकी थी।
अनुराधा ने दौड़कर उसे अपने सीने से लगा लिया। “शांत हो जा मेरी बच्ची, रो मत। मैं हूं ना तेरे साथ।”
वैदेही अनुराधा के गले लगकर फूट-फूट कर रो पड़ी। “दीदी… क्या सच में मैंने इतना बड़ा पाप कर दिया है? आप तो जानती हैं न, मेरे मन में कोई मैल नहीं था। क्षितिज को जब मेरे वैधव्य का पता चला, तो वह बस मुझे सांत्वना देने, मेरा हाल जानने दिल्ली से यहां आया था। मैंने उसे घर आने से मना किया क्योंकि मैं बाबूजी के स्वभाव से डरती थी। मैं तो बस आधे घंटे के लिए उससे मिलकर वापस आ गई दीदी… क्या किसी पुराने दोस्त के सामने अपने आंसू बहा लेना भी इस समाज में गुनाह है?”
अनुराधा ने अपने पल्लू से उसके आंसू पोंछे। उसकी अपनी आंखें भी डबडबा आई थीं। “नहीं मेरी जान, तूने कोई गुनाह नहीं किया। गुनाहगार तो मैं हूं जो तुझे बाबूजी के कोप से बचा नहीं पा रही। बाबूजी ने गुस्से में तुम्हारे बाबूजी को फोन कर दिया है। वे आते ही होंगे।”
“हे भगवान! यह क्या हो गया दीदी?” वैदेही का चेहरा सफेद पड़ गया। “पापा तो पहले ही दिल के मरीज हैं, और समाज के डर से ही उन्होंने मेरी शादी इतनी जल्दबाजी में की थी। अब जब वे बाबूजी के मुंह से मेरे चरित्र पर उठे सवाल सुनेंगे, तो वे तो जीते-जी मर जाएंगे!”
“तू हिम्मत रख वैदेही। आज अगर सच को झुकना पड़ा, तो इस हवेली में फिर कभी कोई बेटी सांस नहीं ले पाएगी,” अनुराधा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा और उसे शांत करने की कोशिश करने लगी।
अनुराधा के कमरे से जाने के बाद वैदेही खिड़की के पास खड़ी होकर सूनी आंखों से आसमान को निहारने लगी। अतीत के पन्ने हवा के झोंकों की तरह उसके सामने फड़फड़ाने लगे।
आज से ठीक एक साल पहले उसकी जिंदगी कितनी अलग थी। वह और क्षितिज साहित्य के छात्र थे। दोनों को ही कविताओं और किताबों से गहरा लगाव था। कॉलेज के पुस्तकालय से लेकर कैंटीन की मेज तक, दोनों घंटों साहित्य और जीवन पर चर्चा करते। उन दोनों के बीच एक बेहद पवित्र, अनकहा सा जुड़ाव पनप रहा था। इसे प्रेम का नाम देने से पहले ही क्षितिज को आगे की पढ़ाई और सिविल सेवा की तैयारी के लिए दिल्ली जाना पड़ा।
जाने से एक दिन पहले क्षितिज ने कॉलेज के बगीचे में उससे कहा था, “वैदेही, मैं दिल्ली जा रहा हूं, लेकिन अपनी मंजिल पाकर बहुत जल्द लौटूंगा। जिस दिन मैं खुद को तुम्हारे काबिल समझूंगा, उस दिन सीधे तुम्हारे पापा से तुम्हारा हाथ मांगने आऊंगा। तब तक मेरा इंतजार करोगी न?”
