दो माओं का आंगन

 शारदा जी का मन बहुत भारी और बेचैन था। सामने मेज पर उनका खुला हुआ सूटकेस रखा था, जिसमें वह आधे-अधूरे मन से अपनी साड़ियां तह करके रख रही थीं। तभी फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘नेहा’ नाम चमक रहा था। शारदा जी ने एक गहरी सांस ली और फोन उठाया।

“मां, आपने अपनी शुगर और बीपी की दवाइयां रख लीं ना? और हां, अपना गर्म शॉल और घुटनों का बेल्ट रखना मत भूलना। दिल्ली में भी अब हल्की ठंड शुरू हो गई है। कम से कम सवा महीना तो आपको मेरे पास रुकना ही पड़ेगा!” फोन के दूसरी तरफ से नेहा की खनकती हुई, लेकिन थोड़ी थकी हुई आवाज आई।

शारदा जी के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान तैर गई, जिसके पीछे आठ साल पुराना एक अनकहा डर छिपा था। वह दबे स्वर में बोलीं, “नेहा बेटा, तू क्यों जिद कर रही है? मैं दो-चार दिन रहकर वापस आ जाऊंगी। इतने लंबे समय तक वहां रुकना मुझे ठीक नहीं लगता। तेरी सासू मां निर्मला जी तो घर पर हैं ही, वह सब संभाल लेंगी। वैसे भी… तू तो जानती है ना कि मेरा और उनका स्वभाव बिल्कुल मेल नहीं खाता। पिछली बार जब आरव हुआ था, तब कितनी अनबन और घुटन हो गई थी। मेरी वजह से तुझे भी तो कितना सुनना पड़ा था बेटा!”

फोन के उस पार कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर नेहा की रुआंसी आवाज आई, “मां, वो आठ साल पुरानी बात थी। तब से आज तक आप कभी मेरे ससुराल में रात भर के लिए भी नहीं रुकीं। सिर्फ सुबह आती हैं और शाम की बस पकड़कर वापस देहरादून लौट जाती हैं। लेकिन मां, इस बार हालात अलग हैं। मेरी उम्र भी अब चौंतीस की हो गई है, शरीर में पहले जैसी ताकत नहीं रही। ऊपर से आरव के स्कूल की परीक्षाएं हैं, वरुण के ऑफिस में मार्च क्लोजिंग का इतना दबाव है कि उन्हें सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती। सासू मां की भी तो उम्र हो गई है, वह अकेले घर, रसोई, आरव और मेरी डिलीवरी… सब कैसे संभालेंगी? और सच कहूं मां, तो आज आठ साल बाद भी इस नाजुक वक्त में मुझे अपनी मां का आंचल चाहिए। क्या आप अपनी बेटी के लिए अपने पुराने कड़वे अनुभवों को भुलाकर नहीं आ सकतीं?”

नेहा की आवाज में जो तड़प थी, उसने शारदा जी के सारे तर्कों को पिघला दिया। एक मां अपने मान-सम्मान से समझौता कर सकती है, लेकिन अपनी संतान की तकलीफ कैसे देख सकती है? शारदा जी ने अपनी आंख के कोने में आई नमी को पोंछते हुए कहा, “अरे पगली, रोती क्यों है? शादी के ग्यारह साल बाद भी तू बिल्कुल बच्ची ही रही। चल, मन छोटा मत कर, मैं कल सुबह की शताब्दी से आ रही हूं। तेरी जिद के आगे मेरी कभी चली है भला?”