वैदेही ने शर्म से पलकें झुका ली थीं। उसने मुंह से कुछ नहीं कहा था, पर उसकी मुस्कान ने सब कुछ बयां कर दिया था।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मोहल्ले के किसी रिश्तेदार ने वैदेही और क्षितिज को कॉलेज के बाहर बात करते देख लिया था और नमक-मिर्च लगाकर वैदेही के पिता कैलाशनाथ जी के कान भर दिए। कैलाशनाथ जी एक साधारण मध्यमवर्गीय स्कूल शिक्षक थे, जिनके लिए समाज में अपनी नाक बचाना ही सर्वोपरि था। उन्हें लगा कि कहीं बेटी प्रेम-प्रसंग में पड़कर खानदान का नाम न डुबो दे।
उन्होंने बिना वैदेही से एक शब्द पूछे, आनन-फानन में अपने पुराने परिचित प्रताप नारायण सिंह के फौजी बेटे विक्रम से उसका रिश्ता तय कर दिया। वैदेही ने अपनी मां के सामने रोकर, गिड़गिड़ाकर अपने मन की बात कहनी चाही, लेकिन पिता की सख्त चेतावनी कि “अगर इस शादी से इनकार किया तो मेरा मरा मुंह देखोगी,” ने उसके होंठों पर हमेशा के लिए ताला जड़ दिया।
वह अपने अधूरे प्रेम को हृदय की गहराइयों में दफन कर विक्रम की दुल्हन बन गई। विक्रम एक नेक और सुलझा हुआ इंसान था, उसने वैदेही को पूरा सम्मान दिया, लेकिन इससे पहले कि उनके बीच पति-पत्नी का रिश्ता पनप पाता, छुट्टियां खत्म हुईं और विक्रम सीमा पर लौट गया—कभी न वापस आने के लिए।
हवेली के बाहर अचानक एक गाड़ी के रुकने की आवाज से वैदेही की तंद्रा टूटी। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
नीचे बैठक में कैलाशनाथ जी पसीने से तर-बतर और घबराए हुए दाखिल हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रताप बाबू को प्रणाम किया, “ठाकुर साहब, आपने इतनी हड़बड़ी में बुलाया… सब कुशल-मंगल तो है? हमारी वैदेही तो ठीक है न?”
प्रताप नारायण सिंह ने उनकी तरफ देखा तक नहीं। वे तल्ख आवाज में बोले, “कुशल-मंगल पूछने लायक छोड़ा ही कहां है आपकी लाडली ने कैलाशनाथ जी! जिस लड़की को हमने लक्ष्मी समझकर अपने शहीद बेटे की निशानी के तौर पर सिर-आंखों पर बिठाया, वह तो हमारे ही कुल के नाम पर कालिख पोतने पर तुली है। सफेद कपड़ों की आड़ में बाजारों में अपने पुराने आशिक के साथ रंगरेलियां मना रही है! मैं पूछता हूं, यही संस्कार देकर भेजा था आपने उसे?”
कैलाशनाथ जी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उनका बुजुर्ग शरीर कांपने लगा। तभी वैदेही धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरती हुई नीचे आई। उसके पीछे अनुराधा और घर के दोनों बड़े बेटे भी आकर खड़े हो गए।
कैलाशनाथ जी ने अपनी बेटी की तरफ देखा, उनकी आंखों में गुस्सा कम और बेबसी ज्यादा थी। “वैदेही… यह मैं क्या सुन रहा हूं बेटा? क्या मेरे सफेद बालों को दुनिया के सामने नीचा दिखाने की कसम खा ली है तूने?”