फोन कटने के बाद शारदा जी बिस्तर के किनारे बैठ गईं। उनकी आंखों के सामने आठ साल पुराना वह मंजर घूम गया, जब नेहा के पहले बेटे आरव का जन्म हुआ था। उस वक्त भी नेहा की ऐसी ही जिद पर वह एक महीने के लिए दिल्ली गई थीं। लेकिन नेहा की सास, निर्मला जी, जो स्वभाव से बेहद रौबदार और पारंपरिक विचारों वाली महिला थीं, उन्होंने कदम-कदम पर शारदा जी को यह अहसास कराया था कि वह ‘लड़की की मां’ हैं और यह घर उनका नहीं है।

शारदा जी को आज भी याद था कि कैसे रसोई में उनके जाने पर निर्मला जी तुरंत टोक देती थीं—”अरे समधन जी, आप क्यों कष्ट कर रही हैं, हमारे यहां मसाले थोड़े अलग तरीके से पड़ते हैं, आपको अंदाजा नहीं मिलेगा।” अगर शारदा जी नेहा के लिए अजवाइन के लड्डू बनातीं, तो निर्मला जी मुंह सिकोड़ कर कहतीं—”हमारे खानदान में तो जच्चा को गोंद की पंजीरी ही दी जाती है, ये आपका पहाड़ी तरीका हमारे बच्चे को सूट नहीं करेगा।”

बात-बात पर यह जताना कि ‘हम लड़के वाले हैं’, शारदा जी के स्वाभिमान को छलनी कर देता था। वह अपने ही कमरे में कैद होकर रह गई थीं। प्यास लगने पर भी रसोई से पानी लेने जाने में उन्हें संकोच होता था, मानो वह किसी पराए घर में बिना बुलाए मेहमान की तरह रह रही हों। सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती थी, जब दोनों माओं के बीच के इस शीत-युद्ध में बेचारी नेहा पिसती थी। कच्ची प्रसूति की अवस्था में नेहा कभी मां के आंसू पोंछती, तो कभी सास के ताने सुनती। शारदा जी ने तभी मन ही मन गांठ बांध ली थी कि वह अपनी बेटी के गृहस्थ जीवन में कभी अपनी परछाईं भी नहीं पड़ने देंगी।

लेकिन आज, आठ साल बाद, नियति ने उन्हें फिर उसी दहलीज पर खड़ा कर दिया था।

अगले दिन जब शारदा जी दिल्ली में नेहा के घर के दरवाजे पर पहुंचीं, तो उनके दिल की धड़कनें तेज थीं। उन्होंने मन ही मन खुद को तैयार कर लिया था कि इस बार निर्मला जी चाहे कुछ भी कहें, वह चुपचाप सह लेंगी, मुस्कुरा कर टाल देंगी, पर नेहा को कोई तनाव नहीं होने देंगी।

डोरबेल बजाते ही दरवाजा खुला। सामने निर्मला जी ही खड़ी थीं। शारदा जी ने झिझकते हुए हाथ जोड़े, “नमस्ते समधन जी।”

लेकिन यह क्या! निर्मला जी के चेहरे पर वह पुरानी तनातनी या रौब का नामोनिशान नहीं था। उनके चेहरे पर एक बेहद सौम्य और सच्ची मुस्कान खिली हुई थी। उन्होंने आगे बढ़कर शारदा जी के जुड़े हुए हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और बड़े ही स्नेह से कहा, “अरे समधन जी, हाथ मत जोड़िए, गले मिलिए! आइए, आइए… मैं सुबह से ही आपकी राह देख रही थी।”

निर्मला जी ने खुद आगे बढ़कर शारदा जी के हाथ से छोटा बैग ले लिया और आठ साल के आरव को आवाज लगाई, “आरव बेटा, देखो नानी जी आ गईं, जल्दी से पैर छुओ और इनका सूटकेस अंदर वाले कमरे में रखो।”

शारदा जी तो अवाक रह गईं। वह अंदर आईं तो देखा कि नेहा सोफे पर बैठी मुस्कुरा रही थी। शारदा जी ने नेहा के सिर पर हाथ फेरा ही था कि निर्मला जी तौलिया और गुनगुना पानी लेकर आ गईं। “शारदा जी, सफर से आई हैं, पहले हाथ-मुंह धो लीजिए। मैंने आपके लिए अदरक और इलायची वाली कड़क चाय चढ़ाई है, बिल्कुल वैसी ही जैसी आपको पसंद है। और हां, उसमें चीनी नहीं डाली है, मुझे याद था कि आपको शुगर है।”

शारदा जी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिस महिला ने आठ साल पहले कभी यह पूछना भी जरूरी नहीं समझा था कि उन्होंने खाना खाया या नहीं, आज उन्हें शारदा जी की चाय की पत्ती और अदरक का स्वाद तक याद था! शारदा जी ने चुपचाप चाय पी और नेहा की तरफ आश्चर्य से देखा। नेहा ने आंखों ही आंखों में मुस्कुरा कर इशारा किया—’मैंने कहा था ना मां, सब बदल गया है।’

दो दिन बाद ही नेहा को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। ऑपरेशन थिएटर के बाहर जब तक नेहा रही, निर्मला जी ने एक पल के लिए भी शारदा जी का हाथ नहीं छोड़ा। वह बार-बार शारदा जी को ढांढस बंधाती रहीं, “आप घबराइए मत शारदा बहन, हमारी नेहा बहुत बहादुर है, भगवान सब अच्छा करेंगे।” ‘समधन जी’ से ‘शारदा बहन’ तक का यह सफर शारदा जी के मन की सारी बर्फ पिघला रहा था।

कुछ ही घंटों में खुशखबरी आई—नेहा ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया था। घर में लक्ष्मी के आगमन से खुशियों की लहर दौड़ गई। तीन दिन बाद जब नेहा और नन्ही परी को लेकर सब घर लौटे, तो असली परीक्षा का समय शुरू हुआ। घर में काम का बोझ बढ़ गया था, लेकिन इस बार नजारा कुछ और ही था।

घर में न कोई सास थी, न कोई समधन; वहां सिर्फ दो माएं थीं, जो अपनी-अपनी ममता की छांव से उस घर को सींच रही थीं।

सुबह होते ही दोनों के बीच बिना कहे एक बहुत ही खूबसूरत तालमेल बैठ जाता। अगर शारदा जी सुबह उठकर नेहा के लिए दलिया और अजवाइन का पानी तैयार करतीं, तो निर्मला जी आरव को जगाकर उसका टिफिन पैक करतीं और उसे स्कूल बस तक छोड़ आतीं। जब निर्मला जी नन्ही बच्ची की मालिश करतीं और उसे नहलातीं, तब तक शारदा जी दोपहर के खाने की तैयारी कर लेतीं।

सबसे बड़ा बदलाव तो रसोई में देखने को मिला। एक दिन शारदा जी झिझकते हुए रसोई में खड़ी थीं, तभी निर्मला जी ने आकर उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “शारदा बहन, आप इतनी संकोच में क्यों रहती हैं? यह आपकी बेटी का घर है, यानी आपका अपना घर है। इस रसोई में जो डिब्बा जहां रखा है, वह आपका ही है। आज दोपहर में अपने हाथ की वो पहाड़ी भट की दाल और झंगोरे की खीर बनाइए ना, वरुण और आरव भी कब से कह रहे थे कि नानी के हाथ का खाना खाना है।”

इतना ही नहीं, दोपहर में जब काम खत्म हो जाता, तो निर्मला जी खुद शारदा जी के कमरे में आतीं और कहतीं, “अब आप थोड़ी देर नेहा के पास बैठिए, मां-बेटी सुख-दुख की बातें कीजिए। बच्ची को मैं अपने पास सुला लेती हूं। नेहा को भी अपनी मां के हाथ के स्पर्श से आराम मिलेगा।” और कभी जब शारदा जी देखतीं कि निर्मला जी के घुटनों में दर्द हो रहा है, तो वह जबरदस्ती उन्हें आराम करने भेज देतीं और खुद उनके लिए गर्म तेल की कटोरी लेकर आ जातीं।

शाम को दोनों बालकनी में बैठकर एक साथ चाय पीतीं, पुराने जमाने के किस्से साझा करतीं, अपने-अपने मायके और ससुराल की बातें कर ठहाके लगातीं। घर का माहौल इतना हल्का, खुशनुमा और पवित्र हो गया था कि वरुण और नेहा को देखकर लगता था जैसे वे स्वर्ग में हैं। नेहा की सेहत में भी तेजी से सुधार हो रहा था, क्योंकि इस बार उसके चेहरे पर दो पाटों के बीच पिसने का तनाव नहीं, बल्कि दो माओं के आंचल की निश्चिंतता थी।