वैदेही अपने पिता के कदमों के पास बैठ गई और सिसकते हुए बोली, “बाबूजी, आप तो मुझे जानते हैं न? मैंने आपकी इज्जत की खातिर बिना एक सवाल किए आपकी चुनी हुई दहलीज को अपना लिया था। विक्रम जी के जाने के बाद मैंने खुद को इस चारदीवारी में कैद कर लिया। क्षितिज मेरे कॉलेज का दोस्त है। जब उसे मेरे दुखद हाल का पता चला, तो वह इंसानियत के नाते मेरा हाल पूछने दिल्ली से यहां आया था। इस घर के सख्त नियमों के डर से मैं उसे यहां नहीं बुला सकी, इसलिए दीदी को बताकर बस कुछ देर के लिए उससे मिलने चली गई। क्या किसी का मेरे दुख में शामिल होना मुझे चरित्रहीन बना देता है पापा? अगर आपको यकीन नहीं है, तो आप खुद क्षितिज से बात कर लीजिए।”
कमरे में गहरा सन्नाटा पसर गया। वैदेही के शब्दों की सच्चाई और उसकी आवाज के दर्द ने कैलाशनाथ जी की आत्मा को झकझोर दिया। उन्हें अपनी वह गलती याद आ गई जब उन्होंने समाज के डर से अपनी फूल सी बेटी की इच्छाओं का गला घोंट दिया था।
कैलाशनाथ जी की आंखों से आंसू बह निकले। वे जमीन पर बैठ गए और वैदेही के सिर पर हाथ रखकर रोते हुए बोले, “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची! तेरा असली गुनहगार तो मैं हूं। मैंने अपनी झूठी शान के लिए तुझसे तेरी खुशी पूछी ही नहीं। समाज क्या कहेगा, इसी डर में मैंने तुझे इस आग में झोंक दिया।”
एक पिता को अपनी बेटी के सामने यूं टूटकर रोते देख प्रताप नारायण सिंह के भीतर का पत्थर भी दरकने लगा। तभी अनुराधा ने आगे बढ़कर कहा, “बाबूजी, देखिए आज एक पिता अपनी गलती स्वीकार कर रहा है। क्या हम इतने कठोर हैं कि अपनी ही बहू के आंसुओं को न समझ सकें? विक्रम चला गया, हम सबका कलेजा फट गया, लेकिन हमने तो अपना बेटा खोया है बाबूजी… इस लड़की ने तो अपना वर्तमान और भविष्य दोनों खो दिया है! क्या हमारी खानदानी इज्जत इतनी कमजोर है कि एक मासूम लड़की के अपने दोस्त से बात कर लेने से मिट्टी में मिल जाएगी? असली इज्जत तो तब मिटती है बाबूजी, जब घर की लक्ष्मी के चरित्र पर अपने ही घर के बुजुर्ग उंगली उठाते हैं।”
प्रताप बाबू के बड़े बेटे ने भी पहली बार हिम्मत जुटाकर कहा, “भाभी बिल्कुल सही कह रही हैं बाबूजी। हमने अपने घर में डर का ऐसा माहौल बना दिया है कि बच्चे अपने मन की पीड़ा भी हमसे साझा नहीं कर पाते। वैदेही हमारी बहू बाद में है, पहले एक इंसान है।”
प्रताप नारायण सिंह चुपचाप खड़े सबकी बातें सुन रहे थे। उनकी नजर सामने दीवार पर टंगी अपने शहीद बेटे विक्रम की तस्वीर पर गई, जिस पर चंदन का हार चढ़ा था। तस्वीर में मुस्कुराता हुआ विक्रम जैसे अपने पिता से पूछ रहा हो—‘बाबूजी, मैंने तो देश की रक्षा के लिए जान दे दी, क्या आप मेरी वैदेही की खुशियों की रक्षा भी नहीं कर सकते?’