देखते ही देखते सवा महीना कैसे पंख लगाकर उड़ गया, पता ही नहीं चला। शारदा जी के वापस देहरादून जाने का दिन आ गया।

जाने से ठीक एक दिन पहले की शाम थी। नेहा अपने कमरे में बच्ची को लेकर सो रही थी और वरुण आरव को पार्क ले गया था। घर में शांति थी। शारदा जी आंगन में बैठकर सूखे कपड़े तह कर रही थीं, तभी निर्मला जी दो कप चाय लेकर वहां आ गईं।

चाय की चुस्की लेते हुए शारदा जी से अब रहा नहीं गया। उनके मन में जो सवाल पिछले सवा महीने से घुमड़ रहा था, वह आखिर होंठों पर आ ही गया। उन्होंने कप नीचे रखते हुए निर्मला जी की आंखों में देखा और बड़े ही आत्मीय स्वर में पूछा, “निर्मला बहन, आज जाने से पहले मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूं। सच कहूं तो इस बार जब मैं घर से चली थी, तो मेरे कदम बहुत भारी थे। लेकिन यहां आकर एक पल के लिए भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं अपनी बेटी के ससुराल में हूं। मुझे लगा ही नहीं कि यह घर पराया है। इतना मान, इतना अपनापन तो शायद मुझे मेरे मायके में भी नहीं मिलता। आखिर इन आठ सालों में ऐसा क्या हुआ कि आप इतनी बदल गईं?”

शारदा जी की बात सुनकर निर्मला जी के चेहरे पर एक गहरी, शांत मुस्कान आ गई। उनकी आंखों में थोड़ी नमी भी चमक उठी। उन्होंने शारदा जी का हाथ अपने हाथों में लिया और धीरे से बोलीं, “शारदा बहन, आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं। मैं जानती हूं कि आठ साल पहले जब आरव का जन्म हुआ था, तब मेरे कठोर और अड़ियल स्वभाव की वजह से आपको यहां बहुत अपमान और घुटन सहनी पड़ी थी। उस वक्त मुझ पर ‘लड़के की मां’ और ‘सास’ होने का झूठा अहंकार सवार था। मुझे लगता था कि यह मेरा घर है, मेरा बेटा है, मेरा पोता है… इसमें लड़की की मां का क्या काम? मैं हर बात में आपको नीचा दिखाकर खुद को बड़ा साबित करना चाहती थी।”

निर्मला जी ने एक लंबी सांस ली और आगे कहा, “लेकिन कहते हैं ना, इंसान को तब तक दूसरे के जूते का कांटा महसूस नहीं होता, जब तक वह खुद नंगे पांव कांटों पर न चले। आज से तीन साल पहले मेरी बेटी मानसी को जब पहला बच्चा हुआ, तो उसके ससुराल पुणे में मुझे दो महीने जाकर रहना पड़ा था। बस, उन्हीं दो महीनों ने मेरी आंखों पर पड़ी अहंकार की पट्टी उतार दी।”

शारदा जी चुपचाप, अपलक निर्मला जी को सुन रही थीं।

निर्मला जी की आवाज थोड़ी भर्रा गई, “शारदा बहन, मानसी की सास ने मेरे साथ बिल्कुल वैसा ही व्यवहार किया, जैसा मैंने आपके साथ किया था। बात-बात पर टोका-टाकी, रसोई में मेरे जाने पर नाक-भौं सिकोड़ना, हर काम में कमी निकालना… मुझे वहां हर पल यह अहसास कराया गया कि मैं लड़की की मां हूं और वहां सिर्फ एक नौकरानी की तरह काम करने आई हूं। उन दो महीनों में मैं रात-रात भर छुपकर रोई हूं। मुझे प्यास लगती थी तो पानी मांगने में शर्म आती थी। सबसे ज्यादा कलेजा तब फटता था, जब मेरी बेटी मानसी मेरे और अपनी सास के बीच पिसकर आंसू बहाती थी। उस पराएपन की पीड़ा ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया।”