प्रताप बाबू का अहंकार मोम की तरह पिघलने लगा। उन्हें एहसास हुआ कि जिस रौब और दबदबे पर वे आज तक इतराते रहे, उसने उन्हें अपनों से ही कितना दूर कर दिया था। उनकी आंखें नम हो गईं। वे धीरे से चलकर वैदेही के पास आए और उसके सिर पर अपना कांपता हुआ हाथ रखा।
“मुझे माफ कर दे बेटी,” प्रताप बाबू का गला रुंध गया था। “मेरी आंखों पर झूठी आन-बान की पट्टी बंधी हुई थी। मैं भूल गया था कि जिस आंगन में बेटियों के आंसू गिरते हैं, वहां कभी बरकत नहीं होती। बड़ी बहू ने आज मेरी आंखें खोल दीं।”
उन्होंने अपनी जेब से रुमाल निकालकर आंखें पोंछी और गंभीर स्वर में कहा, “वैदेही बेटा, उस लड़के को… क्षितिज को फोन लगाओ और अभी इसी वक्त हवेली में बुलाओ।”
वैदेही ने घबराकर उनकी तरफ देखा, तो प्रताप बाबू ने स्नेह से सिर हिलाया, “डरो मत। इस बार यह हुक्म एक जज का नहीं, एक पिता का है।”
आधे घंटे के भीतर क्षितिज हवेली की बैठक में खड़ा था। उसके चेहरे पर थोड़ी घबराहट थी, लेकिन आंखों में एक सच्चे इंसान की गरिमा और आत्मविश्वास साफ झलक रहा था। उसने झुककर सभी बड़ों का अभिवादन किया।
प्रताप बाबू ने करीब आधे घंटे तक क्षितिज से बात की। उन्होंने जाना कि क्षितिज ने हाल ही में सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण की है और वह प्रशिक्षण के लिए जाने से पहले सिर्फ एक बार वैदेही को हिम्मत बंधाने आया था। उसके मन में वैदेही के प्रति आज भी वही गहरा सम्मान और निःस्वार्थ प्रेम था, जिसमें कोई स्वार्थ या छलावा नहीं था।
प्रताप नारायण सिंह उठे और क्षितिज के कंधे पर हाथ रखकर बोले, “बेटा, तुमने इतनी बड़ी परीक्षा पास की है, देश की सेवा करने जा रहे हो। मेरा विक्रम भी देश के लिए ही जिया और देश के लिए ही कुर्बान हो गया। उसने अपनी शहादत से मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया, लेकिन जाते-जाते वह अपनी इस अमानत को मेरे भरोसे छोड़ गया था।”
प्रताप बाबू ने वैदेही का हाथ थामा और उसे क्षितिज के सामने लाकर खड़ा कर दिया। बैठक में मौजूद हर शख्स सांस रोके उन्हें देख रहा था।
“बेटा क्षितिज,” प्रताप बाबू की आवाज भावनाओं से भीग गई, “मैंने एक बेटा सीमा पर खो दिया है। क्या मैं तुमसे अपना दूसरा बेटा बनने का हक मांग सकता हूं? यह वैदेही आज से मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है। इसके आगे पूरी जिंदगी पड़ी है और मैं नहीं चाहता कि यह मेरी झूठी मर्यादाओं की बलि चढ़कर ताउम्र सफेद कपड़ों में घुट-घुट कर जिए। क्या तुम मेरी इस बेटी का हाथ थामकर इसके जीवन में फिर से रंग भरोगे?”
क्षितिज की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने तुरंत झुककर प्रताप बाबू के चरण स्पर्श किए और रुंधे गले से बोला, “बाबूजी, वैदेही को अपनाना मेरे लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है। मैं आपको वचन देता हूं कि मैं ताउम्र इसके सम्मान और खुशियों की रक्षा करूंगा, और आपके लिए हमेशा एक बेटे की तरह खड़ा रहूंगा।”
वैदेही को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसनेकृतज्ञता भरी नजरों से अनुराधा की ओर देखा, जो मुस्कुराते हुए अपने आंसू पोंछ रही थी।
कैलाशनाथ जी ने आगे बढ़कर प्रताप बाबू को गले लगा लिया। “ठाकुर साहब, आज आपने साबित कर दिया कि आप सिर्फ नाम के नहीं, बल्कि कर्म और दिल से भी असली ठाकुर हैं। आपने आज दो जिंदगियों को उजड़ने से बचा लिया।”
प्रताप बाबू ने क्षितिज और वैदेही दोनों को अपने सीने से लगा लिया। हवेली की जिन दीवारों ने सदियों से सिर्फ सख्त नियम और रूढ़ियां देखी थीं, आज वहां इंसानियत, प्रेम और एक नई शुरुआत की सुगंध फैल रही थी। खानदान की इज्जत आज कम नहीं हुई थी, बल्कि पूरे समाज के सामने और भी ऊंची हो गई थी।
आपकी राय में प्रताप बाबू और बड़ी बहू अनुराधा का यह कदम कितना सही था? क्या हमारे समाज को भी अब पुरानी रूढ़ियों से बाहर निकलकर विधवा बेटियों को जीने का दूसरा मौका नहीं देना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें!
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लेखिका : रमा शुक्ला