निर्मला जी ने अपने आंसू पोंछते हुए शारदा जी के हाथों को और कसकर थाम लिया, “जिस दिन मैं पुणे से वापस दिल्ली की ट्रेन में बैठी, उस पूरी रात मुझे नींद नहीं आई। मुझे सिर्फ आपका चेहरा याद आ रहा था। मुझे अहसास हुआ कि अपना घर तो अपना ही होता है, लेकिन जब एक मां अपनी बेटी की खातिर अपना घर छोड़कर उसके ससुराल आती है, तो वह पहले ही अपनी सारी सुविधाएं और स्वाभिमान पीछे छोड़कर आती है। ऐसे में अगर उसे वहां थोड़ा सा सम्मान और अपनापन भी न मिले, तो वह घर उसके लिए किसी जेल से कम नहीं होता। बेटी की मां और सास जब एक छत के नीचे लड़ती हैं या खिंची-खिंची रहती हैं, तो उसका सबसे भयानक जहर हमारे ही बच्चों के वैवाहिक जीवन में घुलता है। मैंने तभी भगवान के सामने कान पकड़े और तय किया कि अगर मुझे कभी अपनी गलती सुधारने का मौका मिला, तो मैं इस घर को आपके लिए पराया नहीं, बल्कि आपका अपना घर बनाऊंगी। शारदा बहन, हो सके तो मेरी आठ साल पुरानी नादानी के लिए मुझे माफ कर दीजिए।”

निर्मला जी के शब्द सुनकर शारदा जी की आंखों से झर-झर आंसू बह निकले। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर निर्मला जी को गले से लगा लिया। “अरे नहीं निर्मला बहन, माफी मत मांगिए! आपने तो आज मेरा दिल जीत लिया। गलतियां तो हम सभी से होती हैं, लेकिन जो इंसान वक्त की ठोकर से सीख लेकर अपने रिश्तों को संवार ले, उससे बड़ा कोई नहीं होता। आपने इन सवा महीनों में मुझे और मेरी बेटी को जो सुख दिया है, उसने आठ साल के सारे घाव भर दिए।”

कमरे के दरवाजे की ओट में खड़ी नेहा कब से उन दोनों की बातें सुन रही थी। उसकी आंखों में भी खुशी के आंसू छलक रहे थे। उसने देखा कि आंगन में दो माएं एक-दूसरे के गले लगकर मुस्कुरा रही थीं। आज नेहा को लगा कि उसकी नन्ही सी बेटी इस दुनिया की सबसे भाग्यशाली बच्ची है, जिसे एक ही छत के नीचे दादी और नानी का ऐसा निश्छल और पवित्र प्रेम मिल रहा है।

अगले दिन जब शारदा जी देहरादून के लिए रवाना हुईं, तो उनके कदम भारी नहीं थे, बल्कि मन में एक असीम संतोष था। वह अपने साथ कोई कड़वाहट नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास और निर्मला जी के हाथ से बने लड्डुओं का डिब्बा लेकर जा रही थीं, और साथ में यह वादा भी कि अब वह हर दो-तीन महीने में अपनी ‘बहन’ से मिलने दिल्ली जरूर आया करेंगी।

सच ही तो है, मकान तो ईंट और पत्थरों से बनते हैं, लेकिन वह ‘अपना घर’ तब बनता है जब उसमें रहने वाले लोग अपने अहंकार को छोड़कर एक-दूसरे के मान-सम्मान और भावनाओं की कद्र करना सीख जाते हैं। एक सास और एक मां जब समधन बनकर नहीं, बल्कि सखियां बनकर मिलती हैं, तो बच्चों का आंगन खुशियों से महक उठता है।

दोस्तों, क्या आपके परिवार में भी कभी ऐसा हुआ है जब किसी पुराने मनमुटाव को भुलाकर रिश्तों की एक नई और खूबसूरत शुरुआत हुई हो? एक मां और सास के इस बदलते रिश्ते पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं!

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रश्मि झा मिश्रा

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